राज्य सत्ता और सोशल मीडिया के अपवित्र गठबंधन का विरोध हो – के. सच्चिदानंदन

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फेसबुक द्वारा के. सच्चिदानंदन काे प्रतिबंधित करने से बुद्धिजीवियों में नाराजगी

प्रसिद्ध कवि और आलोचक के. सच्चिदानंदन को फेसबुक द्वारा ब्लॉक किए जाने पर कवियों, लेखकों, अकादमिशयनों व अन्य समाजकर्मियों ने गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा है कि कॉर्पोरेट मीडिया– चाहे सोशल मीडिया, प्रिंट या विजुअल– हमेशा लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरा रहा है, जिसका एक उदाहरण फेसबुक ने पेश किया है।

गौरतलब है कि मलयालम कवि के. सच्चिदानंदन साहित्य अकादमी के सचिव भी रहे हैं तथा उनके रचाना-कर्म को भारतीय लेखन के प्रतिनिधि-लेखन के रूप में देखा जाता रहा है। उन्हें फेसबुक ने प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के बारे में एक व्यंग्यात्मक पोस्ट करने के कारण 24 घंटे के लिए ब्लॉक कर दिया था। यह समय-अवधि समाप्त होने के बाद फेसबुक ने उनका अकाउंट बहाल कर दिया है।

जनवादी लेखक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष हिंदी कवि चंचल चौहान ने इस प्रतिबंध का विरोध करते हुए कहा कि के. सच्चिदानंदन हमेशा लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और वैज्ञानिक चेतना के विकास के लिए संघर्ष करते रहे हैं। उन्हें फेसबुक द्वारा प्रतिबंधित किया जाना एक खतरनाक संकेत है।

हिंदी कवि अरुण कमल ने कहा कि जिस तरह की स्थितियां सोशल मीडिया से संबंधित ये बड़ी कंपनियां पैदा कर रही हैं, उसमें यह आवश्यक हो गया है कि स्वतंत्र लोगों द्वारा वैकल्पिक मीडिया बनाया जाए, जैसा कि लघु-पत्रिका आंदोलन के समय किया गया था। उन्होंने कहा कि “फेसबुक जैसे संस्थान दुनिया के सबसे अमीर लोगों द्वारा संचालित हैं तथा यहां आपको बोलने की आजादी तभी तक है, जब तक कि वे आपको चुप नहीं करवा देते।”

इतिहासकार शेखर पाठक ने कहा कि के. सच्चिदानंदन केवल कवि और स्वतंत्रचेता बुद्धिजीवी ही नहीं हैं, बल्कि वे पिछले कई दशकों से भारतीय साहित्य और विभिन्न भाषाओं के बीच एक सेतु भी रहे हैं। उनकी आवाज को दबाने की यह कोशिश निंदनीय है।
इस संबंध में के. सच्चिदानंदन ने कहा कि “मुझे एक पल के लिए भी यह नहीं लगता कि यह महज एक व्यक्तिगत मुद्दा है, बल्कि यह सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा किए जा रहे सर्विलांस से संबंधित है, जो वृहत्तर समुदाय से जुड़ा है और जिसके तार भारत की सत्ताधारी पार्टी की अलोकतांत्रिक विचारधारा से जुड़े हैं। यह एक ऐसी विचारधारा है जो मतभिन्नता और प्रतिरोध को कुचल देना चाहती है।” उन्होंने कहा कि ऐसे अनेक लोग हैं, जिन्हें सोशल मीडिया पर मुझसे बहुत अधिक कड़े प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है। उन्हें फेसबुक पर लंबी अवधि के लिए प्रतिबंधित किया गया है। मुझ पर लगाए गए प्रतिबंध का मामला उनकी तुलना में काफी छोटा है। उन्होंने कहा कि इन दिनों ट्वीटर लोगों को द्वारा किए गए ट्वीट के आधार पर राजद्रोह के मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं तथा उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि “हमें राज्य-सत्ता और कॉरपोरेट मीडिया के बीच अपवित्र सांठगांठ का विरोध करना चाहिए”।

जिन अन्य लेखकों, अकादमिशयनों ने फेसबुक के इस कदम का विरोध किया, उनमें लेखक व कवि अशोक वाजपेयी, इतिहासकार सुधीर चंद्र, शेखर पाठक, पर्यावरणविद् समर बागची, एस. फैजी, के. जे. जॉय, श्रीधर राममूर्ति, समाज विज्ञानी दुनू राय, लेखिका सूसी थारू, क्योटो विश्वविद्यालय, जापान के प्रोफेसर रोहन डीसूजा, राज्य सभा सांसद मजीद मेमन, फंट्रियर के संपादक रहे तिमिर बसु, प्रसिद्ध पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता, टी. के. अरूण, शंकर, रघुरामन, प्रमोद रंजन, हंस पत्रिका की प्रबंध संपादक रचना यादव, जावेद आनंद, समाजशास्त्री बद्री नारायण, अमित भादुड़ी, अकैडमिशियन राजीव गुप्ता, वरयाम सिंह, एम. माधव प्रसाद, राधाकृष्ण बरीक, करेन गेब्रियल, अजित मेनन, पी.के. विजयन, एम. मोहंती, अनंत कुमार गिरि, फेलिक्स पैडल, चंदन पांडेय, प्रताप एंटोनी, प्रदीप एस. मेहता, राकेश बटाब्याल, आशीष मिश्र, दिविक रमेश, नितीन देसाई, एस अख्तर एहतिशाम,ध्रुव रैना, प्रभु महापात्र, सव्यसाची, मृदुला मुख़र्जी और आदित्य मुखर्जी प्रमुख हैं।

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