नारी मुक्ति किस रास्ते

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* आर डी आनंद
व्यक्तिवाद गिरती नैतिकता के लिए बेहद जिम्मेदार है। सामूहिकता में मनुष्य का नैतिक स्तर उच्च स्तर का हो जाएगा। ऐसी स्थिति में बेटी-बेटे की जिम्मेदारी न सिर्फ बाप की होगी बल्कि पूरा समाज उनके विकास के लिए जिम्मेदार होगा। जब हर रोजगार लायक स्त्री-पुरुष को काम दे दिया जाएगा तो कोई भी स्त्री किसी पुरुष की जिम्मेदारी बन कर घर में क्यों बैठेगी। जब किचेन, लांड्री, प्रेस, सफाई, बच्चे पालन से स्त्रियाँ मुक्त हो जाएँगी तो गृहणी बन कर बैठने-बैठाने का औचित्य कहाँ रह जाएगा। जब निजी गाड़ी, निजी घर, निजी जमीन, निजी जायजाद, निजी नैकर नहीं रहेगा तब व्यक्ति का स्वरूप और चरित्र भी बदल जाएगा। ऐसी स्थिति में स्त्रियों की पुरुष दासता से लेकर घरेलू उत्पीड़न और बलात्कार से लेकर दोयम दर्जे की जिंदगी और दोहरे शोषण से मुक्ति मिल जाएगी।
फेसबुक मित्र साथी सुश्री सूर्यवंशी सरलेश सिंह जी ने अपने फेसबुक वाल पर श्री राहुल सिंदे के मार्फत लिखा है कि “बाप की नाक के लिए प्रेम छोड़ दो। पति के लिए नाम और घर छोड़ दो। भाई के लिए प्रॉपर्टी छोड़ दो। बच्चों के लिए नौकरी छोड़ दो। बाहर कोई छेड़े तो बाहर जाना छोड़ दो और अंदर कोई छले तो उम्मीद छोड़ दो। अच्छी औरत सिर्फ वह होती है जो जीना छोड़ दे और लाश बन जाये।” बिल्कुल सच है। स्त्रियों की स्थिति सचमुच ऐसी ही है। चिंतन करिए कि एक गुलाम जब मालिक द्वारा सताया जाता है तो वह क्या करता है? वह सिर्फ रोता है, कोसता है, मन में गाली देता है, टूटता-सरपता है और पुनः उसी मालिक द्वारा दी गई परिस्थितियों में गुजर-बसर करता है। उस गुलाम की स्थिति फिर भी इन स्त्रियों से बेहतर है क्योंकि गुलाम मालिक से हमेशा घृणा करता है, वह उससे प्यार कभी नहीं करता है। गुलाम उसके दासत्व में जरूर रहता है लेकिन उसे अपना कभी नहीं समझता है लेकिन स्त्रियाँ जिस पुरुष को अपनी गुलामी का कारण मानती हैं उसी के सम्मुख समर्पित रहती हैं और ताउम्र उसे प्यार करती हैं। यहाँ तक कि जिस बेटे पर यह आरोप है कि उसके लिए माँ स्वरूप स्त्री पति के मृत्यु के उपरान्त उसी के लिए नौकरी छोड़ देती है, वही स्त्री कोख में अपने स्वरूपा स्त्री से खुश नहीं होती है बल्कि उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति चाहिए। बिडम्बना देखिए कि यह क्रान्तिकारी स्त्री बिना एक लड़का पैदा किए खुद को बाँझ समझती है। विचित्र हैं स्त्रियाँ, विचित्र है स्त्री का नारीवाद और विचित्र है इनके क्रान्ति की समझ।
सिर्फ सवाल यह नहीं है कि स्त्रियों की ये समस्याएँ है बल्कि अहम सवाल यह है कि स्त्रियों की ये समस्याएँ क्यों है और ये कैसे खत्म होंगी? क्या पुरुष ही स्त्रियों के समस्याओं का कारण है अथवा इन समस्याओं का कारण कुछ और है? जैसे:-किसी रिवाल्वर से अमुक की हत्या होती है तो हत्या का कारण क्या रिवाल्वर है अथवा कुछ और या कोई और? निश्चित हत्या का कारण रिवाल्वर नहीं है। रिवाल्वर को हत्या का हथियार है। ठीक इसी तरह स्त्री के उन तमाम परिस्थियों का जिम्मेदार पुरुष नहीं है बल्कि कोई व्यवस्था है जिसके अंतर्गत स्त्री-पुरुष का सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक जीवन संचालित होता है। स्त्रियों की भौतिक स्थिति में पुरुष हथियार है जिसका संचालन एक व्यवस्था करती है।
वह व्यवस्था है पूँजीवादी उत्पादन प्रक्रिया और संसाधनों का निजी स्वामित्व। इस प्रक्रिया में उत्पादन सिर्फ और सिर्फ अधिकतम मुनाफे के लिए किया जाता है तथा उत्पादन के सभी साधन-जमीन, संस्थान, कारखाने कुछ व्यक्तिगत हाथों में केंद्रित हैं। शेष लोग अपनी श्रम शक्ति को सस्ते मूल्य में बेंचकर जीवन यापन करते हैं। पूँजीवादी व्यवस्था ने उत्पादन और संसाधनों के इस खेल में मालिकाना को पुरुषों के हाथ में सुरक्षित रखा है। उसने श्रम के क्षेत्र सुनिश्चित कर दिया। श्रम के क्षेत्र सुनिश्चित होने से उत्पादन के संसाधन भी सुनिश्चित हो गए। इस कारण स्त्रियों की स्थिति अपने अत्यंत घनिष्टों के मध्य भी विभाजित है।
कोई भी पुरुष चाहकर भी इस परिस्थिति को परिवर्तित नहीं कर सकता है। कोई भी स्त्री चाह कर भी इस स्थिति को परिवर्तित नहीं कर सकती है। इस स्थिति को परिवर्तित करने के लिए पूरी व्यवस्था को परिवर्तित करना होगा। इस तरह, यह व्यवस्था न सिर्फ स्त्री परिवर्तित कर सकती है और न पुरुष। इस व्यवस्था को परिवर्तित करने के लिए लिंग भेद से दूर रहते हुए स्त्री-पुरुष दोनों को सहभागिता करनी पड़ेगी।
एक सवाल उठ सकता है कि जब पुरुष मालिक की स्थिति में है तो वह इस व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई में स्त्री के पक्ष में क्यों लड़ेगा? जेनविन सवाल है। दरअसल, पूँजीवाद के इस वितरण प्रणाली में न सिर्फ स्त्री शोषित है, पुरुष भी शोषित है। यहाँ स्त्रियाँ दोहरी गुलाम है। एक तरफ पूँजीवाद की तो दूसरी तरफ पुरुषप्रधानता की वजह से पुरुषों की लेकिन, स्त्रियों को यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि पुरुषप्रधानता कोई अलग सत्ता है, बिल्कुल नहीं। पुरुषप्रधानता का जनक भी पूँजीवाद ही है। पूँजीवाद ने स्त्री पुरुष को अलग कर अपने द्वारा किए जाने वाले शोषण की प्रक्रिया को आसान बना लिया है। पूँजीवाद अपने जिस गुलाम को गुलामों का मालिक नियुक्त करता है वह स्वयं को मालिक समझ बैठता है। एक फैक्ट्री मालिक की प्रवृत्ति एक चाय बेंचने वाली की प्रवृत्ति एक जैसी होती है-कम से कम लागत में अधिकतम मुनाफा कमाना और अधिनस्त रखना और उसे रोजगार देना। पुरुष पूँजीवादी व्यवस्था का सीनियर मजदूर है और स्त्रियाँ जूनियर मजदूर। पुरुष पूँजीवाद का वफादार गुलाम है जो स्त्रियों को नियंत्रित रखता है।
चिंतन का विषय यह है कि उत्पादन के संसाधन न पुरुषों के पास हैं और न स्त्रियों के पास ही। दोनों पैदल हैं। पुरुष को वर्चस्व की स्थिति में रखकर पूँजीवाद ने पुरुषों की जिम्मेदारी का बोध बढ़ा दिया है कि कमा कर तुम्हें ही घर चलाना है। घरगृहस्थी का बोझ पुरुष के कन्धे पर है।
यदि पूँजीवाद ध्वस्त हो जाए तो मालिक और मजदूर का सम्बन्ध खत्म हो जाएगा, यहाँ तक की स्त्री-पुरुष के मध्य मालिक और गुलाम का भेद खत्म हो जाएगा। जब उत्पादन के संसाधनों पर स्त्री-पुरुष दोनों का सामूहिक मालिकाना हो जाएगा, तब मालिक और गुलाम जैसी कोई स्थिति नहीं रहेगी बल्कि उत्पादन की प्रक्रिया से जब मुनाफा हट जाएगा और उत्पादन मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जाएगा तथा रोजगार हर हाथों में उपलब्ध रहेंगे तो बेटे, पति और पिता का यह कॉन्सेप्ट अपने आप बिखर जाएगा। कमाने का बोझ किसी एक के कन्धे पर नहीं होगा। जब स्वामित्व का बोझ किसी एक के कन्धे पर नहीं होगा तो स्वामित्व कैसा। तब स्त्रियाँ पुरुष के समरूप होंगी। जब स्त्रियाँ पुरुषों के समरूप होंगी तो मिलजुल कर अपने फैसले में यह सुनिश्चित कर लेना आसान होगा कि हम समान पार्टनर हैं गुलाम नहीं। जब स्त्रियाँ किसी के अधीन नहीं होंगी तो उनको पुरुष से परमिशन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। स्त्री जब पुरुष की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं रहेगी तो पुरुष स्त्री को अपने निजी मर्यादाओं के साथ क्यों जोड़ेगा। जब उत्पादन और संसाधन हमारी सामूहिक जिम्मेदारी हो जाएगी तो किसी स्त्री को पुरुष की इजाजत लेने की क्या जरूरत पड़ेगी। उस अवस्था में स्त्री-पुरुष मर्यादा की सामूहिक जिम्मेदारी होगी। किसी एक स्त्री की नैतिक जिम्मेदारी किसी एक पुरुष की नहीं होगी बल्कि हर स्त्री और हर पुरुष स्वयं सक्षम होंगे और एक दूसरे के प्रति जिम्मेदार होंगे।
जब व्यवस्था बदलेगी तो नैतिकता भी बदलेगी। व्यक्तिवाद गिरती नैतिकता के लिए बेहद जिम्मेदार है। सामूहिकता में मनुष्य का नैतिक स्तर उच्च स्तर का हो जाएगा। ऐसी स्थिति में बेटी-बेटे की जिम्मेदारी न सिर्फ बाप की होगी बल्कि पूरा समाज उनके विकास के लिए जिम्मेदार होगा। जब हर रोजगार लायक स्त्री-पुरुष को काम दे दिया जाएगा तो कोई भी स्त्री किसी पुरुष की जिम्मेदारी बन कर घर में क्यों बैठेगी। जब किचेन, लांड्री, प्रेस, सफाई, बच्चे पालन से स्त्रियाँ मुक्त हो जाएँगी तो गृहणी बन कर बैठने-बैठाने का औचित्य कहाँ रह जाएगा। जब निजी गाड़ी, निजी घर, निजी जमीन, निजी जायजाद, निजी नैकर नहीं रहेगा तब व्यक्ति का स्वरूप और चरित्र भी बदल जाएगा। ऐसी स्थिति में स्त्रियों की पुरुष दासता से लेकर घरेलू उत्पीड़न और बलात्कार से लेकर दोयम दर्जे की जिंदगी और दोहरे शोषण से मुक्ति मिल जाएगी।

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