भाग 10- मार्क्स का समाजवाद जीवन की संतुष्टि नहीं, संतुष्टि की शर्त है

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समाजवाद की मार्क्स की अवधारणा उनकी मनुष्य की अवधारणा का अनुसरण करती है। अब तक यह बात बिल्कुल साफ हो गई होगी कि इस अवधारणा के मुताबिक समाजवाद कोई फौजी अनुशासन में जकड़ा स्वचालित मशीनों जैसे व्यक्तियों का समाज नहीं हो सकता, चाहे इन व्यक्तियों की आमदनी समान हो या नही, चाहे ये अच्छे खाते-पीते हालात में हों या नहीं। यह ऐसा समाज नहीं होता जिसमें व्यक्ति राज्य के, मशीनों के या नौकरशाही के अधीन हो। अगर राज्य एक ‘अमूर्त पूंजीपति’ के रूप में एम्प्लॉयर (रोजगार पर रखने वाला) हो जाए, अगर संपूर्ण सामाजिक पूंजी किसी खास पूंजीपति या किसी खास पूंजीवादी निगम के हाथों में एकीकृत हो जाए तो भी वह समाजवाद नहीं होगा। वास्तव में जैसा कि मार्क्स ने ‘आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियां’ में साफ-साफ कहा है, साम्यवाद अपने आप में मानवीय विकास का लक्ष्य नहीं है।’ तो फिर लक्ष्य क्या है?

साफ है कि समाजवाद का लक्ष्य मनुष्य होता है। इसका लक्ष्य उत्पादन का ऐसा ढांचा तैयार करना, ऐसा समाज संगठित करना है जिसमें मनुष्य अपने उत्पाद से, अपने कार्य से, अन्य मनुष्यों से, खुद अपने आप से और प्रकृति से अपने अलगाव पर काबू पा सके; जिसमें वह अपने आप तक वापस लौट सके, खुद अपनी शक्तियों से दुनिया को समझ सके और इस प्रकार दुनिया से एकात्मता महसूस कर सके। पॉल तिलिच के शब्दों में कहें तो मार्क्स के लिए समाजवाद ‘सामाजिक यथार्थ में प्रेम के विनाश के खिलाफ एक प्रतिरोध आंदोलन था।’

मार्क्स ने पूंजी के तीसरे खंड के अंत में समाजवाद के उद्देश्यों का पूरी स्पष्टता से उल्लेख किया है, ‘वास्तव में आजादी का क्षेत्र तब तक शुरू नहीं होता जब तक यह स्थिति समाप्त नहीं हो जाती कि श्रम की जरूरत आवश्यकताओं और बाहरी उपयोगिताओं की मजबूरी की वजह से ही हो। पूरी सटीकता से कहा जाए तो भौतिक उत्पादन के दायरे के बाहर वस्तुओं के चरित्र में ही यह निहित होती है। जैसे कि असभ्यों को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए, अपना जीवन चलाने के लिए और जीवन चक्र बनाए रखने के लिए प्रकृति से दो-दो हाथ करना पड़ता है, ठीक वैसे ही सभ्य मनुष्यों को भी करना होता है और हर प्रकार के समाज में, हर संभव उत्पादन प्रणाली के तहत उसे ऐसा करना ही होगा। उसके विकास के साथ-साथ स्वाभाविक आवश्यकताओं का क्षेत्र बढ़ता जाता है क्योंकि उसकी चाहतें बढ़ती हैं, लेकिन इसके साथ ही उत्पादन की शक्तियां भी बढ़ती चलती हैं जिसकी बदौलत ये चाहतें पूरी होती हैं। इस क्षेत्र में आजादी का मतलब इस तथ्य के अलावा और कुछ नहीं हो सकता कि समाजीकृत मनुष्य, सहयोगीकृत उत्पादक (एसोसिएटेड प्रोड्यूसर्स) प्रकृति के साथ विनिमय को तार्किक ढंग से विनियमित करते हैं, उसे अपने साझा नियंत्रण में लाते हैं, बजाय इसके कि एक अंधी ताकत के रूप में इससे शासित हों। वे अपना कार्य अपनी मानवीय प्रकृति के बेहद अनुकूल माहौल में बहुत कम ऊर्जा खर्च करके पूरा करते हैं। लेकिन यहां हमेशा जरूरत का ही तर्क चलता है। इस सीमा के आगे इंसानी शक्ति का विकास शुरू होता है जो अपने आप में साध्य है। यह वास्तविक आजादी का ऐसा क्षेत्र है जो जरूरत पर आधारित व्यवस्था की बुनियाद पर ही फल-फूल सकता है।‘

मार्क्स ने यहां समाजवाद के सभी प्रमुख तत्वों को व्यक्त किया है। एक, मनुष्य सहयोगात्मक रूप में उत्पादन करता है, प्रतिद्वंद्वात्मक रूप में नहीं। वह तार्किकता के साथ अलगावरहित ढंग से उत्पादन करता है, जिसका मतलब यह है कि वह उत्पादन को अपने नियंत्रण में रखता है न कि एक अंधी ताकत के रूप में उससे शासित होता है। स्पष्ट तौर पर यह समाजवाद की उस अवधारणा को अलग कर देता है जिसमें मनुष्य एक नौकरशाही से संचालित होता है भले ही यह नौकरशाही महज एक बड़े निगम के बजाय पूरी राजकीय अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करती हो। इसका मतलब यह है कि व्यक्ति योजनाएं बनाने और उन्हें क्रियान्वित करने में पूरी सक्रियता से हिस्सेदारी करता है। संक्षेप में इसका मतलब है राजनीतिक और औद्योगिक लोकतंत्र की प्राप्ति। मार्क्स ने अपेक्षा की थी कि इस नए अलगावरहित समाज के जरिए मनुष्य स्वतंत्रता हासिल करेगा, अपने पैरों पर खड़ा हो सकेगा कि वह अलगावयुक्त उत्पादन प्रणाली और खपत के हाथों मजबूर, लाचार नहीं बना रहेगा कि वह सही अर्थों में अपनी जिंदगी का रचयिता और मालिक होगा और यह कि वह अपनी आजीविका के साधनों का उत्पादन करते रहने के बजाय अपना मुख्य काम शुरू कर सकेगा। मार्क्स के लिए समाजवाद कभी जीवन की संतुष्टि नहीं, बल्कि इस संतुष्टि की शर्त था। मनुष्य एक बार तार्किक और अलगावरहित ढांचे वाला समाज बना ले तो उसे जीवन के उद्देश्य की ओर बढ़ना शुरू करने का मौका मिलता है। “जीवन का उद्देश्य यानी मानवीय शक्ति का विकास, सही मायनों में आजादी का दौर जो अपने आप में साध्य है।“

हर साल शेक्सपियर और ऐस्चीलस (Aeschylus) की सारी रचनाएं पढ़ने वाले और खुद मानवीय चिंतन की सर्वश्रेष्ठ कृतियों को जन्म देने वाले मार्क्स ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि समाजवाद संबंधी उनके विचारों को इस तरह व्य़ाख्यायित किया जाएगा कि इसका लक्ष्य अच्छा खाना और अच्छा पहनना सुनिश्चित करने वाला ‘कल्याणकारी’ या ‘श्रमिक’ राज्य हो जाएगा। मार्क्स के अनुसार मनुष्य ने इतिहास के क्रम में ऐसी संस्कृति बनाई जिसे, आर्थिक गरीबी और अलगाव से उपजी आध्यात्मिक गरीबी की जंजीरों से खुद को आजाद करने के बाद, अपना बनाने के लिए वह स्वतंत्र होगा। मार्क्स की दृष्टि मनुष्य में, इतिहास के दौरान विकसित मनुष्य के सत्व में निहित वास्तविक संभावनाओं में उनके यकीन पर आधारित है। उन्होंने समाजवाद को मानवीय स्वतंत्रता और रचनात्मकता की शर्त के रूप में देखा, न कि मनुष्य जीवन के अपने आप में एक उद्देश्य के रूप में।

मार्क्स के मुताबिक समाजवाद (या साम्यवाद) उस ठोस जगत से पलायन या उस दुनिया का अमूर्तिकरण नहीं है जो मनुष्यों ने अपनी योग्यता का पदार्थीकरण करते हुए बनाई है। यह अप्राकृतिक, आदिकालीन सादगी में दरिद्र वापसी नहीं है। इसके बजाय यह मनुष्य की प्रकृति का एक यथार्थ के रूप में पहला वास्तविक उभार, पहला सच्चा प्रकटीकरण है। मार्क्स के मुताबिक समाजवाद एक ऐसा समाज है जो मनुष्य के अलगाव पर विजय हासिल करके उसके सत्व के प्रकटीकरण की अनुमति देता है। यह किसी भी स्थिति में सच्चे अर्थों में मुक्त, तार्किक, सक्रिय, स्वतंत्र मनुष्य के रहने लायक परिस्थितियां तैयार करने से कम नहीं है। यह बुतों को तोड़ने के पैगंबरीय मकसद की ही प्राप्ति है।

मार्क्स को आजादी का दुश्मन भी माना जा सकता है, यह संभव हुआ दो वजहों से। एक, पश्चिमी देशों में मार्क्स के प्रति फैली जबर्दस्त अज्ञानता और दो स्टालिन का वह अद्भुत फर्जीवाड़ा जिसके तहत वह मार्क्स के नाम से बोलते मान लिए गए। मार्क्स के मुताबिक समाजवाद का उद्देश्य आजादी है, लेकिन आजादी महज उस रूप में नहीं जिस रूप में मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं उसे स्वीकारती हैं, उससे कहीं ज्यादा अग्रणी स्वरूप में। आजादी, स्वतंत्रता के अर्थ में जो मनुष्य के अपनी शक्तियां इस्तेमाल करते हुए और दुनिया से उत्पादकतापूर्ण ढंग से जुड़ते हुए अपने पैरों पर खड़े होने पर आधारित है। मार्क्स कहते हैं, ‘आजादी मनुष्य का सत्व है कुछ इस कदर कि इसके विरोधी भी इसे महसूस करते हैं… कोई भी व्यक्ति आजादी के खिलाफ नहीं होता। वह अधिक से अधिक दूसरों की आजादी का विरोध करता है। इसलिए हर तरह की आजादी हमेशा मौजूद रही है, बस कभी विशेषाधिकार के रूप में तो कभी सबके सहज अधिकार के रूप में।’

मार्क्स के मुताबिक समाजवाद एक ऐसा समाज है जो मनुष्य की जरूरतें पूरी करता है। लेकिन बहुत से लोग सवाल करेंगे कि क्या आधुनिक पूंजीवाद भी ठीक ऐसा ही नहीं करता? क्या हमारी बड़ी-बड़ी कंपनियां मनुष्य की जरूरतें पूरी करने को बेकरार नहीं हैं? और क्या बड़ी-बड़ी विज्ञापन एजेंसियां उन पार्टियों से टोह नहीं लेतीं जो विभिन्न सर्वेक्षणों तथा प्रेरक विश्लेषणों के जरिए यह पता करती रहती हैं कि मनुष्य की जरूरतें क्या हैं?

दरअसल, समाजवाद की अवधारणा कोई तभी समझ सकता है जब वह यह समझे कि मार्क्स ने मनुष्य की वास्तविक जरूरतों में और कृत्रिम रूप से प्रस्तुत की गई जरूरतों में भेद किया है। जैसा कि मनुष्य की संपूर्ण अवधारणा से पता चलता है, उसकी वास्तविक जरूरतों की जड़ उसकी प्रकृति में होती है। वास्तविक और झूठी जरूरतों के इस अंतर को समझना तभी संभव है जब मनुष्य की प्रकृति और उसकी प्रकृति में निहित वास्तविक मानवीय जरूरतों की तस्वीर साफ हो। मनुष्य की वास्तविक जरूरतें वे हैं जिनकी पूर्ति बतौर मनुष्य उसके सत्व के प्रकटीकरण के लिए आवश्यक हो। जैसा कि मार्क्स ने कहा है, ‘जिसे मैं सचमुच प्यार करता हूं उसका अस्तित्व मैं एक जरूरत के रूप में, आवश्यकता के रूप में महसूस करता हूं जिसके बगैर मेरा सत्व पूर्ण नहीं हो सकता, संतुष्ट नहीं हो सकता।’ मनुष्य की प्रकृति की खास अवधारणा के ही आधार पर मार्क्स मनुष्य की सच्ची और झूठी जरूरतों में फर्क कर सकते हैं। बिल्कुल आत्मगत रूप में बनावटी जरूरतों को वास्तविक जरूरत के रूप में महसूस किया जा सकता है और आत्मगत नजरिए से दोनों जरूरतों में फर्क करने का कोई आधार नहीं हो सकता। (आधुनिक शब्दावली में न्यूरोटिक यानी मानसिक रोग से संबंधित जरूरतों और तर्कसंगत या स्वस्थ जरूरतों के बीच फर्क किया जा सकता है) अक्सर मनुष्य अपनी झूठी जरूरतों को लेकर ही सतर्क होते हैं, वास्तविक जरूरतों को लेकर वे उदासीन होते हैं। समाज के विश्लेषक का यही काम है कि मनुष्य को जागरूक बनाए ताकि वह झूठी जरूरतों के भ्रम से निकले और वास्तविक जरूरतों की सचाई महसूस कर सके। मार्क्स के अनुसार समाजवाद का मुख्य लक्ष्य मनुष्य की वास्तविक जरूरतों की पहचान और पूर्ति करना होता है। यह तभी संभव है जब उत्पादन मनुष्य का ख्याल रखे और पूंजी मनुष्य की झूठी जरूरतें गढ़ना और उनका फायदा उठाना बंद करे।

तमाम अस्तित्ववादी दर्शन की तरह मार्क्स की समाजवाद की अवधारणा भी मनुष्य के अलगाव का विरोध है। अगर, जैसा कि आल्डस हक्सले ने कहा है, ‘हमारी मौजूदा आर्थिक, सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाएं काफी हद तक संगठित प्रेमविहीनता पर आधारित हैं’ तो मार्क्स का समाजवाद इसी प्रेमविहीनता का, मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का, प्रकृति के प्रति उसकी शोषणपरकता का विरोध है। अलगावरहित मनुष्य ( जो, जैसा कि हमने पहले दिखाया है समाजवाद का लक्ष्य है) ऐसा इंसान है जो प्रकृति पर ‘वर्चस्व’ नहीं कायम करता, उसके साथ एक हो जाता है। वह वस्तुओं के प्रति इतना संवेदनशील और उत्तरदायी होता है कि उसके लिए वस्तुएं प्राणवंत हो जाती हैं।

क्या इसका यह मतलब नहीं है कि मार्क्स का समाजवाद अतीत के महान मानवतावादी धर्मों से मिलती-जुलती गहरी धार्मिक भावनाओं की पूर्ति है? बिल्कुल है, बशर्ते हम इस बात को समझें कि हीगल और अन्य कई विद्वानों की तरह मार्क्स ने मनुष्य की आत्मा के बारे में अपनी चिंता आस्तिक नहीं बल्कि दार्शनिक भाषा में व्यक्त की है।

मार्क्स ने धर्म से लड़ाई इसीलिए छेड़ी क्योंकि यह अलगावयुक्त है और मनुष्य की वास्तविक जरूरतों की पूर्ति नहीं करता। ईश्वर से मार्क्स की लड़ाई दरअसल उस मूर्ति से लड़ाई है जिसे ईश्वर कहा जाता है। एक युवक के रूप में मार्क्स अपने शोध के बारे में पहले ही लिख चुके हैं, ‘ईश्वररहित वे नहीं हैं जो आम लोगों के ईश्वर का अनादर करते हैं, ईश्वररहित वे हैं जो जनसमूह की धारणाओं का श्रेय ईश्वर को देते हैं। मार्क्स की आस्तिकता तार्किक रहस्यवाद (जेन बुद्धत्व या मीस्टर एखार्ट के करीब) का सबसे आगे बढ़ा हुआ रूप है। ईश्वर और धर्म की तरफ से लड़ने वाले और मार्क्स पर ‘ईश्वरहीनता’ का आरोप लगाने वाले तमाम लोगों के मुकाबले कहीं आगे की चीज है यह।    (अनुवाद की तारीखः फरवरी 2016)

11 समाजवाद मनुष्य के अलगाव का उन्मूलन है

मार्क्स के इतिहास संबंधी दर्शन और समाजवाद संबंधी दर्शन में जो संबंध है उसका और ओल्ड टेस्टामेंट प्रॉफेट्स की मसीहाई उम्मीदों (मेशियानिक होप) तथा ग्रीक और रोमन चिंतन में निहित मानवता की आध्यात्मिक जड़ों का जिक्र किए बगैर धर्म संबंधी उनके नजरिए के बारे में बात नहीं की जा सकती। मेशियानिक होप सचमुच पाश्चात्य चिंतन की अनूठी विशेषता है। ओल्ड टेस्टामेंट के प्रॉफेट्स लाओत्से और बुद्ध की तरह केवल आध्यात्मिक नेता नहीं हैं, वे राजनीतिक नेता भी हैं। वे मनुष्यों का उन विकल्पों से सामना कराते हैं जिनमें से उन्हें चुनना होता है और यह भी बताते हैं कि मनुष्यों को कैसा होना चाहिए। ज्यादातर ओल्ड टेस्टामेंट प्रॉफेट बताते रहे हैं कि इतिहास का एक मतलब होता है, कि मनुष्य इतिहास की प्रक्रिया में खुद को परिपूर्ण बनाता है और यह कि मनुष्य आखिरकार शांति तथा न्याय सुनिश्चित करने वाली सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करेगा। मगर इन प्रॉफेट्स की नजर में शांति तथा न्याय का मतलब युद्ध की अनुपस्थिति या अन्याय की गैरमौजूदगी नहीं था। शांति तथा न्याय ऐसी अवधारणाएं हैं जिनकी जड़ें समग्रता में ओल्ड टेस्टामेंट की मनुष्य की अवधारणा में निहित हैं। अपने बारे में सचेत होने से पहले (यानी इंसान होने से पहले) मनुष्य प्रकृति के साथ एकीकृत होकर रहता है (स्वर्ग में एडम और ईव की भांति)। स्वतंत्रता का पहला कदम (यानी ‘ना’ कहने की क्षमता) उसकी आंखें खोल देता है और वह इस दुनिया में खुद को अजनबी की तरह पाता है जो न केवल प्रकृति के साथ संघर्ष में घिरा है, बल्कि मनुष्य और मनुष्य में तथा पुरुष और स्त्री में भी संघर्ष झेल रहा है। इतिहास की प्रक्रिया वह प्रक्रिया है जिसके जरिए मनुष्य अपनी विशिष्ट मानवीय विशेषताएं – प्यार करने और समझ बनाने की क्षमता – विकसित करता है। और एक बार वह पूर्ण इंसानियत हासिल कर ले तो अपने और दुनिया के बीच एकात्मता के खोए दौर में वापस लौट सकता है। हालांकि एकात्मता का यह नया दौर इतिहास शुरू होने के पहले वाले पूर्व चेतन दौर से अलग होता है। इसमें मनुष्य का अपने साथ, प्रकृति के साथ और अन्य सह मनुष्यों के साथ ऐक्य भाव इस तथ्य पर आधारित होता है कि इंसान ने इतिहास की प्रक्रिया में खुद को जन्म दिया है। ओल्ड टेस्टामेंट चिंतन में यह बात आती है कि ईश्वर इतिहास में उद्घाटित होता है और इतिहास में ही मनुष्य की मुक्ति निहित है। इसका मतलब यह है कि मनुष्य के आध्यात्मिक लक्ष्य समाज के रूपांतरण से अभिन्न रूप में जुड़े हैं। राजनीति मूलतः ऐसा क्षेत्र है नहीं जिसे नैतिक मूल्यों से और मनुष्य के आत्म साक्षात्कार से अलग किया जा सके।

मिलते-जुलते विचार ग्रीक (तथा हेलनिस्टिक) और रोमन चिंतन में भी उभरे। स्टोइक दर्शन के प्रवर्तक जेनो से लेकर सेनेका और सिसरो तक मनुष्य के दिमाग पर प्राकृतिक कानून और मानव मात्र की समानता की अवधारणाओं का सशक्त प्रभाव पैगंबरीय परंपरा के साथ संयुक्त रूप से ईसाई चिंतन की नींव तैयार करता रहा।

चूंकि ईसाइयत, खासकर पॉल के बाद, मुक्ति की ऐतिहासिक अवधारणा के पारलौकिक या विशुद्ध आध्यात्मिक रूपांतरण की ओर झुकने लगी और चर्च अच्छे समाज का स्थानापन्न बन गया इसलिए यह रूपांतरण किसी भी रूप में संपूर्ण नहीं था। शुरुआती दौर में चर्च फादरों ने मौजूदा राज्य की बुनियादी आलोचना की; उत्तर मध्यकालीन दौर में ईसाई चिंतन ने राज्य और धर्मनिरपेक्ष सत्ता की दिव्य और प्राकृतिक न्याय के दृष्टिकोण से आलोचना की। यह दृष्टिकोण इस बात पर जोर देता है कि आनंद और तर्क (मध्यकालीन दार्शनिक अर्थ में कहा जाए तो सामूहिक ज्ञान) में निहित आध्यात्मिक मूल्यों से राज्य को किसी भी स्थिति में अलग नहीं किया जाना चाहिए। इसके अलावा सुधार से पहले ईसाई धर्म में, सुधार के बाद कई ईसाई समूहों के चिंतन में और वहां से मौजूदा दौर के मित्र समाजों (सोसाइटी ऑफ फ्रेंड्स) तक में मसीहाई विचार इससे भी ज्यादा उग्र रूप में व्यक्त हुए।

हालांकि सुधार के बाद मसीहाई सोच की मुख्यधारा धार्मिक विचारों में प्रकट होना बंद हो गई। इसके बाद यह दार्शनिक, ऐतिहासिक और सामाजिक विचारों में प्रकट होती है। थोड़े अलग रूप में यह पुनर्जागरण के यूटोपियाओं में भी प्रकट हुई जहां नई दुनिया सुदूर भविष्य की नहीं बल्कि सुदूर स्थान की बात थी। यह फ्रांसीसी और अंग्रेजी क्रांतियों तथा प्रबोधन के दार्शनिकों के विचारों में व्यक्त हुई। इसकी सबसे ताजा और सबसे पूर्ण अभिव्यक्ति हम मार्क्स की समाजवाद की अवधारणा में पाते हैं। मोजेज हेस जैसे समाजवादियों के जरिए ओल्ड टेस्टामेंट चिंतन का प्रत्यक्ष प्रभाव उन पर चाहे जितना भी रहा हो, पर इसमें दो राय नहीं कि स्पिनोजा, गोथे, हीगल के विचारों के जरिए पैगंबरीय मसीहाई परंपरा ने उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से निश्चित तौर पर प्रभावित किया। जो बात पैगंबरीय सोच, 13वीं सदी के ईसाई चिंतन, 18वीं सदी के प्रबोधन और 19वीं सदी के समाजवाद – –इन सब में समान है वह है यह विचार कि राज्य (समाज) और आध्यात्मिक मूल्य इन दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता, कि राजनीति और नैतिक मूल्य अविभाज्य हैं। इस विचार पर हमला पहले पुनर्जागरण की धर्मनिरपेक्ष अवधारणाओं की ओर से और फिर आधुनिक राज्य के धर्मनिरपेक्षवाद की ओर से हुआ। ऐसा लगता है कि पश्चिमी मनुष्य जब भी अपनी विशाल भौतिक विजयों के प्रभाव में था, उसने अमर्यादित रूप से खुद को इन जीतों के जरिए हासिल ताकतों के हवाले कर दिया और इन ताकतों के नशे में चूर वह खुद को भूल गया। इन समाजों के अभिजन सत्ता, विलासिता और अनुसरण करने वाले जनसमूहों के साथ जोड़-तोड़ को लेकर मोहासक्त हो गए। पुनर्जागरण में इसके नए विज्ञान, ग्लोब की खोज और उत्तर इटली के संपन्न नगर राज्य के साथ यही हुआ। पहले और दूसरे यानी मौजूदा औद्योगिक क्रांतियों के साथ भी ऐसा ही हुआ।

लेकिन एक अन्य कारक की मौजूदगी के चलते स्थिति थोड़ी जटिल हो गई है। अगर राज्य या समाज का उद्देश्य खास आध्यात्मिक मूल्यों पर अमल सुनिश्चित करना मान लिया जाए तो खतरा यह हो जाता है कि एक सर्वोच्च ताकत लोगों को खास तरह से सोचने या व्यवहार करने के लिए मजबूर करने लगेगी। खास वस्तुनिष्ठ मूल्यों को सामाजिक जीवन में शामिल करना समाज में  अधिनायकवाद पैदा कर सकता है। मध्यकालीन दौर में आध्यात्मिक सत्ता कैथोलिक चर्च में थी। प्रोटेस्टेंटवाद ने इस सत्ता से लड़ाई लड़ी, यह वादा करते हुए कि व्यक्तियों को ज्यादा स्वायत्तता दी जाएगी। हालांकि आखिरकार उसने भी राज्य को निर्विवाद रूप से मनुष्य के शरीर और उसकी आत्मा का निरंकुश शासक बना दिया। शाही सत्ता के खिलाफ राष्ट्र के नाम पर सामने आए विद्रोहियों ने राष्ट्र राज्य की वकालत करते हुए खुद को स्वतंत्रता का प्रतिनिधि बताया। पर जल्दी ही राष्ट्र राज्य ने खुद को उन लोगों के भौतिक हितों की रक्षा में झोंक दिया जो पूंजी के मालिक थे और इस प्रकार अधिसंख्य आबादी के श्रम का शोषण कर सकते थे। समाज के कुछ तबकों ने इस नए अधिनायकवाद का विरोध किया और धर्मनिरपेक्ष सत्ता की दखलंदाजी से व्यक्ति की आजादी पर जोर दिया। उदारता के इस बुनियादी सिद्धांत ने, जो  ‘से आजादी’ की रक्षा को प्रवृत्त था, इसके साथ ही ‘की आजादी’ के आग्रह का भी मार्ग प्रशस्त किया। दूसरे शब्दों में इसका मतलब यह था कि उदारता चर्च और राज्य से अलगाव भर सुनिश्चित करके संतुष्ट नहीं रह सकती, उसे इस बात को भी स्वीकार्य बनाना पड़ेगा कि खास नैतिक या आध्यात्मिक मूल्यों पर अमल में मदद करना राज्य का काम नहीं है। ये मूल्य पूरी तरह व्यक्ति का अपना मामला होते हैं।

समाजवाद (मार्क्सवादी या अन्य रूपों में) इस विचार की ओर लौटा कि ‘अच्छा समाज’ मनुष्य की आध्यात्मिक जरूरतों की पूर्ति की शर्त होता है। यह चर्च और राज्य दोनों के लिहाज से अधिनायकवाद विरोधी था। इसलिए इसने अपना लक्ष्य धीरे-धीरे राज्य के विलोप और ऐसे समाज की स्थापना को बनाया जो व्यक्तियों के स्वैच्छिक सहयोग पर टिका हो। इसका लक्ष्य समाज की पुनर्संरचना को कुछ इस तरह से अंजाम देना था कि यह मनुष्य की स्व में वास्तविक वापसी का आधार बन जाए। वह भी उन अधिनायकवादी ताकतों की मौजूदगी के बगैर जिनने मानव मस्तिष्क को बाधित करने और दरिद्र बनाने का कार्य किया है।

इस प्रकार मार्क्सवादी और अन्य तरह के समाजवाद पैगंबरीय मसीहावाद (प्रफेटिक मेशियनिज्म) क्रिश्चन चिलियस्टिक सेक्टेरियनिज्म, तेरहवीं सदी के टॉमिज्म, पुनर्जागरण के युटोपियनिज्म और अठारहवीं सदी के प्रबोधन (एनलाइटेनमेंट) का उत्तराधिकारी है। यह समाज के प्रफेटिक-क्रिश्चन विचारों का संश्लेषण (सिंथेसिस) ही है जो वैयक्तिक स्वतंत्रता और आध्यात्मिक आशापूर्ति का आधार बनता है। इसी कारण यह चर्च का विरोधी है क्योंकि चर्च ने समाज और नैतिक मूल्यों के अलगाव के जरिए मानव मस्तिष्क को और उदारवाद को बाधित किया है। यह स्टालिनवाद और ख्रुश्चेववाद के भी खिलाफ है क्योंकि ये अधिनायकवादी रहे हैं और इन्होंने मानववादी मूल्यों की अवहेलना की है।

समाजवाद मनुष्यों के अलगाव का उन्मूलन है, वास्तविक इंसान के रूप में उसकी वापसी है। ‘यह मनुष्य और मनुष्य तथा मनुष्य और प्रकृति के बीच विरोध के निपटारे का विश्वसनीय संकल्प है। यह अस्तित्व और सत्व के बीच, पदार्थीकरण और स्व उद्घोष के बीच, आजादी और आवश्यकता के बीच, व्यक्ति और प्रजाति के बीच विरोध का सच्चा समाधान है। यह इतिहास की पहेली का हल है और खुद को इसके हल के रूप में जानता है।’ मार्क्स के लिए समाजवाद का मतलब था मनुष्य की खुद में वापसी की इजाजत देने वाली सामाजिक व्यवस्था, अस्तित्व और सत्व के बीच की पहचान, सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट के विरोध या उनके अलगाव पर फतह, प्रकृति का मानवीकरण। थोड़े में इसका मतलब था एक ऐसी दुनिया जिसमें मनुष्य अजनबियों के बीच अजनबी की तरह न हो बल्कि अपनी दुनिया में पूरी सहजता से रहता हो। (अनुवाद की तारीखः मई 2016)

 

 

12 मार्क्स को दो भागों में बांट कर देखने की ‘मजबूरी’ को समझें

अगर वे लोग सही होते जो यह दावा करते हैं कि ‘आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियां’ में संकलित ‘युवा मार्क्स’ के विचार उम्रदराज और परिपक्व मार्क्स द्वारा हीगल की शिक्षा से जुड़े आदर्शवादी अतीत के अवशेषों के रूप में त्याग दिए गए थे तो मानवीय प्रकृति, अलगाव, गतिविधि आदि की मार्क्स की अवधारणा के बारे में पेश किया गया हमारा ब्योरा काफी इकतरफा बल्कि गुमराह करने वाला कहलाता। अगर ऐसा दावा करने वाले सचमुच सही होते तो भी कोई उम्रदराज मार्क्स के बजाय युवा मार्क्स को ही तरजीह देता, समाजवाद को उन्हीं से जोड़ना चाहता बजाय उम्रदराज मार्क्स के। मगर सौभाग्य से मार्क्स को इस तरह दो भागों में विभक्त करने की जरूरत नहीं है। तथ्य यह है कि ‘आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियां’ में व्यक्त मार्क्स के मनुष्य संबंधी बुनियादी विचारों और पूंजी में व्यक्त अपेक्षाकृत अधिक उम्र वाले मार्क्स के विचारों में कोई बुनियादी अंतर नहीं है; कि मार्क्स ने अपने शुरुआती विचारों का परित्याग नहीं किया था, जैसा कि उक्त सिद्धांत के प्रवक्ता दावा करते हैं।

पहली बात, वे कौन लोग हैं जो यह दावा करते हैं कि युवा मार्क्स और प्रौढ़ मार्क्स के मनुष्य संबंधी विचार परस्परविरोधी हैं? मुख्यतया ऐसे विचार रूसी कम्यूनिस्टों ने व्यक्त किए हैं। वे इससे अलग कुछ शायद ही कर सकते थे क्योंकि उनके विचार ही नहीं उनकी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था भी हर तरह से मार्क्स के मानववाद के प्रतिकूल पड़ती थी। उनकी व्यवस्था में मनुष्य तमाम सामाजिक इंतजामात का सर्वोच्च लक्ष्य होने के बजाय राज्य और उत्पादन का गुलाम होता है। मार्क्स का जो लक्ष्य था – मानवीय व्यक्तित्व की वैयक्तिकता का विकास – उसे सोवियत व्यवस्था में जिस कदर नकारा गया, वैसा तो समकालीन पूंजीवाद में भी नहीं नकारा जाता। कम्यूनिस्टों का भौतिकवाद मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद के बजाय 19 वीं सदी के उस बुर्जुआजी यांत्रिक भौतिकवाद के ज्यादा करीब था जिसके खिलाफ मार्क्स ने लड़ाई लड़ी थी।

सोवियत संघ की कम्यूनिस्ट पार्टी ने जी लुकास के जरिए अपनी यह राय प्रकट की। लुकास ने ही सबसे पहले मार्क्स के मानववाद को पुनर्जीवित करने का काम किया था। लेकिन नाजियों के चंगुल से भाग निकलने के बाद जब 1934 में वे रूस में थे, तो कम्यूनिस्ट पार्टी ने उन्हें अपनी गलतियां ‘कबूल’ करने को बाध्य किया था। ऐसे ही अपनी कमाल की पुस्तक ‘द प्रिंसिपल होप’ में मार्क्स के मानववाद पर वैसा ही जोर देने वाले अर्न्स्ट ब्लॉक को कम्यूनिस्ट पार्टी से जुड़े लेखकों की तरफ से जबर्दस्त हमले झेलने पड़े, हालांकि उनकी किताब में सोवियत कम्यूनिज्म के बारे में कई बहुत अच्छी, प्रशंसात्मक टिप्पणियां की गई थीं। कम्यूनिस्ट लेखकों से अलग डैनियल बेल ने हाल ही में यही नजरिया अपनाते हुए दावा किया कि ‘आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियां’ पर आधारित मार्क्स के मानववाद संबंधी विचार ‘ऐतिहासिक मार्क्स नहीं हैं’। बेल ने कहा, ‘हालांकि ऐसे दृष्टिकोण के प्रति सहानुभूति रखी जा सकती है, लेकिन इस अवधारणा को मार्क्स के विचारों के केंद्रीय तत्व के रूप में देखना मिथक निर्माण को आगे बढ़ाना भर है।’

इसमें दो राय नहीं कि मार्क्स के शास्त्रीय व्याख्याकारों ने – चाहे वे बर्नस्टीन जैसे सुधारवादी हों या काउत्स्की, प्लेखानोव, लेनिन और बुखारिन जैसे परंपरावादी (ऑर्थोडॉक्स) – मार्क्स की व्याख्या उनके मानववादी अस्तित्ववाद को केंद्र में रखते हुए नहीं की है। दो तथ्य मुख्य रूप से इस प्रवृत्ति को स्पष्ट कर देते हैं। एक, यह तथ्य कि आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियां 1932 से पहले नहीं छपी थी और पांडुलिपि के रूप में भी वह तब तक ज्ञात नहीं थी। दो, यह तथ्य कि जर्मन आइडियॉलजी 1932 से पहले तक कभी पूर्ण रूप में प्रकाशित नहीं हुई और आंशिक रूप में भी पहली बार 1926 में ही प्रकाशित हुई। स्वाभाविक रूप से उपरोक्त लेखकों की मार्क्स के विचारों की इकतरफा और तोड़ी-मरोड़ी व्याख्याओं के पीछे इन दोनों तथ्यों की अहम भूमिका रही, लेकिन किसी भी सूरत में यह तथ्य कि मार्क्स के ये लेख क्रमशः बीस और तीस के दशक तक कमोबेश अज्ञात थे, ‘शास्त्रीय’ (क्लासिक) व्याख्या में हुई मार्क्सवादी मानववाद की अनदेखी का पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं पेश करता है क्योंकि ‘पूंजी’ और मार्क्स की अन्य प्रकाशित रचनाएं (जैसे 1844 में प्रकाशित हीगल के कानून के दर्शन की आलोचना) मार्क्स के मानववाद को समझने का पर्याप्त मजबूत आधार प्रदान कर सकती थीं। ज्यादा प्रासंगिक स्पष्टीकरण इस तथ्य में निहित है कि मार्क्स की मौत के बाद से लेकर बीस के दशक तक के दौर का दार्शनिक चिंतन सकारात्मक यांत्रिकतावादी (पॉजिटिविस्टिक मेकैनिस्टिक) विचारों के साये में रहा जिसका प्रभाव लेनिन और बुखारिन जैसे विचारकों पर पड़ा। यह बात भी भुलाई नहीं जा सकती कि मार्क्स की ही तरह शास्त्रीय मार्क्सवादियों को भी उन शब्दों से एलर्जी थी जिनसे आदर्शवाद या धर्म की हल्की सी भी गंध आती हो क्योंकि वे अच्छी तरह जानते थे कि इन शब्दों का इस्तेमाल काफी हद तक सामाजिक और आर्थिक यथार्थ को छुपाने के लिए होता था।

मार्क्स के मामले में आदर्शवादी टर्मिनोलॉजी से यह एलर्जी ज्यादा आसानी से समझी जा सकती है क्योंकि वह उस नास्तिक, पर आध्यात्मिक परंपरा में पूरी गहराई से पगे हुए थे जो स्पिनोजा और गोथे  हीगल तक ही नहीं बल्कि पैगंबरी मसीहावाद (प्रफेटिक मेशियनिज्म) तक जाती है। ये बाद वाले विचार सेंट साइमन और मोजेज हेस जैसे समाजवादियों में बिल्कुल सचेत ढंग से जीवित रहे और 19वीं सदी के समाजवादी चिंतन का एक अहम हिस्सा बने रहे। यहां तक कि बीसवीं सदी में भी प्रथम विश्वयुद्ध तक के अग्रणी समाजवादियों (जैसे जीन जॉरेस) के चिंतन में मौजूद रहे।

जिस आध्यात्मिक-मानवीय परंपरा में मार्क्स जीते रहे और जो सफल औद्योगीकरण की यांत्रिक-भौतिकवादी धारा में लगभग पूरे तरह डुबो दी गई थी, प्रथम विश्वयुद्ध के बाद छोटे पैमाने पर एकाध चिंतकों में और फिर द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान तथा उसके बाद बड़े पैमाने पर पुनर्जीवित हुई। स्टालिन व हिटलर के शासन के दौरान हुई क्रूरताओं में और युद्ध के दौरान हुई बर्बरताओं में मनुष्य का जैसा अमानवीकरण दिखा और गैजिट मानसिकता वाले मनुष्यों तथा कंपनी मानवों में भी जिस तरह का अमानवीकरण झलका उन सबने मानवीय विचारों की इस नई अभिव्यक्ति का मार्ग प्रशस्त किया। दूसरे शब्दों में अलगाव के खिलाफ जो विरोध मार्क्स, कीर्कगार्ड और नीत्शे द्वारा व्यक्त किया गया था, जो बाद में पूंजीवादी औद्योगीकरण की स्पष्ट सफलता द्वारा शांत करा दिया गया था, इस प्रमुख व्यवस्था की मानवीय विफलता के बाद एक बार फिर बुलंद हो गया और इसने संपूर्ण मार्क्स तथा उनके मानववादी दर्शन की पुनर्व्याख्या की राह खोली। मैंने पहले ही उन कम्यूनिस्ट लेखकों का जिक्र किया है जो इस मानववादी संशोधनवाद में अग्रणी हैं। मैं यहां युगोस्लाव कम्यूनिस्टों का जिक्र करना चाहूंगा। हालांकि मेरी जानकारी में उन लोगों ने अलगाव का दार्शनिक सवाल तो नहीं उठाया, लेकिन रूसी साम्यवाद से उनकी आपत्ति का मुख्य आधार स्टेट मशीनरी के बरक्स व्यक्ति को लेकर उनकी चिंता थी और उन्होंने विकेंद्रीकरण तथा वैयक्तिक पहलों की एक व्यवस्था विकसित की जो पूर्ण नौकरशाहीकरण और केंद्रीकरण के रूसी आदर्श से नितांत भिन्न थी।

पोलैंड, पूर्वी जर्मनी, हंगरी में रूसियों का राजनीतिक विरोध मानवीय समाजवाद के नुमाइंदों से करीबी से जुड़ा हुआ था। फ्रांस, जर्मनी और कुछ हद तक इंग्लैंड में मार्क्स को लेकर जीवंत चर्चा चल रही थी जो उनके विचारों की ठोस जानकारी और गहरी समझ पर आधारित थी। जर्मन साहित्य से मैं मुख्यतः प्रोटेस्टेंट ब्रह्मज्ञानियों (थियोलॉजियंस) द्वारा लिखे गए पेपरों का ही जिक्र करूंगा। फ्रांसीसी साहित्य तो और व्यापक है। ये कैथोलिक्स द्वारा और मार्क्सवादी तथा गैरमार्क्सवादी दार्शनिकों द्वारा लिखे गए हैं।

अंग्रेजीभाषी देशों में मार्क्सवादी मानववाद की वापसी इस तथ्य से बाधित हुई कि आर्थिक तथा दार्शनिक पांडुलिपियां का हाल तक अंग्रेजी में कभी अनुवाद ही नहीं हुआ। बावजूद इसके, टी बी बोटोमोर जैसे कुछ लोगों ने उपरोक्त लेखकों द्वारा व्यक्त किए गए मार्क्सवादी मानववाद संबंधी विचार साझा किए। अमेरिका में मार्क्स के मानववाद को समझने की राह खोलने वाली सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है हरबर्ट मर्क्यूज की रीजन एंड रिवोल्यूशन (तर्क और क्रांति)। राया दुनायेव्स्काया की पुस्तक मार्क्सिज्म एंड फ्रीडम (मार्क्सवाद और आजादी) जिसकी भूमिका एच मर्क्यूज ने लिखी है, भी मार्क्सवादी मानववादी विचारों पर अच्छी खासी रोशनी डालती है।

हालांकि इस तथ्य में संदेह नहीं है कि रूसी साम्यवादी युवा मार्क्स तथा बुजुर्ग मार्क्स के विभाजन को स्वयंसिद्ध मान लेने के लिए मजबूर किए गए और यह भी सही है कि कई गूढ़ और गंभीर लेखकों ने रूसियों के इस रुख का निषेध किया, लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं हो जाता कि रूसी (और डी बेल) गलत थे। हालांकि रूसियों के इस रुख के औचित्य पर ढंग से विचार करना इस पुस्तक की सीमाओं के चलते यहां संभव नहीं होगा, लेकिन फिर भी मैं संक्षेप में पाठकों को यह दिखाने की कोशिश करूंगा कि रूसियों का स्टैंड क्यों समर्थन के काबिल नहीं है।

कुछ ऐसे तथ्य हैं जो सतही तौर पर देखने से रूसी कम्यूनिस्टों के रुख का समर्थन करते प्रतीत होते हैं। जर्मन आइडियॉलजी में मार्क्स और एंजिल्स स्पिशीज (प्रजाति) और ह्यूमन एसेंस (मानवीय सत्व) शब्दों का प्रयोग करते नहीं दिखते हैं जबकि इकोनॉमिक एंड फिलॉसफिकल मैन्युसक्रिप्ट में ये शब्द इस्तेमाल हुए हैं। इतना ही नहीं, मार्क्स ने बाद में ( द क्रिटीक ऑफ पॉलिटिकल इकोनॉमी की भूमिका में) यह भी कहा कि जर्मन आइडियॉलजी में उन्होंने और एंजिल्स ने यह ‘तय किया था कि अपने पहले के दार्शनिक अंतःकरण से हिसाब बराबर करने के लिए आपसी तालमेल से जर्मन फिलॉसफी के प्रति वैचारिक दृष्टि को लेकर अपने नजरिए का विरोध खोज निकालेंगे।’ दावा किया गया कि पहले के दार्शनिक अतःकरण के साथ ‘हिसाब बराबर करने’ का मतलब यह था कि मार्क्स और एंजिल्स आर्थिक तथा दार्शनिक पांडुलिपियां में व्यक्त अपने बुनियादी विचारों का परित्याग कर चुके थे। लेकिन जर्मन आइडियॉलजी (जर्मन विचारधारा) पर एक सरसरी नजर डालने से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि यह बात सच नहीं है। हालांकि यह सही है कि जर्मन आइडियॉलजी में ह्यूमन एसेंस जैसे शब्द नहीं प्रयुक्त हुए हैं, लेकिन फिर भी इसमें आर्थिक तथा दार्शनिक पांडुलिपियां की मुख्य चिंतन धारा को जारी रखा गया है। खासकर अलगाव की अवधारणा को।

(इस पहलू पर और विस्तार से अगले अंक में)

(अनुवाद की तारीखः जुलाई 2016)

 

13 मार्क्स को खारिज करने के लिए उनकी दलीलों का पुतला खड़ा करते हैं आलोचक

‘जर्मन आइडियॉलजी’ में अलगाव की व्याख्या श्रमों में विभाजन के परिणाम के रूप में की गई है जिसमें एक अलग व्यक्ति या परिवार के हितों और एक-दूसरे से अतंर्क्रिया करने वाले तमाम व्यक्तियों के सामुदायिक हितों में अंतर्विरोध निहित होता है। इसी पैराग्राफ में अलगाव की अवधारणा को ठीक उसी तरह परिभाषित किया गया है जैसे ‘आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियां’ में, और इसके शब्द हैं, ‘मनुष्य के अपने ही कार्य उसके विरुद्ध खड़ी ऐसी अनजानी ताकत बन जाते हैं जो उसके द्वारा नियंत्रित होने के बजाय उसको अपना गुलाम बना लेती हैं।‘ यहां भी हम परिस्थितियों के संदर्भ में अलगाव की वही परिभाषा पाते हैं जो पहले बताई जा चुकी हैः सामाजिक गतिविधियों का यह सुनिश्चितीकरण, हम खुद जिसे अपने ऊपर एक वस्तुनिष्ठ ताकत के रूप में निर्मित करते हैं उसका यह मजबूतीकरण, उसका हमारे काबू से बाहर होते जाना, हमारी अपेक्षाओं को धता बताते हुए हमारी गणनाओं की धज्जियां उड़ाते चले जाना – यह अब तक के ऐतिहासिक विकास का मुख्य कारक है।‘

चौदह वर्ष बाद एडम स्मिथ के साथ एक बहस (1857-58) में मार्क्स यही कथित आदर्शवादी दलील देते हैं जो उन्होंने आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियां में दी थी, यह कहते हुए कि कार्य की जरूरत अपने आप में आजादी पर बंदिशों का औचित्य नहीं होती (बशर्ते कि यह अलगावयुक्त कार्य न हो)। मार्क्स व्यक्ति के ‘आत्म साक्षात्कार’ यानी उसकी सच्ची आजादी की बात करते हैं। बाद में यही विचार कि मानवीय विकास का लक्ष्य है इंसान की परतें खोलना, एक ऐसे ‘संपन्न’ मनुष्य का निर्माण करना जो अपने और प्रकृति के बीच के अंतर्विरोध को हल करके सच्ची आजादी हासिल कर चुका है, परिपक्व और उम्रदराज मार्क्स द्वारा पूंजी (कैपिटल) के कई अध्यायों में व्यक्त किया गया है। जैसा कि ऊपर उद्धृत किया जा चुका है, पूंजी के तीसरे खंड में मार्क्स लिखते हैं, ‘इससे (आवश्यकताओं के राज से) आगे शुरू होता है मानवीय शक्ति का विकास जो अपने आप में लक्ष्य है, वास्तविक स्वतंत्रता का वह दौर जो आवश्यकताओं के राज वाले दौर को आधार बनाकर ही फल-फूल सकता है। कार्य दिवस की कम अवधि इसकी बुनियादी जरूरत होती है।‘

पूंजी के अन्य हिस्सों में वे ‘पूर्ण विकसित मनुष्य’ उत्पादित करने, मानव प्रजाति को पूरी तरह विकसित होने की अहमियत बताते हैं, खुद को विकसित करने की मनुष्य की जरूरत बताते हैं और साथ ही अलगाव की प्रक्रिया के चलते मनुष्य के टुकड़ों में बंटने का भी जिक्र करते हैं।

चूंकि डी बेल उन कुछेक अमेरिकी लेखकों में शामिल हैं जिन्होंने मार्क्स की अलगाव की अवधारणा में दिलचस्पी ली है, मैं दिखाना चाहता हूं कि उनका स्टैंड, जो कमोबेश रूसी कम्यूनिस्टों जैसा ही है (हालांकि उनका उद्देश्य बिल्कुल उलटा है), क्यों टिकने वाला नहीं है। बेल का मुख्य दावा यह है कि उपरोक्त मानववादी लेखकों के दृष्टिकोण से मार्क्स की व्याख्या करना मिथक निर्माण को और आगे बढ़ाना है। उन्होंने दावा किया कि ‘मार्क्स ने अलगाव के विचार को छोड़ दिया था, आर्थिक व्यवस्था से इसे अलग कर दिया था और ऐसा करते हुए उन्होंने उस राह को बंद कर दिया जो हमें समाज और व्यक्तित्व के मार्क्सवादी रूढिबद्धता के मुकाबले कहीं ज्यादा व्यापक, कहीं ज्यादा उपयोगी विश्लेषण तक ले जा सकता था।’

यह वक्तव्य अस्पष्ट भी है और गलत भी। इससे ऐसा लगता है जैसे मार्क्स ने अपने बाद के लेखन में मानवीय अर्थों में अलगाव की अवधारणा का परित्याग कर दिया था और इसे ‘विशुद्ध रूप में आर्थिक श्रेणी’ की अवधारणा में तब्दील कर दिया था, जैसा कि बेल ने बाद में कहा था। मार्क्स ने कभी भी मानवीय अर्थों में अलगाव की अवधारणा को छोड़ा नहीं था बल्कि उन्होंने दावा किया था कि इसे अलगावग्रस्त व्यक्तियों की ठोस और वास्तविक जीवन प्रक्रिया से अलग नहीं किया जा सकता। यह हकीकत इस दावे से एकदम अलग है कि ‘बुजुर्ग मार्क्स’ ने ‘युवा मार्क्स’ की मानवीय अलगाव की अवधारणा से खुद को अलग कर लिया था। यह मार्क्स को ध्वस्त करने के लिए उसकी दलीलों का एक पुतला खड़ा करने जैसा है। बेल को यह गलती करनी पड़ी क्योंकि वह मार्क्स की पारंपरिक व्याख्या की समस्त रूढ़ोक्तियों को स्वीकार करते चलते हैं। ‘’मार्क्स के लिए एकमात्र सामाजिक हकीकत मनुष्य या व्यक्ति नहीं बल्कि मनुष्यों के आर्थिक वर्ग हैं। व्यक्तियों या उनके उद्देश्यों का कोई मोल नहीं है। एकमात्र चेतना जिसे अमली जामा पहनाया जा सकता है – और जो अतीत, वर्तमान और भविष्य की व्याख्या कर सकती है – वह है वर्गीय चेतना।’’ यह दिखाने की कोशिश में कि मार्क्स व्यक्ति में नहीं बल्कि समूह में दिलचस्पी रखते थे, ठीक वैसे ही जैसे कि कथित तौर पर उनकी दिलचस्पी मनुष्य में नहीं बल्कि सिर्फ आर्थिक कारकों में रह गई थी, बेल यह नहीं देखते हैं – या इसका जिक्र नहीं करते हैं – कि मार्क्स ने पूंजीवाद की आलोचना ठीक इसी बात के लिए की है कि यह वैयक्तिक व्यक्तित्व को नष्ट कर देता है (जैसे कि वह फूहड़ साम्यवाद की भी इसी बात के लिए आलोचना करते हैं) और यह कि इतिहास की व्याख्या सिर्फ वर्गीय चेतना के जरिए की जा सकती है वाला कथन व्यक्ति के प्रति मार्क्स के अनादर की अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि यह एक तथ्य है जिसका जिक्र पिछले इतिहास के संदर्भ में किया गया है।

दुर्भाग्यवश, अपनी थीसिस को साबित करने के लिए बेल ने मार्क्स के एक निर्णायक महत्व वाले पाठ को गलत उद्धृत किया है। मार्क्स के बारे में वह कहते हैं, ‘’यह कहना कि ‘हरेक व्यक्ति में अलग से कोई मानवीय चरित्र निहित नहीं होता’ (जैसा कि मार्क्स फायरबाख पर छठी थीसिस में कहते हैं) सिर्फ वर्गों में होता है, वास्तव में एक नए व्यक्ति को पेश करना है, नया अमूर्तिकरण है।’’

‘फायरबाख पर छठी थीसिस’ में मार्क्स ने क्या कहा था? ‘‘फायरबाख धर्म के सत्व को इंसान के सत्व से अलग करते हैं। मगर इंसान का सत्व हर अलग व्यक्ति में निहित कोई अमूर्त चीज नहीं है। वास्तव में यह सामाजिक रिश्तों का योग है। फायरबाख इस वास्तविक सत्व की आलोचना की गहराई में नहीं गए और इसीलिए इस बात के लिए मजबूर हुएः 1) कि इतिहास की प्रक्रिया से अलग होकर धार्मिक प्रकृति को एक स्वतंत्र चीज स्वीकार करें और अमूर्त – अलगावयुक्त – मनुष्य को स्वयंसिद्ध मान लें। 2) इसलिए मनुष्य का सत्व केवल ‘वर्ग’ के रूप में उसके उस भीतरी सतही सामान्यीकरण के रूप में ही समझा जा सकता है जो स्वाभाविक रूप से बहुत से व्यक्तियों को जोड़ता है।’’ मार्क्स ऐसा नहीं कहते जैसा कि बेल उद्धृत करते हैं कि ‘हरेक व्यक्ति में अलग से कोई मानवीय चरित्र निहित नहीं होता’ बल्कि इससे उलट यह कहते हैं कि ‘मनुष्य का सत्व हरेक व्यक्ति में निहित कोई अमूर्त चीज नहीं होती।‘ यह हीगल के आदर्शवाद के बरक्स मार्क्स के भौतिकवाद का केंद्रीय तत्व है। मार्क्स ने मनुष्य की प्रकृति संबंधी अपनी अवधारणा का कभी परित्याग नहीं किया (जैसा कि हमने ‘पूंजी’ के उद्धरणों के जरिए दर्शाया), मगर यह प्रकृति विशुद्ध जैविक चीज नहीं है और न ही कोई कल्पना की चीज। इसे सिर्फ इतिहास के जरिए समझा जा सकता है क्योंकि यह इतिहास में ही खुलती है। मनुष्य की प्रकृति के बारे में निष्कर्ष इतिहास में मिलती इसकी अनेक झलकियों (विकृतियों) से निकाले जा सकते हैं। इसे हरेक व्यक्ति के ‘ऊपर’ या उसके ‘पीछे’ मौजूद सांख्यिकीय इकाइयों के रूप में नहीं देखा जा सकता बल्कि मनुष्य में मौजूद उस संभावना के रूप में पहचाना जा सकता है जो ऐतिहासिक प्रक्रिया में खुलती और बदलती है।

इतना ही नहीं, बेल अलगाव की अवधारणा को ठीक से समझे ही नहीं। वह इसे ‘अपने भाग्य को नियंत्रित करने के लिए संघर्ष करते व्यक्ति और दूसरों द्वारा प्रभावित की जा रही वस्तु में मौलिक पृथक्करण’ के रूप में परिभाषित करते हैं। जैसा कि मेरी अपनी चर्चा से भी स्पष्ट होता है और अलगाव की अवधारणा के संबसे गंभीर अध्येताओं की बातों से भी, कि यह बिल्कुल अधूरी और गुमराह करने वाली परिभाषा है। सच पूछें तो यह उतना ही नाकाफी है जितना बेल का यह कहना कि जेन-बौद्ध (पुनरेकीकरण के अन्य आधुनिक आदिवासी तथा सामुदायिक दर्शनों की ही तरह) व्यक्ति को ‘स्व की भावना छोड़ने’ का लक्ष्य देता है और इस प्रकार आखिरकार मनुष्यविरोधी है क्योंकि वे (जेन सहित पुनरेकीकरण के तमाम दार्शनिक) व्यक्ति विरोधी हैं।‘ इन बातों को गलत साबित करने का यहां मौका नहीं है, बस इतनी सलाह जरूर दी जा सकती है कि मार्क्स और जेन को और सावधानी से पढ़ने की जरूरत है।

युवा और परिपक्व मार्क्स के बीच कथित अंतर की इस बहस का पटाक्षेप करते हुए कहा जा सकता है कि सच है कि मार्क्स ने (एंगल्स की तरह) अपने जीवन काल में अपनी अवधारणाएं बदलीं, कुछ विचार बदले। वह हीगलीय आदर्शवाद के करीब समझे जाने वाले शब्दों के प्रयोग के और ज्यादा खिलाफ हो गए थे। उनकी भाषा कम उत्साही और परलोकशास्त्रीय हो गई। 1844 के मुकाबले जीवन के आखिरी बरसों में वह शायद ज्यादा हतोत्साहित भी हो गए थे। मगर, अवधारणाओं में, मूड में और भाषा में कुछ निश्चित बदलावों के बावजूद युवा मार्क्स द्वारा विकसित दर्शन के केंद्रीय भाग में उन्होंने कभी कोई बदलाव नहीं किया और जीवन के उत्तरार्ध में विकसित उनकी समाजवाद की अवधारणा या पूंजीवाद की आलोचना को आरंभिक लेखन में विकसित मनुष्य की उनकी अवधारणा के ही आधार पर समझा जा सकता है किसी और तरह से नहीं।

(अनुवाद की तारीखः अगस्त 2016)

 

 

14 मनुष्य की प्रकृति (एरिक फ्रॉम)

व्यक्ति के रूप में मार्क्स

‘मार्क्स के लेखन को लेकर जितनी गलतफहमियां फैली हैं और जितनी गलत व्याख्याएं प्रचलित हैं उनकी तुलना सिर्फ मार्क्स के व्यक्तित्व को लेकर फैली गलतफहमियों से ही की जा सकती है। उनके सिद्धांतों की ही तरह उनके व्यक्तित्व से जुड़े तथ्यों की भी काफी तोड़-मरोड़ हुई जिनकी घिसी-पिटी नकल पत्रकार, नेता और यहां तक कि समाज विज्ञानी भी करते रहे जिनकी जानकारी बेहतर होनी चाहिए थी। उनका चित्रण अन्य लोगों से अलग-थलग पड़े ‘अकेले’ व्यक्ति के रूप में किया गया। उन्हें आक्रामक, अभिमानी और तानाशाही प्रवृत्ति का बताया गया। मार्क्स के जीवन के बारे में थोड़ी भी जानकारी रखने वाले व्यक्ति के लिए इसे स्वीकार करना बेहद मुश्किल था क्योंकि एक पति, पिता और मित्र के रूप में मार्क्स की छवि से इसका मिलान करना अत्यंत कठिन होता।

दुनिया में कुछ ही ज्ञात शादियां ऐसी रही हैं जिनमें मानवीय संतुष्टि का तत्व ऐसी प्रखरता से मौजूद हो जितने असाधारण रूप में यह कार्ल और जेनी मार्क्स के वैवाहिक रिश्ते में दिखता है। एक यहूदी वकील के पुत्र मार्क्स किशोरावस्था में ही सबसे पुराने माने जाने वाले स्कॉटिश परिवारों के वंशज एक प्रशियन सामंती परिवार की बेटी जेनी वॉन वेस्टफलेन के प्यार में पड़ गए। जब मार्क्स 24 वर्ष के थे तब दोनों ने शादी की और जेनी के गुजरने के बाद वह एक ही साल और जीवित रहे। यह एक ऐसी शादी थी जिसमें पृष्ठभूमि का अंतर होने के बावजूद, जिसमें गरीबी और बीमारी की लगातार मौजूदगी के बावजूद आपसी प्यार और खुशियों का खजाना कभी कम नहीं पड़ा। यह सिर्फ तभी मुमकिन हो सकता है जब दो लोग एक-दूसरे के प्रति गहरे प्यार में डूबे हों और उनमें प्रेम की असाधारण क्षमता हो।

उनकी सबसे छोटी बेटी इलीनोर ने एक पत्र में अपने माता-पिता के रिश्ते का चित्रण करते हुए मां की मौत से कुछ पहले और पिता की मौत से एक साल पहले के एक दिन का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है, ‘‘मूर (मार्क्स का एक नाम) एक बार फिर बीमारी से ठीक हो गए हैं। मैं वह सुबह कभी नहीं भूलूंगी जब उन्होंने इतनी ताकत महसूस की कि मां के कमरे में जा सकें। जब भी वे दोनों साथ होते हैं तो जैसे फिर से युवा हो जाते थे। मानो एक-दूसरे से हमेशा के लिए बिछड़ने जा रहे तमाम बीमारियों से ग्रस्त एक वृद्ध और मरणासन्न वृद्धा नहीं बल्कि जिंदगी की दहलीज पर खड़ी एक जोड़ी हो… वह एक किशोरी और वे प्यार में डूबे एक किशोर।’’

बच्चों के साथ मार्क्स का रिश्ता किसी भी तरह के प्रभुत्व की सड़न से उतना ही मुक्त और उत्पादक प्यार से भरपूर था जितना पत्नी के साथ उनका रिश्ता। यह समझने के लिए अध्याय के अध्याय पढ़ने की जरूरत नहीं, बस उनकी बेटी इलीनोर द्वारा दिया गया वह वर्णन देख लेना ही काफी है जिसमें मार्क्स अपने बच्चों के साथ टहलते हुए उन्हें किस्से सुनाते हैं, मीलों से नापे जाने वाले किस्से। लड़कियां चिल्ला कर फरमाइश करतीं, ‘हमें एक और मील सुनाइए।’ ‘उन्होंने पूरा होमर, समूचा निबेलंजनलाइड, गुडरूं, डॉन क्विक्जोट, अरेबियन नाइट्स आदि उन्हें ऐसे ही सुनाया। शेक्सपियर की बात करें तो वह हमारे घर की बाइबल थे और शायद ही कभी हमारे हाथ या मुंह से छूटते थे। छह वर्ष की होते-होते मुझे शेक्सपियर के सीन के सीन कंठस्थ हो चुके थे।’

फ्रेडरिक एंगिल्स से उनकी दोस्ती तो उनकी शादी और बच्चों से उनके रिश्ते से भी ज्यादा अनूठी थी। एंगिल्स खुद भी असाधारण बौद्धिक क्षमता और इंसानी जज्बे वाले व्यक्ति थे। उन्होंने हमेशा मार्क्स की श्रेष्ठतर प्रतिभा की दाद दी। उन्होंने मार्क्स के कार्यों के प्रति अपना जीवन समर्पित कर दिया, लेकिन अपना योगदान करने में भी कभी हिचके नहीं और न ही उसे कम करके आंका। इन दोनों के रिश्तों में कभी कोई खटास आई ही नहीं, कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं बल्कि भाईचारे की भावना जिसकी जड़ें दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति असीम प्यार की गहराई में जमी थीं, ऐसा प्यार जो दो पुरुषों के बीच शायद ही कभी देखने को मिला हो।

मार्क्स ऐसे उत्पादक, अलागवमुक्त, स्वतंत्र व्यक्ति थे जिसे उनके लेखन ने नए समाज के व्यक्ति के रूप में वर्णित किया है। पूरी दुनिया से, लोगों से, विचारों से उत्पादकतापूर्ण ढंग से जुड़े हुए, मार्क्स वही व्यक्ति थे जो कि उन्होंने सोचा था। एक ऐसा व्यक्ति जो हर साल एशीलस और शेक्सपियर मूल भाषा में पढ़ता था और जो अपने सबसे उदास दिनों में यानी अपनी पत्नी की बीमारी के दौरान गणित में घुसा हुआ था और कैलकुलस का अध्ययन कर रहा था। मार्क्स पूरे के पूरे मानववादी थे। उनके लिए मनुष्य से ज्यादा विलक्षण कुछ नहीं था और अपनी यह भावना उन्होंने हीगल के उद्धरण के जरिए बार-बार व्यक्त की, ‘किसी दुष्कर्मी का कोई आपराधिक विचार भी स्वर्ग के चमत्कारों के मुकाबले ज्यादा उदार औऱ शानदार होता है।‘ बेटी लॉरा द्वारा उनके लिए बनाई गई प्रश्नावली के उनके उत्तर भी उनकी शख्सियत पर खासी रोशनी डालते हैं: उनके लिए दुख का मतलब आत्मसमर्पण था, जो दुर्गुण उन्हें सबसे ज्यादा नापसंद था वह थी दासता और उनकी सबसे पसंदीदा सूक्तियां थीं, ‘जो कुछ भी मानवीय है वह मेरे लिए अपरिचित नहीं है‘ और ‘हर चीज पर शक करना होगा’।

आखिर ऐसे आदमी को अकेला, अहंकारी और तानाशाही प्रवृत्ति वाला कैसे मान लिया गया? कलंक लगाने के मकसद के अलावा इस गलतफहमी के कुछ और भी कारण थे। पहली बात, मार्क्स की (एंगिल्स की तरह) व्यंग्यात्मक शैली थी, खासकर लेखन में, और वह अच्छी खासी आक्रामकता रखने वाले योद्धा थे। लेकिन सबसे बड़ी बात यह कि उनमें पाखंड और धोखा बर्दाश्त करने की क्षमता बिल्कुल नहीं थी। मानवीय अस्तित्व से जुड़ी समस्याओं को लेकर वे अतिशय गंभीर थे। अहम मसलों पर विन्रम मुद्रा में मुस्कुराते हुए दी जाने वाली झूठी दलीलें और मनगढ़ंत बयान स्वीकार करने में वे बिल्कुल असमर्थ थे। वे किसी भी तरह का पाखंड सहन नहीं कर पाते थे, चाहे वह व्यक्तिगत रिश्तों में हो या विचारों में। चूंकि ज्यादातर लोग यथार्थ के बजाय कल्पना की दुनिया में ही रहना चाहते हैं और जीवन जगत से जुड़े तथ्यों पर खुद को और दूसरों को धोखे में रखते हैं, इसलिए नितांत स्वाभाविक था कि मार्क्स उन्हें अहंकारी और ठंडे नजर आएं, लेकिन उनका यह निष्कर्ष मार्क्स के बारे में कम और उनके बारे में ज्यादा बताता है।

अगर कभी दुनिया मानववादी परंपरा की ओर लौटी और इसने पश्चिम सभ्यता में आई गिरावट (पूंजीवादी और सोवियत – दोनों स्वरूपों में) पर विजय पाई, तो यह इस बात को जरूर महसूस करेगी कि मार्क्स न तो कट्टर थे और न ही अवसरवादी, कि वह पश्चिमी इंसानियत के श्रेष्ठ मूल्यों की नुमाइंदगी करते थे, कि वह भ्रमित करने वाली सतह में उलझे बगैर यथार्थ के सत्व तक पहुंचने वाले और सचाई पर कभी समझौता न करने वाले व्यक्ति थे, कि वह अदम्य साहस और ईमान वाले व्यक्ति थे, कि उन्हें मनुष्य और उसके भविष्य की गहरी चिंता थी, कि वह निःस्वार्थ थे और सत्ता की उनमें कोई लालसा नहीं थी, कि वह हमेशा जीवंत रहते थे, हर पल में स्फूर्ति भरते थे और जिस चीज को भी छूते थे उसमें जान डाल देते थे। उन्होंने पश्चिमी परंपराओं की सर्वोत्तम विशेषताओं का – तर्क में  और मनुष्य की प्रगति में इसके विश्वास का – प्रतिनिधित्व किया। दरअसल उन्होंने मनुष्य की उस अवधारणा का प्रतिनिधित्व किया जो उनके चिंतन के केंद्र में थी – ऐसा मनुष्य जो (मनुष्य) बहुत ज्यादा हो और जिसके पास (संपत्ति) बहुत कम हो, मनुष्य जो इसलिए समृद्ध हो क्योंकि वह अपने साथी मनुष्यों की जरूरत हो।  (अनुवादः सितंबर 2016) (समाप्त)

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