मुनाफा को केंद्र में रखकर नहीं बल्कि समाज की जरूरत के अनुसार उत्पादन करने की जरूरत

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विश्व पूंजी के जाल में सिमटती हुई दुनिया की अर्थव्यवस्था पिछले कई साल से मंदी के दौर से गुजर रही है। ‘वाशिंगटन सहमति’ के आधार पर दुनिया को चलाने का फार्मूला आजमाने के लिए कई तरकीबें चलाई गईं। बाजार को हर मर्ज का इलाज कहा गया। यहां तक कि पूंजी के पैरोकार ने तो इतिहास का अंत तक कह डाला। किंतु कुछ ही सालों में असलियत पर से पर्दा हटने लगा। पूंजीवाद लगातार आर्थिक मंदी के चपेट में आता गया। आर्थिक मंदी से हाशियाकरण तेज गति से बढ़ा। आज पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था आधारभूत आर्थिक मंदी के दलदल में धंसती जा रही है। इससे उपजे जन असंतोष के कारण संगठित तथा स्वतःस्फूर्त आंदोलनों की बाढ़ सी आ गई है। मंदी से उबरने के लिए विभिन्न देशों की सरकारें खासकर तीसरी दुनिया के देशों की सरकारें आक्रामक रूप धारण कर रही है। जैसा कि क्रांतिकारी विचारक कार्ल मार्क्स ने कहा है कि “राजनीति अर्थनीति की घनीभूत अभिव्यक्ति होती है” तो हम इस लेख के माध्यम से आर्थिक मंदी और उससे उपजे राजनीतिक परिदृश्य का विश्लेषण करेंगे। उससे पहले जानते हैं कि आखिर आर्थिक मंदी है क्या और उसका कारण क्या है? अक्सर आम लोग वृहद स्तर पर ना सोच पाने के कारण आर्थिक संकट को सही तरीके से समझ नहीं पाते। कई लोग सोचते हैं कि आर्थिक संकट का मतलब समाज में उत्पादन की कमी होगी। ऐसा नहीं है, “पूंजीवादी आर्थिक संकट उत्पादन में कमी होने की वजह से नहीं बल्कि अति उत्पादन होने की वजह से आता है”। पर यह तथाकथित ‘अति उत्पादन’ निरपेक्ष अति उत्पादन नहीं होता। इसका मतलब यह नहीं होता कि समाज द्वारा उत्पादित वस्तुएं इतनी ज्यादा हैं कि लोग उन सब का उपभोग नहीं कर सकते। बल्कि आम जनता में क्रय शक्ति न होने की वजह से वे वस्तुएँ खरीद नहीं पाते। आम मेहनतकश लोग कई जरूरी मांग होने के बाद भी नहीं खरीद पाते है। उद्योगों में मजदूरों को यह कह कर छंटनी की जाती है कि इतना ज्यादा उत्पादन हो गया कि उसकी बिक्री नहीं हो पा रही है। इसलिए पूंजीवादी अति-उत्पादन सापेक्षिक अति-उत्पादन होता है। दूसरे शब्दों में, सामाजिक उत्पादन का अधिक्य केवल लोगों की क्रय शक्ति के सापेक्ष होता है। आर्थिक संकटों के दौर में, मांग के अभाव में पूंजीपति के गोदामों में माल का स्टॉक जमा होता जाता है। विभिन्न माल पड़े-पड़े सड़ जाते हैं या यहां तक कि उन्हें जानबूझकर नष्ट किया जाता है। ताकि इसके मूल्य और मुनाफे पर कोई विशेष प्रभाव ना पड़े। 1929 की विकट आर्थिक मंदी के दौरान खाद्य सामग्री को समुद्र में फेंका जा रहा था, आलू को केरोसिन तेल में डुबोकर सड़कों पर फेंका जा रहा था, दूध से खेतों को सींचा जा रहा था तथा कपड़ों और जूतों की होली जलाई जा रही थी। अभी हाल में भारत में भी ऐसी कई घटनाएं देखने को मिलीं। लाखो टन खाद्य सामग्री गोदामों में सड़ाई जाती है लेकिन उसे भुखमरी के शिकार लोगों में नहीं बाटा जाता है। व्यापक मेहनतकश जनता जो इसका उत्पादन करती है वह रोटी कपड़ा खरीदने की भी क्षमता नहीं रखती है तथा भुखमरी से जूझती रहती है। पूंजीवादी उत्पादन में ज्यादा से ज्यादा उत्पादन की होड़ में नई तकनीकों को अपनाया जाना, बड़ी संख्या में किसानों, दस्तकारों तथा छोटे व मंझोले उत्पादकों को दिवालिया बना देता है। जिससे छोटी पूंजी बड़ी पूंजी द्वारा निगल ली जाती है। तथा पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में इंसान के बजाय मुनाफा प्रमुख होने के कारण मालिक ज्यादा से ज्यादा मुनाफा के चक्कर में मजदूरों और व्यापक मेहनतकाश को हमेशा मजदूरी को न्यूनतम संभव स्तर तक घटाने की कोशिश करता है। इससे व्यापक जनसमुदाय को अपने ही उत्पाद खरीदने से रोकता है जैसे बाटा मजदूर द्वारा बाटा के जूते न खरीद पाना, रेमंड गारमेंट मजदूर द्वारा रेमंड के कपड़े न खरीद पाना। इस तरह एक ओर उत्पादन का जबरदस्त विस्तार तथा दूसरी और मेहनतकाश व व्यापक गरीब आबादी की क्रयशक्ति न होने से माल धीरे-धीरे गोदामों में जमा हो जाता है और यह सापेक्षिक अतिउत्पादन आर्थिक संकट को जन्म देता है।
काल मार्क्स बता गए हैं कि “आर्थिक संकट पूंजीवादी व्यवस्था में एक असाध्य रोग है तथा एक अवश्यंभावी परिघटना है जो बार-बार हर चंद सालों में चक्रीय रूप में आती है”। इतिहास में पीछे मुड़कर देखने पर हम पाते हैं कि पूंजीवाद की शुरुआत से ही बड़े पैमाने पर आर्थिक संकट आया। 1825 ई, 1848 ई, 1867 ई में फिर आर्थिक संकटों की पुनरावृत्ति हुई। औसतन हर 10 से 20 वर्ष में एक बार वे पैदा होते रहें हैं। इसके बाद तो और भी गंभीर संकटों का लगातार क्रम बना रहा। 1910 ई तथा 1929 ई का महान आर्थिक संकट ने तो प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्ध को जन्म दिया, जो मानव इतिहास के काले अध्याय में जुड़ गया है। यह आर्थिक संकट हजारों छोटे-बड़े उद्योगों को बंद कर देता है, लाखों मजदूर बेरोजगार हो जाते हैं, बाजारों में मंदी छा जाती है, ना केवल मजदूर बल्कि दुकानदार, कर्मचारी और अन्य मंझोले तबके को भी मंदी की मार झेलनी पड़ती है। केवल चंद बड़े पूंजीपति इसका फायदा उठाते हैं। वे छोटे और मंझौले कारखाने को खरीद लेते हैं। उन्हें बाजार से बाहर कर देते हैं और जब आर्थिक संकट खत्म होता है तो बाजार से छोटा और मंझौला पूंजीपति व कारोबारी गायब हो गया होता है। और एकाधिकारी पूंजीपति का कब्जा पहले से भी ज्यादा मजबूत हो जाता है।

पूंजीपति वर्ग, बुर्जुआ अर्थशास्त्री और इसके पैरोकार तो पहले आर्थिक मंदी जैसी कोई परिघटना होती है, इसे मानने को तैयार ही नहीं थे। लेकिन 1929 की विकट आर्थिक मंदी ने उन्हें यह मानने पर विवश कर दिया। वे आर्थिक संकटों के बारे में मार्क्सवाद के वैज्ञानिक निष्कर्षों से बुरी तरह डरते और नफरत करते हैं। संकट और पूंजीवादी व्यवस्था का आपस में कोई संबंध नहीं है, यह दिखाने के लिए उन्होंने अपने दिमाग पर पूरा जोर डालकर तमाम किस्म के झूठ गढ़ डाले ताकि मेहनतकश जनता को धोखा देकर इस शोषणकारी व्यवस्था को बरकरार रखा जा सके। उदाहरण के लिए, इसमें से कुछ लोग संकटों का श्रोत “अल्प उपभोग (underconsumption)” को बताते हैं और संकट को समाप्त करने के लिए “उपभोग उत्प्रेरण (consumption stimulation)” के प्रयोग का सुझाव देते हैं। वास्तव में, मेहनतकश लोगों द्वारा अल्प उपभोग पूंजीवाद के आने के साथ ही अस्तित्व में नहीं आया। जब से मानव समाज शोषक और शोषित वर्गों में बँटा है, तभी से यह मौजूद है। लेकिन अतिउत्पादन केवल पूंजीवाद में ही होता है। इस तरह स्पष्ट है कि ‘अल्प उपभोग’ के मत्थे मढ़कर अतिउत्पादन की व्याख्या नहीं की जा सकती। पूंजीवादी व्यवस्था में आर्थिक संकट केवल मैन्युफैक्चरिंग में नहीं बल्कि कृषि क्षेत्र में भी उत्पन्न होता है। कृषि संकट पूंजीपति के गोदामों में इकट्ठा होते भंडार, थोक मूल्य में गिरावट, खेतिहर मजदूरों की बढ़ती बेरोजगारी और किसानों के कंगाल होने के रूप में अभिव्यक्त होता है। मैन्युफैक्चरिंग संकट की ही तरह कृषि संकट अतिउत्पादन’ से उपजते हैं। लेकिन तुलनात्मक रूप से कृषि संकट ज्यादा समय तक चलते हैं। इसलिए 50 साल पहले जकड़ा कृषि संकट आज तक उबर नहीं पाया। कृषि उत्पादन के मामले में यदि देखा जाए तो भारत के केवल गंगा यमुना के मैदानों में ही इतना अनाज पैदा होता है कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को बैठाकर खिलाया जा सकता है। फिर भी इतनी भुखमरी है, यहाँ तक उसे उपजाने वाले किसान पिछले एक दशक में तीन लाख से ज्यादा की संख्या में आत्महत्या करने को विवश किये गए है। 2012 की एक रिपोर्ट के अनुसार एक साल में करीब 58 लाख टन अनाज गोदामों में सड़ गया है। और यह लगभग हर साल होता है।
आर्थिक संकट पूंजीवाद के बुनियादी अंतरविरोध को और तीखा कर देता हैं। संकटों के दौरान पूंजीपतियों के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज हो जाती है। बड़ों उद्यमों के साथ होड़ में टिक पाने में अक्षम बहुत से लघु और मंझौले उद्यम पहले कंगाल होते हैं। कर्जा चुकाने के लिए बहुत से मध्यम और लघु उद्योग नीलाम हो जाते हैं। इस तरह पूंजीवादी समाज में, हर संकट के बाद पूंजी कुछ पूंजीपतियों के हाथों में और अधिक संकेंद्रित और सघन हो जाती है। इस तरह समाज में दो वर्गों के बीच खाई और चौड़ी हो जाती है तथा उनके बीच अंतर्विरोध तीखे हो जाते हैं। संकटों के दौरान अपना घाटा कम करने के लिए पूंजीपति सीधे जनता पर हमला करते हैं। वह मजदूरों की बड़े पैमाने पर छंटनी करते हैं, मजदूरी घटाते हैं, श्रम कानून में मजदूरों को दिए गए अधिकार छीनते हैं, टैक्स बढ़ाते हैं, पूंजीपति सरकार के गंठजोड़ से अपना लोन माफ करवाते हैं, अपना टैक्स कम करवाते हैं तथा घाटा के नाम पर सरकारी खजाना जो आम जनता के पैसों से होता है लेकर वापस नहीं करते, सरकारी उपक्रमों को निजी हाथों में बेचते हैं, बाजार में परिचालन पूंजी बैंकों द्वारा केन्द्रीकृत करवाई जाती है, मुद्रा का अवमूल्यन कर महंगाई बढ़ाते हैं, इस प्रकार सारा बोझ श्रमिक जनता की पीठ पर पटकने की कोशिश करते हैं। निजीकरण उदारीकरण और वैश्वीकरण के नाम पर जनविरोधी साम्राज्यवादी नीति को लागू करते हैं। इस तरह की नीति को लागू करने पर जनता भी इसका प्रतिरोध बहुत तेज करती है। तब पूंजीवादी आर्थिक संकट के ‘हल’ के लिए उतारू सरकार बड़ी आक्रामकता से उनका दमन करती है। अपने विरोधियों को जेल में डालती है। कत्लेआम मचाने के लिए जनता को राष्ट्रवाद, जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर लड़वाती है। इसका मुखर प्रतिरोध करने वाले को अपने गुर्गे से हत्या करवा देती है। इसी को फासीवाद कहते हैं इसका सटीक उदाहरण जर्मन में जर्मनी में यहूदियों का हिटलर नाजी सरकार द्वारा नरसंहार, अमेरिका में मैकार्थी सरकार, इटली में मुसोलिनी। फासीवाद कोई अलग चीज नहीं होता है बल्कि पूंजीवादी व्यवस्था में उदारवादी सरकार और फासीवादी सरकार एक ही सिक्के के दो अलग अलग पहलू हैं। जब आर्थिक संकट गहराता है तो उदारवादी सरकार हार जाती है या तो वह फ़ासीवादी आक्रामक रूप धारण कर लेती है। इसका उदाहरण भारत में आपातकाल के दौरान उदारवादी कहे जाने वाली कांग्रेस की इंदिरा गांधी है। आज सत्ता में आसीन नरेंद्र मोदी और अमित शाह को देख सकते हैं। कवि वरवर राव ने कहा था कि “मोदी कोई और नहीं बल्कि राजीव गांधी का ही अवतार हैं”। दोनों ही स्थिति में पूंजी के जूए से मेहनतकाश जनता को मुक्ति नहीं मिलती। यहाँ पर महान क्रांतिकारी लेनिन का कथन कहना प्रासंगिक होगा कि ” हर कुछ वर्षों के चुनाव में मेहनतकशों को एक बार यह तय करने की अनुमति दी जाती है कि उत्पीड़न पूंजीपति वर्ग के कौन से विशेष प्रतिनिधि संसद में उनका प्रतिनिधित्व करेंगे और उनका दमन करेंगे!” इस तरह के आर्थिक संकट को हल पूंजीवादी व्यवस्था में किया ही नहीं जा सकता। आर्थिक संकट का हल केवल और केवल व्यवस्थित और सामूहिक मालिकाना वाली उत्पादन प्रणाली से किया जा सकता है। जो मुनाफा को केंद्र में रखकर नहीं बल्कि समाज की जरूरत के अनुसार उत्पादन करें यानी समाजवादी उत्पादन प्रणाली स्थापित करनी होगी।
विश्वनाथ कुमार

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