बिकनाः राकेशरेणु की कविताएं

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खिलाड़ी नीलाम हुए पंचतारा होटल में
लेबर चौक पर बिके मजदूर-कारीगर हर फन के
वकील बिके ठीक न्यायालय परिसर में
अवमानना है कहना कि माननीय न्यायाधीश बिके।

वेश्याएँ बिकीं सरेराह, सरे बाज़ार
डॉक्टर बिके, बिके चार्टर्ड एकाउंटेंट
सितारे हिंद बाबुओं का बिकना आम रहा हमेशा
अगुआ नेताओं की कौन कहे
वे बिके पहले एक-एक, फिर थोक-थोक खुदरा कीमत पर।

साहूकारों, तस्करों, हत्यारों के लिए आसान रहा
खरीदना-बेचना कुछ भी
विचार और मूल्य इस तरह बिके
जैसे किराने की दुकान पर लवा-दुआ।

वजारतें बनाई गईं लकदक तिजारत के लिए
कंपनियाँ बिकीं
लॉरियाँ, रेलगाड़ियाँ, विरासत जो उन्हें मिलीं
फिर एक दिन विक्टोरिया टर्मिनस बिका
ताजमहल एक दिन
धीरे-धीरे सब बिक गए
ईमान, खानदान, पीकदान
बावजूद इसके कहना कठिन है कि पहले कौन बिका
पहला, दूसरा, तीसरा या चौथा पाया लोकतंत्र का।

वहीं जनता थी जिसका कोई चेहरा न था, सिर्फ मुखौटा
वह अवाक् थी या कीर्तनिया मंडली में शामिल
मालूम न था उसे कि जिस जमीन पर वह खड़ी है
उसे चुपचाप बेचने की तैयारी है।

स्वामीनाथन की पेंटिंग और चमकी बुखार

आसमान में एक दरार उभर आया
ओजोन परत फट गई हो मानो
एक चिड़िया उड़ी और गिरने लगी अचानक काँपते पत्ते सी
टिकोरों और पत्तों का गिरना एक-सा नहीं होता यह
मालूम नहीं था बच्चों को
वे गिरे बेआवाज काँपते पत्तों से
गोया कोई दूसरी मुफीद जगह नहीं गिरने की
बुद्ध, महावीर, जनकदुलारी के देस में
यों ही झरते हैं पत्ते हर साल
श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज के जनरल वार्ड में।

चिड़िया अचानक किरचों में बदल गई पेंटिंग में
बरसती रहीं माँओं की आँखों-चीत्कारों से
टेढ़ा-मेढ़ा त्रिकोण बनाती चेहरे पर
त्रिकोण के भीतर और त्रिकोण, लकीरें टेढ़ी-मेढ़ी
जैसे दुख के भीतर और दुख, अकथ-अथाह-अचिन्हीं।
बंद थीं खिड़कियाँ सदरे-रियासत के बंगले की
सूखे आषाढ़ की दोपहर
गरबा खेला जा रहा था गर्भगृह में
बाहर जल-टोटियाँ उड़ गई थीं चिड़िया बन कर
जलाने के लिए सबकुछ था वहाँ, बुझाने को बूँदभर पानी नहीं।
चिड़ियों ने साँपों का रूप धर लिया पेंटिंग में
और दौड़ पड़ीं एकबारगी
अलग-अलग दिशाओं में
मानो किसी मुहिम पर निकली हों
निष्पंद देह से
चौसर खेलने वालों की तलाश में।
हवा थम गई थी बहते-बहते
पृथ्वी बिलख रही थी की निस्पंद देह गोद में लिए
नदी काँप रही थी और बह रही थी
बगीचे सुनसान थे, पेड़ सब निस्तब्ध
माएँ बिलख रही थीं बच्चों से लिपटकर
या चुप हो चुकी थीं रोते-रोते
वह समय साँपों का था और सँपेरों का
वे दौर रहे थे गजब की चमक और फुर्ती के साथ
दौड़ रहे थे जमीन पर, हवा में, पानी पर
दौड़ रहे थे और डँस रहे थे
दसों दिशाओं में।

माँ की साड़ी

किन्हीं ईश्वर के नाम लहराती
रंग-बिरंगी ध्वजा थी वह
आँगन की अलगनी पर टँगी
मानो पूरे घर को असीस रही हो
अपनी फड़फड़ाहट से।

माँ की गोद के बाद
सबसे सुकूनदायी गोद थी उसकी
जिससे लिपट कर
लिपटे होने का सुख मिलता माँ से।

वह रुमाल थी, या फिर अँगोछा
उससे ज्यादा खुशबूदार और मुलायम
कुछ न मिला आजतक जातक को
हाथ सुखाने और मुँह पोंछने के लिए
कई बार जब नाराज होता माँ से
पोंछ आता नाक भी उसी साड़ी में।
पर माँ थी कि पूछती-
जुकाम तो नहीं हो गया तुम्हें?
आ, तेल लगा दूँ सर में!

उषा उत्थुप के लिए

जब सब बचा रहे थे बेशकीमती असबाब सैलाब से
उसने बचाई चिट्ठियाँ प्रेमभरी
उन्हीं चिट्ठियों की डोंगी में
वह उतरती रही पार बार-बार
झंझावातों से
प्रेम ने बनाया हर वजन बेवजन इतना
कि उन्हें तैरा कर पार की जा सके
उफनती बरसाती नदी
चिट्ठियों में समाया प्रेम
समाया था उसकी आवाज में
उसने जिसे प्यार किया, जब भी, बेहद किया।

वह पहली स्त्री थी माँ के बाद
जिसकी आवाज़ से प्रेम किया जातक ने
जाना औरत का होना उसकी आवाज़ से
वह साकार होती थी आवाज़ में
जिसे सुनकर जाना जा सकता था सहज ही
कि स्त्री ही रही होगी कोई
आवाज़ को जनने वाली
अपनी खूबसूरत कृति को आवाज़ दी जिसने
आवाज़ कहकर।
आवाज़ में घुली थी काया
फुर्ती और गति उसकी
उसके सारे कटाव दिखते आवाज़ में
वह देह नहीं खालिश आवाज़ थी खुरदुरी
प्रेमिल और कमनीय खसखसाहट से भरी

केवल देह होती भी नहीं स्त्रियाँ
गति, लय, ऊर्जा, रचना-पुंज होती हैं
देह के आवरण में लिपटी हुईं
रचती हैं जिससे दुनिया
उतनी ही गतिमय, लयबद्ध
प्रेमिल ऊर्जा से दिप्-दिप्।

नाज़िया हसन के लिए

उसके आते ही खुला सदियों से बंद दरवाजा
विशाल जर्जर, बंदिशों और रवायतों का
जैसे खुलता है फिल्मों की भुतहा हवेली में
सुदीर्घ चर्रचर्रचर्रss की आवाज़ के साथ
अनुगूँजें सुनाई देती रहीं जिसकी
जीवन के इस छोड़ से उस छोड़ तक।

जैसे खुली और साफ हवा में
गहरी साँस भरती है स्त्री फेफड़ों में हाथ उठा
गोइठा पाथने/माथे का बोझ पटकने के बाद
जैसे चिड़ियाँ फैलाती हैं डैने
नई उड़ान के लिए
जैसे भर जाता है ताज़ा और तेज़ हवा का झोंका
भुतहा हवेली में
भरते हुए सुर, संगीत, कर्णप्रिय कोलाहल
लगभग वैसे ही, वह आई
और बदल दिया भुतहा चर्रचर्रचर्रss की आवाज़ को
कर्णप्रिय संगीत में।

आते ही उसने आवाज़ दी
आहूत करती एक अदद उम्मीद
और दाखिल हो गई हजारहाँ धड़कनों में
किसी का इज़ारा नहीं उमंग – कहा उसने
उतना ही है औरतों और लड़कियों का
जितना कि मर्दों का।
उसने आवाज दी लरजती
सुर और संगीत भरी और फिर कहा
कुफ्र नहीं है संगीत, न उल्लास, न खुदमुख्तारी औरतों की
इस तरह उसने बंदिशों, रवायतों, हिचक और कोहरे का हटाया हिज़ाब
जैसे कोई सुर्ख, चमकदार भंवर
लगभग वैसे ही, वह आई!

जैसे भरभरा कर गिरा खंडहर ख्यालों का
मानो चर्रचर्रचर्रss की आवाज़ के साथ गिरा हो दरवाज़ा
जैसे दूर जा छिटकी बंदिशों, कायदों, परंपराओं की जंग खाई चूलें
उसकी एक जुंबिश से
वैसे ही वह लौट गई वापस आते-आते
छत्तीस बरस की भरी जवानी में
लेकिन गई कहाँ, ठहर गई जाते-जाते
महाद्वीप की लड़कियों, लड़कों की आँखों में
फिर सबने कहा एक स्वर में
लो, वह आई, जीवन संगीत बनकर!

सभ्यता कथा

सभ्य कहे जाने के लिए
अगले दो अंगों को हमने हाथ बनाया
पिछले दो को पैर
और धीरे-धीरे तन कर खड़े हो गए
आसपास देखा थोड़े विस्मय, थोड़ी हिकारत से
शेष जीवों को जंगली और चौपाया कहा
खुद को सभ्य और श्रेष्ठ ।

जैसे-जैसे सभ्य हुए हम
औरत को औरत और मर्द को मर्द पहचाना
हमने परिवार बनाए, परिजनों और अन्य जनों का भेद रचा
समाज बनाए और समाजों के भीतर समाज
हमने बोलियाँ और भाषाएँ बनाई
जातियाँ गढ़ी, कुनबे और कबीले
संप्रदाय और धर्म बनाए
अपने अपने नायक और नायिकाएँ गढ़े
फिर एक दूसरे को अलग करना
एक दूसरे से नफरत करना सीखा।
हमने घर बनाए और खेत
और गाँव और रियासतें और देश अनेकानेक
सबकी चौहद्दियाँ खींची हमने
जैसे-जैसे सभ्य हुए हम
खींचते गए विभाजक रेखाएँ, चौहद्दियाँ
औरतों, मर्दों, कुनबों, कबीलों, संप्रदायों, गांव-रियासतों, देशों की चौहद्दियाँ।
श्रेष्ठता के पैमाने तय किए हमने
किसी की औरत हथिया ले
या खेत या खनिज
या गांव या रियासत
वह श्रेष्ठ
किसी के घर में घुस जाए
या गांव या देश में
मार-काट करे, लूटमार या बलात्कार
वह श्रेष्ठ
अपनी चौहद्दी का जितना विस्तार करे वह उतना ही श्रेष्ठ
इस तरह हमने देवी-देवता रचे
जिनने लड़ाइयाँ लड़ी बड़ी-बड़ी देवानुकूल
विजेताओं को हमने सदा सदाचारी
और पराजितों को दुर्गुणों की खान माना
कुछ बने प्रतापी और चक्रवर्ती सम्राट
श्रेष्ठता के मानकों में सर्वप्रमुख रही
कुटिलता या बाहुबल या पौरुष
श्रेष्ठता के लिए हमने लड़ी लड़ाइयाँ –
जातियों की श्रेष्ठता के लिए लड़ाइयाँ
धर्मों, आराध्यों की श्रेष्ठता के लिए लड़ाइयाँ
भाषाओं और सीमाओं की श्रेष्ठता के लिए
हथियारों की श्रेष्ठता के लिए लड़ाइयाँ
संपत्तियों और बाज़ारों के लिए लड़ाइयाँ।

इस तरह लड़ते-झगड़ते हम सभ्य हुए और श्रेष्ठ
अपने आदिम साथियों के बीच
हम भूल गए, मनुष्य होना था हमें
मनुष्यों के बीच बेहतर मनुष्य
किंतु हम आदिम ही रहे
स्वार्थी, बर्बर और धर्मांध ।

दिल्ली में यमुना

वो अपने दिन गिन रही है
उसका शरीर निस्तेज
और काला पड़ गया है
उसके मुँह से ढेर सारा झाग निकल रहा है
उसे कई नागों ने डँसा है।
कवि राकेशरेणु का परिचय-

सीतामढ़ी,बिहार में जन्में चर्चित कवि राकेशरेणु भारतीय सूचना सेवा से संबद्ध हैं।सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा प्रकाशित साहित्य-संस्कृति की पत्रिका “आजकल ” के वरिष्ठ संपादक हैं।इनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं -रोजनामचा (कविता संग्रह),इसी से बचा जीवन (कविता संग्रह) , समकालीन हिंदी कहानियाँ(सं),समकालीन मैथिली साहित्य (सं),यादों के झरोखे (संकलन-संपादन)।विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, लेख,समीक्षाएँ, रिपोर्ताज़ आदि प्रकाशित।आकाशवाणी और दूरदर्शन पर कविताएँ ,वार्ताएँ और परिचर्चाएं प्रसारित।समकालीन परिभाषा, आजकल, योजना,कुरुक्षेत्र, रोज़गार समाचार, बल भारती आदि पत्र-पत्रिकाओं का संपादन।
फोन-9868855425

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