राजीव कुमार झा की कविताएंः खूब सवेरे मन की पगडंडी पर चलकर

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यह प्यार भरा मन . . . शांत सुबह में अब कहाँ जागता . . . . खूब सवेरे मन की पगडंडी पर चलकर . . . . इस बाग बगीचे के बाहर कल आये . . . .कितनी दुर नदी बहती है . . . .यह आसमान भी उतना ही फैला . . . किस निर्जन वन में कहीं सिमट गर जाये . . . आज हवा की हलचल से भरी दुपहरी . . . . साथ रहेगी वही सुबह कभी इससे जो नहीं डरी . . . . अब झुरमुट में आकर हँसना . . . कलियों ने पंखुरियों का पहना गहना . . . अब अपनी खुशियाँ सबसे कहना . . . . वर्षा ग्रीष्म ऋतु की छोटी बहना . . . आयेगी सावन में लेकर रिमझिम सरस फुहारें . . . सबके सब उसके अपने जो प्यारे . . . बारिश में आज रातभर हम किससे हारे . . . . हँसते तारे . . . . इस कड़ी धूप में जो भी हारे . . . . . . . . . यह प्यार भरा मन . . . शांत सुबह में अब कहाँ जागता . . . . खूब सवेरे मन की पगडंडी पर चलकर . . . . इस बाग बगीचे के बाहर कल आये . . . .कितनी दुर नदी बहती है . . . .यह आसमान भी उतना ही फैला . . . किस निर्जन वन में कहीं सिमट गर जाये . . . आज हवा की हलचल से भरी दुपहरी . . . . साथ रहेगी वही सुबह कभी इससे जो नहीं डरी . . . . अब झुरमुट में आकर हँसना . . . कलियों ने पंखुरियों का पहना गहना . . . अब अपनी खुशियाँ सबसे कहना . . . . वर्षा ग्रीष्म ऋतु की छोटी बहना . . . आयेगी सावन में लेकर रिमझिम सरस फुहारें . . . सबके सब उसके अपने जो प्यारे . . . बारिश में आज रातभर हम किससे हारे . . . . हँसते तारे . . . . इस कड़ी धूप में जो भी हारे . . . . . . . . . . . . . .
तुम्हारे मन का सुवास . . . सुबह रंगबिरंगे फूलों का प्यार . . महकती रात के अंतिम पहर में . . . उसी नदी के किनारे से हवा आयी . . . . ओ ज्योत्सना आनंद की रिमझिम बारिश सुबह की ओस में तुम हरी दूब पर चमकती . . . . रंगबिरंगी किरनों को बुलाती . . . अपने पास अब यह धूप की धार है . . . .कोई पगडंडी कहाँ फसल भरे खेतों से होकर गुजरती . . . कितने साहस से यहाँ उस ठंड में आते रहे . . . .किसी सिहरती रात में इस नदी का यह मौन हलचल से भरा स्वर . . . . . सात धाराओं में कितनी दूर बहती रात वह . . . धूप भरी इस झील में यह मुस्कुराता चेहरा तुम्हारा . . . . यह स्वर्णभूमि सचमुच कितनी सुंदर है

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