पांच लोगों में केवल 1.5 किलो चावल और एक पाव दाल

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गरीबी का मजाक इससे बड़ा और क्या हो सकता
विशद कुमार

भले ही कोरोना कहर के कारण आज पूरा देश लॉकडाउन का दंश झेल रहा है, लेकिन झारखंड अपने अलग राज्य गठन के 20 वर्षों के बाद भी अलग राज्य की अवधारणा को लेकर आज भी लॉकडाउन में फंसा हुआ है। कहना ना होगा कि झारखंड अलग राज्य की अवधारणा में राज्य में रोजगार के विकास के साथ—साथ आदिवासी समाज का विकास निहित था, ताकि रोजगार के लिए झारखंड से पलायन रुके, आदिवासी समाज स्वालंबी बने, सभी को भोजन उपलब्ध हो सके और कोई भूखा न रहे। लेकिन अलग राज्य गठन के 20 वर्षों बाद भी इन तमाम विसंगतियों से झारखंड को मुक्ति नहीं मिल सकी है, जिसे हम आए दिन खबरों की सुखिर्यों में देखते रहे हैं।

हम जानते हैं कि विगत महीनों से कोरोना की वैश्विक महामारी से प्रभावित पूरा देश लॉकडाउन में है और देश के सभी राज्यों की प्राथमिकताओं में गरीबों, मजदूरों, असहाय लोगों को अनाज उपलब्ध कराना है, ताकि कोई भूखा न रहे।

झारखंड भी इस प्राथमिकता से अछुता नहीं है बावजूद राज्य में प्रशासनिक लापरवाही के कारण सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की बदहाली की परेशान करने वाली खबरें तो हैं ही, लेकिन जब ऐसी खबर सरकार की नाक के नीचे से बाहर आए तो वह काफी चिंतित करती है।

यहा उल्लेख करना जरूरी होगा कि एक तरफ झारखंड सरकार दावा कर रही है कि बिना राशन कार्ड वालों को 10 किलो चावल दिए जा रहे हैं। दूसरी तरफ सरकार का यह दावा कितना सार्थक है उसे हम इससे समझ सकते हैं कि रांची स्थित सचिवालय से 2.5 किमी दूर पर बसे आदिवासी टोले तक भी यह राशन नहीं पहुंच पाया है।

बताते चलें कि राजधानी रांची में स्थित सचिवालय (नेपाल हाउस) से महज 2.5 किलोमीटर की दूरी पर बसा आदिवासी टोला बीते 20 साल से सड़क और सुविधाओं से आज भी महरूम है और यहां के लोगों की जिंदगी शहर से कटी हुई है। इसी टोले की एक खबर को फोटो सहित रांची के मो.असग़र खान ने सोशल मीडिया पर डाला जो काफी परेशान करने वाली खबर थी।

खबर के मुताबिक बीते 20 साल से सड़क और सुविधाओं से महरूम झारखंड की राजधानी रांची के नदी दीप टोला के लोग अब लॉकडाउन की मार झेल रहे हैं। लगभग 20 घरों का यह आदिवासी टोला सचिवालय (नेपाल हाउस) से महज 2.5 किलोमीटर की दूरी पर है। बावजूद यहां के लोगों की जिंदगी शहर से कटी हुई है।

इस टोले में कई परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं है। इन्हीं में से एक पूनम कच्छप हैं, जिनके परिवार में पांच सदस्य हैं। वह बताती हैं कि 20 दिन पहले पार्षद पुष्पा तिर्की ने उन्हें राशन के लिए बुलाया था, मगर उन्होंने 1.5 किलो चावल और एक पाव दाल ही दिया। गरीबी का मजाक इससे बड़ा और कुछ नहीं हो सकता।

मनीषा कच्छप, सवित्री कच्छप और सीमा कच्छप का भी यही कहना है। इनके परिवार में भी क्रमशः तीन, दो और तीन सदस्य हैं। वे कहती हैं कि वे खाना एक टाइम ही बनाती हैं।

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