पूँजीपति मज़दूरों से संगठित संघर्ष का क़ानूनी अधिकार छीनने की तैयारी में

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कोरोना-लॉकडाउन की इस आफ़त के बहाने मज़दूर वर्ग पर पूँजीपति बड़े राजनीतिक-आर्थिक हमले करने की तैयारी कर रहे हैं। जैसे कि पहले ही ख़बर आ चुकी है कि भारत में आठ घंटा कार्य-दिवस को 12 घंटे का करने की तैयारी की जा रही है। अब गुजरात चैंबर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज (जी.सी.सी.आई.) ने भारत सरकार के श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय से माँग की है कि कम-से-कम एक साल के लिए औद्योगिक विवाद अधिनियम में से मज़दूरों का यूनियन बनाने का अधिकार निलंबित कर दिया जाए।
पूँजीपतियों की यह माँग स्पष्ट करती है कि यह कोरोना-लॉकडाउन आफ़त का किस कदर फ़ायदा उठाने की घटिया चालें चलने में लगे हुए हैं।

पूँजीपतियों के इस संगठन का कहना है कि उद्योगपतियों को यूनियनें ‘‘इस क़ानून का इस्तेिमाल करके धमकियाँ देती हैं’’ और ‘‘मज़दूरों को काम पर वापिस नहीं आने देतीं’’। सच्चाई तो यह है कि उद्योगों में मज़दूरों के संगठित होने के अधिकार का पहले से ही हनन किया जा रहा है। उद्योगों में सिर्फ़ पाँच-सात प्रतिशत मज़दूर ही ऐसे हैं, जो श्रम क़ानूनों के अंतर्गत ‘‘पके’’ मज़दूर हैं। इन मज़दूरों में से भी बहुत थोड़े मज़दूर ही हैं, जो यूनियनों में संगठित हैं। बाकी के 93-95 प्रतिशत, जो ठेके, पीस रेट, दिहाड़ी पर उद्योगों में काम करते हैं, और जो क़ानूनी श्रम अधिकारों से वंचित मज़दूर हैं, का नाममात्र हिस्सा ही यूनियनों में संगठित है। ऐसी हालत में ज़रूरत तो यह है कि उद्योगों में ठेके-दिहाड़ी-पीस रेट पर काम पूरी तरह बंद किया जाए और इन मज़दूरों को पक्का किया जाए। मज़दूरों के संगठित होने के जनवादी-संवैधानिक अधिकार को सख्ती से लागू किया जाए। परंतु पूँजीपति तो मज़दूरों की मौजूदा संगठित ताकत और थोड़े-बहुत हासिल क़ानूनी श्रम अधिकारों को देखकर भी घबराते हैं और इससे छुटकारा पाना चाहते हैं, क्योंकि यह अधिकार चाहे छोटे स्तर पर ही मज़दूर वर्ग को हासिल हैं परंतु इससे भी पूँजीपतियों के हितों पर चोट तो लगती ही है! यूनियन बनाने के क़ानूनी अधिकार का मज़दूर एक हद तक फ़ायदा तो उठा ही रहे हैं, जो पूँजीपतियों को बर्दाश्त नहीं हो रहा। इसलिए भारतीय शासकों द्वारा लगातार क़ानूनी श्रम अधिकारों में संशोधन करके मज़दूरों के अन्य क़ानूनी श्रम अधिकारों के साथ ही यूनियन बनाने के अधिकार पर कैंची चलाने की साज़िशें रची जाती रही हैं।

मज़दूर वर्ग को संगठित होने के क़ानूनी अधिकार से वंचित करना पूँजीपति वर्ग की एक आम ज़रूरत तो है ही, परंतु आर्थिक संकट के मौजूदा दौर में और इसके साथ ही कोरोना-लॉकडाउन के इस ख़ास समय में जब मज़दूरों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है और लॉकडाउन के बाद उनके द्वारा इस समय की तनख्वाहें और भत्तों के लिए और छँटनी के ख़िलाफ़ ज़ोरदार संघर्ष लड़े जाने की संभावनाएँ हैं। पूँजीपति मज़दूर वर्ग को ज़रा-सी भी राहत देने के लिए तैयार नहीं हैं। जब सत्ता में फासीवादी हों और कोरोना के डर और लॉकडाउन के चलते मज़दूरों का इकठ्ठा होकर विरोध करना गैरक़ानूनी हो, मज़दूर वर्ग पर राजनीतिक-आर्थिक हमला तीखा करने का इससे बढ़िया समय पूँजीपतियों के लिए और कौन सा हो सकता है?
मुक्तिमार्ग से साभार

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