मतदाता की नज़र में बिकाऊ माल क्यों बन गया है मीडिया?

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विजयशंकर चतुर्वेदी (कवि-पत्रकार)

माल्कन एक्स ने कहा था- “अगर आप सावधान नहीं रहेंगे तो अख़बार आपको उन लोगों से नफ़रत करना सिखा देंगे जिनका उत्पीड़न किया जा रहा है और उन लोगों से प्यार करना सिखा देंगे जो उत्पीड़न कर रहे हैं।” मीडिया के बारे में यह कोई उत्तेजना भरा बयान नहीं है बल्कि हमारे इस क्रूर और कठिन समय की वास्तविकता का रेखांकन है और मीडिया के बारे में, उसके आचरण के बारे में सभी को आगाह भी किया गया है। जनविश्वास क़ायम करने का वहाँ भी संघर्ष पैदा हो गया है। एक दौर ऐसा था कि लोग पत्रकारिता पर अगाध विश्वास करते थे। अब स्थिति भिन्न है। पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर जबरदस्त प्रश्नांकन हैं क्योंकि पत्रकारिता अनेक रूपों में विकसित हो गई है- प्रिन्ट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया, डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया, न्यू मीडिया, ऑनलाइन मीडिया, ऑफलाइन मीडिया आदि, जहाँ सूचनाओं की बमबारी के बीच सच और झूठ का फर्क कर पाना आम पाठक के लिए टेढ़ी खीर है.

पत्रकारिता या मीडिया को प्रजातंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है। यदि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो मीडिया में काम करने वाले प्रायः अच्छे माने जाते थे। क्योंकि तब पत्रकारिता एक मिशन थी। पत्रकारिता में ऐसे लोग काम करते थे जो जनता के विश्वासों को जीवित रखना चाहते थे। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद मीडिया या पत्रकारिता की अहमियत रही है। उसे अपनी करनी के द्वारा एक व्यापक पहचान मिली थी। पत्रकारिता या मीडिया अपने समय पर अपने समाज को प्रतिबिम्बित करती रही है, लेकिन पूरी जिम्मेदारी के साथ। प्रश्न उठता है कि क्या आज भी ऐसा है? इस पत्रकारिता पर लांछनों की, भूल की परतें विगत कई वर्षों से चढ़ रही हैं। उसका दागदार चेहरा भी निरन्तर सामने आने लगा है। उसकी विश्वसनीयता संशय के दायरे में है। लोग कहने लगे हैं कि वह सत्ता के पक्ष में काम करने लगी है। वहाँ भी सत्ता, लालच, धन के प्रति विराट आकर्षण है।

यह आज की पत्रकारिता का एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह भी है कि पत्रकारिता से जुड़े लोग यदि थोड़ा भी असावधान हुये, उन्होंने जनता की तरफ़दारी की तो उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाता है। उन्हें पूरी तरह से खरीदने की कोशिश होती है। सत्तापक्ष जो चाहता है वह उससे कराना चाहता है। सच्चे पत्रकार यदि माफियाओं के काले कारनामें के बारे में लिखते हैं तो या तो उन्हें नौकरी से हटवा दिया जाता है या उनकी हत्या कर दी जाती है। समय बदला अब मीडिया सरकारों का मोर्चा है। इसीलिये ज़्यादातर पत्रकार सत्ता के पक्ष में हैं। अपने स्वार्थवस खड़े होते हैं। यदि ये पत्रकार विपक्ष की स्थितियों को उजागर करते हैं तो सत्ता या तो उनका गला घोंट देती है या खत्म करने का का करती है। सत्ता में चाहे जो पार्टी हो वे पत्रकारिता को अपने पाले में खींचने का प्रयास करते हैं। विपक्ष को समाप्त करने की एजेंसी के रूप में काम किया जाता है। सत्ताओं को विपक्ष की आवश्यकता नहीं है वे अपने दम पर निष्कंटक होना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें कि वे तानाशाहियत के बाड़े में आ चुके हैं।

पत्रकारिता कोई आज की चीज़ नहीं है। पत्रकारों ने इसकी इब्तेदा से ही हमारी वास्तविकताओं को, हमारी स्थितियों को, हमारी विकास यात्रा को ठीक ढंग से जानने-पहचानने की कोशिश की है। पत्रकारों ने अपने छोटे-छोटे साधनों के द्वारा बड़े ऊँचे-ऊँचे सपने देखे और बड़ी-बड़ी कार्यवाहियाँ कीं। भारत में ही अंग्रेजों की दासता के ख़िलाफ़ जनजीवन को नई आस्थायें एवं नई उमंग और उनके हृदय में उत्साह भरा। पत्रकारों ने एक ‘विज़न’ के जरिये संघर्ष किये। पैसा नहीं था लेकिन हौसला तो था, साधन नहीं थे तो संघर्ष का जलवा तो था। जनकल्याण के लिये माद्दा तो था। बहुत कम पैसों में लस्टम-पस्टम तरीके से निकले पत्रों और पत्रिकाओं ने हमारे देश में वो फ़िजा बनाई कि उनकी लेखनी से विदेशी शासन तक थर्राता था।

मीडिया ने अपने ढंग से देशी सामंतों और राजे-रजवाड़ों के ख़िलाफ़ एक मुहिम छेड़ी। पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ संघर्षशील लड़ाई लड़ी। यह उस जमाने में छोटा नहीं निश्चय ही बड़ा काम था। इन पत्रकारों ने अंधेरे में रहकर गुमनामी और गुलामी में जीकर आज़ाद ख़्यालों के जो पर्चे बांटे उनकी धमक हमें आज भी सुनाई पड़ती है। उनकी पक्षधरता और मूल्यों का संचरण हमें प्रेरणा देता है। अकबर इलाहाबादी ने कभी कहा था कि जब तोप मुकाबिल हो, अख़बार निकालो। जनता की आवाज़ को बहुत दूर तक पहुँचाओ। कहाँ तो वो दिन थे और कहाँ आज के दिन हैं। तब हम गुलाम थे अब आज़ाद भारत में और जनतंत्र व्यवस्था में हैं। सभी चीज़ें वहीं हैं लेकिन हमारे सोचने का नज़रिया बदला है। हमारी स्वार्थ साधना के नये-नये रूप विकसित हुये हैं। अपनी स्वार्थ साधना में सत्ता और सत्ता से जुड़े लोग पत्रकारिता को हिन्दू माइथॉलॉजी में प्रसिद्ध ऋषि नारद से भी जोड़ रहे हैं। बाक़ायदे अब नारद जयन्ती मनाई जा रही है। मैं तो कहता हूं कि उन कबूतरों की भी जयंतियाँ मनाईं जायें जो प्रारंभिक दौर में संदेशवाहक हुआ करते थे।

आज शासन जो और जैसा चाहता है- वही मीडिया करने पर तुला है। सच्चे लेखकों, संस्कृतिकर्मियों और पत्रकारों को हम लगातार पीठ दिखा रहे हैं। उनकी नृशंस हत्यायें हो रहीं हैं। यह अंधेरे में नहीं खुलेआम है और दिन दहाड़े हो रहा है। हत्यारे निष्कंटक घूम रहे हैं। उनको जल्दी पकड़ने की किसी की हिम्मत नहीं, इरादा नहीं। स्पष्ट है कि यह सब सत्तातंत्र की शह से हो रहा है। लेकिन दुखद स्थिति यह है कि इस दौर में मीडिया की भूमिका निरन्तर संदेहास्पद और हास्यास्पद हुई है। किसी ने लिखा था- ‘हर किसी के हाथों बिक जाने को तैयार नहीं/ये मेरा दिल है तेरे शहर का अख़बार नहीं।’ शासन प्रशासन ने मीडिया को अपनी तरफ़ या अपने पक्ष में कर लिया है। प्रलोभन का विकट महामायाजाल है। जिसमें प्रायः अधिकांशतः फंस ही जाते हैं। ‘माया महाठगनी हम जानी’- कबीर ने ऐसे ही नहीं कहा था। यह माया मात्र स्त्री भर नहीं है। इसके असंख्य और अनंत रूप और रूपाकार हैं।

मीडिया में कुछ ही लोग हैं जो प्रलोभनों की दुनिया से बाहर होकर आम जनता की वाणी और संघर्षों को तरजीह देते हैं। झूठ, प्रवंचनाओं और छल से सत्ता के किले से हमें बाहर ले जाने का प्रयत्न करते हैं। मीडिया में कई ऐसे पत्रकार हैं जो जनपक्षधर हैं वे जनता की लड़ाई को वाणी देते हैं। मिसाल के तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में रवीश कुमार हैं, अभिषेक श्रीवास्तव हैं, पुण्य प्रसून वजपेयी हैं, अभिसार शर्मा हैं। लेकिन जब वे निर्भीकता से अपनी बातें रखते हैं तो कुछ को नौकरी से निकाल दिया जाता है और कुछ को जान से मारने की धमकियां दी जाती हैं। डराने के और भी सौ तरीके हैं, जो आपातकाल के वक़्त नहीं थे। सरकारें सबको नहीं डराती हैं, सिर्फ़ उन्हें डराती हैं जिनसे उन्हें डर लगता है। ऐसे ही लोगों के आसपास डर का माहौल रचा जाता है। यही वह माहौल है जहाँ से सत्ता अपको डराती है। डर का कोई दस्तावेज़ नहीं मिलता। यह एक तरह का सुनियोजित षड़यंत्र है, जो इन दिनों लगातार पनपा है।

हास्यास्पद स्थिति यह है कि मीडिया के कुछ जानकार सत्ता और प्रशासन में जिस तरह की घटनायें घटा रहे हैं उनका बेहद सधे ढंग से खुलासा करते हैं। उसमें ऐसे प्रसंग हैं कि हर किसी को दांतों तले उंगली दबानी पड़ेगी। बलात्कार अब घटना नहीं एक प्रसंग हो गया है। फिर भी चुनाव के समय महिला मतदाताओं को पत्रकारिता के झूठ के द्वारा सत्ता के पाले में खींच लिया जाता है? यह भी एक तरह का मैनेजमेन्ट है। इन समूचे प्रश्नों को मीडिया सत्ता के पक्ष में रसगुल्ले और चाशनी के रूप में पेश करता है। मीडिया सत्ता के लिये हर धूल धक्कड़ को सोना और हीरा बना देता है। चरम विध्वंस और हत्याओं को विकास के मानकों से ढंक देता है। यह घनघोर असमंजस का समय है। मीडिया इधर के समय में देशभक्ति की जो परिभाषायें रूढ़ कर रहा है, उससे सहमत होना किसी के वश का नहीं। मीडिया देश से बड़ा होने की कोशिश कर रहा है जबकि देश सर्वोपरि होता है। उसकी परिधि, उसकी व्यापकता और समग्रता सबको अपने आगोश में ले लेती है। मीडिया विपक्ष का ध्वंस करने में सत्ता पक्ष का भोंपू बन बैठा है। उसे मालूम होना चाहिए कि विपक्ष देश नहीं रहेगा तो लोकतंत्र भी नहीं बचेगा और मीडिया को तो पाताल में गाड़ दिया जाएगा!

सत्तायें तो आनी-जानी हैं। हर हाल में मीडिया को जनपक्षधर पत्रकारिता करके मानवीय मूल्यों को और हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था को बचाना चाहिये। पर न जाने इस माध्यम को किसकी नज़र लग गई है। सत्ताधारी पार्टी यदि यह समझती है कि जो उसकी ग़लत नीतियों की आलोचना करते हैं वे देशद्रोही हैं। जो बहुसंख्यक कहें उसे सभी को मानना चाहिये। लेकिन कम से कम मीडिया को तो इस रुग्ण विचार को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। यह जनतंत्र की भावना और संविधान में निहित नीतियों के ख़िलाफ़ है। उरूग्वे के एक ख्यात साहित्यकार एदुआर्दो ग़ालियानो लिखते हैं- “अगर देशप्रेम की परिभाषा सरकार की अन्धआज्ञाकारिता नहीं हो, झण्डों और राष्ट्रगानों की भक्तिभाव से पूजा करना नहीं हो; बल्कि अपने देश से, अपने साथी नागरिकों से (सारी दुनिया के) प्यार करना हो, न्याय और जनवाद के उसूलों के प्रति प्रतिबद्धता हो; तो सच्चे देशप्रेम के लिये ज़रूरी होगा कि जब हमारी सरकार इन उसूलों को तोड़े तो हम उसके हुक्म मानने से इंकार करें।….. जिस धरती पर हर अगले मिनट एक बच्चा भूख या बीमारी से मरता हो, वहाँ पर शासक वर्ग की दृष्टि से चीज़ों को समझने की आदत डाली जाती है। लोगों को इस दशा को एक स्वाभाविक दशा समझने के लिये प्रशिक्षित किया जाता है। लोग व्यवस्था को देशभक्ति से जोड़ देते हैं और इस तरह से व्यवस्था का विरोधी एक देशद्रोही अथवा विदेशी एजेण्ट बन जाता है। जंगल के कानूनों को पवित्र रूप दे दिया जाता है ताकि पराजित लोग अपनी हालत को अपनी नियति समझ बैठें।” भारतीय मीडिया को इससे सबक हासिल करना चाहिए।

आजकल विकास-विकास का खेल खेला जा रहा है। किसान-मजदूर, शिक्षा-रोजगार, अस्पताल-सड़क की क्या हालत है, पुलों और भवनों के क्या हाल हैं, इस पर मीडिया की नज़र न के बराबर जाती है। हाँ, फ्लायओवर संस्कृति के जलवे के तहत सत्ताधारियों के पक्ष में चुनावी गणित साधने के लिए वह बराबर दुम हिला रहा है। हर गली मोहल्ले की सड़कें खुदी पड़ी हैं। प्रायः कहीं भी काम पूरा नहीं हैं। इस वास्तविकता को देखकर यही कहा गया है- यहाँ भी खुदा है, वहाँ भी खुदा है, जिधर देखते हैं खुदा ही खुदा है। शहरों में फ्लायओवरों का ढहना और उससे हुई अनेक मौतें कई प्रश्नचिन्ह हमारे सामने रख रही हैं। लेकिन मीडिया ने इन खबरों की ओर पीठ करके सत्ता के इशारे पर दिन रात हिंदू-मुस्लिम केंद्रित थोथी बहसों का जाल फैला रखा है।

कभी जनता की आवाज़ कहा जाने वाला मीडिया आज जनता की उम्मीदों की कब्रगाह बन गया है। कवि मदन कश्यप की इन काव्य पंक्तियों पर ध्यान दीजिए- “आप जो भाषा को खाते रहे/हमारे सपनों को खाना चाहते हैं/आप तो विचार को मारते रहे/हमारी संस्कृति को मारना चाहते हैं।” (अपना ही देश)। मीडिया की भूमिका धर्मप्रचारक की कभी नहीं रही लेकिन आजकल हिंदुत्व की एक नई परिभाषा गढ़ी जा रही है और मीडिया इसमें सहयोगी की भूमिका अदा कर रहा है। नब्बे के दशक से हिन्दुत्व का जुमला परोसा जाने लगा। यूँ तो जुमला पहले से भी चल रहा था लेकिन तब से वह केन्द्र में आ गया। मीडिया के बदले हुए रंग के चलते यह अब नारे की तरह चल रहा है। अब नेता हिन्दुत्व की चादर के नीचे सत्ता का खेल साध रहे हैं और गर्जना कर रहे हैं।

जुझारू और विचारवान पत्रकार गौरी लंकेश की दिन दहाड़े हत्या कर दी गयी। कहा यह भी जा सकता है कि हर कोई गौरी लंकेश नहीं बन सकता? उसमें गुर्दा होना चाहिये। जिसमें विहंगावलोकन की ताक़त होती है वही गौरी लंकेश बन सकता है? जो सच को सामने नहीं ला सकता वह काहे का पत्रकार? गौरी लंकेश ने अपने आख़िरी संपादकीय में लिखा था- “आज की मेन स्ट्रीम मीडिया केन्द्र सरकार और बी.जे.पी. के दिये आंकड़ों को जस का तस वेदवाक्य की तरह फैलाती रहती हैं। मेन स्ट्रीम मीडिया के लिये सरकार का बोला हुआ वेदवाक्य हो गया है। उसमें भी जो टी.वी. न्यूज चैनल हैं वो इस काम में दस क़दम आगे हैं।” (फेक न्यूज के जमाने में) गौरी लंकेश की जघन्य हत्या से समूचे भारत में सभायें हुईं, निन्दायें हुईं। हमारे देश में सत्ता का मत न स्वीकार करने वालों की श्रृंखलाबद्ध हत्या की जा रही है। यह एक सुविचारित हत्याओं का सिलसिला है। लेकिन मीडिया के बड़े वर्ग ने गौरी को विद्रोही और माओवादी बताते हुए उल्टा हत्यारों के पक्ष में हवा बनाने की कोशिश की. इतिहासकार हार्वर्ड जिन ने एक तथ्य की ओर हमारा ध्यान दिलाया था- “नागरिक अब तो हमारी समस्या नहीं है। हमारी समस्या है नागरिकों की आज्ञाकारिता। हमारी समस्या है कि दुनिया भर में ग़रीबी, भुखमरी, अज्ञान, युद्ध और क्रूरता का सामना कर रहे लोग आज्ञाकारी बने हुये हैं। हमारी समस्या यह है कि लोग आज्ञाकारी हैं जबकि जेलें मामूली चोरों से भरी हुईं हैं।… बड़े चोर देश को चला रहे हैं। यही हमारी समस्या है।” क्या मीडिया को इतना भी समझ में नहीं आता! लेकिन लोग बख़ूबी समझते हैं कि सत्ता की बातें मानने पर पत्रकार लाभ में रहते हैं। उनके लिये हर तरह के दरवाजे खुलते हैं। इसीलिये वे सतत् सत्ता का कीर्तन भजन गाते हैं। आख़िर रोजी-रोटी का मामला है, गाड़ी-घोड़ा का खेल है इसीलिए मीडिया से जुड़े लोग भी बिकते हैं। इसमें क्या शक? ये सत्ता झांसा भी देती है और आराम से लोगों को खरीदती भी है, इसे कौन नहीं जानता?

पिछले वर्षों लेखकों, संस्कृतकर्मियों, वैज्ञानिकों, दार्शनिकों और विचारकों ने कितने पुरस्कार वापस किये? ये क्या बात हुई कि जनतंत्र की खुले आम हत्या हो और कोई बोले नहीं? संस्कृतिकर्मी सत्ता के गुलाम नहीं होते। वे जनता के पक्ष में होते हैं और जनता की आवाज़ को बुलंद करते हैं। वे प्रतिपक्ष में रहकर ही ये संघर्ष कर सकते हैं। हत्या की राजनीति को जनता पी ले? निन्दा और कुकर्म पर चुप्पी साधे? यह शायद भारतीय इतिहास की पहली घटना है जब लेखकों ने इतना तीख़ा और तीव्र विरोध किया। लेकिन लांगूल चलाने वाले मीडिया ने उसे ‘पुरस्कार वापसी गैंग’ कहकर अपमानित किया। सत्ता ने इसे हंसी में लिया क्योंकि वह तो केवल गुणगान करने वालों को पसन्द करती है। एक शायर ने कहा है- ‘खामोशी अच्छी लगती नहीं कुछ तो गिला कीजिये/ जब कोई फैसला कीजिये दिल से भी मशविरा कीजिये।‘ लेकिन लगता है कि मीडिया ने दिल को किसी कोटर में छिपा दिया है।

जिन्होंने देश और पत्रकारिता के लिये कुछ किया है उन्हें हाशिये पर ठेला जा रहा है। बल्कि सच यह है कि उन्हें वाकई में ठेल दिया गया है। शायद अब अच्छे पत्रकारों की तलाश मीडिया मुग़लों को भी नहीं है। वहाँ चाटुकार और केंचुए भरे पड़े हैं। हम दोयम दर्जे़ के बहुत निम्न किस्म के व्यक्तियों को तलाशते हैं। केवल उनकी क़ाबिलियत यह होनी चाहिये कि वे सत्ता की हाँ में हाँ मिलाते हुए झूठ बोल सकें और सरकारी आतंक फैला सकें। दूसरों को गरिया सकें और लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर सकें। उनके कोटे भी फिक्स किये जा रहे हैं। जुझारू और अच्छे पत्रकारों को संकेत दिया जा रहा है कि बहुत क्रांतिकारिता कर ली, अब ऐसे ही किसी कोने अंतरे में पड़े फ़ाक़ाकशी करते रहो। काफ़ी दिनों से जनता के पक्ष में काम करते रहे हो, थक गये होगे, अब पूर्ण आराम करो।

मीडिया में तरह-तरह के विवाद, अपवाद, इतिहास से तोड़फोड़ और मनमाने निशाने साधे जा रहे हैं। अज्ञानी एंकर टीवी पर समझा रहे हैं कि देश के विकास के काम, समाज के काम, सरकार को नहीं विपक्ष को करने होंगे। मीडिया को खरीद चुके लोग ईमानदार पत्रकारों से कह रहे हैं कि आपके मन में अभी भी प्रतिष्ठा का भूत काम कर रहा है तो घर बैठो। अब तुम्हारा कोई हक़ नहीं बनता कि बार-बार टीवी पर अपनी सूरत दिखाओ। इस बात के लिये अकड़ो कि पत्रकारिता के लिए तुमने बड़े त्याग किये हैं, तुमने बड़ी तपस्या की है। ज़मीन से कटे पत्रकार कह रहे हैं कि हम लोग हैं न? सच मानो कुछ अच्छा ही कर गुज़रेंगे। तुम लोग दाढ़ी बढ़ाकर, खादी का झोला टाँगकर बहुत लम्बे अरसे से पत्रकारिता की मुख्य धारा में रहे हों। अब तुम हाशिये पर रहो। अभी तक हम लोग हाशिये पर ही थे। अब हमारे भी दिन फिरे हैं। कुछ हमें भी करने-खाने दो। तुम जनता की आवाज़ बन कर अमरत्व प्राप्त करना चाहते थे। हमारे दर्द को भी समझो। हम हमेशा बहुत दिक्कत में रहे हैं अब मौका मिला है तो उसका सुखभोग करने दो। जाहिर है कि असली मजा तो तब आता है जिनका पत्रकारिता से, जनआन्दोलन से, पठन-पाठन से कभी कोई लेना-देना नहीं था, जो पुरातनपंथियों के पिछलग्गू थे, इक्कीसवीं सदी में पाषाणकाल उतार लाने के हामी थे, वे अब पत्रकारिता के शीर्ष पर विराजमान हैं और खुलकर खेल रहे हैं। उनका कभी कोई नामोनिशान नहीं था, कभी भी उनकी कोई चर्चा ज़रूरी नहीं होती थी। अब वही सरताज हैं। अब पत्रकारिता के नायक चूहे बन गये और ख़बरों के खलनायक सुख-सुविधाओं की पिचकारी चला रहे हैं, सत्ता का फाग गा रहे हैं। अपनी बेईमानी की चाँदनी पर फूलकर कुप्पा हो रहे हैं।

मीडिया में उत्खनन की भी एक संस्कृति होती है। गड़े मुर्दे उखाड़ कर सत्ता की नाक में दम करना उसका एक हथियार होता है। खोजी पत्रकारिता का भी अपना एक मजा होता है। कभी-कभी पुराने कालपात्रों को उखाड़कर जब वर्तमान कालपात्रों से अटैच किया जाता है तो जनता की आँखें खुल जाती हैं। इस उत्खनन से बड़े-बड़े भीमकाय बलवान भी चित्त हो जाते हैं। राजीव गांधी और बोफोर्स का किस्सा तो याद ही होगा। लेकिन मीडिया आजकल उत्खनन का लाभ अपने मालिकान के लिए कर रहा है। कालपात्र तो खुल जाते हैं लेकिन उससे निकली हड्डियों को जनता के सामने नहीं लाया जाता। बाह में वे ब्लैकमेलिंग के काम आती हैं। बर्टोल्ड ब्रेख़्त ने पूर्व में ही सच कहा था- “सचमुच मैं अंधेरे युग में जीता हूँ/एक मासूम बोल बेवकूफी की अलामत है/जिस इंसान के माथे पर शिकन नहीं/ज़रूर वह पत्थर दिल है/कोई आदमी हंसता है तो/जान लो कि उस तक अभी पहुँची नहीं है बुरी खबर।” इस बुरी खबर को मीडिया दबाने का काम करता है।

इसे इस तरह समझना चाहिए कि एक गाँव के पण्डितजी ने पैसा कमाने के बारे में सोचा? उन्होंने एक जंगल में गड्ढा खुदवाकर चनों से भर दिया और उस पर एक पत्थर दबा कर लोगों से बताने लगे कि उन्हें रात में स्वप्न आया है कि वहाँ एक अद्भुत प्रतिमा विराजमान है। उसका अभिषेक करना चाहिये, उसकी प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिये। गाँव के गाँव पहुँचने लगे, घण्टा-घड़ियाल बजे, जलाभिषेक होने लगा। चना धीरे-धीरे फूलने लगा और पत्थर ऊपर उठने लगा। लोगों ने भगवान शिव के प्रकट होने पर जयकारा लगाया और पण्डित जी के वारे-न्यारे हो गये। पैसे और चढ़ोत्तरी के बहुमूल्य सामान से घर भर गया। लेकिन उन्होंने मरते दम तक अपनी धूर्तता का यह राज नहीं खोला। मीडिया भी काले कारनामों के सबूत इकट्ठा करके घर भरता है, मगर राज नहीं खोलता। उसका उत्खनन और पत्थर दबाने का कार्य जारी है।

आजकल मीडिया अपना मूल मिशन छोड़ कर सीधे बाज़ार में दुकान खोल कर बैठ गया है। वह विज्ञापनीकरण, कारपोरेट घरानों और सत्ता के गलियारों के इशारे पर नाचने के लिए पूँछ उठाए फिर रहा है। सत्ता से सांठगांठ उसका अंतिम आश्रय स्थल है। हमारे सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार, अट्टहास कर रहा है। दुनिया देख रही है लेकिन सत्ता से जुड़े लोगों को भ्रष्टाचार मीडिया को दिखाई नहीं पड़ता। मीडियाकर्मी अपनी आँखों के सामने मर्यादायें तार-तार होते देखता है और नज़रें झुकाकर सत्ता की तरफ़दारी करता है। वह भूल चला है कि उसका मिशन निष्पक्षता के साथ जनता के अधिकारों की हिफ़ाजत करना था। शायद उसी के लिए कहा गया था कि- न छिपते हैं न छिपकर बोलते हैं, हम आईना हैं मुँह पर बोलते हैं।

सच है कि पत्रकारिता और मीडिया की जनहितैषी छवि ऐसे ही नहीं बन गई थी। आज भी जो थोड़े ईमानदार लोग हैं उन्हें प्रतिपक्ष का आदमी मान लिया गया है। सत्ता पागल हाथी की तरह उनके पीछे पड़ी है और हर हाल में पैरों के नीचे कुचल देना चाहती है। लेकिन कुछ ऐसे विश्लेषण वीर पैदा हो गए हैं जिन्हें शाखामृग होने में सुविधा होती है। वे कब किसकी आरती उतारने लगेंगे, कहा नहीं जा सकता! वे न तो वाम में हैं न मध्य में न दक्षिण में। जब तक उन्हें लाभ मिल रहा है तब तक वे सबके हैं। उनका विश्लेषण सरकार और उसके सम्पूर्ण जुगाड़ पर टिका है। धन की हवस ने उन्हें अपने लपेटे में ले लिया है। उनका मुख्य मुद्दा है उन्हें लाभ कहाँ है? इसीलिए मीडिया की दुनिया में स्वार्थों के अखाड़े लोटते तथाकथित मीडियावीर हरसू नज़र आ रहे हैं। रुख हवाओं का जिधर होता है वे उधर के लिए चल पड़ते हैं। निदा फ़ाजली ने शायद इन्हीं के लिए लिखा है- “अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफर के हम हैं, रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।‘

भारतीय; ख़ास तौर पर हिन्दी पत्रकारिता के लिए यह काफी कठिन और जटिल समय है। जटिल इसलिये भी कि जो दिख रहा है वह, वह नहीं है। उसमें कई तरह के मामले एकसाथ फिट हैं। क्या मूल्यों की पत्रकारिता बनाम अवमूल्यन की पत्रकारिता का दौर शुरू नहीं हो गया? क्या अब नफ़रत और धोखा धड़ी की पत्रकारिता सतह पर नहीं आ गई? क्या टीवी स्टूडियो अदालतों की तरह फैसले और मुल्लों की तरह फ़तवे नहीं सुनाने लगे? यह कटुयथार्थ है कि अब पत्रकारिता भी राजनीति की तरह लोककल्याण की हिमायत से मुँह चुराती है। राजनीति की ही तरह पत्रकारिता आज दलित, आदिवासी, छोटी जातियों और ओबीसी वगैरह का खेल खेलती है। उनके बीच झगड़ा लगाने और नफ़रत फैलाने के स्पेशल धन्धे में फनफना रही है। उसके सामने कोई बड़ा टुकड़ा फेक दे तो वह उसी के चरण चूमने लगती है। ऐसे में फ़िल्म ‘गर्म हवा’ का एक वाक्य बार-बार गूंजता है- “अपने यहाँ एक चीज़ मजहब से भी बडी है और वह है रिश्वत।” इसीलिए कीमत केवल झूठे और लफ्फाज पत्रकार की है। कौन कितनी बड़ी लफ्फाजी कर सकता है। कितने झांसे दे सकता है और किस-किस को भरमा सकता है। शायद यही पत्रकार और एंकर की योग्यता है। इनकी पत्रकारिता देख-देख कर जनता की मनोदशा बकौल ग़ालिब कुछ-कुछ यों हो चुकी है-

खुशी जीने की क्या ,मरने का गम क्या

हमारी ज़िन्दगी क्या, और हम क्या?

राजनीति की तरह पत्रकारिता में सब ज़ायज नहीं है, होना भी नहीं चाहिए। लेकिन अब न लज्जा है, न आँख का पानी! तिहाड़ी कुकर्म ऐसे कि पीढ़ियाँ याद रखें। बल्ली सिंह चीमा का शेर देखें-

बड़ा बेशर्म हमलावर है दुनिया हाँकने वाला

अमन की बात करता है खंजर बेचने वाला

और श्रीराम मेश्राम कहते हैं-

देखता जा कि तेरे सामने आता क्या है

मीडिया हमको लगातार दिखाता क्या है

रूह की, जिस्म की, अस्मत की नुमाईश नंगी

रोज़ बाज़ार के हर घर में सजाता क्या है

मीडिया ने सत्ता के गुणगान का समा पूर्व में भी बांधा था। आज भी बांध रहा है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि मीडिया की पकड़ से बाहर का भारत बहुत बड़ा है। जनता वो रहपट देती है कि बड़े-बड़ों की लेंड़ी तर हो जाती है। जनता को मूर्ख न समझा जाये- वह सब देखती और समझती है। इसके बावजूद सत्य को हर तरफ़ से ढकने की कोशिश हो रही है। ग़रीब, असमर्थ और असहाय की चीख़ पुकार सुनने की किसी पत्रकार को फुरसत नहीं? अपराध धुआंधार हैं और अपराधी हर जगह पूजे जा रहे हैं। लेकिन संकट यह है कि मीडिया असत्य को अब सत्य बना कर दिखाने लगा है। लिखे और छपे शब्द की सत्ता बची हुई थी लेकिन प्रिन्ट मीडिया को लगभग ध्वस्त कर दिया गया है। इलेक्ट्रानिक मीडिया में कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा लेकर कुछ भी बनाया जा सकता है। इसमें झूठ, अफवाह और फेंक न्यूज़ को बड़ी आसानी से पुख़्ता करके पेश किये जा सकने की क्षमता है। शम्भूनाथ अपने संपादकीय में लिखते हैं- “झूठ का शक्तिशाली प्रचार ही इस समय सत्ता चिह्न है। कौन कितने बड़े पैमाने पर झूठ फैला सकता है, इस पर राजनीति की सफलता निर्भर करती है।… इलेक्ट्रानिक मीडिया की वजह से फ़र्क़ यह आया है कि फेक न्यूज़ अब तेज़ी से फैलता है। सवाल है, कोई फ़ेक न्यूज़ पर विश्वास क्यों करता है? झूठ बार-बार दोहराया जाये और कई तरह से प्रचारित हो तो वह सच लगने लगता है। यह किसी दब चुके विवाद या भय को फिर से जगा देता है। ऐसी झूठी ख़बरों के प्रचार के तीन लक्ष्य हैं। एक लक्ष्य है, आधुनिक मन को फिर से पुरानी रूढ़ियों, अंधविश्वासों और संकीर्णताओं का वैचारिक कबाड़खाना बनाना। दूसरा लक्ष्य है, किसी खास समुदाय को शत्रु की तरह पेश करना- उसके प्रति भय जगाना। तीसरा लक्ष्य है, किसी खास नायक या ब्राण्ड के प्रति अबाध भरोसा बनाना।” (वागर्थ, अप्रैल-2018, पृष्ठ-5,6़)

इधर मीडिया अधिनायकों की मूर्ति बनाने-चमकाने में लगा है, उधर भारत का नागरिक निरन्तर अनुभव कर रहा है कि उस पर हो रहे अत्याचारों का मीडिया ढंग से प्रतिरोध नहीं कर रहा रहा है। सत्ता के पास झूठ को, झांसों को, वायदों को, समूची चीज़ों को लीपापोती करने के इतने तरीके आ गये हैं कि वे किसी भी सत्य को बड़े आराम से अपने झूठ से बहुत क़ायदे और सुव्यवस्थित तरीके से मीडिया की मदद लेकर ढंक देते हैं। सड़कों पर प्रतिरोध के डर से व्यापक पैमाने पर झूठी घोषणाओं के विज्ञापन देकर सभी आवाज़ें दबा दी जाती हैं। कभी डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा था- “जब सड़क मौन हो जाती है तो देश की संसद आवारा या बांझ हो जाती है।” जनपत्रकारिता धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। अब जुगाड़ या प्रबंधन पत्रकारिता के जलवे हैं। अब तो वह शिगूफों के बल पर चल रही है। उसमें गिरोहबंदी भी बहुत सख्ती से सक्रिय है। अनुराधा राय लिखती हैं- “ऐसा गिरोह जिसका फैलाव शायद किसी की पहुँच और दायरे से बाहर है। विश्वासों के साथ खेलने में इतना धूर्त गिरोह कि करोड़ों लोग उसके हर झूठ पर आँख मूंद कर यकीन कर लेते हैं। उस वक़्त आप क्या कर सकते हैं, जब आप अपने रक्षकों को ही अपने कातिलों में तब्दील होते देख रहे हैं।” (रविवार डाइजेस्ट, मई-2018, पृष्ठ-17)

हम ऐसे अभिशापित दौर में हैं जब हमारे यहाँ विधिवत निर्वाचित सरकारें स्वाधीनता, समानता और बंधुत्व की कामना न करके जनतंत्र को अपाहिज बनाती जा रही है। है। इन्हें प्रजातंत्र और आज़ादी के मूल्यों की वजह से देश की सत्ता में भागीदारी मिलती है लेकिन उनकी जनता के प्रति संवेदनशीलता खत्म है। अपराध, आतंक तथा बलात्कार उनका असली चेहरा बनता जा रहा है। भ्रष्टाचार केवल धन का नहीं राजनीतिक-विरासत का भी है। घोषणायें अलग हैं लेकिन कार्यवाहियाँ अलग। लेकिन मीडिया पोल खोलने के बजाए सत्ता की जनविरोधी नीतियों पर बड़ी बेहयाई और ढिठाई के साथ परदा डालने का काम कर रहा है। आम आदमी के आक्रोश से सत्ता को बचाये रखने में मीडिया की भूमिका उजागर है। महँगाई बढ़ती है तो वे भूत-प्रेत के किस्से दिखाने लगते हैं। बेरोज़गारों का क्रोध बढ़ता है तो वे बाबाओं के प्रवचन सुनाने लगते हैं।

मैं टीवी चैनलों में रोज़ प्राइम टाइम में मीडियाकर्मियों की बहसें सुनता हूँ और पाता हूँ कि अधिकतर वे सत्तापक्ष की तरफ़ से विपक्ष के साथ-साथ जनता के साथ भी ज़ोर आजमाइश कर रहे हैं। उनकी भूमिका सत्ता के आलोचक के रूप में नहीं है। प्रशासन और सरकार की जद में आकर क्या पत्रकारिता कभी न्यायपूर्ण हो सकती है? वे बलात्कार में भी हिन्दू और मुसलमान ले आते हैं! संसद और विधानसभायें स्पष्ट बहुमत के अभाव में अच्छी खासी खरीद फरोख़्त करती हैं। मीडिया इसे भी नज़रअंदाज़ करता है और समूचे सत्य को खोखला करते हुये अजनतांत्रिक कार्यवाहियों को सम्पन्न कराने में अपनी भूमिका अदा करता है। निष्पक्षता से देखें तो यह मीडिया के लिये न तो अच्छा वक़्त है न अच्छा संदेश है।

यह एक कटु सत्य है कि राजनीति पूर्व में भी बेहया थी लेकिन तब भी उसके कुछ मूल्य हुआ करते थे। पत्रकारिता उसे आईना दिखा कर रास्ते पर लाती थी। आज पतन के मामले में पत्रकारिता स्वयं राजनीति से होड़ ले रही है। लेकिन अन्तिम निर्णय तो आम जनता को करना है। मीडिया में या पत्रकारिता में पहले एक बेचैनी हुआ करती थी। झूठ के ख़िलाफ़ सच को सामने लाने की जद्दोजहद थरथराती थी। पहले वह गाँव-गाँव घूमती थी, अब महानगरों में महलों की रानी बनी बैठी है। वहाँ सत्ता के पिट्ठू या पेट चलाने वाले निरीह लोग मौजूद हैं। होशियार लोग कारपोरेट घरानों के साथ सीधे जुड़ गये हैं और उनके हित में अपनी पत्रकारिता संचालित करते हुए माल काट रहे हैं। लेकिन जब जनपक्षधरता स्थगित हो जाती है तो लोकतांत्रिकता को रखैल बना दिया जाता है। ऐसे में क्या परिणाम सामने आयेंगे? इच्छाओं, अकांक्षाओं और सपनों वाला देश भीष्म पितामह की तरह सरशैय्या में लेटा हुआ केवल और केवल इंतजार कर रहा है। पत्रकारिता की संभावनायें अभी चुकी नहीं हैं, लेकिन जनता के मन में पत्रकारों को लेकर नकारात्मकता और एक विशेष प्रकार की निराशा पसर गई है। लोग खुलेआम कहने लगे हैं कि पत्रकार तो नेता की तरह ही बिकाऊ माल है। इस छवि को बदलना आज के सच्चे और जनप्रतिबद्ध पत्रकारों के लिए बड़ी चुनौती है.

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