देश के हर एक लीडर पर सवाल उठाना वाज़िब है!!!

0
618

जनता के सामने कोरोना के अलावा अन्य भी कई तरह की खतरनाक बीमारियाँ है जिससे वो ग्रसित व परेशान हैं। अस्पतालों के ओपीडी, भर्ती वार्ड यहां तक कि इमरजेंसी सेवाओं को बंद कर दिया गया है। जिन लोगों को बीमारियां हैं और इलाज से वंचित हो रहे उनकी भी मौतें हो ही रही होंगी। इसकी परवाह किसी सरकार/मंत्री को नही है। कोरोना की बात करें तो उससे भी निपटने की कोई खास इंतेज़ाम अस्पतालों में नही है। कुछ स्क्रीनिंग सेंटर खोले गए हैं पर वो सिर्फ नाम के हैं। केजीएमयू लखनऊ के डॉक्टरों को तो कुलपति को चेतावनी देते हुए पत्र लिखना पड़ा कि अगर उन्हें ज़रूरी सामान जैसे बॉडी कवर, मास्क, पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (PPE) उपलब्ध नही कराया गया तो वो काम पर नही जाएँगे। डॉक्टर, बेड, आइसोलेशन वार्ड, बुनियादी जांच व सेवाओं की भारी कमी चरमरा चुकी स्वास्थ व्यवस्था को दिखाती है जो देश में हमेशा से ही रहा है और ये कभी विकास के पैमाने पर आते ही नही। सरकार इन सभी कमियों को छिपाने के लिए कभी थाली-ताली पिटवा रही। खुद प्रधानमंत्री घड़ियाली आँसू में माफ़ी मांग रहे। इसी बीच अचानक से मीडिया में यह खबर आने लगी कि दिल्ली स्थिति मरकज में हज़ारों जमाती ‘छुपे’ बैठे हैं। इन लोगों पर कोरोना फैलाने का सारा आरोप लगा दिया गया। देश के अलग अलग जगहों पर मस्जिद और मदरसे में छपेमारी और विभिन्न जगहों से जामातियों के ‘छुपे’ होने की खबरें आने लगी। अब मज़दूरों गरीबों की दशा की चर्चा खत्म हो गया। यहां से हमेशा की तरह मुस्लिम इस बार भी देश की दुर्दशा के ज़िम्मेदार बता दिए गए।
कोरोना महामारी के आपातकाल ने भारत की तमाम बुनियादी व्यवस्था व अर्थव्यवस्था की जर्जर हालत की तस्वीर रख दी है। गाँव के बेरोज़गार लोग बड़ी तादाद में शहरों में पलायन कर दो वक्त की रोटी के लिए खून-पसीना बहाकर वहाँ चकाचौंध रोशनी पैदा कर रहे पर उनके खुद के ज़िन्दगी में अँधेरापन छाया हुआ है। बेरोज़गारी इतनी की अच्छे पढ़े लिखे नौजवान भी दिहाड़ी या फैक्टरियों में थोड़े-मोड़े पैसों के लिए 14-15 घण्टे काम करने को मजबूर हैं। प्राइवेट व असंगठित क्षेत्र में काम करने की कोई समय सीमा नही और कब निकल दिए जाए इसकी भी कोई समय सीमा नही है।
ऐसे परिस्थिति में भी अन्य संसदीय पार्टियां इस लॉकडाउन का समर्थन किया। पर ऐलान के महज 4 घण्टे बाद के लॉकडाउन को लेकर व्यापक आबादी के लिए क्या तैयारी है इस पर कोई सवाल नही।
ऐसे में व्यापक जनता अब भयानक, दहशतपुर्ण व ख़तरनाक माहौल में जीने को बेबस है। सच्चाई ये है कि कोरोना, अन्य बीमारियों व भूख से प्रभावित व मारने वाली भी जनता वास्तव में यही हैं ना कि उच्च वर्ग के लोग। अगर यह कोरोना किसी गरीब को होती है तो यह महामारी सिर्फ उसके परिवार ही नही बल्कि पूरे बस्ती को ही खत्म कर देगी। इससे निपटने की कोई तैयारी नही। अभी तक तो किसी मज़दूर गरीब की बस्ती में इस वायरस का टेस्ट भी नही हुआ है। पूरे देश मे बहुत ही मामूली व चुनिंदा लोगों का ही टेस्ट हो हुआ है। वो ज्यादतर उच्च वर्ग व वर्ण के ही लोग हैं।
वो गरीब मज़दूर-किसान जो देश की सभी उत्पादन कामों को अपने कंधे पर लिए हैं। जो सच मे देश के निर्माता हैं। उनके लिए देश के शासकों के पास देने के लिए कुछ भी नहीं। अगर वो एक दिन काम न करें तो उनको रोटी भी नसीब नही होती है। हर साल पूंजीपतियों के लाखों करोड़ का कर्ज माफ़(NPA में डालकर) कर दिया जाता है। ये बेतहाशा संपत्ति इन्ही मज़दूरों किसानों की मेहनत से बनती है। मगर कुछ पूँजीपयियों के दिये हुए चंदों को प्रचारित कर उन्हें ‘महान’ बनाया जा रहा। ये सवाल नही किया जा रहा कि वो लाखों करोड़ जो हर साल सरकार उनको माफ करती है, कौड़ियों के भाव ज़मीन देती है , उसकी वसूली क्यों नही की जा रही।
ये ऐसे लोग हैं जो रोज़ कमाते और रोज़ खाते हैं। ये रोड किनारे, किराये के छोटे कमरों में, झुग्गी-झोपड़ीयों में रहने को विवश लोग हैं। इस लॉकडाउन के बाद दिहाड़ी मजदूर के पास कोई काम नहीं, फैक्टरियाँ बन्द हो गईं, किराये के कमरे खाली कराये जाने लगे, रोड किनारे रह रहे लोगों को भगाया जाने लगा, भिखारियों को भीख देने वाला कोई न बचा। ये हालात पूरे देश मे गंभीर रूप से अफरा-तफरी का माहौल बना दिया। गाँवों से पलायन करके काम की तलाश में शहर आए मज़दूरों के पास अब खाने और रहने को कुछ न बचा। वो वापस गाँवों की ओर लौटने को मजबूर हो गए।
सरकार के पास ऐसी कोई व्यवस्था नही थी जिससे वो वही रह खा पाते या वापस ठीक से गांव ही लौट पाते। अंत मे मज़बूर होकर हज़ारों मज़दूर देश के बड़े शहरों से सैकड़ों किलोमीटर दूर गाँव की ओर पैदल ही लौटने लगे। कोई अपने बच्चों को कंधे पर बैठाए, कोई अपनी टुटे पैर पत्नी को कंधे पर बैठाए, कोई सिर और कंधों पर सामान लादे भूखे प्यासे सैकड़ों किमी की दूरी पैदल ही तय करने को विवाश हो गए। कई लोग रास्ते मे ही भूख व बीमारी से दम तोड़ दिए। कई रास्ते मे गुज़रने वाले ट्रकों पर लदकर जाने लगे। कई ने बिस्किट और केले खाकर अपने घर का सफर क़िया। कुछ लोगों को रास्ते मे राहत कार्य कर रहे लोगों से खाना खाने को मिला तो वो फूट-फूटकर रो पड़े।
गाँव के गरीब-दलित बस्तियों की हालत भी बदतर ही हो गई। बनारस के कोइरीपुर में तो मुसहर जाति के लोग व बच्चे भूख से बचने के लिए अंकरी(एक तरह का घास) खाने को मजबूर हो गए।
पूरे देश की ये बदहाल स्थिति कई अखबारों की सुर्खियां बनी, लोगों ने सोशल मीडिया में लिखना शुरू कर दिया। आनन-फानन में केंद्र सरकार ने सहयोग/राहत के लिए 1.7 लाख करोड़ का ऐलान कर दिया पर ये कब कैसे किसी जरूरतमंद को मिलेगी इसका कोई ठोस ब्यौरा या ज़मीनी हक़ीक़त नही दिखी। इसके इतर पीएम केयर्स के नाम से सहयोग की अपील की गई। जिसमे कई जगहों से ये ख़बरें आयी कि नौकरी कर रहे लोगों से 1 या 2 दिन का वेतन काटा जाएगा। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने दिल्ली से अपने गाँव लौट रहे लोगों को मुफ्त बस सेवा का ऐलान किया। लेकिन बस से उनके टिकट काटे गए, किराए वसूले गए। कहीं कहीं तो किराए से ज्यादा पैसे ऐंठे गए। इस तरह सभी योजनाओं और राहत पैकेज की पोल-पट्टी सब खुल गई। जगह जगह पर स्थानीय संगठनों व लोगों द्वारा फण्ड-चंदा इकठ्ठा करके खाद्य सामग्री इत्यादि का आवंटन ज़रूरतमंदों को किया जा रहा।
इस तरह देशभर में इस अफरा-तफरी के माहौल में आम लोग कोरोना वायरस से ज्यादा भूख और छत की कमी के भय में जी रहे। जो देश की असमान विकास के साथ साथ झूठे विकास वादों की पोल-पट्टी भी खोलकर रख दी है। इस पूंजीवादी-साम्राज्यवादी-सामंती व्यवस्था में एक तरफ बड़ी बड़ी सड़के, बिजली, मेट्रो-बुलेट ट्रेनें, बड़ी बड़ी इमारतें कुछ चंद लोगों के अय्याशी के लिए है तो वहीं देश की बड़ी आबादी अपने बुनियादी अधिकार से भी वंचित है जैसे, शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, आत्मसम्मान व बराबरी से जीने का अधिकार इत्यादि। सच्चाई तो ये है कि देश की 70 फीसदी संपत्ति पर मात्र 1% लोगों का कब्ज़ा है और मेहनत करने वाले किसान मजदूर फसल बर्बाद व कर्ज़ के बोझ से आत्महत्याएं करने को मजबूर हैं।
सरकार ने जिस तरीके से लॉकडाउन और अफरा-तफरी का माहौल खड़ा किया उससे निपटने के लिए सिर्फ एक तैयारी की, वो है पुलिस बल की। फासीवादी व तानाशाह सत्ताएं हर परिस्थिति से निपटने के लिए पुलिस सेना गुंडों को ही आगे करती है। जब कोरोना पूरी दुनिया मे खतरे की दस्तक दे रही थी और तमाम देश उससे जूझ रहे थे तो उस समय भरतीय सत्ता पर काबिज भाजपा, आरएसएस दिल्ली में CAA, NRC, NPR के खिलाफ चल रहे प्रदार्शनों को कुचलने के लिए पुलिस प्रशासन और गुंडों के बल पर दंगे-फसाद व साम्प्रदायिक माहौल बनाने में लगी थी। जब छात्र सस्ती, मुफ्त शिक्षा माँगें, किसान सस्ती खाद बीज, सब्सिडी, मुआवजे की मांग करे, जनता सस्ती, मुफ्त स्वास्थ व्यवस्था की मांग करें, दलित-महिलाएँ बराबरी-आत्मसम्मान की मांग करें, आदिवासी अपने जल-जंगल-ज़मीन पर हक़ की बात करें तो सिर्फ लाठी गोली से मामले को हल करने(दबाने) का काम किया जा रहा। मतलब फासीवादी सत्ता के सामने जैसी भी परिस्थिति हो, जो भी हक़ की आवाज़ हो उससे निपटने के लिए बस सेना पुलिस ही है।
लॉकडाउन के दौरान भी यही हाल रहा। जहाँ कोई भी सड़क पर किसी ज़रूरी काम से भी निकल रहा उस पर पुलिस डंडा बरसा रही है। यहाँ तक कि शहर से गांव की तरफ लौट रहे मज़दूरों के ऊपर भी डंडे बरसाए, एक जगह मज़दूरों से स्काउट करवाए गए, पुलिस बल पर ही तमाम राज्यों की सीमाएं बंद कर दी गई जिससे मज़दूर या बाक़ी कोई भी व्यक्ति को बॉर्डर पार कर घर लौटने में दिक्कत झेल रहा। बरेली में पहुँचे मज़दूरों पर तो डेंगू के लार्वा को मारने वाले केमिकल का छिड़काव किया गया। ऐशोआराम की ज़िंदगी जी रहे तमाम मंत्री नेता जनता को सोशल मीडिया से सलाह दे रहें।
सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने “जनता की मांग पर” कहते हुए रामायण व महाभारत सीरियल का दूरदर्शन पर पुनः टेलीकास्ट शुरू कराया और इसे देखने की अपील की। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने भी इसी अंदाज में गीता के 18 अध्याय पढ़ने को बोला। दोनों की ही अपील हिंदुत्व की फासीवादी राजनीति को ही दर्शाता है। साथ ही ये अपनी नाकामियों को छिपाने की कोशिश भी कर रहे।

देश के हर एक लीडर पर सवाल उठाना वाज़िब है,
देश के हर एक हाकीम को सूली पर चढ़ाना वाज़िब है। -फ़ैज़

विनय कुमार

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here