जान देकर भी विश्व सर्वहारा को सही दृष्टि नहीं दे पाए ट्रॉट्स्की, आखिर क्यों?

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(राया दुनायेव्सकाया ने ट्रॉट्स्की के निर्वासन के दौर में उनकी सेक्रेटरी के रूप में काम किया था। हालांकि बाद में उनसे मतभेदों के चलते वह उनसे अलग भी हो गईं। वाम आंदोलन को, सोवियत संघ में साम्यवाद के साथ हुए प्रयोग को और एक विचारधारा के रूप में मार्क्सवाद लेनिनवाद को देखने की राया की अपनी एक स्वतंत्र दृष्टि रही है। अक्टूबर क्रांति के सौ साल पूरे होने के बाद के इस दौर में विश्व वामपंथी आंदोलन जिन हालात में है और जिन चुनौतियों के मुकाबिल है, उसके मद्देनजर राया दुनायेव्सकाया की यह स्वतंत्र दृष्टि खासी अहम हो जाती है। इसे देखने, समझने, परखने और इससे ठोस सबक लेकर आगे बढ़ने की जरूरत है। प्रस्तुत लेख में ट्रॉट्स्की और स्टालिन के बीच चले संघर्ष को राया के नजरिए से देखने का प्रयास किया गया है। यह लेख लगभग पूरी तरह से राया की पुस्तक फिलॉसफी एंड रिवॉल्यूशनके चैप्टर 4 (लियॉन ट्रॉट्स्की ऐज थियोरेटीशन) में दिए गए तथ्यों और व्यक्त किए गए नजरियों पर आधारित है।)

प्रणव एन

अंतरराष्ट्रीय कम्यूनिस्ट आंदोलन में जो दो प्रमुख धाराएं आज भी एक-दूसरे से लोहा लेती दिखती हैं वे हैं स्टालिनवादी और ट्रॉट्स्कीवादी। कम्यूनिस्ट आंदोलन की सबसे सही धारा के बारे में कोई आम राय बनाना मुश्किल है।  सारी वैचारिक धाराएं खुद को यह विशेषण प्रदान करती रही हैं। और यह स्वाभाविक भी है। ज्यों ही कोई धारा यह मान लेगी कि कोई अन्य धारा उसके मुकाबले ज्यादा सही और प्रामाणिक है, उसकी अपनी सार्थकता पर सवाल खड़ा हो जाएगा। लिहाजा सबसे सही धारा के बारे में कोई फैसला मुश्किल है, लेकिन इस बात पर मतभेद की गुंजाइश कम है कि स्टालिनवादी धारा विश्व कम्यूनिस्ट आंदोलन की सबसे प्रमुख धारा रही है। लेनिन के बाद स्टालिन के नेतृत्व, उनकी नीतियों और फैसलों पर लगातार सवाल उठाने वाले ट्रॉट्स्की तथा उनके विचारों का झंडा लेकर चलने वाले ट्रॉट्स्कीवादी भी इस तथ्य से इनकार नहीं करते।

सोवियत संघ में स्टालिन और ट्रॉट्स्की के बीच चले संघर्ष की परिणति ट्रॉट्स्की के निर्वासन और फिर उनकी हत्या में हुई। पार्टी और राज्य दोनों पर स्टालिन का कब्जा बना रहा। लिहाजा उस संघर्ष में विजेता के रूप में उभरे स्टालिन सोवियत संघ में कम्यूनिज्म के नाम पर चले लंबे प्रयोग की आजीवन अगुआई करते रहे। स्वाभाविक था कि विश्व के इतिहास में स्थापित पहले ‘मजदूरों के राज्य’ को न केवल कायम रखने बल्कि इसे मजबूत बनाते चले जाने का श्रेय स्टालिन को मिला। लिहाजा विश्व कम्यूनिस्ट आंदोलन के सबसे बड़े नेता के रूप में उनका जो कद स्थापित हुआ उसे चुनौती देने की जरूरत विश्व कम्यूनिस्ट आंदोलन के अंदर कम ही लोगों ने महसूस की। स्टालिन पर ज्यादातर हमले पूंजीवादी खेमों से हुए। इन हमलों ने कम्यूनिस्ट नेता के तौर पर उनकी विश्वसनीयता को बढ़ाने का काम किया। जो छिटपुट आवाजें अंदर से उठीं, उन्हें भी पूंजीवादी शक्तियों द्वारा प्रेरित मान लिया गया।

मगर इसका पूरा दोष स्टालिन और उनके समर्थकों को ही नहीं दिया जा सकता। इस स्थिति की जिम्मेदारी काफी हद तक ट्रॉट्स्की जैसे उन आलोचकों की भी बनती है जिन्होंने स्टालिन की आलोचना करते हुए इसकी धार इतनी कमजोर रखी कि समर्थकों के लिए यह समझना मुश्किल बना रहा कि स्टालिन जैसे बड़े आदमी की इतनी छोटी आलोचनाएं सचमुच मायने रखती हैं या ये निजी खुन्नस के चलते की जा रही है। कहना चाहिए कि कम्यूनिस्ट आंदोलन में इस तरह की व्यक्ति केंद्रित सोच न केवल मार्क्सवादी विश्लेषण पद्धति के प्रतिकूल थी बल्कि इस बात का सबूत भी थी कि आंदोलन मार्क्सवाद की पटरी संभवतः काफी पहले छोड़ चुका था। मगर इस बिंदु पर फिलहाल जोर न देते हुए पहले यही देखना ठीक रहेगा कि आखिर वे कौन सी आलोचनाएं थीं जिन्हें स्टालिन जैसे बड़े आदमी की छोटी आलोचना माना जा सकता था।

गौर करने की बात है कि लेनिन के जीवन काल को छोड़ दें तो कम से कम उनकी मृत्यु के बाद ट्रॉट्स्की उन कुछेक प्रमुख नेताओं में रहे जो इस बात को समझ रहे थे कि स्टालिन पार्टी को सही राह पर नहीं ले जा रहे। ऐसी स्थिति में अपनी भूमिका की अहमियत को भी वे अच्छे से समझ रहे थे। संभवतः इसीलिए ट्रॉट्स्की का कहना था कि 1917 में उनकी भूमिका चाहे जितनी भी महान रही हो, वास्तव में उनका कद लेनिन की मौत के बाद की उनकी उपलब्धियों पर निर्भर करता है। (1) इसी संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि ट्रॉट्स्की पर स्टालिन की जीत का कोई मतलब नहीं है अगर ट्रॉट्स्की के विचार और उनके विश्लेषण सही साबित हुए, अगर विश्व सर्वहारा के पथ प्रदर्शन की ऐतिहासिक जरूरत इनसे पूरी होती है।

मगर दिक्कत यह है कि स्टालिन की अगुआई में लिए गए फैसलों की आलोचना करते हुए और उनकी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय नीतियों का विरोध करते हुए भी ट्रॉटस्की उन गलत फैसलों व नीतियों पर अमल करने वाले देश सोवियत संघ का आखिर तक बचाव करते रहे। यहां तक कि स्टालिन और हिटलर के बीच संधि हो जाने के बाद भी ट्रॉट्स्की ने दुनिया के मजदूरों से यही अपील की कि वे सोवियत संघ का बचाव करें क्योंकि लाख गिरावट के बावजूद वह एक ‘मजदूर राज्य’ है।

पूछा जा सकता है कि जब लाख गिरावट के बावजूद सोवियत संघ एक मजदूर राज्य था तो उस मजदूर राज्य को स्थापित करने, बनाए रखने, द्वितीय विश्वयुद्ध में उसे विजय दिलाने वाले नेता को कोई खारिज कैसे कर सकता है? ट्रॉटस्की की इसी दलील को आगे बढ़ाया जाए तो यह इस तार्किक निष्कर्ष पर पहुंचा देती है कि स्टालिन में कमियां जो भी रही हों वे विश्व सर्वहारा के नेता थे और इसीलिए उनका बचाव करना चाहिए। सो, अगर विश्व कम्यूनिस्ट आंदोलन करीब-करीब संपूर्णता में अपने इस नेता के पीछे आंखें मूंदे खड़ा रहा, ‘बाल की खाल निकालने वालों’ से दूरी बनाए रखते हुए स्टालिन के हर सही-गलत का ‘बचाव’ करता रहा तो इसमें भला आश्चर्य कैसा! कम से कम ट्रॉट्स्कीवादियों को तो इसमें किसी तरह की आपत्ति नहीं होनी चाहिए जो आज भी ट्रॉटस्की की उसी पुरानी दलील के आधार पर रूस, चीन, क्यूबा, उत्तर कोरिया जैसे तमाम देशों के पीछे खड़े हैं, यह कहते हुए कि हम इन राज्यों की नीतियों का समर्थन नहीं करते, मगर फिर भी अन्य देशों से युद्ध की स्थिति में हम इन्हें समर्थन देंगे क्योंकि गिरावट आने के बावजूद आखिर ये ‘मजदूर राज्य’ हैं।

स्टालिन और ट्रॉट्स्की के बीच विवाद पर गौर करें तो साफ होता है कि बहस विश्व अर्थव्यवस्था की अवस्था को लेकर नहीं थी, न ही संयुक्त विकास के नियम (लॉ ऑफ कंबाइन्ड डिवेलपमेंट) को लेकरकोई मसला था जिसकी बदौलत रूस जैसे एक पिछड़े देश में भी श्रमिकों का ध्रुवीकरण संभव हुआ। न सर्वहारा की हिरावल भूमिका पर कोई मतभेद था और न तकनीकी रूप से अधिक विकसित देशों से राजकीय मदद की जरूरत को लेकर कोई सवाल था। विवाद का मूल विषय था जनता की भूमिका। इसलिए नहीं कि लेनिन ने सर्वहारा की हिरावल भूमिका को लेकर कोई संदेह व्यक्त किया था और निजी संपत्ति के प्रति किसानों के रुझान से डरे नहीं थे। इसलिए क्योंकि लेनिन ने वास्तविक क्रांति के डायलेक्टिक्स में किसान जनता की भूमिका को वर्जित करना स्वीकार नहीं किया। (2)

ट्रॉट्स्की पर किसान समुदाय को कमतर आंकने का आरोप लगाने के पीछे स्टालिन की मंशा चाहे जो भी रही हो, इस बात से इनकार करना मुश्किल है कि किसान समुदाय को लेकर ट्रॉट्स्की की अवधारणा अपने आप में विकसित होने वाला विषय नहीं रही। राया दुनायेव्सकाया के शब्दों में कहें तो ‘ट्रॉट्स्की हमें यकीन दिलाते हैं कि किसानों के बारे में उनका रुख मजदूरों की हिरावल भूमिका के बारे में उनके रुख से निकला है, मगर सच यह है कि शुरू से ही मजदूरों की भूमिका संबंधी उनकी अवधारणा भी उसी अमूर्तन का शिकार रही है जिसने उनकी किसान संबंधी अवधारणा को विकृत किया है।’(3)

ट्रॉट्स्की का शुरू से मानना रहा है कि मार्क्सवादी संगठन का ‘सर्वहारा पर प्रभाव’ रहे ताकि राज्य सत्ता पर कब्जा करने से पहले और उसके बाद उनका ‘नेतृत्व’ किया जाए। सर्वहारा को भी उन्होंने अपने आप में विकसित होने वाले एक विषय के रूप में नहीं बल्कि एक ताकत (फोर्स) के रूप में ही देखा। यह स्थिति चरम पर तब पहुंची जब प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हुआ। विश्वयुद्ध के विस्फोट ने इस तथ्य को स्थापित किया कि स्थापित मार्क्सवादी नेतृत्व जिसे सर्वहारा की अगुआई करनी थी, उसने सर्वहारा के साथ विश्वासघात किया। युद्ध से पहले तक वह दुनिया के सर्वहारा का नेतृत्व कर रहा था, लेकिन युद्ध शुरू होते ही वह उसे भूल गया और अपने-अपने देशों के सर्वहारा को पितृदेश की रक्षा करने को कहने लगा। दूसरे शब्दों में उसने अपने देशों के सर्वहारा को भी उसी बुर्जुआ नेतृत्व के पीछे कतार बांधने में लगा दिया जिसके शोषण की चक्की से मुक्ति दिलाने के अभियान में उसकी अगुआई करने का वह दावा कर रहा था। सच पूछें तो यह दर्शन का संकट था। क्रांति से दर्शन का नया रिश्ता ढूंढे जाने की जरूरत थी। .यही जरूरत लेनिन को वापस हीगल के पास ले गई (4)।

ट्रॉट्स्की ने ऐसी कोई जरूरत महसूस नहीं की। उनके लिए ये ऐसे जिंदा सवाल नहीं थे जो दुनिया की बदलती स्थितियों से प्रभावित होते हैं, जिन पर निरंतर सोच-विचार करते रहने की जरूरत बनी रहती है। राया दुनायेव्सकाया के ही शब्दों में कहें तो वे डायलेक्टिक से अनजान नहीं थे, उन्होंने इसे हलके में लिया।(5)

नतीजा यह कि ट्रॉट्स्की अपनी थ्योरीज का बार-बार हवाला जरूर देते रहे हैं, उनके सही होने की घोषणाएं भी करते रहे हैं, लेकिन वे लगातार विकसित होती नहीं दिखतीं। घटनाओं के साथ उनका सतत संबंध नहीं दिखता। खुद ट्रॉटस्की भी उनसे लगातार जुड़े हुए नहीं नजर आते। हां सब कुछ हो जाने पर वे यह ऐलान जरूर करते हैं कि उनकी फलां थ्योरी सही साबित हुई। उदाहरण के लिए अगर 1905 की उनकी थ्योरी को 1917 का पूर्वानुमान माना जाए क्योंकि 1905 की क्रांति 1917 की क्रांति का ‘ड्रेस रिहर्सल’ थी तो निरंतर क्रांति के सिद्धांत ( थ्योरी ऑफ परमानेंट रिवॉल्यूशन) में 1905 की क्रांति के दौरान और 1905 से 1917 की अवधि में रक्त मज्जा नजर आनी चाहिए थी। इस दौरान हम इस सिद्धांत के आत्मविकास का गवाह बनते। यह सिद्धांत उस युद्ध विरोधी संघर्ष के लिए जमीन तैयार करता जिसकी परिणति सीधे समाजवादी क्रांति में हुई। मगर हम देखते क्या हैं? यह कि युद्धविरोधी संघर्ष को धार देना तो दूर ट्रॉट्स्की लेनिन के नारे –साम्राज्यवादी युद्ध को गृहयुद्ध में बदलो- के खिलाफ मोर्चा बांधे हुए थे। ट्रॉट्स्की के मुताबिक यह नारा नेगेटिव था। उन्होंने खुद को पॉजिटिव नारे – शांति, बगैर किसी कब्जेदारी के (पीस विदाउट ऐनेक्सेशन)- तक सीमित रखा। साफ है कि सर्वहारा की हिरावल क्रांतिकारी भूमिका में भरोसे के अभाव में ट्रॉट्स्की यही महसूस करते रहे कि सर्वहारा से ‘शांति के लिए संघर्ष’ से ज्यादा की अपेक्षा नहीं की जा सकती। यह अलग बात है कि जब 1917 का ऐतिहासिक विस्फोट हो गया, तब उन्होंने दावा किया कि इसने उनके निरंतर क्रांति के सिद्धांत (थ्योरी ऑफ परमानेंट रिवॉल्यूशन) की पुष्टि कर दी। (6)

जहां तक किसानों को कमतर आंकने संबंधी स्टालिन के आरोपों का सवाल है तो गौर करने की बात है कि स्टालिन के आरोप लगाने से काफी पहले से खुद ट्रॉट्स्की के शब्द इसकी घोषणा करते रहे हैं। अपने निरंतर क्रांति के सिद्धांत में खुद ट्रॉट्स्की कह चुके थे, ‘मेहनतकश आबादी के कई तत्व, खासकर ग्रामीण आबादी में से, क्रांति में खींच लिए जाएंगे। वे पहली बार राजनीतिक संगठन भी हासिल करेंगे, लेकिन तभी जब शहरी सर्वहारा सत्ता पर कब्जा कर चुका होगा।’ (7) 1905 की अपनी इस प्रस्थापना के 12 वर्षों के बाद जब 1917 की क्रांति संपन्न हो चुकी थी, न केवल शहरों में बल्कि गांवों में भी, खुद ट्रॉट्स्की के शब्दों में किसानों ने अपने ‘विद्रोहों के जरिए बोल्शेविकों को ठेल कर सत्ता तक पहुंचा दिया था’तब भी उनका यही कहना था कि किसानों ने ‘अपने इतिहास में आखिरी बार यह क्रांतिकारी भूमिका निभाई’ है। (8)

यही नहीं, 1925-27 के दौरान जब चीन हर जगह चर्चा में था और यह तथ्य जगजाहिर था कि चीन का इतिहास किसान विद्रोहों का लंबा सिलसिला रहा है, तब भी ट्रॉटस्की 1905 की अपनी प्रस्थापना में किसी भी तरह के संशोधन की जरूरत महसूस किए बगैर किसानों को समाजवादी चेतना तो दूर, राष्ट्रीय चेतना तक नहीं बख्शते, ‘ग्राम्य पिछड़ापन हमेशा सड़कों के अभाव… और राष्ट्रीय चेतना के अभाव से हाथ में हाथ मिलाए चलता है।’ (9)

इससे भी आगे बढ़ें तो स्टालिन-ट्रॉट्स्की विवाद के दस साल बाद जब ट्रॉट्स्की चीनी क्रांति पर लिखी एक पुस्तक (हैरोल्ड इसाक लिखित द ट्रैजेडी ऑफ दि चाइनीज रिवॉल्यूशन) की भूमिका लिख रहे थे तो वहां भी उन्होंने अपनी उसी पुरानी प्रस्थापना की जीत के दावे करते हुए यही लिखा कि ‘निरंतर क्रांति की अवधारणा की एक बार फिर पुष्टि हुई, इस बार विजय के रूप में नहीं बल्कि तबाही के रूप में।’ (10)

साफ है कि चाहे जो ऐतिहासिक दौर हो, चाहे जो मुद्दा हो चाहे जैसी भी स्थितियां हों ट्रॉट्स्की अपनी इसी पोजिशन पर टिके रहे कि ‘किसानों की भूमिका चाहे जितनी भी क्रांतिकारी हो जाए यह कभी स्वतंत्र भूमिका नहीं हो सकती, अग्रणी तो और भी नहीं।’ (11)

यहां मामला कमिटमेंट का या अपने विचारों पर अडिग रहने का नहीं, इस बात का है कि जनता के विभिन्न हिस्सों को देखने का नजरिया कैसा है। इस सवाल का है कि जनता के अलग-अलग समूह – किसान, मजदूर आदि आपकी नजरों में क्या हैं? वे सचमुच इतिहास निर्माता हैं या महज एक फोर्स हैं जिनका नेतृत्व किया जाना है? ट्रॉट्स्की की नजरों की यही सीमा जनसमूहों से उनके रिश्तों में ठहराव के रूप में नजर आती है। किसान हों या मजदूर या अन्य कोई वर्ग। वर्ग के रूप में उनकी अपनी विशेषता होती है, उनका अपना एक चरित्र होता है। उनका व्यवहार भी इस चरित्र से काफी हद तक निर्धारित होता है। मगर इन सबके बावजूद हर वर्ग जीते-जागते, जिंदा लोगों का समूह होता है। अपने हितों से उपजी सीमाओं के बावजूद वे अपने दौर से, उस दौर के माहौल से बिल्कुल कटे हुए, उससे बिल्कुल अप्रभावित नहीं रहते हैं। जाहिर है, इन्हें निरंतर आगे बढ़ती, बदलती चीज के रूप में न देखते हुए, एक ऐसी निर्जीव, बेजान सी ठोस चीज माने रहना जिसमें किसी तरह के बदलाव की कोई गुंजाइश न हो, सही दृष्टि कदापि नहीं कही जा सकती।

ट्रॉट्स्की की यही संकुचित दृष्टि रूसी अर्थव्यवस्था के चरित्र को सटीकता से समझने में भी बाधा बन जाती है। वे विश्व पूंजीवाद की एक नई अवस्था के मुकाबिल थे, और महज स्टालिन नहीं बल्कि स्टालिनवाद (जो राजकीय और आर्थिक ताकत से लैस एक मोनोलिथिक पार्टी का रूसी नाम था) से जूझ रहे थे, तब भी उन्होंने सिद्धांत और व्यवहार के पुराने दोहरेपन को ही नए रूप में- विश्व क्रांति की अपनी अवधारणा बनाम एक देश में समाजवाद का स्टालिन का सिद्धांत- व्यक्त करके काम चलाया। (12)

रूस में प्रथम पंचवर्षीय योजना के आखिर यानी 1932 आते-आते यह बात शीशे की तरह साफ हो गई थी कि निजी पूंजीवाद की पूरी दुनिया खात्मे की ओर है। महामंदी ने निजी उद्यमों की बुनियाद को इस कदर हिला दिया था कि हर जगह पूंजीवाद का अस्तित्व ही खतरे में नजर आने लगा था। नतीजा यह हुआ कि खुद को सर्वहारा तानाशाही से बचाने के लिए पूंजीवाद अपना रूप बदलने की जुगत में लग गया। यह अब तक जिस रूप में जाना जाता था – अराजकतापूर्ण, प्रतियोगी और शोषणकारी, उसे छोड़ इसने राजकीय योजना की राह पकड़ ली। चाहे अमेरिका जैसे अमीर देश हों या नाजी जर्मनी हो या सैन्यवादी जापान हो – हर देश सामान्य एकाधिकारवादी अवस्था से किसी न किसी नई अवस्था की ओर बढ़ा। यह क्या था? कुछ  (जैसे ब्रूनो रिज्जी) ने इसे ब्यूरोक्रेटिक कलेक्टिविज्म (दफ्तरशाही सामूहिकतावाद) कहा तो दूसरों ने स्टेट कैपिटलिज्म (राजकीय पूंजीवाद)। ट्रॉट्स्की ने दोनों को खारिज कर दिया। रूस उनके लिए मजदूरों का राज्य बना रहा, गिरावट के बावजूद।

गौर करने की बात है कि लेनिन ने आरंभिक मजदूर राज्य की वास्तविकता को अमूर्तन में रूपांतरित किए जाने के खिलाफ तीखी लड़ाई लड़ी थी क्योंकि यह (अमूर्तन) नौकरशाही विकृतियों को छुपाता है। मगर ट्रॉट्स्की रूसी राज्य के अमूर्तन की कोशिश लगातार जारी रखते हैं तब भी जब स्टालिन ने इसे इसके एकदम विपरीत रूप – राजकीय पूंजीवादी समाज- में तब्दील कर दिया था। न तो वे यह तथ्य देख पाए कि मजदूर उत्पादन पर अपना पूरा नियंत्रण खो चुके थे, ट्रेड युनियनें तक राज्य मशीनरी का हिस्सा बना ली गई थीं और न इस तथ्य पर ध्यान दे पाए कि उत्पादन के साधन बढ़ रहे हैं तो बस खपत के साधनों की कीमत पर, ठीक वैसे ही जैसे निजी पूंजीवाद में होता है। बस यही एक बात उनके मन में अंधभक्ति की तरह बैठ गई थी कि राज्यीकृत संपत्ति मतलब मजदूरों का राज्य।  (13)

अंधभक्ति हमें काफी हद तक अंधा बना ही देती है। संपत्ति के राष्ट्रीयकरण के प्रति ट्रॉट्स्की की अंधभक्ति ने उन्हें उत्पादन संबंधों में जारी प्रतिक्रांति की प्रक्रिया को देखने समझने से वंचित कर दिया था। स्टालिनवादी संविधान ने अक्टूबर क्रांति के खिलाफ प्रतिक्रांति को वैधता प्रदान कर दी थी, लेकिन ट्रॉटस्की ने उसे महज एक ऐसी चीज के रूप में देखा जो ‘एक नए प्रभुत्वशाली वर्ग के जन्म के लिए राजनीतिक आधार वाक्य (premise) रचता है।’ मानो वर्ग आधार वाक्यों से उपजते हों। (14) चूंकि उनकी नजरों में स्टालिनवादी रूस अब भी एक मजदूर राज्य था, इसलिए उन्हें लगा कि मास्को ट्रायल ने स्टालिनवाद को कमजोर कर दिया है। वास्तव में इसने अपने शासन को और मजबूत कर लिया था और इसे ‘महान देशभक्तिपूर्ण युद्ध’ यानी द्वितीय विश्वयुद् में झोंकने की पूरी तैयारी कर ली थी।

विश्व अर्थव्यवस्था की नई अवस्था को पहचानने में नाकाम होने और रूस के अंदर वर्गीय रूपांतरण को देखने में असफल होने के कारण स्वाभाविक ही ट्रॉट्स्की स्टालिनवादियों की वैश्विक शक्ति की आकांक्षा को नहीं समझ पाए। ‘मैन ऑफ अक्टूबर’ रूसी नौकरशाही के विचारों और उसकी मेथडॉलजी के दलदल में इससे गहरे नहीं धंस सकते थे। उस नौकरशाही के जो न्यूनतम लागत और अधिकतम उत्पादन का सिद्धांत नहीं, प्रशासनिक फॉर्म्युला पेश कर रही थी। कहने की जरूरत नहीं कि न्यूनतम लागत और अधिकतम उत्पादन का यह फॉर्म्युला सभी शासक वर्गों का खुदा होता है।

साफ है कि स्टालिनवाद की प्रकृति का ट्रॉट्स्की का विश्लेषण वर्गीय चरित्र से रहित था। लिहाजा स्टालिन और स्टालिनवाद की निरंतर आलोचना करते हुए, सारा जोखिम मोल लेते हुए और अपनी जान देकर इसकी कीमत चुकाते हुए भी वह दुनिया के मजदूर आंदोलन का सही मार्गदर्शन नहीं कर सके। स्टालिनवाद को उन्होंने सुधारवाद के एक रूप में देखा जिससे लड़ने के लिए इतना ही काफी था कि स्टालिन के बजाय ट्रॉट्स्की के हाथों में नेतृत्व दे दिया जाए। हालांकि नतीजा आखिरकार इसका भी वही होता कि द्वितीय विश्वयुद्ध में स्टालिन के बजाय ट्रॉट्स्की ‘मजदूरों के राज्य’ सोवियत संघ को बचाने की आड़ में हिटलर से समझौता कर रहे होते, समझौता टूटने पर मित्र राष्ट्रों के साथ मिल कर युद्ध कर रहे होते और युद्ध के बाद विजेता साम्राज्यवादी मुल्कों के नेताओं के साथ बैठ कर दुनिया का बंटवारा कर रहे होते। दूसरी तरफ दुनिया के सर्वहारा साम्रज्यवादी विश्वयुद्ध को गृहयुद्ध में बदलने के लेनिन मार्का आह्वान के इंतजार में सूनी आंखों से भविष्य को निहारते बैठे रहते।

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