पत्तलों पर जूझते कुत्तो की गुर्राहट

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जनरेटर शांत होते ही ,
फैले अँधेरे में ,
पत्तलों पर जूझते कुत्तो की गुर्राहट ,
सन्नाटे को भंग कर रही है |
प्रयोजन के गुणदोष पर ,
फुसफुसाते हुए मेहमानों ,
के होठो पर तैर रहा है ,
तुम्हारे वजूद से बना रिश्ता |
तमाम थकन के बावजूद ,
नीद से कोसों दूर आखो में ,
याद आ रहा है ,
तुम्हारा प्रथम आगमन ,
जिसका अवशेस साक्छी मै ,
बंसखट पर बलगम थूक रहा हू |
गोबर लिपे आंगन में ,
तुलसी के चौरे पर ,
बुदबुदाती माँ ,
तुम्हारी प्रथम सन्तति के ,
सकुशल होने की प्राथर्ना कर रही है |
बेटी की बिदाई पर ,
धार-धार रोती आंखे ,
और बेटों के बंटवारे पर ,
हतप्रभ चेहरे से ,
अपनी उम्र के पड़ाव ,
गिनता रहा हू ,
शायद अब वो घड़ी ,
भी बंद हो गई ,
जो बुढ़ाते समय का सन्देश देती।
संतोष कुमार

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