बीमारी कोरोना नहीं बल्कि यह व्यवस्था है

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” मैं हूँ ना ” यह डायलॉग आप ने शाहरुख खान की मूवी में सुना होगा । लेकिन अब यह डायलॉग फ़िल्म से निकल कर राजनीति में आ पहुंचा है । एक आधी अधूरी शक्ति वाला नेता जब इतना बड़ा डायलॉग मारता है तो इस से यही स्प्ष्ट होता है कि वह केवल भावनात्मक खिलवाड़ कर रहा है । यही भावनात्मक खिलवाड़ उसे दुनिया के इतिहास में सबसे बड़े मसखरे नेता से जोड़ता है । फ़र्क़ इतना है कि बड़ा नेता अक्सर मसखरी के साथ भावनात्मक खिलवाड़ करता है यह आधा अधूरा नेता उतरा हुआ मुंह लेकर भावनात्मक खिलवाड़ कर रहा है ।
हा गया कि कहीं मत जाइयेगा ” मैं हूँ ना ” लेकिन मज़दूर जानते हैं कि इस वीभत्स पूंजीवादी दुनिया में उनकी भूख और पेट के बीच सिर्फ कमाई हुई रोटी ही होती है । कोई नेता उन्हें वँहा दूर दूर तक नहीं दिखता है । मज़दूरों ने “मैं हूँ ना ” को स्वीकार नहीं किया ।  शहरों की सभ्य दुनिया पर थूक कर निकल पड़े अपने गांवों की ओर ।
मज़दूर कोरोना से नहीं भूख और शहरों की पूंजीवादी कीमतों से डरते हैं । बिजली बिल , किराया , डॉ बाबू की फीस , राशन ये चार चीजें दिल्ली में रहने वाले प्रवासी मज़दूरों की आधी से ज्यादा गाढ़ी कमाई छीन लेती हैं ।
मकानमालिक किसी भी पार्टी का हो । चाहे देशभक्ति का ढोंग करने वाला संघी ही क्यों न हो ? लेकिन किराया वक़्त पर चाहिए । महीना होते ही , लक्ष्मी चाहिए । देशभक्ति गई तेल लेने । महीना होते ही हिन्दू बिन्दु कुछ नहीं चलता ।
हर पार्टी को सपोर्ट करने वालों के यही हाल हैं ।
कुछेक हो सकते हैं जो अभी भी मनुष्य के रूप में जिंदा हैं । बाकी तो दुनिया जंगल हो चुकी है । गांव हो या शहर सब जगह एक का खर्चा दूसरे की आय । मुनाफे को प्राथमिकता ।श्रम का शोषण । चरम पर है ।
मज़दूर यह सब जानते हैं । उन्हें पता है उनकी ज़िंदगी से किसी को कोई लेना देना नहीं है । कोई मदद के लिए नहीं आएगा । जिस देश में बच्चा भात भात कहते हुए मर जाये उस देश में राजनीतिक गलियारों से ” मैं हूँ ना ” का केवल एक ही अर्थ है , राजनीति ।
इसलिए मंत्री महोदय यह भावनात्मक खिलवाड़ बन्द कीजिये । लोगों को धोखा मत दीजिये । किसान आंदोलन को खत्म करने के लिए कोरोना की अफवाह उड़ाई गई है । यह सब समझ आता है । राष्ट्रीय पूंजी का दबाव देशभक्त पार्टी नहीं सहन कर पा रही है फिर आप तो स्वयम भी उसी तबके से आते हैं । लोक डाउन लगा कर मज़दूरों को क्यों भगाया जा रहा है दिल्ली से ? मज़दूर किसान आंदोलन में मदद नहीं करेंगे । आप को किसानों को यहां से भगवाना है । भगवा दीजिये । कौन मना कर रहा है ? लेकिन लोगों को तो घरों में बंद मत कीजिये । हमें पता है आप के वोट बैंक में एक बड़ा हिस्सा संघी वोटरों का भी है । इस लिए आप मज़दूरों की चिंता किये बगैर लोक डाउन लगा बेठे ।
ऐसी क्या आफत आ गई भैया मंत्री महोदय ? एक ओर  केंद्र सरकार की आंदोलन के विरुद्ध योजना पूरी हुई दूसरी ओर आप ने लोक डाउन लगा दिया । बीजेपी के कॉंग्रेस मुक्त भारत के सपने को दिल्ली में ज़रूर आप ने पूरा किया है लेकिन क्या अब आप अम्बानी अडानी द्वारा किसान मुक्त भारत के सपने को पूरा करने के लिए भी राष्ट्रवादियों के साथ हो लिए हैं । संघ प्रेम दर्शाने के लिए ही हनुमान मंदिर जाना हुआ था क्या ? केंद्र से राज्यों को मिलकर चलना चाहिए लेकिन केंद्र की मनमानियों को कूटनीतिक समर्थन देना जनविरोधी है ।।
अब तो दवाई भी है । अमिताभ बच्चन का एड भी बंद हो गया । जिन्हें कोरोना है ,इंजेक्शन लगाइए । ठीक कीजिये । क्या दिक़्क़त है ? दवाई होने के बावजूद यह बीमारी बढ़ क्यों रही है ? बीमारी कोरोना नहीं बल्कि यह व्यवस्था है जिसे आप सब बचाये हुए हैं । इस लिए इस व्यवस्था को बदलना ज़रूरी है ।
अपील , घरों से बाहर निकलिए । किसानों का साथ दीजिये । किसान आप की भूख के लिए लड़ रहे हैं । उनकी आवाज़ में आवाज़ मिलाइए । यह समय राजभक्त नहीं बल्कि देशभक्त बनने का है । किसान बचेंगे तभी देश बचेगा ।। दिल्ली में लोक डाउन इसी लिए लगाया गया है ताकि किसानों को अकेला किया जा सके । दिल्ली की प्रबुद्ध जनता किसानों का साथ न दे सके । आप का ध्यान भटकाने के लिए ही कहा गया है कि चारों तरफ कोरोना का कहर है । ऑक्सीजन खत्म हो रही है । लोग मर रहे हैं । चारों तरफ श्मशान बन गया है । डरिये मत । भूमि के दो ही रूप हैं । एक घर । दूसरा श्मशान । डरना कैसा ?
. रवि निर्मला सिंह

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