भीमा कोरेगांव बनाम सारागढ़ी का युद्ध

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1 जनवरी 1818 को भीम नदी के किनारे एक लड़ाई लड़ी गयी थी जिसे संख्याबल के अनुसार युद्ध के बजाय सैनिक शब्दावली मे झड़प कहा जा सकता है। इस लड़ाई में पेशवा के दो हजार सैनिकों तथा ब्रिटिश कम्पनी के आठ सौ सैनिकों ने भाग लिया था। पेशवा की सेना मे मराठों के साथ अरबी सैनिकों ने भी भाग लिया था जो कि जाहिर है मुसलमान थे लेकिन ये किसी इस्लामी राज्य की लड़ाई नही लड़ रहे थे। ये बस अपने हुनर से अपने ढंग की जिन्दगी जीने की लड़ाई लड़ रहे थे। ब्रिटिश कम्पनी मे महार सैनिक लड़ रहे थे और यह भी अपनी जिन्दगी जीने की लड़ाई ही लड़ रहे थे। यह युद्ध महार सैनिकों की बहादुरी के लिए याद किया जाता है जिन्होने कम संख्या मे होने के बावजूद पेशवाई सैनिकों को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। यह युद्ध कम्पनी के लिए पेशवाओं पर विजय प्राप्त करने के क्रम में महत्वपूर्ण था और जैसा कि होता विजेता ने जीत के बाद अपना स्तम्भ स्थापित किया। जाहिर है इस कीर्तिस्तम्भ अपने हुनर मे असाधारण दक्षता तथा आत्मोसर्ग करने वाले योद्धाओं का नाम अंकित किया गया। ऐसे स्तम्भ कम्पनी ने और जगहों पर भी स्थापित किया है परन्तु इस युद्ध मे महारों की बहादुरी की प्रसिद्धि मे अन्य कारण भी सम्मलिति होते गए।
सारागढ़ी युद्ध का इतिहास भी इसी 19वीं शताब्दी के आखिरी वर्षो में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का एक महत्वपूर्ण पन्ना है जब 12 सितम्बर 1897 को आधुनिक पाकिस्तान के नार्थ वेस्ट फ्रण्टियर प्रान्त मे सारागढ़ी किले पर लड़ा गया था। इस युद्ध मे ब्रिटिश सेना के 21 सिक्ख बहादुर सैनिकों ने लगभग 10 हजार अफगान सैनिकों का मुकाबला करते हुए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया था और लगभग 450 अफगान सैनिक मारे गए थे। जैसी की परम्परा रही है विजेता ब्रिटिश साम्राज्य ने इस युद्ध की याद मे भी सारागढ़ी मे एक गुरुद्वारे का निर्माण कराया।
ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति के लगभग 70 साल बाद इस साम्राज्य की हिफाजत मे शहीद हुए योद्धाओं को विभिन्न कारणों से याद किया जा रहा है। भीमा कोरेगांव का युद्ध सामाजिक न्यायवादियों का स्मृतिचिन्ह बन चुका है तो सारागढ़ी के युद्ध को मुस्लिम कबाइलियों के विरुद्ध शानदार स्मारक के रुप मे खड़ा किया गया है। अपने समय मे ये दोनो युद्ध भारतीय उपमहाद्धीप मे उभरी नयी राजनैतिक ताकत की सेवा मे लड़े गए थे लेकिन अब वर्चुवल विश्व मे इन दोनो युद्धों को पुनः लड़ा जा रहा है तथा इसके नायकों को स्वतंत्र भारत की प्रभावी राजनैतिक ताकतों ने अपने अपने झण्डे थमा दिए हैं। इन योद्धाओं को जनस्मृतियों मे दर्ज कराने के लिए दोनो राजनैतिक धाराएं अपने आर्थिक राजनैतिक क्षमता का प्रयोग कर रही है ताकि यह घटना उनके राजनैतिक प्रतिद्वन्दियों के विरुद्ध प्रेरक बल का कार्य कर सके। ब्रिटिश साम्राज्य कालीन भारत में हिन्दू वर्णवादी व्यवस्था के शोषण और दमन के प्रतिरोध मे जागृत हो रही शक्तियों के लिए अगर ब्रिटिश साम्राज्य मुख्य शत्रु नही था तो अरबी सांस्कृतिक परम्पराओं के प्रति चिढ़ और अपनी वर्चस्वशाली जाति व्यवस्था की अक्षुण्णता के लिए गोलबन्द हो रही शक्तियों के लिए भी ब्रिटिश साम्राज्य मुख्य शत्रु नही था। इसलिए आश्चर्यजनक नही है कि आजादी के कुछ दशाब्दियों के उपरान्त ही ब्रिटिश व्यवस्था को स्थानापन्न करने वाली राजनैतिक धारा के विरुद्ध एक दूसरे की प्रबल विरोधी दिखने वाली ये राजनैतिक ताकतें आवश्यकतानुसार आपस मे रणनीतिक एवं राजनैतिक सहयोग करती पायी जाती हैं।
संतोष कुमार के ब्लॉग http://nutan-vikalp.blogspot.com/ से साभार

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