बैकवर्ड्स और मुस्लिमों से दलित रिश्ते

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संसदीय लोकतंत्र से दलितों का भला नहीं होगा। इस संविधान से भी दलितों का भला नहीं होगा। ब्राह्मणवादी इस संविधान को परिवर्तित कर देना चाहता है। वह नया संविधान बनाएगा तो अधिकतर मनुवादी सिद्धांतों और संस्कारों को विधिक दर्जा प्रदान करने के लिए संविधान में डाल देगा। इसलिए दलित, आदिवादी, मूलनिवासी, बैकवर्ड, अल्पसंख्यक मिलकर डॉ. आम्बेडकर के मूल संविधान जो “राज्य और अल्पसंख्यक” नामक पुस्तक में पेज न.167 से 240 तक दर्ज है जिसे संविधान सभा से अस्वीकार कर दिया था तथा डॉ. आम्बेडकर साहब को बीएन राव तथा एसएन मुखर्जी द्वारा तैयार किए गए ड्राफ्ट पर बड़ी मजबूरी में काम करना पड़ा था, के आधार पर एक नया संविधान बनाने का बीड़ा उठा लेना चाहिए। डॉ. आम्बेडकर साहब आरक्षण नहीं चाहते थे। वे पृथक निर्वाचन चाहते थे। गांधी जी के आमरण अनशन की वजह से उन्हें गांधी-जवाहर के आरक्षण जैसे धोखे को स्वीकार करना पड़ा था। संसदीय राजनीति द्वारा सत्ता प्राप्त कर हम कोई भी मूल परिवर्तन नहीं कर सकते हैं। हमें एक ऐसे संगठन का निर्माण करना होगा जो आंदोलन को नेतृत्व प्रदान करे, जो आमूलचूल परिवर्तन के लिए क्रांति का आह्वान व नेतृव करे।

सुश्री मायावती का विरोध दलित समाज नहीं कर पाएगा। हाँ, उनको वोट देना बंद जरूर कर देगा। सुश्री अपना पतन देख रही हैं लेकिन अपनी गलती नहीं समझ रहीं हैं क्योंकि सुश्री संसदीय राजनीति में सिर्फ सत्ता प्राप्ति के बाद दलितों के उद्धार का मार्ग समझ पाती हैं जबकि संसदीय लोकतंत्र में अन्य पार्टियां जिसे घोर दक्षिणपंथी कहा जाता है वे भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अनुसरण करती हैं। उन संगठनों की पूरी प्रक्रिया लोकतांत्रिक तरीकों से चलती है। दुर्भाग्य है, जितनी भी दलित पार्टियां हैं वे डॉ. आम्बेडकर के लोकतंत्र की खूब दुहाई देती हैं लेकिन सभी दलित पार्टियों में अध्यक्षीय तंत्र कार्य करता है और ताउम्र के लिए एक व्यक्ति ही उसका अध्यक्ष होता है, वह भी लोकतांत्रिक तरीके से नहीं चुना जाता है। जब मुख्यमंत्री बनने की बात आती है तो भी लोक लोकतांत्रिक तरीके से अपना नेता नहीं चुनते हैं बल्कि तानाशाह का डर ही उनको विधायक दल का नेता चुनवा देता है। ऐसी स्थिति में, सुश्री का डाउनफाल निश्चित था। इनके चमचे बसपा और सुश्री में क्रांति देखते है लेकिन हम आम जनता ठगा हुआ महसूस करते हैं और देख रहे हैं कि संसदीय लोकतंत्र के दक्षिणपंथी नेता वोट के लिए अपने-अपने जातियों का ध्रुवीकरण करते रहते हैं, न कि किसी भी तरह से इनका इरादा जातिप्रथा उन्मूलन का है। ये क्रांति का सपना दिखा कर हमें बेवकूफ बना रहे हैं। इसी तरह अन्य जातीय पार्टियां भी अपनी-अपनी जातियों को बेवकूफ बनाने के लिए धार्मिक गोलबंदी और साम्प्रदायिकता का पाठ पढ़ाते हैं।

मित्र एआर अकेला जी, आप ने कहा, “आनन्द जी, आप न तो मायावती को जानते हैं और न वो आपको जानती हैं इसलिए आप न मायावती को सुधार सकते हो और न बसपा बचा सकते हो। हाँ, आप जिस तरह का मूवमेन्ट चलाना चाहते हो, उसका नेतृत्व आप और कंवल भारती जी करें। जय भीम, जय बहुजन समाज।” तो मित्र, मेरी तो कँवल भारती से पटती ही नहीं। वे अपने को आम्बेडकरवादी कहते हैं और मैं अपने को मार्क्सवादी। उन्हें मार्क्स से मोह है और मुझे आम्बेडकर से। अब आप बताइए हम क्या करें?

वैसे आप ने मा. कांशीराम साहब के भाषणों को एकत्रित करके प्रकाशित करने का महान कार्य किया है। आप को तहेदिल से शुक्रिया।  मेरी बात सुश्री मानें या न मानें। कहना था कह दिया। किशोर कुमार जी की गाने की बोल है,
“आदमी जो कहता है आदमी जो सुनता है
जिंदगी भर वे सदाएं पीछा करती हैं”
यदि इस दर्शन में दम है तो आप की बातें निरर्थक हैं। सुश्री न सुनें, कोई बात नहीं है। जनता सुन रही है। जनता इस पर अमल करेगी।

आप मिशनरी व्यक्ति है आप को मेरा दर्द समझना चाहिए। आप एक लेखक हैं। मैं भी एक लेखक हूँ। चिंतन भी करता हूँ। आप के पल्ले पड़े तो भी न पल्ले पड़े तो भी। लेकिन, आप मेरे हैं। आप को दलितों से प्यार है। आप को डॉ. आम्बेडकर साहब से प्यार है। आप को अपने मशीहा मान्यवर कांशीराम साहब से प्यार है। आप को सुश्री मायावती से भी प्यार है। इसका अर्थ मैं यह निकालता हूँ कि आप को दलित समाज के चिंतकों, नेताओं और कार्यकर्ताओं से प्यार है। भले ही अनेक लोग अनेक उद्देश्यों से कार्य कर रहे हों या थे, कोई बात नहीं। लेकिन, आप का प्यार दलित समाज के लिए उचित और सराहनीय है। अतः मेरे प्रति नफरत और हिकारत के बावजूद भी मैं आप से प्यार करता हूँ और प्यार करता रहूँगा। विचारों की भिन्नता के बावजूद आप सामाजिक परिवर्तन के लिए कटिबद्ध हैं, सो मेरे हैं।
जय भीम-लाल सलाम।

तो फिर तो हर पार्टियों को यह कहकर सिद्ध करना होगा कि वह संसदीय लोकतंत्र में विश्वास करती है इसलिए वह जानता के काम की नहीं है। उसका नेता भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास नहीं करता है तब जनता यह समझेगी कि अमुक पार्टी भले मेरे जाति के नाम पर वोट लेती है और हमारी पार्टी होने का दावा करती है, वास्तव में वह हमारी पार्टी नहीं है और न जाति की पार्टी होने के नाते हमारा भला ही करेगी। तब जनता कोई नया विकल्प सोचेगी। मैंने इतना सब लिखकर अप्रत्यक्ष क्या सिद्ध किया है? थोड़ा सा दिमाग लगाएंगे तो समझ जाएंगे। हमें जातिवादी करार नहीं देंगे। और हाँ, भाजपा-बसपा विकल्प नहीं है। हमें जाति-धर्म के मोह से ऊपर उठकर वर्ग-संघर्ष का रास्ता अपनाना होगा।

अरे वाह अकेला साहब, आप के शब्द तो बहुत ही विष्मयकारी हैं, “आनन्द जी, मैं मायावती का घोर विरोधी हूँ। जल्द ही हम उनका बैन्ड बजाने वाले हैं क्योंकि लातो के भूत बातो से कभी नहीं मानते हैं। ये खलनायिका है। इसके पीछे भाजपा व चड्ढीधारी हैं।” मित्र, जिसे मैं काँटा समझ बैठा था, वह तो फूल है। आप का स्वागत है। मैं अपनी कडुई बातें वापस लेता हूँ। मैं कँवल भारती साहब से हर मायने में छोटा हूँ। मैं उनसे आप के दर्द को बयां करूँगा और कहूँगा कि हमें बाबा साहब के *जातिप्रथा उन्मूलन और राजकीय समाजवाद* पर एक ठोस रणनीति के तहत जनता के सम्मुख विमर्श में लाकर एक संगठन का निर्माण अवश्य करना चाहिए। मैं, आप के सलाह के मद्देनजर, कँवल भारती साहब से अपने कटु बचनों की माफी भी माँग लूँगा किन्तु सत्य और अनिवार्य के लिए हमें सचमुच लग जाना चाहिए। वैसे इससे पूर्व आप के मंतव्य की बात कँवल भारती साहब से लिखित रूप से कहा था लेकिन उन्होंने प्रतिक्रियावश मेरे अकेले पर टाल दिया। खैर, प्रयास जारी है। हिम्मत नहीं हारूँगा। हाँ, आप से आप के उद्देश्य और कार्यप्रणाली के सिद्धांत जानना चाहूँगा।

दलित संगठनों की बहुत बड़ी विडम्बना है कि वे बाबा साहब के लोकतंत्र की दुहाई देते है लेकिन उनके स्वयं के संगठनों में लोकतांत्रिक प्रणाली नहीं होती है। सारे दलित संगठन अध्यक्षीय प्रणाली और तानाशाही के शिकार हैं।

यह सच है कि बैकवर्ड न हिन्दू विरोधी है और न हिंदुत्व विरोधी। बैकवर्ड हिन्दू देवी-देवताओं का पुजारी है। वह राम और कृष्ण को ईश्वर मानता है। वह न इस्लाम का समर्थक है और न मुसलमानों का ही। दलित जातियों के बुद्धिजीवी बैकवर्ड को शूद्र कहकर अपने करीब लाने की जुगत में रहते हैं लेकिन, दलित जातियों की असफ़सलता इस बात में निहित है कि बैकवर्ड सछूत शुद्र है। सछूत शुद्र का अर्थ है वह ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य के घर में घुस सकता है, उनसके चारपाई पर बैठ सकता है, उनके चौके में खा सकता है, उनका बरतन छू सकता है, उनके बरतन में भोजन खा सकता है, उनके लोटा-गिलास में पानी पी सकता है, सिर्फ उनके मध्य विवाह नहीं कर सकता है। शिक्षा, जमीन और रोजगार का अब कोई रोक नहीं है। उनका अलग आरक्षण है। बैकवर्ड 90 प्रतिशत सवर्ण है। वह अछूत जातियों के पास क्या पाएगा? क्या बैकवर्ड दलितों से जुड़कर अछूत नहीं हो जाएगा? बैकवर्ड के किसी विद्वान को दलित अपना आदर्श नहीं मानता है और न उनके नेतृत्व को ही स्वीकार करता है फिर बैकवर्ड दलित के इस चक्कर में क्यों आएगा कि मेरे बैकवर्ड भाइयों तुम भी शुद्र हो और हम भी शुद्र हैं। बैकवर्ड को दलितों के पास आकर दलित नेतृत्व को स्वीकारना होगा और डॉ. आम्बेडकर में आस्था रखनी होगी इसलिए बैकवर्ड कभी भी अछूत बनना पसंद नहीं करेगा। वह समझ गया है कि दलितों की लड़ाई जातिप्रथा उन्मूलन के नाम पर दलित सशक्तिकरण की चाल मात्र है, न कि सचमुच जातिप्रथा के लिए दलित बैकवर्डस को एकत्रित व संगठित करना चाहता है। बैकवर्ड यह बहुत बारीकी से समझ गया है कि दलित सिर्फ वोट की राजनीति के लिए बैकवर्ड से दोस्ती बनाना चाहता है इसलिए वह अपनी स्वतंत्र राजनीतिक इकाई में कार्य करना पसंद करता है। फिर, दलित नेतृत्व का अवसरवादी होना किसी के लिए भी चिंता का विषय हो सकता है। सपा और बसपा का गठबंधन दो पार्टियों का ही गठबंधन नहीं है बल्कि दो कौमों का गठबंधन है, दलित और बैकवर्ड का गठबंधन है। इससे किसको कितना वोट मिला से अधिक फायदा दोनों की पब्लिक में पैदा हुई हिम्मत से है। गठबंधन तोड़ देने से दलित नेतृत्व बदनाम हुआ है और फायदा हुआ घोर दक्षिणपंथी-फ़ासीवादी पार्टियों को। दलित पुनः असमंजस में फंस गया। वह दिग्भ्रमित है। दलित गढ़ टूट गया है। दलित इंटेलेक्चुअल बिखर गया है। लेकिन, यह अच्छा है। ताअल्लुक़ बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा। विद्ध्वंस ही निर्माण की प्रक्रिया है। अब नवसृजन निश्चित है।

हिन्दू और इस्लाम दोनों ईश्वर में विश्वास रखते हैं। दोनों धर्म में आस्था रखते हैं। दोनों धार्मिक हैं। एक का ईश्वर राम व कृष्ण हैं तो दूसरे का अल्लाह। एक का मंदिर है तो दूसरे का मस्ज़िद। एक गीता-रामायण को अपौरुषेय पवित्र पुस्तक मानता है तो दूसरा क़ुरआन को। हिन्दू अपनी पुस्तकों में हमेशा ज़रूरत के हिसाब से चुपके-चुपके नए श्लोक के रूप में नए विचार जोड़ता रहता है अर्थात समय के अनुसार अपने धर्म की महत्ता और ज़रूरत को परिवर्तित करता रहता है। इस्लाम इसकी इजाज़त नहीं देता है। वह क़ुरआन को मुंहजबानी याद करवाता है जिससे उसमें कोई भी हेरफेर संभव न हों, यहाँ तक कि किसी नुक़्ता का हेरफेर नहीं किया जा सकता है इसलिए क़ुरआन की पवित्रता अभी तक बरकरार है। क़ुरआन को हूबहू याद करने वाले को मौलबी की डिग्री प्रदान की जाती है और उसे ताउम्र इस्लाम खाने और रहने का इंतज़ाम करता है।

इस स्थिति में, हिन्दू और इस्लाम में से प्रगति और परिवर्तन की संभावना हिन्दू में अधिक है। दलित आएदिन हिन्दू देवी-देवताओं की आलोचना भी कर लेता है और गरियाने की हिम्मत भी जुटा लेता है। यह न तो दलित बुद्धिमत्ता की वजह से संभव है और न ही दलित हिम्मत की वजह से बल्कि यह संभव है हिन्दू सहिष्णुता और लचीलेपन की वजह से। इस्लाम की आलोचना दलित नहीं करता है और न कर सकता है, किसी पीर-पैग़म्बर को गाली देना तो दूर-दूर की बात है। फिर भी, दलित मुस्लिम गठबंधन जरूर करता है। दलित ऐसा इसलिए करता है कि उसे दार्शनिक परिवर्तन की चिंता नहीं है बल्कि वह सिर्फ राजनीतिक परिवर्तन के रूप में दलित वर्चस्व व पहचान चाहता है। दलित बुद्धिजीवी व नेता सिर्फ सम्भ्रान्त लोगों के सुख की राजनीति कर रहा है न कि सभी दलितों के शिक्षा और रोजगार की उसे फ़िक्र है। यदि दलित व्यवस्था परिवर्तन के लिए संकल्पबद्ध हो जाय तो उसे दर्शन के रूप में सभी ईश्वर, सभी धर्म और सभी धार्मिक पुस्तकों के विरुद्ध लड़ना होगा। सभी धार्मिक पुस्तकों में डायनामाइट लगाने की बात करनी होगी। ऐसी स्थिति में न सिर्फ हिन्दू, इस्लाम भी दलितों के राह में रोड़े होंगे। फिर, दलित मुसलमानों से दोस्ती का हवाला कभी नहीं दे पाएगा और न मुसलमान दलितों के व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई में साथ ही देगा। मुसलमान दलितों के साथ वहीं तक खड़ा है जहां तक उसे विश्वास है कि दलित इस्लाम में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। इसलिए, हर दलित संगठन में मुसलमान अपने धार्मिक पहचान के साथ बिना किसी फ़िक्र के खड़ा मिलता है। जिस दिन मुसलमानों को यह पता हो जाएगा कि दलित उसके अल्लाह और क़ुरआन को झूठा मानते हैं, झूठा साबित करने के लिए वैज्ञानिक तर्क प्रस्तुत करेंगे, उस दिन दलितों से उनका ज़िहाद प्रारम्भ हो जाएगा। मुसलमान दलितों के किसी भी क्रांतिकारी आंदोलन के लिए दलितों के साथ नहीं हैं बल्कि उन्हें दलितों का साथ इसलिए दरकार है जिससे हिन्दू उन्हें क्षति पहुंचाने से गुरेज़ करे। जिस दिन दलितों का उद्देश्य संसदीय व्यवस्था को उलटकर कम से कम डॉ. आम्बेडकर के समाजवादी व्यवस्था को स्थापित करना हो जाएगा, उस दिन दलित हर प्रगतिशील इस्लाम व हिन्दू को अपने साथ लेगा और प्रगतिशील चेतना को विकसित करने के लिए सभी धर्मों की मान्यताओं को ख़ारिज करेगा। ऐसी स्थिति में सभी धर्म *(चाहे हिन्दू हो या इस्लाम)*क्रांतिकारी दलितों के विरुद्ध खड़े होंगे और दलितों को एक असली सर्वहारा के रूप में बहुजन की तानाशाही के द्वारा इन्हें रोकना पड़ेगा।

दलित ब्राह्मणवाद खत्म कर ले अर्थात ब्राह्मणों को डरवाकर, धमकाकर, पुचकारकर कनिन्स कर ले जाय कि अब हम सब ऊँच-नीच में विश्वास नहीं रखेंगे, हिन्दू धर्म की कोई बात नहीं मानेंगे, राम-कृष्ण को नहीं मानेंगे, तो क्या धर्म का डर खत्म हो जाएगा, ईश्वर की अवधारणा खत्म हो जाएगी, पूजा-आराधना-इबादत खत्म हो जाएगी, गैर बराबरी का कॉन्सेप्ट खत्म हो जाएगा? कदापि, नहीं। हमें तो ऐसा लगता है उस समय दलितों के ऊपर इस्लाम का वर्चस्व हो जाएगा तथा दलित अल्लाह और क़ुरआन को मानने को बाध्य होंगे। क्या हम उससे प्रभावित नहीं होंगे?

जो धर्म कट्टर है वह अधिक असहिष्णु है। उसमें प्रगतिशीलता के तत्व नहीं हैं। जिसमें प्रगतिशीलता के तत्व व चेतना नहीं है वह मौका पाते ही हमलावर हो सकता है। उस दशा में यह और भी चिंता का विषय है जब उसकी प्रतिरोधी शक्ति बिल्कुल न हो अथवा बिल्कुल कमज़ोर हो। फिर दलित क्या करेगा? क्या उस समय दलितों को ब्राह्मणवाद की तरह इस्लामवाद के विरुद्ध नहीं लड़ना पड़ेगा? दलितों के इस तरह की लड़ाई में ऐसी स्थिति तो आएगी ही और पुनः ऊर्जा खत्म करना पड़ेगा। इस तरह वर्ग-संघर्ष की नौबत ही नहीं बनेगी।

इस तर्क से मैं यह नहीं सिद्ध करना चाह रहा हूँ कि ब्राह्मण व हिन्दू प्रगतिशील है किंतु धार्मिक जड़ता के मामले में हमारा अध्ययन बताता है कि हिन्दू धर्म कमजोर हुआ है इसलिए यहाँ प्रगतिशीलता के तत्व जन्म ले चुके हैं। इनके प्रगतिशीलों को अपने साथ लेने के लिए कुछ कम मेहनत की जरूरत होगी।

लेकिन, दलित मुसलमान को अल्पसंख्यक मानकर उसको उसके धार्मिक जड़ता के साथ स्वीकार कर अपने सत्ता में भागीदारी की लड़ाई में ब्राह्मणवाद के विरुद्ध खड़ा करता रहता है और मुसलमान हिंदुओं के अपने प्रति मानसिकता को भाँफकर दलितों के साथ खड़ा होना उचित मान लेता है। एक अज़ीब बात है, दलित अनीश्वरवादी-अधार्मिक होकर एक विशुद्ध धार्मिक चेतना से सम्पन्न व्यक्ति को दूसरे धार्मिक चेतना के विरुद्ध अपने साथ खड़ा करता है। कहीं हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्म के मुद्दे पर एक साथ मिलकर दलितों की ऐसी की तैसी न कर दें क्योंकि एक ईश्वरवादी धार्मिक व्यक्ति व संस्था एक नास्तिक-अनीश्वरवादी-अधार्मिक व्यक्ति के लिए दूसरे धार्मिक-ईश्वरवादी व्यक्ति व संस्था के विरुद्ध क्यों लड़ेगा?

यह नोट करना सत्य है, प्रथम-दलित जातिप्रथा की लड़ाई नहीं लड़ रहा है बल्कि अपने को वर्चस्व की स्थिति में पहुंचाने की लड़ाई लड़ रहा है। दूसरा-यह कि वह हिन्दू धर्म के देवी देवताओं को खुलेआम गाली देता है। इन दोनों बातों से सहमत होते हुए मैं इस बात की निंदा करता हूँ। यह एक तरह से आम आदमी को गुमराह कर सम्भ्रान्त लोगों की राजनैतिक भूमि तैयार करना है। दरअसल, ऐसे गेम से किसी भी जाति का अमीर मार खाने से बच जाता है लेकिन उसी जाति का गरीब हर जगह हर दिन मार खाता रहता है। यही नहीं, दलित अन्य धर्म के देवी-देवता को गाली देने की हिम्मत नहीं करता है। एक तरफ हिन्दू धर्म से नफरत करता है दूसरी तरफ हर हर्फ़ों में ख़ुद को हिन्तुत्व से जोड़ रखता है। होना तो यह चाहिए कि दलित हिन्दू धर्म से अपने को किसी भी रूप में न जोड़े-न प्रेम करके न गाली देकर। जैसे, न दलित इस्लाम से डरता है, न प्रभावित होता है, न यह महसूस करता है कि वह मुसलमानों से किसी भी तरह नीच है। उसी तरह दलितों को हिंदुओं से किसी भी तरह अपने को न नीच मानना चाहिए, न उन्हें अपने से ऊँच मानना चाहिए, न उनके न छूने से चिंतित होना चाहिए। दलितों को अपने को किसी भी तरह ब्राह्मणों-क्षत्रियों के होने न होने से प्रभावित नहीं होना चाहिए। वह किसी दलित के घर खाए न, खाए; अपने घर खिलाए, न खिलाए; छुए, न छुए; कोई फ़र्क महसूस नहीं करना चाहिए।

आर डी आनंद
एल-1316, आवास विकास कॉलोनी,
बेनीगंज, फैज़ाबाद, अयोध्या-224001
मो.9451203713
मो.8887749686
Email:rd.anand813@gmail.com

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