तलोजा जेल में बंद स्टेन स्वामी आज 84 वर्ष के हुए देश 

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विशद कुमार
झारखंड जनाधिकार महासभा ने एक प्रेस बयान जारी कर बताया है कि तीन दशकों से अधिक समय से झारखंड में आदिवासियों और वंचितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले जेसुइट प्रीस्ट स्टेन स्वामी छह महीने से भी अधिक समय से मुंबई की तलोजा जेल में बंद हैं। आज वे 84 साल के हो गए हैं।
स्टेन को भीमा कोरेगांव मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा 8 अक्टूबर 2020 को गिरफ्तार किया गया था। यह अब स्पष्ट हो चूका है कि किस प्रकार इस मामले में फ़र्ज़ी सबूत (फर्जी दस्तावेज जो आरोपित लोगों को माओवादी गतिविधियों से जोड़ते हैं आदि) का इस्तेमाल कर सामाजिक कार्यकर्ताओं और सरकारी के जन विरोधी नीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले लोगों  का दमन करने के लिए किया गया था स्टेन को पार्किंसंस रोग है जिसकी वजह से उनके दोनों हाथ कांपते हैं। उन्हें अन्य  बीमारियाँ भी हैं।
स्टेन उन लाखों विचारधीन कैदियों की दुर्दशा का प्रतीक हैं, जो कई सालों से यूएपीए के फ़र्ज़ी आरोपों के तहत जेल में बंद हैं. इन मामलों का अक्सर उद्देश्य होता है उन लोगों को परेशान करना जो वंचितों के लिए आवाज़ उठाते हैं या सरकार की जनविरोधी नीतियों को चुनौती देते हैं। यूएपीए के अधिकांश आरोप निराधार हैं, क्योंकि 2016-19 के बीच उनकी सजा का दर केवल 2.2 प्रतिशत थी, जैसा कि केंद्र सरकार ने स्वयं संसद में उल्लेख किया है।
विडंबना यह है कि पिछले कुछ वर्षों में, स्टेन ने झारखंड में विचारधीन कैदियों पर बहुत काम किया। 2014-16 में, उन्होंने एक अध्ययन का नेतृत्व किया, जिसमें पता चला कि लगभग 97 प्रतिशत सर्वेक्षण किए गए कैदियों पर माओवादी होने का झूठा आरोप लगाया गया था। अधिकांश विचारधीन कैदी आदिवासी, दलित या पिछड़े वर्ग के थे। कई अपने ही गाँवों में अन्याय और शोषण के खिलाफ मुखर थे। 2017 में, स्टेन ने झारखंड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर राज्य के सभी विचारधीन कैदियों सम्बंधित  जानकारी  (जैसे कि जाति रचना, ट्रायल में देरी के कारण आदि) मांगी और इस सम्बन्ध में कार्यवाई की मांग की.  झारखंड सरकार ने आज तक इसका जवाब नहीं दिया है।
इसके अलावा, कई ऐसे अध्ययन हैं जो बताते हैं कि भारत के सभी कैदियों में से लगभग 70 प्रतिशत विचारधीन कैदी हैं। उनके ट्रायल में देरी और अनिश्चितता के कारण एवं कानूनी प्रणाली की लंबी प्रक्रियाओं के कारण, गुनाही साबित न होने के बावज़ूद अनेक कैदी सालों से जेल में बंद हैं। इसके अलावा, कई कैदियों के परिवारों को गरीबी का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि रिहाई के लिए कानूनी लड़ाई में खर्चे हुए हैं और परिवार का कमाने वाला एक व्यक्ति भी लंबे समय से अनुपस्थित है।
साथ ही, महामारी की वर्तमान लहर में देश भर के अनेक कैदी COVID -19 से संक्रमित हो रहे हैं। भीमा-कोरेगांव मामले की सबसे कम उम्र की आरोपी, ज्योति जगदप भी संक्रमित हो गयी है। बुज़ुर्ग और कमज़ोर होने के बावजूद, स्टेन स्वामी को अभी तक COVID -19 का पहला टीका भी नहीं मिला है। मौजूदा महामारी के दौरान विचारधीन कैदियों को जेलों में रहने देना अमानवीय है। महामारी से निपटने में मोदी सरकार की व्यापक असफलता तो बेनकाब हो चूका है. जितना समय, पैसा और ध्यान सरकार ने सामाजिक कार्यकर्ताओं को परेशान करने में, फ़र्ज़ी मामले गढ़ने में, विरोध के स्वरों को दबाने में और देश के लोकतान्त्रिक संस्थाओं को कमज़ोर करने में लगाया है, वो इस महामारी के विरुद्ध तैयारी करने में लगा सकती थी.
आज जब एक  बुजुर्ग और बीमार व्यक्ति को, जिनका हिंसा का कोई इतिहास नहीं है, अपना 84वां जन्मदिन एक विचारधीन कैदी के रूप में मन रहा है,  झारखंड जनाधिकार महासभा केंद्र और राज्य सरकारों से मांग करती है कि स्टेन स्वामी और देश के सभी विचारधीन कैदियों को तत्काल रिहा किया  जाए। महासभा लोगों से भी इस आह्वान  में शामिल होने की अपील करती है।

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