भीमराव अंबेडकर पर केंद्रित कविताएंः संकलनकर्ता नीरज कुमार मिश्र

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आज बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर जी का जन्मदिवस है।वे बहुज्ञ, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, और समाजसुधारक थे।उन्होंने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और अछूतों (दलितों) से सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया था। श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन भी किया था।ये कविता का संकलन उनके साहित्यिक, सामाजिक,राजनैतिक और सांस्कृतिक योगदान को नमन करते हुए समर्पित है।??

(१). डॉ० अम्बेडकर के लिए – नामदेव ढसाल

“आज हमारा जो भी कुछ है
सब तेरा ही है
यह जीवन और मृत्यु
यह शब्द और यह जीभ
यह सुख और दुख
यह स्वप्न और यथार्थ
यह भूख और प्यास
समस्त पुण्य तेरे ही हैं।”

(२). भगवान मत बनाओ – जयप्रकाश कर्दम

“देवता नहीं हैं अम्बेडकर
कि पूजाघर में
बंद कर दिया जाए
न प्रतिमा हैं अम्बेडकर
कि तोड़कर
ध्वस्त कर दिया जाए
और
न केवल नाम है अम्बेडकर
कि इतिहास के पन्नों में
दफ़न कर दिया जाए
अम्बेडकर करोड़ों दलितों की
अस्मिता के प्रतीक हैं
उनके जीवन का संगीत हैं
अम्बेडकर एक जीवंत विचार हैं
जो दे सकता है ताकत
दुनिया के तमाम उत्पीडि़तों को
बदल सकता है दुनिया
श्रद्धा के आवेग मे
विचार को मत दबाओ
अम्बेडकर को भगवान मत बनाओ।”

(३). विश्व की वसुन्धरा सुहागिनी बनी रहे-श्योराज सिंह बेचैन

“गगन में सूर्य-चन्द्र
और चाँदनी बनी रहे।
चमन बना रहे
चमन की स्वामिनी बनी रहे।
कोयलों के
कंठ की माधुरी बनी रहे।
रागियों के
अधरों की रागिनी बनी रहे।
गूँजते रहें
भ्रमर किसलयों की चाह में
मेल-प्यार
हो अपार,ज़िंदगी की चाह में
सब
तरु सरस रहें,न पाट टूट भू गहें।
कली-कली
की गोद, नित सुगंध से भरी रहे।
ये गिरि
शिखर बने रहें,ये सुरसरी बनी रहे।
भँवर को
चीरती चली,प्रगति तरी बनी रहे।
छूतछात
जातिभेद की प्रथा नहीं रहे।
लोकतंत्र
हो सजीव,मनुकथा नहीं रहे।
गरज ये कि
तृतीय विश्व युद्ध नहीं चाहिए।
विश्व की
वसुन्धरा सुहागिनी बनी रहे।
हवा सुचैन
शांति की सदा सुहावनी रहे।
नहीं रहे तो
देश की दरिद्रता नहीं रहे।
आदमी की आदमी से
शत्रुता नहीं रहे।
ये भुखमरी नहीं रहे,
ये खुदकुशी नहीं रहे।
मनुष्यता
की भावना प्रबल घनी बनी रहे।
चमन बना रहे
चमन की स्वामिनी बनी रहे।”

(४). द्रोणाचार्य सुनें:उनकी परम्पराएँ सुनें – दयानन्द ‘बटोही’

“सुनो! द्रोण सुनो!
एकलव्य के दर्द में सनसनाते हुए घाव को
महसूसता हूँ
एकबारगी दर्द हरियाया है
स्नेह नहीं, गुरु ही याद आया है
जिसे मैंने हृदय में स्थान दिया
हाय! अलगनी पर टंगे हैं मेरे तरकश और बाण
तुम्हीं बताओ कितना किया मैंने तुम्हारा सम्मान!
लेकिन! एक बात दुनिया को बताऊँगा
तुम्हीं ने उछलकर
दान में माँगा अँगूठा
यह विघ्न नहीं लाऊँगा
सच कहता हूँ
मेरी भुजाएँ फड़कती रहती हैं
जब किसी शूर-शूरमा को देखता हूँ,
मैं अछूत नहीं हूँ
नहीं हूँ
नहीं हो सकता जानता हूँ
तुम्हीं ने बताया था गुरु
‘कोई नहीं अछूत होता है जन्म से,
यहीं हम बनाते हैं’
अन्धे स्वार्थ में लीन हो
मैं भी तो मानता हूँ तुम अछूत नहीं हो
लेकिन स्वार्थ के वशीभूत हो कहता है अछूत हो।
मेरी रग-रग तुम्हारी गुरु-भक्ति की टकराहट से
गद्गद है!
मौन हो मैं तुम्हारी गुरु-भक्ति को मानत हूँ
तुमने घाव दिये, दर्द दिया
फिर भी मैंने शाप नहीं, वरदान माना
हे गुरु!
तुम्हारी परम्पराएँ अब ज़्यादा दिन तक नहीं चलेंगी
क्योंकि अब एकलव्य कोई नहीं बनेगा
मैं आगाह कर दिया करता हूँ
बनना ही है तो द्रोणाचार्य जैसे गुरु का शिष्य
कोई क्यों बने?
बनना ही है तो डॉ.आम्बेडकर का शिष्य बनो
बाईस घंटे उन जैसा पढ़ो
गढ़ो संविधान और क़ानून
धरती काँपती है
काँपती है, पूरी शक्ति
जिसके पास छद्म रूप में है,
सच कहता हूँ शिष्य बना मैं
स्वार्थ में लीन हो कदापि नहीं
मैं सच को सच मान पूछता था
अपने भीतर द्वंद्व से जूझता था
अब तुम भी जूझते हो
अभी भी पूरी व्यवस्था द्रोणाचार्य-जैसी है,
द्रोण की परम्परा के पृष्ठपोषक सुनो
अब और जाल मत बुनो!
जाल को रहने दो
अँधेरे की गहन गुफ़ा को घाव सहने दो
जाओ द्रोण जाओ, दर्द को हरियाने दो
एकलव्य मैं पहले था, आज भी हूँ
अब जान गया हूँ
अँगूठा दान क्यों माँगते हो?
अभी-भी प्रैक्टिकल में पास-फेल की नीति है
द्रोण! यही तुम्हारी परम्परा की दुर्नीति है,
परम्पराएँ अच्छी होती हैं या बुरी
मुझे कुछ नहीं कहना
मैं सिर्फ़
द्रोण तुम्हारे रास्ते पर चले गुरु से कहता हूँ
अब दान में अँगूठा माँगने का साहस कोई नहीं करता
प्रैक्टिकल में फेल करता है
प्रथम अगर आता हूँ तो, छठा या सातवाँ स्थान देता है
जाति-गन्ध टाइटल में खोजता है
वह आत्मा और मन को बेमेल करता है
परम्पराओं को निभाने में
अब कोई विश्वास नहीं करता
जो नयी राह पर चलता है, चलने दो
द्रोण अपनी काया को मत कल्पाओ
मैं एकलव्य अब भी वही गुरु-भक्त हूँ
जो पहले था
आज भी हूँ।”

(५). उगते अंकुर की तरह जियो – सुशीला टाकभौरे

“स्वयं को पहचानो
चक्की में पिसते अन्न की तरह नहीं
उगते अंकुर की तरह जियो
धरती और आकाश सबका है
हवा प्रकाश किसके वश का है
फिर इन सब पर भी
क्यों नहीं अपना हक़ जताओ
सुविधाओं से समझौता करके
कभी न सर झुकाओ
अपना ही हक़ माँगो
नयी पहचान बनाओ
धरती पर पग रखने से पहले
अपनी धरती बनाओ।”

(६). अम्बेडकर -रजतरानी मीनू

“अम्बेडकर
नाम भर नहीं है
अन्याय के विरुद्ध
न्याय की आवाज़ है
संघर्षों का
इतिहास है
शिक्षा की बारिश है
समता का पहाड़ा है
संगठन का पर्याय है
भाईचारे की पाठशाला है।
अम्बेडकर
नाम भर नहीं है
इतिहास की करवट है
स्त्रियों की सांस है
नई संस्कृति का उन्नायक है
समता की गूंज है
अम्बेडकर
नाम भर नहीं है
सम्मान का टीका है
स्वतंत्रता का
नया नाम है
ऊंच-नीच
सड़े-गले
परिवार रूपी
समाज की स्वच्छता का
हथियार है
अम्बेडकर
नाम भर नहीं है
लोकतन्त्र का पर्व है
दबे-कुचले
लोगों के चेहरों की
मुस्कान है
उम्मीदों की
किरण है
आत्मसम्मान का
मार्ग है
अम्बेडकर
नाम भर नहीं है
नए भारत की
खुशबू है
करोङों युवाओं के
चेहरों की खुशियां है
राष्ट्र के सम्मान
का भाल है
गर्व का आकाश है
अम्बेडकर
नाम भर नहीं है
भूखों के चेहरों की
मुस्कान है
संघर्षों की प्रेरणा है
करुणा और मानवता का
संरक्षक है
हमारे माथे पर
सिंबल ऑफ
नॉलेज का टीका है
अम्बेडकर
नाम भर नहीं है।”

(७). मुझमें बसता है एक अम्बेडकर – अनिता भारती

“देखो !
मुझमें बसता है एक अम्बेडकर
देखो !
तुममें बसता है एक अम्बेडकर
जो हमारी
नसों में दौड़ते नीले खून की तरह
ह्रदय तक चलता हुआ
हमारे मस्तिष्क में समा जाता है
अरे साथी !
निराश ना हो ।
हमें पता है
जो यहाँ घुला है,
वही उठेगा
इस मिट्टी से एक दिन
फिर दुबारा
अपनी प्रतिमा गढ़ते हुए
नया भीमराव !”
.
(८) .’याद आते हैं अम्बेडकर’ – हीरालाल राजस्थानी

“जब-जब कोई धैर्य का दामन थामे
निष्ठा की रोशनी में
अटूट प्रतिबद्धता के साथ
उन्माद से जूझता हुआ
उतर पड़ता है असमानता की धधकती धरती पर
अकेले ही
समानता के पक्ष में
ढाल बनकर
एक योद्धा की तरह
कमान सा तनकर
अमानवीयता के खिलाफ
बुद्ध की तरह
वर्ण की डोरी को तोड़
अपनो के उलाहने झेल
धर्म के ढकोसलों से दूर
मानवता की लीक पर
भयमुक्त होकर
झनझना देता है जातियों की परछत्ती को
न्याय की छतरी बनकर
इसी प्रतिबिम्ब में
याद आते हैं अम्बेडकर
तपती धूप में उम्मीद की शीतल छाया बनकर।।”

(९). मुक्ति-संग्राम अभी जारी है – कंवल भारती

“मैं उस अतीत को
अपने बहुत क़रीब पाता हूँ
जिसे जिया था तुमने
अपने दृढ-संकल्प और संघर्ष से।
परिवर्तित किया था समय-चक्र को
इस वर्तमान में।
मैं उस अन्धी निशा की
भयानक पीड़ा को / जब भी महसूस करता हूँ
तुम्हारे विचारों के आन्दोलन में
मुखर होता है एक रचनात्मक विप्लव
मेरे रोम-रोम में।
तुम बिलकुल नहीं मरे हो बाबा !
जीवित हो हमारी चेतना में,
हमारे संकल्प में, हमारे संघर्षों में।
समता, सम्मान और स्वाधीनता के लिए
मुक्ति-संग्राम जारी रहेगा / जब तक कि
हमारे मुरझाए पौधे के हिस्से का सूरज
उग नहीं जाता है।”

(१०). गाँधी और मैं – असंगघोष

” मैं
और
वह
वह और मैं
वह माने गाँधी
मैं याने मैं
दोनों ही
देखते हैं लगातार
एक दूसरे को रोज
बिला नागा
वह हाथ में
लाठी लिए
मेरी ओर तेजी से
चले आने की मुद्रा में
एक पाँव आगे बढ़ाए
दूसरा जमाए पेडस्टल पर
स्थिर खड़ा है
जरा भी हिला-डुला तो
गिर न जाए
औंधे मुँह
जमीन पर
औ उसे कोई उठाने न आए
मैं काम करते रहता हूँ
फुर्सत मिलते ही
नजरें मिलती हैं
चश्मे के पार
गाँधी की नजरों में
बार-बार
एक ही प्रश्न दिखाई देता है
पुनः पूना पैक्ट करोगे?
मैंने कहा नहीं बाबा!
पहले ही पैक्ट में
तुमने भूखे रह बाबा को घेर
हमें हरिजन कह ह लिया
अब बख्शो
कोई और सम्बोधन नहीं चाहिए
दलित हैं
दलित ही रहने दो
तुम्हारी अहिंसा का
सहारा ले
दमित हैं
शोषित हैं
अब तक
अपनी रक्षा के लिए
कम अज कम
हमें हथियार तो उठाने दो
हम खुद ही लड़ेंगे
अपनी लड़ाई
तुम्हारे सिद्धान्त और अहिंसा
हमारे हित में नहीं हैं
वरना तुम यूँ ही बुत की तरह
बीच चौराहे पर टँगे नहीं रहते
तुम्हारा अनुसरण करते
अनुयायी
और देश का हर नागरिक
अपने घर में बिठा पूजता तुम्हें
तुम्हारे सिद्धान्त थोड़े भी प्रासंगिक होते तो
निश्चित ही तुम रोक पाते
अपने उन चेलों को जो
तुम्हें याद करते हैं केवल
2 अक्टूबर, 30 जनवरी को हर साल
चढ़ा आते हैं
फूलमालाएँ तुम्हारे बुत पर
कुछ पड़े रहते हैं दारू पीये गटर में
बचे खुचे तथाकथित अनुयायी
तुम्हारी धर्मनिरपेक्षिता का मजाक उड़ाने
तुम्हारे हाथ पर सेफरन कलर का
दुपट्टा बाँध आते हैं
तुम्हारी ही जमीं पर
तुम हो कि अपनी ही जिद्द पर
अड़े हो खड़े हो
तुम किंकर्तव्यविमूढ़ हो स्थिर ही खड़े रहो
चौराहे के बीच जहाँ से कोई रास्ता
तुम्हारे सिद्धान्तों की ओर नहीं जाता
न ही पेडस्टल से लाठी उठाना
वरना नीचे गिर जाओगे
जहाँ कोई तुम्हें उठाने भी नहीं आएगा
भूल जाओ पूना पैक्ट
वह हमारे लिए कलंक है
हमें तुम्हारे सिद्धान्त नहीं चाहिए
उन्हें अपनी बकरियों को ही चर जाने दो
हमारे पास बाबा साहेब का दिखाया रास्ता है
हम उसी पर चलेंगे।”

(११). बाबा ने कहा था – सोहनलाल सुमनाक्षर

“बलि, भेड़-बकरियों की दी जाती है,
कभी शेरों की नहीं
इसलिए बाबा ने कहा—
बेटो! शेर बनो, बकरी नहीं
शेर बनोगे तो, तुमसे डरेगा ज़माना
फिर तुम पा सकोगे— सत्ता, सम्मान, समता
जो दीनता से अभी नहीं है पाना।
सिंह में कुछ विशेष गुण भी होते हैं दोस्तो!
शेर भूखा मर जाएगा, पर घास नहीं खाएगा।
शेर दुश्मन पर टूटेगा, जीवन तक झूझेगा,
पीठ न दिखाएगा, सिर न झुकाएगा।
शेर, भेड़-बकरियों की तरह
झुंडों में नहीं चलता,
अरे शेर तो शेर है,
वह अकेला ही सवा शेर है
वह अपना रास्ता ख़ुद बनाता है,
फिर आगे क़दम बढ़ाता है और दूसरों के लिए
अपनी लीक छोड़ जाता है।
जो बलवान है, वह किसी को
‘अभय’ दान दे सकता है, जो धनवान है वही किसी को
‘धन’ दान दे सकता है
जो निर्बल है,
वह दूसरे की क्या रक्षा कर पाएगा?
जो निर्धन है, भूखा है,
वह दूसरों को क्या खिलाएगा?
इसलिए मेरे दोस्तो
बाबा का कहा मानो—
भेड़-बकरियाँ नहीं, शेर बनो
शेर बनोगे तो तुम्हें कभी कोई नहीं सताएगा,
दुश्मन भी तुमसे डरेगा
और तुम्हारी वीरता के गुण जाएगा।”

(१२). संविधान इन गरीबां का इंसाफ करैगा -अमर सिंह छाछिया

“संविधान इन गरीबां का इंसाफ करैगा।
देश सदा इसको न्यूए याद करैगा।…टेक
डॉ. अम्बेडकर जान्दा ऐ अंग्रेजां तै टकर्या।
तेरे भी गुलाम इनके भी गुलाम तनै के यो इन्साफ कर्या
तैं भी हो आजाद उनै भी वादा पक्का कर्या।
इसे बात पै ये गांधी नै मरण व्रत कर्या।
होया शौक इसा रोग तेरे नाम पै मरैगा…
जै तूं न्यारा पाटैगा इनका हाल के होगा।
ये रहै ठोकर कै आगै हक तो इनका भी होगा।
भाई-भाई सभी एक ना द्वेष किसे तै होगा।
छुआछूत करो इनतै, मेल किस तरियां होगा।
आज तै आगै छुआछात कोऐ नहीं करैगा…
इन गरीबां का हाल यू देख्या ना जान्दा।
बिराग लागग्या बेदन छिड़गी बहम इनै का रहन्दा।
रिजर्व सीट म्हं हक इनका सब तै अलग लगान्दा।
दलित की टक्कर म्हं दलित ए आवै कानून इसा बनांदा।
इन गरीबां के तो यो भीम ए पूरे करैगा…
साधना का प्रतीक एक मिशन बणैगा।
सबका हो एक इशारा जद यो बदलैगा।
मनुवादियां का होवै सफाया वो खड़ा लखावैगा।
भूख देश म्हं रहै कोनी रोजगार सब नै पावैगा।
अमरसिंह छाछिया बड़सी का थारी मन की चाही करैगा।”

(१३). आम्बेडकरीय कविता – 2 -प्रेमशंकर

“आम्बेडकर की मूर्ति—
आक्रोश के पर्याय नहीं
यह तो शेरगढ़ी की
अस्मिता का दर्शन है
पुलिसिया अत्याचार
मानव अधिकारों की व्याख्या
कई सदी से करते आ रहे हैं
आज अन्तर केवल पुलिस के
नये प्रशिक्षण के
अभ्यास का है
या वैचारिकता का
यह तो आम्बेडकर की मूर्ति ही
तय करेगी।”

(१४). संकल्प -जितेन्द्र विसारिया

“वह चला
तो उसका चलना
ठीक वैसे ही नहीं था
जैसे भेड़ के पीछे
चल पड़ते हैं
निरीह मेमने
भोजन की तलाश में
भटकतीं हैं
लक्ष्यहीन
दीमक और चींटियाँ
या बरसात में
कहीं से भी निकल पड़ते हैं
रीढ़-विहीन
केंचुए और गिंझाइयाँ
वह चला
तो ऐसे चला
जैसे चल पड़ता है
लक्ष्य की ओर-तीर
शिकार की ओर बढ़ता-तेंदुआ
या घोर अरण्य में
निकल पड़ता है
अकेला-बबर शेर
ठीक उस दिन
वैसे ही अपनी आँखों में भर
करोड़ों बहुजनों की
मुक्ति का स्वप्न
चल पड़ा था-वह।”

(१५). कलम और कुदाल – सरोज कुमारी

“संविधान में पोषित
लोकतंत्र की परिभाषा
पढ़ ही रहे थे हम
कि अचानक छीन ली गई हमसे
हमारी जमीन
समाज की मुख्यधारा में मिलने की
कोशिश करते करते
फिर हाशिए पर घसीट दिए गए हम
समरसता का नया व्याकरण गढ़ दिया गया है अब
बिना संज्ञा सर्वनाम और क्रिया के
लोकतंत्र की दीवार में सेंधमारी करके
छीन लिया गया हमसे हमारा इतिहास
यह कहकर कि संविधान बदल चुका है
और तुम इससे बाहर हो
तुम्हारे हाथों में कलम नहीं
कुदाल ही भली है
और तुम उस समाज की संतान हो
जो हमारी नजरों में समाज नहीं।”

(१६).अम्बेडकर – कर्मानंद आर्य

“इससे पहले न धरती थी न मिट्टी
न कोई कला थी न कलाकार
न नफरत थी न प्रेम
फिर तुमने मिट्टी को छुआ
कला पैदा हुई
कलाकार पैदा हुआ
प्रेम पैदा हुआ
तुमने एक मूरत गढ़ दी
एक मूरत पैदा हुई
रंग पैदा हुआ
जो अभी तक था रंगहीन
वर्ण पैदा हुआ
जो अभी तक था वर्णहीन
यह निश्चित है
तुम अपने समय को समझ गए थे
तुम्हें पता था
आने वाला समय तुम्हारा है
धरती में, मिट्टी में, कला में
तुमने कैसा अमर प्राण डाला था
मेरे कलावंत।”

(१७). बाबा भीम को करो प्रणम रे – करतार सिंह कैत

“बाबा भीम को करो प्रणाम रे
बोलो भीम भीम भीम भीम रे…टेक
भारत का संविधान बनाया,
सभी जनो को गले लगाया
पूरा राख्या ध्यान रे,
बोलो भीम भीम…
इनका मिशन घणा लाग्या प्यारा
भीम मिशन तै मिल्या सहारा
सब सुणो करकै ध्यान रे
बोलो भीम भीम…
बाबा साहब की ज्योत जगाओ,
इनके मिशन को सफल बनाओ
थारा हो ज्यागा कल्याण रे
बोलो भीम भीम…
करतार सिंह ने शब्द बनाया
सभा बीच मैं आकै गाया
जिसका कोकत गांव रे
बोलो भीम भीम…”

(१८). महापुरुष – पूनम तुषामड़

“नहीं !आप नहीं हैं
कोई देव पुरुष ,मसीहा
या कोई अवतार.
ये सब तो हैं धर्म सत्ता
का ढोल पीटने वालों के
हथियार .
बाबा साहेब…
आप ईश्वर तो बिलकुल
भी नहीं हैं
क्योंकि ईश्वर ??
कमजोरों से बोला
सबसे शक्तिशाली ‘झूठ’ है.
जिसकी पैरवी करने को
रचे गए सदियों से न जाने
कितने झूठे धर्म ग्रन्थ,वेद
और पुराण .
इसअस्तित्व विहीन ईश्वर
के नाम से छली कपटियों ने
कभी छल से तो कभी बल
से बनाया निशाना, किया शिकार
निरीह ,निहथ्यों का .
बाबा साहेब !
आप केवल मानव हैं .
मानवीय संवेदनाओं से पूर्ण
मनुष्य जो है सृष्टि की
सर्वश्रेष्ठ रचना .
जिसने सीखा है सभ्यता के
गर्भ से ही सदा
श्रम,संघर्ष और सामजिक
संगठन.
जो बदल सकता है
अपनी चेतना शक्ति,शिक्षा
व ज्ञान के बल पर
सदियों पुरानी,फूहड़
जर्जर वर्णव्यवस्था को
पलट सकता है
मठाधीशों,पोंगापंडितों की
धर्मसत्ता,फूंक सकता है
‘मनुस्मृति’.
जो जगा सकता है
चेतना और आत्मविशास
सदियों से दलित,उपेक्षित
अस्मिताओं में .
बाबा साहेब
आपने दी कमजोरों को
ताकत
बेजुबानो को ज़ुबान ,
आपने दिए सबको समान हक़
सड़क से संसद तक
बना दिया मार्ग जनमानस का
लिखकर सर्व समतामूलक
‘विशाल संविधान’।”

(१९). कुछ समुदाय हुआ करते हैं – सुशान्त सुप्रिय

“कुछ समुदाय हुआ करते हैं
जिनमें जब भी कोई बोलता है
‘ हक़ ‘ से मिलता-जुलता कोई शब्द
उसकी ज़ुबान काट ली जाती है
जिनमें जब भी कोई अपने अधिकार माँगने
उठ खड़ा होता है
उसे ज़िंदा जला दिया जाता है
कुछ समुदाय हुआ करते हैं
जिनके श्रम के नमक से
स्वादिष्ट बनता है औरों का जीवन
किंतु जिनके हिस्से की मलाई
खा जाते हैं
कुल और वर्ण की श्रेष्ठता के
स्वयंभू ठेकेदार कुछ अभिजात्य वर्ग
सबसे बदहाल, सबसे ग़रीब
सबसे अनपढ़ , सबसे अधिक
लुटे-पिटे करोड़ों लोगों वाले
कुछ समुदाय हुआ करते हैं
जिन्हें भूखे-नंगे रखने की साज़िश में
लगी रहती है एक पूरी व्यवस्था
वे समुदाय
जिनमें जन्म लेते हैं बाबा साहेब अंबेडकर
महात्मा फुले और असंख्य महापुरुष
किंतु फिर भी जिनमें जन्म लेने वाले
करोड़ों लोग अभिशप्त होते हैं
अपने समय के खैरलाँजी या मिर्चपुर की
बलि चढ़ जाने को
वे समुदाय
जो दफ़्न हैं
शॉपिंग माॅल्स और मंदिरों की नींवों में
जो सबसे क़रीब होते हैं मिट्टी के
जिनकी देह और आत्मा से आती है
यहाँ के मूल बाशिंदे होने की महक
जिनके श्रम को कभी पुल, कभी नाव-सा
इस्तेमाल करती रहती है
एक कृतध्न व्यवस्था
किंतु जिन्हें दूसरे दर्ज़े का नागरिक
बना कर रखने के षड्यंत्र में
लिप्त रहता है पूरा समाज
आँसू, ख़ून और पसीने से सने
वे समुदाय माँगते हैं
अपने अँधेरे समय से
अपने हिस्से की धूप
अपने हिस्से की हवा
अपने हिस्से का आकाश
अपने हिस्से का पानी
किंतु उन एकलव्यों के
काट लिए जाते हैं अंगूठे
धूर्त द्रोणाचार्यों के द्वारा
वे समुदाय
जिनके युवकों को यदि
हो जाता है प्रेम
समुदाय के बाहर की युवतियों से
तो सभ्यता और संस्कृति का दंभ भरने वाली
असभ्य सामंती महापंचायतों के मठाधीश
उन्हें दे देते हैं मृत्यु-दंड
वे समुदाय
जिन से छीन लिए जाते हैं
उनके जंगल, उनकी नदियाँ, उनके पहाड़
जिनके अधिकारों को रौंदता चला जाता है
कुल-शील-वर्ण के ठेकेदारों का तेज़ाबी आर्तनाद
वे समुदाय जो होते हैं
अपने ही देश के भूगोल में विस्थापित
अपने ही देश के इतिहास से बेदख़ल
अपने ही देश के वर्तमान में निषिद्ध
किंतु टूटती उल्काओं की मद्धिम रोशनी में
जो फिर भी देखते हैं सपने
विकल मन और उत्पीड़ित तन के बावजूद
जिन की उपेक्षित मिट्टी में से भी
निरंतर उगते रहते हैं सूरजमुखी
सुनो द्रोणाचार्यो
हालाँकि तुम विजेता हो अभी
सभी मठों पर तैनात हैं
तुम्हारे ख़ँूख़्वार भेड़िए
लेकिन उस अपराजेय इच्छा-शक्ति का दमन
नहीं कर सकोगे तुम
जो इन समुदायों की पूँजी रही है सदियों से
जहाँ जन्म लेने वाले हर बच्चे की
आनुवंशिकी में दर्ज है
अन्याय और शोषण के विरुद्ध
प्रतिरोध की ताक़त।”

(२०). बाबा साहेब कै महिमा महान सखी – सुशील सिद्धार्थ

“बाबा साहेब कै महिमा महान सखी
जानत कुल जहान सखी ना।
गै गुलामी बेमियादी
आई देसवा मा अजादी
हमरे देसवा का दिहिनि संविधान सखी
जानत कुल जहान सखी ना।
हमहू पियब जूड़ पानी
हमरी बात जाई मानी
हमहू ऊंच होइकै छुअब आसमान सखी
जानत कुल जहान सखी ना।
खाली वाट नाहीं द्याब
हकु न मिलिहै छीनि ल्याब
उनके ब्वाल बनिगे आज धनुष बान सखी
जानत कुल जहान सखी ना।
जगिहैं सगरे बहिन भाई
करबै जुलुम पर चढ़ाई
हमरे फूस तरे आई अब बिहान सखी
जानत कुल जहान सखी ना।
हमरे दर्द कै दलाली
कर्ति घूमैं जी कुचाली
धीरे धीरे उनका हमहू गयेन जान सखी
जानत कुल जहान सखी ना।
अबहू बाकी बहुतु काम
अबही करब ना आराम
अबही समुहे ठाढ़ केत्ते इम्तिहान सखी
जानत कुल जहान सखी ना।
बाबा केरी बात मानि
हमरी दुनिया जगमगानि
उइ हैं हमरी आन बान औरु सान सखी
जानत कुल जहान सखी ना।”

(२१). भूल गया तेरै याद नहीं मैं – सतबीर पाई

“भूल गया तेरे याद नहीं मैं याद दिलाना चाहता
सब बातों को छोड़ जोड़ ले भीम राव से नाता…टेक
बाबा साहब नै तेरे लिए जीवन न्यूए गुजार दिया
बहुत बुरा था हाल चाल तेरा शूद्र वर्ण सुधार दिया
बराबर का दर्जा प्रजा को वोटों का अधिकार दिया
गुलामी का तेरा पुराणा बाणा जिनै उतार दिया
बहुत किया उपकार तेरे पै नहीं चुकाया जाता…
आज तलक कहैं शूद्र जिंदगी तनै विपत की काटी
झूठा दे विश्वास तेरे इतिहास पै दे दी माट्टी
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य एक जात क्यूं चौथी शूद्र छांटी
इसतै भी दो भाग बणाकै न्यारी न्यारी बांटी
तेरी आंख्या पै बांधी पट्टी तेरा बता कौण सा खाता…
तेरे लिए बाबा साहब संविधान बणागे ताजा
तू मिलकै रहिये एक फेर दुश्मन का बाजै बाजा
कोई नहीं रोकणे आला तू आप बणैगा राजा
वोटों का कर्या राज आज कुछ ता लाल्यो अंदाजा
संघर्ष करकै सब कुछ थ्याजा इतना क्यूं घबराता…
बाबा साहब उच्च कोटि के बुद्धिजीवी इंसान हुए
इतने बड़े विशाल देश का लिखणे वाले संविधान हुए
समाज के हित की लड़ी लड़ाई वो ऐसे बलवान हुए
कानूनमंत्री रहे देश के नेता भी इसे महान हुए
पाई वाला सतबीर सिंह भी गीत मिशन के गाता…”

(२२). मनुस्मृति – प्रियंका सोनकर

“लड़कियां पढ़ने लगी हैं मनुस्मृति
और पैनी निगाह से उसके एक-एक पन्ने;
बुनने लगी हैं
जाले,
खोलने लगी हैं
परत दर परत,
लिखने लगी हैं इतिहास
अपने होने का
और तुम्हारे सदियों से फैले वर्चस्व का
सोचते होगे तुम
मनु
और
मनुपुत्रों ! तुम भी
खुश तो बहुत हुए होगे
स्त्री-जाति को पराजित करके
अपने लिखित मनुस्मृति से,
किन्तु अब डरने लगे हो
अपने ही प्रावधानों से,
कांपने लगे हो
उनकी बेखौफ आजादी से,
फिर भी तुम
अपने मनसूबे करते हो
और बुलन्द,
खंजरों और कुदालों की धार
करने लगे
तुम और भी तेज ।
ये अब भांपने लगी हैं लड़कियां
होने लगा है
खाली सिंहासन,
बनाये विधि-विधान
दरकने लगे हैं
तुम्हारे ,
स्वेटर के ऊन-गोलों में
उलझा दिया था उनको ;
आज उलझने लगी हैं
वे तुमसे ।
गोल रोटी को ही
जीवन का ग्लोब समझ
ये बेसुध लड़कियां
हो गयी हैं अब चौकन्नी;
उनकी शिक्षा
घर से बाहर उनका एक
कदम,
करते हैं ध्वस्त
और रौंद डालती हैं
एक-एक पन्ने मनुस्मृति के ।
दीमकों की तरह वे
चाट जायेंगी
खोखली हो जायेगी
तुम्हारी मनुस्मृति ।
ऊंची-ऊंची दीवारें
तुम्हारे इन रस्मों के
ढहाने लगी हैं
वे मेहनतकश महिलाएं
जिन्हें नहीं था
अब तक ज्ञान ।
मनु
तुमने गढ़े थे
ऐसे कानून
गर स्त्रियां पढ़ें
तो डाल देना मेरे पुत्रों
उनके कानों में खौलता शीशा
और खींच लेना उनकी जुबान ।
सदियों पहले वंचित किया था तुमने
उनको शिक्षा के अधिकार से ।
मासिक धर्म को
पवित्रता का नाम देकर
खींचतान करते रहे,
अलापते रहे तुम
शुद्धता का राग ।
जैसे भूल गये
स्वयं के पैदा होने की
प्रक्रिया ।
मनगढ़न्त इस साजिश को
नेस्तनाबूत
करने आ गयी हैं देखो ये लड़कियां ।
अब स्याह सुर्ख
खाली पन्ना
उनके इतिहास का,
चमकने लगा है
नीली रोशनी से ;
ये रोशनी दी है डॉ.अंबेडकर ने
प्रज्ञा ली थी जिसने बुद्ध से ।
सावित्रीबाई फुले !
पण्डिता रमाबाई
तुम्हारा संघर्ष !
नहीं जायेगा अब खाली,
मूलमन्त्र लेकर तुमसे;
विश्वमानवता का इतिहास बनाने,
अपनी निजता का अहसास कराने
आयी हैं ये संगठित होकर ।
देखो मनु !
और मनुपुत्रों ! तुम भी
धू-धू करती
जल रही है
तुम्हारी मनुस्मृति
तुम्हारे आंखों के सामने ।”

(२३). ‘बदला भारत का डीएनए -सतीश खनगवाल

“सदियों से गुलाम
शोषित, पीड़ित
और वंचित
आधारभूत सुविधाओं से
जीने का भी नहीं अधिकार
नहीं भान किसी खुशी का
शिक्षा किस चिड़िया का नाम
मान नियति जीते जाते थे
घोर विवशता, बेगारी में
गवां चुके प्रतिष्ठा
खो चुके अपना स्वाभिमान
मानव!
मात्र कहने को
अछूत जीवन
निरा पशु समान।
ज्ञान का दीपक ले हाथ में
जन्मा उनका तारणहार
दिन प्रतिदिन
स्वयं अपमानित
कदम कदम पर
जाति अवमानित
लिया प्रण
दूर करूँगा
भेदभाव और
छूआछूत
अंगुलि उठाकर
चला मसीहा
भीमाबाई का तू
सपूत।
किया उद्घोष
शिक्षित बनो
संगठित रहो
और करो संघर्ष
मनाकर
कोरेगाँव विजय दिवस
जगाया अछूतों में
स्वाभिमान
दिलाकर मुक्ति
नीच काम से
बढ़ाई प्रतिष्ठा
और सम्मान।
साईमन को लिखा पत्र
हुआ महाड़
इतिहास प्रसिद्ध
कालामंदिर और गोलमेज से
हिल गया गाँधी और
उसकी हरिजन नींव
उच्च वर्णों के खुले दिमाग
अछूतों को मिला उचित
प्रतिनिधित्व
शासन-सत्ता में
उत्तराधिकार
पहली बार खिले
चेहरे जब
मिले जीवन के
अधिकार।
तेरा रचा संविधान
बना भारत का
प्राणतत्व
भारत के डीएनए
भर दिए
स्वतंत्रता, समानता और
बंधुत्व।
सारा देश ऋणी तुम्हारा
नतमस्तक होकर कहता
भीम तुम्हारी जय हो
बाबा भीम तुम्हारी जय हो।”

(२४) अंबेडकर विजय – आलोक कुमार मिश्रा

“वह जीता
पर ऐसे नहीं
जैसे जीतती हैं सेनाएँ
विध्वंस करते हुए, गरजते और हुँकार भरते हुए
वह जीता नहीं
किसी नेवले सा
सर्प के फन को मुँह में दबाए
किसी गिद्ध की तरह
शिकार को चोंच में लटकाए
वह जीता
सूर्य की तरह
काले मेघों को चीरता हुआ
रोशनी बिखेरता हुआ
वह जीता मगर बुद्ध की तरह
करूणा का जल उड़ेलता हुआ
अंतस में उतरता हुआ और
समाज में बिखरता हुआ।”

संकलन-नीरज कुमार मिश्र

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