मार्क्स की इंसान की अवधारणा

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ये एरिक फ्रॉम की पुस्तक का पहला अध्याय है। ऐसे 14 अध्याय हैं, जिन्हें हम धारावाहिक के रूप में प्रकाशित करेंगे। आपकी टिप्पणियों का इंतजार रहेगाः संपादक

लेखक एरिक फ्रॉम

अनुवादः प्रणव एन

1 मार्क्स की अवधारणाओं में घालमेल

इसे इतिहास की विडंबना ही कहेंगे कि स्रोतों तक पहुंच के असीमित साधनों वाले इस दौर में भी सिद्धांतों के साथ तोड़-मरोड़ और गलतफहमियों का कोई अंत नहीं है। इस प्रवृत्ति का सबसे ज्वलंत उदाहरण है पिछले कुछ दशकों में कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों के साथ हुई तोड़-मरोड़। प्रेस में, नेताओं के भाषणों में, किताबों में और प्रतिष्ठित दार्शनिकों-समाजशास्त्रियों के लेखों में लगातार मार्क्स तथा मार्क्सवाद का जिक्र होता रहा है, इसके बावजूद ऐसा लगता है कि कुछ अपवादों को छोड़कर नेताओं और मीडियाकर्मियों ने कभी मार्क्स की लिखी एक लाइन पर भी नजर नहीं डाली है और समाजशास्त्री भी मार्क्स की न्यूनतम जानकारी से ही संतुष्ट हैं। साफ है कि वे इस क्षेत्र के विशेषज्ञ की एक्टिंग करने में कोई खतरा महसूस नहीं करते क्योंकि सोशल रिसर्च के उनके साम्राज्य में हैसियत और ताकत रखने वाला कोई भी शख्स उनके अज्ञानतापूर्ण वक्तव्यों को चुनौती नहीं देता।

मार्क्स के विचारों को लेकर जो तमाम गलतफहमियां फैली हैं, उनमें सबसे ज्यादा प्रचलित और व्यापक है मार्क्स के ‘भौतिकवाद’ से जुड़ी गलतफहमी।  इन मान्यताओं के मुताबिक मार्क्स ऐसा मानते थे कि मनुष्य को गतिशील रखने वाला सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक कारक होता है पैसा और भौतिक सुख-सुविधाएं हासिल करने की उसकी इच्छा। अधिकतम संभव लाभ की यही इच्छा उसकी निजी जिंदगी में भी सबसे बड़ा प्रेरक तत्व होती है और मनुष्य जाति के जीवन में भी। इस मान्यता के साथ ही यह धारणा भी उतना ही व्यापक रूप ले चुकी है कि मार्क्स ने व्यक्ति के महत्व की उपेक्षा की है, कि मार्क्स की दृष्टि में मनुष्य की आध्यात्मिक जरूरतों की कोई अहमियत नहीं थी, न ही उन्हें इनकी कोई समझ थी और यह कि उनका आदर्श था अच्छा खाने और अच्छा पहनने वाला ‘आत्मारहित’ मनुष्य। मार्क्स द्वारा की गई धर्म की आलोचना को तमाम आध्यात्मिक मूल्यों के नकार के रूप में लिया जाता है और उन लोगों के लिए यह बात और भी स्पष्ट होती है जो मानते हैं कि आध्यात्मिक रुझान के लिए ईश्वर में आस्था अनिवार्य है।

मार्क्स के बारे में बना यह नजरिया यहीं नहीं रुकता। यह उनके समाजवादी समाज की व्याख्या लाखों लोगों के ऐसे समूह के रूप में करता है जो सर्वशक्तिशाली राज्य नौकरशाही के आगे पूरी तरह समर्पित हो चुके होते हैं, ऐसा समाज जिसने समानता भले हासिल कर ली है पर जिसे अपनी आजादी खो देनी पड़ी है; भौतिक तौर पर संतुष्ट ये तमाम ‘व्यक्ति’ अपनी वैयक्तिकता खोकर ऐसे लाखों रोबॉट या चलती-फिरती मशीनों के रूप में सफलतापूर्वक तब्दील हो चुके होते हैं जिनकी कमान मुट्ठी भर अभिजन (इलीट) नेताओं के हाथों में होती है।

शुरू में इतना कहना ही काफी होगा कि मार्क्स के ‘भौतिकवाद’ की यह लोकप्रिय तस्वीर – उनका आध्यात्मिकता विरोधी रुख, समरूपता और अधीनस्थता को लेकर उनका आग्रह – सिरे से गलत है। मार्क्स का मकसद था मनुष्य को आध्यात्मिक मुक्ति दिलाना, आर्थिक स्थितियों की बेड़ी से उसे आजाद कराना,  उसे फिर से संपूर्ण इंसान का रूप देना और उसे दूसरे इंसानों से तथा प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करने में सक्षम बनाना। मार्क्स का दर्शन, धर्मनिरपेक्ष और नास्तिक भाषा में पैगंबर मसीहाई (प्रोफेटिक मेसियनिजम) परंपरा में एक नया और आमूल परिवर्तन लाने वाला कदम था; इसका लक्ष्य था वैयक्तिकता को पूर्ण रूप से अमल में लाना, वही लक्ष्य जो पुनर्जागरण और सुधारों के काल से 19वीं सदी तक पश्चिमी सोच का मार्गदर्शन करता रहा।

यह तस्वीर निस्संदेह बहुत से पाठकों को चौंका सकती है क्योंकि यह उन बातों से एकदम उलट है जो वे मार्क्स के विचारों के बारे में अब तक सुनते-पढ़ते आए हैं। लेकिन इन बातों के विस्तार में जाने से पहले मैं उस विरोधाभास को रेखांकित करना चाहता हूं जो इस तथ्य में निहित है कि मार्क्स के लक्ष्य और समाजवाद की उनकी अवधारणा की निंदा के तौर पर जो विवरण दिए गए हैं वे दरअसल मौजूदा पश्चिमी पूंजीवादी समाज पर फिट बैठते हैं। इस समाज के ज्यादातर लोग ज्यादा भौतिक फायदा पाने की इच्छा से प्रेरित हैं और उनकी इस इच्छा पर कोई अंकुश अगर होता है तो बस सुरक्षा की चिंता का, जोखिम टालने की भावना का। एक ऐसी जिंदगी में ही संतुष्ट रहने की उनकी भावना लगातार मजबूत होती जाती है जो उत्पादन और उपभोग दोनों ही क्षेत्रों में राज्य, बड़े निगम और दोनों की अपनी नौकरशाहियों द्वारा नियमित तथा नियंत्रित की जाती है। वे अनुकूलता के उस स्तर तक पहुंच चुके हैं जिसने उनकी वैयक्तिकता को उल्लेखनीय स्तर तक मिटा दिया है। मार्क्स के शब्दों में कहा जाए तो वे काम शक्ति से संपन्न, मशीनों की सेवा में लगे नपुंसक ‘वस्तु मानव’ हैं। बीसवी शताब्दी के मध्य के पूंजीवाद की ही तस्वीर को ले लें तो वह विरोधियों द्वारा बनाए गए मार्क्स के समाजवाद के कैरिकेचर से शायद ही अलग दिखे।

इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि जो ‘भौतिकवाद’ का आरोप लगाते हुए मार्क्स की तीखी आलोचना करते हैं, वही लोग समाजवाद को इस आधार पर अव्यावहारिक बताते हैं कि समाजवाद इस बात को स्वीकार नहीं करता कि मनुष्य को कार्य करने के लिए प्रेरित करने वाला एकमात्र कारगर तत्व भौतिक लाभ पाने की उसकी इच्छा है। अपने लिए सुविधाजनक हो तो अधिक से अधिक स्पष्ट अंतर्विरोधों को भी तर्कों की आड़ में नजरअंदाज करने की मनुष्य की असीमित क्षमता का इससे अच्छा उदाहरण शायद ही कोई और मिले। जिन बातों को इसका सबूत बताया जाता था कि मार्क्स के विचार हमारी धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं के कितने विपरीत हैं और जिन बातों का मार्क्स के विचारों के बरक्स हमारी मौजूदा व्यवस्था के बचाव में इस्तेमाल किया जाता था, उन्हीं बातों के जरिए वही लोग यह भी साबित करते रहे कि पूंजीवाद मानव प्रकृति के समरूप है और इसीलिए ‘अव्यावहारिक’ समाजवाद से बहुत-बहुत अच्छा है।

मैं यह बताने की कोशिश करूंगा

-कि मार्क्स की यह व्याख्या पूरी तरह गलत है;

-कि मार्क्स के सिद्धांत ऐसा नहीं मानते कि मनुष्य को प्रेरित करने वाला मुख्य कारक भौतिक लाभ है;

-कि मार्क्स का उद्देश्य ही मनुष्य को आर्थिक जरूरतों के दबाव से मुक्त करना था ताकि वह पूरी तरह इंसान बन सके;

-कि मार्क्स की मुख्य चिंता यह थी कि मनुष्य की एक व्यक्ति के रूप में मुक्ति कैसे संभव हो, कैसे उसका अलगाव दूर किया जाए और वह दूसरे मनुष्यों से तथा प्रकृति से पूरी तरह तादात्म्य स्थापित करने की अपनी क्षमता वापस हासिल कर सके;

-कि मार्क्स का दर्शन धर्मनिरपेक्ष भाषा में एक आध्यात्मिक अस्तित्ववाद रचता है और इस आध्यात्मिक खूबी के चलते यह भौतिकवादी व्यवहारों तथा हमारे युग के भौतिकवादी दर्शन के विपरीत है;

-कि मार्क्स की इंसान की अवधारणा पर आधारित उनका लक्ष्य, समाजवाद दरअसल उन्नीसवीं सदी की भाषा में मूलतः प्रोफेटिक मेसियनिजम ही है।

फिर आखिर यह कैसे हो सकता है कि मार्क्स के दर्शन को इस कदर गलत समझा गया और उसे तोड़-मरोड़ कर एकदम विपरीत रूप दे दिया गया? इसके कई कारण हैं। पहला और सबसे स्पष्ट कारण है अज्ञानता। ऐसा लगता है कि ये ऐसे विषय रहे जो विश्वविद्यालयों में नहीं पढ़ाए गए, किसी परीक्षा में इससे जुड़े सवाल नहीं किए गए और इसलिए हर व्यक्ति इन पर अपने ढंग से सोचने, बोलने और लिखने के लिए ‘आजाद’ रहा, इसे ढंग से समझने की चिंता किए बगैर भी। कोई ऐसी सम्मान्य अथॉरिटी नहीं रही जो तथ्यों और सच्चाइयों का सम्मान किए जाने पर जोर देती। इसलिए हर कोई खुद को मार्क्स पर बोलने का अधिकारी समझने लगा, उन्हें पढ़े बगैर या कम से कम इतना पढ़े बगैर कि उनकी जटिल, गूढ़ और सूक्ष्म विचार पद्धति का कुछ अंदाजा हो सके। इससे भी फर्क नहीं पड़ा कि इंसान की, उसके अलगाव की, उसकी मुक्ति आदि की मार्क्स की अवधारणा बताने वाली उनकी प्रमुख दार्शनिक कृति ‘इकॉनमिक एंड फिलॉसफिकल मैन्युस्क्रिप्ट्स’ अभी हाल तक अंग्रेजी में अनुवादित नहीं हुई थी और इसलिए उनके कई विचार अंग्रेजीभाषी जगत के लिए अनजान थे।

हालांकि यह तथ्य किसी भी सूरत में मार्क्स को लेकर फैली अज्ञानता की व्याख्या करने के लिए काफी नहीं है क्योंकि मार्क्स की इस किताब का अंग्रेजी में काफी देर से अनुवादित होना अपने आप में इस अज्ञानता का कारण ही नहीं उसका परिणाम भी था। दूसरी बात यह कि मार्क्स के मूल दार्शनिक विचार उनकी अंग्रेजी में पहले प्रकाशित किताबों में भी इतने साफ हैं कि इस तरह की गलतफहमियों से बचना मुश्किल नहीं था।

इसका एक और कारण इस तथ्य में निहित है कि रूसी कम्यूनिस्टों ने मार्क्स के सिद्धांतों पर अपना कब्जा जमा लिया और पूरी दुनिया को यह यकीन दिलाने की कोशिश की कि उनके सिद्धांत और व्यवहार मार्क्स के ही विचारों के अनुरूप हैं, जबकि बात उल्टी थी। पश्चिम ने उनके प्रचारात्मक दावों को स्वीकार कर लिया और यह मान बैठा कि मार्क्स के सिद्धांत ठीक वही हैं जो रूसियों के सिद्धांत और व्यवहार बताते हैं। हालांकि रूसी कम्यूनिस्ट अकेले नहीं हैं जो मार्क्स के विचारों को तोड़ने-मरोड़ने के दोषी हों। वैयक्तिक गरिमा और मानववादी मूल्यों की ऐसी-तैसी करने के मामले में जरूर उन्हें विशिष्टता हासिल रही है, लेकिन जहां तक अर्थशास्त्रीय भौतिकवाद के प्रतिपादक के तौर पर मार्क्स के विचारों को तोड़ने-मरोड़ने का सवाल है तो उसमें साम्यवाद विरोधियों और सुधारवादी समाजवादियों की भी भागीदारी रही है। इसके कारणों को समझना मुश्किल नहीं है। जहां मार्क्स के सिद्धांत पूंजीवाद की समीक्षा हैं वहीं उनके बहुत से समर्थक पूंजीवादी भावनाओं में इस कदर डूबे हुए थे कि उन्होंने मार्क्स के विचारों की व्याख्या समकालीन पूंजीवाद में प्रचलित अर्थशास्त्रीय और भौतिकवादी मानकों के अनुरूप कर दी। बेशक, सोवियत कम्यूनिस्टों के साथ ही सुधारवादी समाजवादी भी खुद को पूंजीवाद का दुश्मन मानते थे, लेकिन असलियत यह थी कि उन्होंने साम्यवाद और समाजवाद को पूंजीवादी चेतना के साथ ग्रहण किया था। उनके लिए समाजवाद कोई ऐसा नया समाज नहीं था जो पूंजीवाद से मानवीय तौर पर एकदम अलग हो। उनके अनुसार यह पूंजीवादी समाज का ही एक अलग रूप था जिसमें मजदूर वर्ग को ऊंची हैसियत मिली हुई होती है। इसे ही एंगल्स ने एक बार व्यंग्यात्मक स्वर में कहा था, ‘मौजूदा समाज, इसकी कमियों के बगैर।’

अब तक हमने मार्क्स के विचारों में तोड़-मरोड़ के तार्किक और वास्तविक कारणों पर बात की है। लेकिन, इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसे अतार्किक कारण भी रहे हैं जिन्होंने इस तोड़-मरोड़ में मदद की है। सोवियत संघ को तमाम बुराइयों का मूर्त रूप समझा जाता था; ऐसे में स्वाभाविक ही था उसके विचारों को शैतानी प्रभाव से ग्रस्त माना जाने लगता। 1917 के बाद कुछ ही दिनों के अंदर कम्यूनिस्ट शैतान का रूप माने जाने लगे और उनके सिद्धांतों पर निष्पक्षता से विचार होना मुश्किल हो गया। इस नफरत का कारण आम तौर पर उस आतंक को बताया जाता है जो स्टालिनवादियों ने लंबे समय तक बनाए रखा। लेकिन इस व्याख्या की प्रामाणिकता पर संदेह के पुख्ता आधार मौजूद हैं। आतंक और अमानवीयता का ऐसा ही दौर जब फ्रांसीसियों ने अल्जीयर्स में, ट्रुजिलो ने सैंटो डोमिंगो में और फ्रैंको ने स्पेन में कायम किया तो उनके खिलाफ ऐसी नैतिकतापूर्ण नाराजगी नहीं जताई गई, बल्कि कोई नाराजगी नहीं जताई गई। इतना ही नहीं, स्टालिन की बेलगाम आतंककारी व्यवस्था जब ख्रुश्चेव की प्रतिक्रियावादी पुलिस राज्य में बदली तब भी उसकी ओर खास ध्यान नहीं दिया गया।

इन सबसे हम यह सोचने को मजबूर होते हैं कि क्या रूस के प्रति जताई जा रही यह नैतिकतापूर्ण नाराजगी सचमुच मानवतावादी और नैतिक भावनाओं पर आधारित है या इसका कारण सिर्फ इस एक तथ्य में निहित है कि वहां की व्यवस्था में निजी संपत्ति नहीं थी।

यह कहना मुश्किल है कि मार्क्स के दर्शन में तोड़-मरोड़ और घालमेल के लिए ऊपर बताए गए कारकों में से सबसे ज्यादा जिम्मेदार कौन सा था। संभवतः हर व्यक्ति और राजनीतिक समूह के संदर्भ में इनकी भूमिका का महत्व बदल जाता है। ऐसी संभावना नहीं है कि इनमें से कोई एकमात्र कारक इसके लिए जिम्मेदार हो।

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