मई दिवस की महत्ता के बारे में स्वदेश सिन्हा

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           द अमेरिकन और मई दिवस

मई दिवस समूचे दुनिया में मनाया जाने वाला मजदूरों का मुक्ति पर्व है। 01मई 1886 में पहली बार अमेरिका के शिकागो में यह मनाया गया था, क्योंकि इसी दिन अमेरिका के इस शहर में पूंजीवादी शोषण के खिलाफ़ तथा काम के 8 घंटे की माँग को लेकर एक महाकाव्यात्मक हड़ताल की शुरुआत हुई एवं अनेक मजदूरों की शहादत के बाद श्रमिकों के 8 घंटे की माँग पूंजीपति वर्ग तथा प्रशासन ने इस विशाल आंदोलन से घबराकर मान ली। इसी दिन शिकागो में एक ऐसी घटना घटी, जिसने अमेरिकी लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था की पोल खोल दी। शिकागो के ‘हे’ मार्केट में किसी अज्ञात व्यक्ति ने बम फेंका, जिसमें कुछ पुलिसकर्मी मारे गए। इस घटना को अंजाम किसने दिया यह कभी पता नहीं लगा, लेकिन जानकारों का कहना था कि यह काम पूंजीपतियों के एजेंटों का है, जिससे कि इस विशाल आंदोलन को बदनाम किया जा सके तथा निर्दोष मजदूर नेताओं को गिरफ्तार करके इस आंदोलन को तोड़ा जा सके। उन्होंने मौका देखकर मजदूरों के प्रमुख नेता ‘अल्बर्ट पार्सन्स’ और उनके आठ अन्य साथियों को बम फेंकने के झूठे जुर्म में गिरफ्तार करके अगस्त 1886 में फाँसी पर चढ़ा दिया गया। अल्बर्ट पार्सन्स ने फाँसी से पहले अपनी पत्नी तथा बच्चों को एक मर्मस्पर्शी पत्र लिखा था, जो उनके प्रेम, संघर्ष चेतना एवं अपार जिजीविषा को दर्शाता है। यह पत्र अमेरिकी पूंजीवादी न्याय व्यवस्था और लोकतंत्र के ढोंग को भी उजागर करता है, मार्क्स का यह कथन सही सिद्ध होता है कि पूंजीवादी व्यवस्था तथा उनमें निहित न्याय-कानून और संसद को चलाने के लिए पूजीपतिवर्ग की प्रबंधकारिणी सभा के अलावा कुछ भी नहीं है।

मई दिवस की इस ऐतिहासिक घटना एवं मजदूर नेताओं के शहादत को केन्द्र में रखकर दुनिया भर में अनेक लेख, कहानियाँ, नाटक और उपन्यास लिखे गए, जो आज भी लिखे जा रहे हैं। इस घटना की पृष्ठभूमि पर महान अमेरिकी कहानीकार-उपन्यासकार हावर्ड

फास्ट ने एक बहुत प्रभावशाली उपन्यास ‘द अमेरिकन’ लिखा था। फास्ट खुद एक गरीब मजदूर परिवार से आते थे। उनका बचपन बहुत ही गरीबी और अभावों में बीता था, शायद इन्हीं कारणों से उनका झुकाव मार्क्सवाद की ओर हुआ। उनके पिता एक लोहा खदान में मजदूर थे, इसलिए बचपन से बड़े होने तक अपना अध्ययन पूरा करने के लिए छोटी-मोटी नौकरियाँ करनी पड़ीं। कुख्यात ‘मैकार्थी काल’ में उन्हें कम से कम तीन महीने जेल में बिताने पड़े। उन्होंने मजदूरों-किसानों तथा तलछट में पड़े लोगों के जीवन पर अनेक कहानियाँ-उपन्यास लिखे। उनका सबसे महत्त्वपूर्ण उपन्यास ‘स्पार्टकस’ है, जो ईसा से 75 वर्ष पूर्व यूनान और रोम में गुलामों के उस विद्रोह पर आधारित है, जिसने गुलामों के बल पर टिके समाजों की नींव हिला दी। गुलामों का नेता स्पार्टकस है, जिसे लेखक ने आदिविद्रोही बतलाया है, इसके अलावा उनके ‘सिटीजन टॉमपेन’, ‘ऑन फ्रीडम रोड’ तथा ‘माई ग्लोरियस ब्रदर्स’ जैसे ढेरों संघर्ष चेतना के उपन्यास हैं। फास्ट अपने उपन्यासों में कल्पना, मिथक, गल्प और इतिहास को मिलाकर रोचक कथा शिल्प रचते थे, जो विश्व साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। मुझे मई दिवस पर आधारित उनका उपन्यास ‘द अमेरिकन’ स्पार्टकस के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण लगता है। यह उपन्यास अमेरिकी लोकतंत्र के पाखंड को दिखाता है, यही कारण है कि उपन्यास के प्रकाशन के कुछ समय बाद ही सम्पूर्ण अमेरिका में  यह अनुपलब्ध हो गया। वहाँ की लाइब्रेरियों तक में यह नहीं मिलता है। करीब एक दशक पहले हमारे मित्र लाल बहादुर वर्मा ; जो इतिहासकार, नाटककार ,संस्कृतिकर्मी तथा अनुवादक भी थे, उनकी फास्ट के उपन्यासों में गहरी रुचि थी, उन्होंने पहले मुझे इस उपन्यास की कथावस्तु के विषय में बताया तथा इसके हिन्दी अनुवाद के लिए इसके अंग्रेजी संस्करण की खोजबीन शुरू कर दी। बहुत खोजने पर मुझे दिल्ली के दरियागंज में पुराने किताबों के बाज़ार में इसकी एक फटी हुई प्रति मिली, लेकिन वह इतनी अधिक क्षतिग्रस्त थी कि उससे हिन्दी अनुवाद संभव नहीं था। बाद में एक अमेरिकी मित्र ने बहुत खोजकर इसकी एक अंग्रेजी प्रति भिजवाई तथा ‘लाल बहादुर वर्मा जी’ ने इसका हिन्दी अनुवाद किया। दुर्भाग्य से वर्तमान समय में यह भी अनुपलब्ध हो गया है, इसके पुनः प्रकाशन का हम सभी को इन्तजार है। यह उपन्यास 01मई 1886 के मई दिवस में काम के आठ घंटे करने के आंदोलन पर आधारित है। शिकागो के ‘हे’ मार्केट में बम फेंकनेऔर अल्बर्ट पार्सन्स सहित आठ मजदूर नेताओं पर केन्द्रित है, जिन्हें बम फेंकने आरोप में फाँसी दी गई थी। इस मुकदमे में कथित अभियुक्तों को फाँसी की सज़ा सुनाने वाला जज ‘एलिस’ खुद एक गरीब मजदूर परिवार से आया था, उसे उन मजदूरों से सहानुभूति थी। उसे अपने गलत फैसले का एहसास था, लेकिन वह विवश था वह पूंजीवाद के ढोंग-पाखंड के घेरे से बाहर नहीं जा सकता था। वह इस व्यवस्था का एक छोटा का पुर्जा मात्र था जिसे कभी भी निकालकर आसानी से फेंका जा सकता था। उपन्यास में उसके अन्तर्द्वन्द्वों बहुत गहराई से दिखाया गया है। उसे कोई पहचान न सके इसलिए वह लम्बा ओवरकोट और हैट पहनकर शहीद मजदूरों के अन्तिम संस्कार के स्थल पर जाता है तथा उन्हें अश्रुपूर्ण नेत्रों से श्रद्धांजलि देता है। उसकी आत्मा उसे झकझोरती है, वह अपने को दोषी और अपराधी मानता है। इसी उपन्यास का दूसरा महत्त्वपूर्ण भाग अल्बर्ट पार्सन्स का एक साधारण मजदूर से ; एक क्रान्तिकारी मजदूर नेता बनने का सफर है ,कि किस तरह एक मजदूर में अन्याय के खिलाफ़ लड़ने की संघर्ष चेतना, त्याग-बलिदान तथा शहादत का जज्बा पैदा हो जाता है। जज के माध्यम से उपन्यासकार एक ऐसे व्यक्ति का चित्रण करता है, जो इस सम्पूर्ण व्यवस्था से घोर नफ़रत तो करता है, लेकिन व्यवस्था में निहित सुख-सुविधाओं को वह नहीं छोड़ पाता है। वह लिंकन, जेफरसन और कनेडी के उस आदर्शवादी अमेरिका का प्रतीक है, जो आज डॉलर परमाणु हथियारों तथा युद्धों की झंकार में कहीं खो गया है। ‘द अमेरिकन’ एक जरूरी और महत्त्वपूर्ण पुस्तक है जिसे अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।

 

 

 

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