मोदी सरकार कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई तेज़ करे, अपनी जनता के ख़िलाफ़ नहीं

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जनवादी लेखक संघ का बयान

मोदी सरकार कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई तेज़ करे, अपनी जनता के ख़िलाफ़ नहीं

यह बेहद शर्मनाक है कि जिस समय देश कोरोना महामारी के अभूतपूर्व संकट से गुज़र रहा है, देशव्यापी तालाबंदी के कारण अर्थव्यवस्था भयावह संकुचन की कगार पर है, आम आदमी की रोज़ी-रोटी छिन गयी है और निरुपाय प्रवासी मज़दूर देश के राजमार्गों पर दम तोड़ रहे हैं, उस समय केंद्र और अनेक राज्यों की सत्ता पर क़ाबिज़ हिन्दुत्ववादी शक्तियां अपना सांप्रदायिक और दमनकारी एजेंडा चलाने में मुब्तिला हैं| कोरोना-बंदी को उन्होंने अपना एजेंडा लागू करने के लिए एक सहूलियत में तब्दील कर लिया है| दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के द्वारा उमर ख़ालिद को ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि (निवारक) क़ानून (UAPA) के तहत बुक किया जाना इसकी सबसे ताज़ा कड़ी है|

स्मरणीय है कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली की साम्प्रदायिक हिंसा के नाम पर सीएए विरोधी आन्दोलनकारियों की झूठे आरोपों के तहत गिरफ़्तारी कोरोना-बंदी के दौर में ही शुरू की गयी| पहले जामिया के विद्यार्थी मीरान हैदर और जामिया को-ऑर्डिनेशन कमेटी की संयोजक सफूरा ज़रगर को उत्तर-पूर्वी दल्ली की हिंसा की साज़िश में शामिल होने के नाम पर गिरफ़्तार किया गया; वे अभी न्यायिक हिरासत में हैं| फिर इसी कड़ी में कल जनेवि के भूतपूर्व छात्र नेता उमर ख़ालिद और भजनपुरा के निवासी दानिश को अभियुक्त बनाया गया| दिल्ली पुलिस ने इन सभी के ख़िलाफ़ यूएपीए जैसे काले क़ानून के तहत मुक़दमा दर्ज किया है और अब वह इन आरोपितों की ग़ैर-कानूनी संलिप्तताओं का क़िस्सा गढ़ने में लगी हुई है| ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, 13 अप्रैल को गिरफ़्तार हुई सफूरा ज़रगर और राजद की छात्र इकाई के नेता मीरान हैदर पर यूएपीए के तहत मुक़दमा दर्ज करने का कारण “पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया के साथ उनके सम्बन्ध” हैं| उन पर यूएपीए की धारा 13, 15, 16, 17 एवं 18 लगाई गयी है जिनका वास्ता आतंकवादी गतिविधियों और फंडिंग से है|

उमर ख़ालिद के बारे में दिल्ली पुलिस यह क़िस्सा बना रही है कि एक भेदिये से अपराध शाखा की नारकोटिक्स इकाई के एक सब-इंस्पेक्टर को यह जानकारी मिली कि 23-25 फरवरी को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई साम्प्रदायिक हिंसा एक ‘सुनियोजित साज़िश’ थी जिसकी रूपरेखा उमर ख़ालिद और दो अन्य लोगों ने तैयार की थी|

यह बेहद शर्मनाक है कि देशव्यापी तालाबंदी का इस्तेमाल सीएए विरोधी आन्दोलनकारियों के उत्पीड़न के लिए किया जा रहा है| ऐसे समय में, जब लॉक डाउन के नाम पर लोगों का घरों से निकलना प्रतिबंधित कर दिया गया है, केंद्र में बैठे भाजपा सरकार के इशारे पर दिल्ली पुलिस काले क़ानूनों के दुरुपयोग में लिप्त है|

और यह सिर्फ दिल्ली पुलिस की बात नहीं है, उत्तर प्रदेश में जिस तरह ‘द वायर’ के संस्थापक सम्पादक सिद्धार्थ वरदराजन के ख़िलाफ़ झूठा मुक़दमा दर्ज किया गया, गुजरात में प्रशांत भूषण और कन्नन गोपीनाथन के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया, कश्मीर में जिस तरह तीन पत्रकारों—मसरत ज़ाहरा, आशिक़ पीरज़ादा और गौहर गिलानी—पर आपराधिक मुक़दमे दर्ज किये गए, जिस तरह लॉक डाउन और कोरोना महामारी को दरकिनार करके आनंद तेलतुम्बड़े और गौतम नवलखा जैसे बुद्धिजीवियों को संगीन अपराधियों की तरह जेल भेजा गया, इनसे पता चलता है कि कोरोना और देश के मौजूदा हालत की चिंता भाजपा की सरकारों को कितनी कम है| उनकी प्राथमिकताएं अभी भी उनके हिन्दुत्ववादी एजेंडे से ही तय हो रही हैं| जैसा कि प्रख्यात वकील दुष्यंत दवे का कहना है, जब संसद बंद है और न्यायपालिका कोमा में है, जनता के पक्ष में किसी तरह के हस्तक्षेप की उम्मीद नहीं की जा सकती, और पुलिस, अर्द्धसैनिक बल तथा नौकरशाही का इस्तेमाल जनता का उत्पीड़न करने के लिए किया जा रहा है| महामारी से उत्पन्न परिस्थितियों का इस्तेमाल जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करने, अल्पसंख्यकों ख़ास तौर से मुसलमानों को हमले का निशाना बनाने, और जनता में साम्प्रदायिक नफ़रत को बढ़ाते हुए अपने हिन्दुत्ववादी एजेंडे को मज़बूती प्रदान करने में किया जा रहा है| सत्ताधारी पार्टी महामारी पर निगरानी के नाम पर लोगों की निजता को पूरी तरह कुचलने की ओर बढ़ रही है और जैसी कि कई बुद्धिजीवियों ने आशंका व्यक्त की है, यह आने वाले दिनों में सामान्य चलन बन सकता है, जो कि लोकतंत्र के लिए बहुत ख़तरनाक होगा| लोकतंत्र पर किये जा रहे उसके हमले को लेकर मुख्यधारा मीडिया न केवल चुप है, बल्कि ऐसे हमलों के लिए झूठी ख़बरें फैलाकर माहौल को और बिगाड़ने में लगा है|

यह कितने शर्म की बात है कि इस कठिन समय में जहाँ मोदी सरकार को अपना ध्यान कोरोना और देशव्यापी तालाबंदी से उत्पन्न संकटों से निपटने में लगाना चाहिए, वह अपने विरोधियों को निपटाने में लगी है| विश्व-विख्यात अर्थशास्त्री अपने सार्वजनिक बयानों के माध्यम से इस सरकार को जो सुझाव दे रहे हैं, उन पर अमल करने की रत्ती भर कोशिश नहीं की गयी| गोदामों में बफर स्टॉक नॉर्म से तीनगुना ज़्यादा अनाज भरा है, लेकिन जनता भूख से मर रही है| अचानक की गयी तालाबंदी की घोषणा से इस देश के मजदूरों और ख़ास कर प्रवासी मजदूरों पर जो दुर्दिन टूट पड़ा है, उसके लिए मोदी सरकार के पास कोई योजना नहीं है| लेकिन अपने विरोधियों को निपटाने के लिए मौक़े का फ़ायदा उठाने में यह सरकार पूरी तरह मुस्तैद है|

जनवादी लेखक संघ केंद्र सरकार के इस रवैये की कठोर निंदा करता है और उससे यह मांग करता है कि

(1) कोरोना की आड़ में विपक्ष का दमन बंद किया जाए;

(2) तालाबंदी के बीच जिन बुद्धिजीवियों और सीएए विरोधी आन्दोलनकारियों को गिरफ़्तार किया गया है, उन्हें रिहा किया जाए;

(3) तमाम तानाशाहीपूर्ण कार्रवाइयां वापस ली जाएं;

(4) केंद्र सरकार के गोदामों में पड़े हुए अनाज को राशन के रूप मजदूरों में देशव्यापी स्तर पर बांटा जाए;

(5) लॉक डाउन लागू करने के दमनकारी अधिकार पुलिस से वापस लिए जाएं|

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)
राजेश जोशी (संयुक्त महासचिव)
संजीव कुमार (संयुक्त महासचिव)

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