घर वापसी पर केंद्रित कविताएँ, संकलन- नीरज कुमार मिश्र

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कोरोना पूरे विश्व में कहर बरपा रहा है।इस भयावह समय में सभी को ये सुझाव मिला है कि जो जहाँ है वहीं रहे।सामाजिक दूरी से ही इन जंग को जीता जा सकता है।लेकिन जिस तरह अपने घर जाने की अफरा तफरी मची हुई है,उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।उनमें से सबसे बड़ा सवाल है कि आख़िर सभी अपनी और दूसरों की जान की परवाह किये बिना क्यों एक साथ घर जाने को बेताब हैं ? घर वापसी के इन सवालों से टकराती कई कविताएँ आपके सामने रखने की कोशिश कर रहा हूँ।समय हो तो जरूर पढ़ें।

(१). घर की याद – अज्ञेय

“क्या हुआ अगर किसी को घर की याद आती है
और वह उसे देश कह कर देशप्रेमी हो जाता है?
या कि उसे लोगों के चेहरों के साथ बाँध कर
निजी चेहरे हों तो (गीति-काव्यकार?)
या कि (जिस-तिस के हों तो)-चलो-मानववादी?
याद मुझे भी आती है : इस से क्या कि जिस को आती है
वह दूसरों की भाषा में घर नहीं है?
दृश्य : परिस्थितियाँ, ऋतुओं के स्वर, सौरभ, रंग;
गतियों के आकार-जैसे हिरन की कूद
या सारस की कुलाँच
या छायाओं के जाल-डोरों में से
किरण-पंछियों की सरकन?
क्या हुआ
अगर मेरी यादों की भूमि
वह (कल्पित) भूमि नहीं है जिसे भाव-भूमि कहते हैं, वरन्
वह है जिस पर भावना और कल्पना दोनों टिकते हैं :
गोचर अनुभवों की भूमि?
अगर मेरा घर
वैसा नहीं है जिसे सिर्फ़ सोचा जा सकता है, वरन्
वैसा है जिसे देखा, छुआ, सूँघा, या चखा जा सके?
चाहे सिर्फ़ मेरी आँखों से, मेरे स्पर्श, मेरी नासा,
मेरी जीभ से? क्या हुआ?
मुझे भी याद आती है
घर की, देश की, एकान्त अपने की
अपनी हर यात्रा में :
उस से अगर यात्रा रुकती नहीं
या यह यायावर क्षेत्र-संन्यास नहीं लेता
तो क्या हुआ?…”

(२). घर वापसी – त्रिलोचन

“साबरमती रुकी है । इंजन बिगड़ गया है ।
ठीक-ठाक करने में कितने हाथ लगे हैं
फ़ैज़ाबाद ने ख़बर पा कर, सुना, कहा है
इंजन सुलभ नहीं है । यात्री थके-थके हैं ।
घंटा गुज़र गया, तब गाड़ी आगे सरकी
आने लगे बाग़, हरियाले खेत, निराले;
अपनी भूमि दिखाई दी पहचानी, घर की
याद उभर आई मन में; तन रहा सम्भाले ।
क्या-क्या देखूँ, सबसे अपना कब का नाता
लगा हुआ है । रोम पुलकते हैं; प्राणों से
एकप्राण हो गया हूँ, ऎसा क्षण आता
है तो छूता है तन-मन कोमल बाणों से ।
अपने आस-पास हूँ, खोया हूँ, अपने में,
जैसे बहुत बिछोही मिल जाए सपने में ।”

(३). घर में वापसी -धूमिल

“मेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैं
माँ की आँखें
पड़ाव से पहले ही
तीर्थ-यात्रा की बस के
दो पंचर पहिये हैं।
पिता की आँखें…
लोहसाँय-सी ठंडी शलाखें हैं।
बेटी की आँखें… मंदिर में दीवट पर
जलते घी के
दो दिये हैं।
पत्नी की आँखें, आँखें नहीं
हाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैं।
वैसे हम स्वजन हैं,
करीब हैं
बीच की दीवार के दोनों ओर
क्योंकि हम पेशेवर गरीब हैं।
रिश्ते हैं,
लेकिन खुलते नहीं हैं।
और हम अपने खून में इतना भी लोहा
नहीं पाते
कि हम उससे एक ताली बनाते
और भाषा के भुन्नासी ताले को खोलते
रिश्तों को सोचते हुए
आपस मे प्यार से बोलते
कहते कि ये पिता हैं
यह प्यारी माँ है,
यह मेरी बेटी है
पत्नी को थोड़ा अलग
करते…तू मेरी
हमबिस्तर नहीं…मेरी
हमसफ़र है
हम थोड़ा जोखिम उठाते
दीवार पर हाथ रखते और कहते…
यह मेरा घर है।”

(४). वापसी -तादेयुश रोज़ेविच-अनुवाद अशोक वाजपेयी

“अचानक खिड़की खुल जाएगी
और माँ पुकारेगी
अन्दर आने का वक़्त हो गया ।
दीवार फटेगी
मैं कीचड़ सने जूतों में
स्वर्ग-प्रवेश करूँगा
मैं मेज़ पर आऊँगा
और सवालों के ऊलजुलूल जवाब दूँगा ।
मैं ठीक-ठाक हूँ मुझे अकेला
छोड़ दो । सर हाथ पर धरे बैठा हूँ —
बैठा हूँ । मैं उन्हें कैसे बता सकता हूँ
उस लम्बे उलझे रास्ते के बारे में ?
यहाँ स्वर्ग में माँएँ
हरे स्कार्फ बुनती हैं
मक्खियाँ भिनभिनाती हैं
पिता ऊँघते हैं सिगड़ी के बगल में
छह दिनों की मेहनत के बाद ।
न, निश्चय ही मैं नहीं कह सकता उनसे
कि लोग एक
दूसरे का गला काटने पर उतारू हैं ।”

(५). घर वापसी-विस्साव शिम्बोर्स्का-अनुवाद- असद ज़ैदी

“वह लौटा। कुछ बोला नहीं।
पर यह ज़ाहिर था कि किसी वजह से दुखी है।
वह बिना कपड़े बदले बिस्तर पर लेट गया।
कम्बल अपने सर पर खींच लिया।
घुटने मोड़े और गुड़ी-मुड़ी होकर पड़ गया।
चालीस साल उसकी उम्र है, लेकिन इस वक़्त नहीं।
इस वक़्त उसका अस्तित्व है — जैसे अपनी माँ के गर्भ में
सात त्वचाओं के पीछे, एक सुरक्षित अन्धेरे में।
कल उसे अन्तर-आकाशगांगेय अन्तरिक्ष-यात्रा में
समस्थिति-नियमनविषय पर भाषण देना है।
पर फ़िलहाल गुड़ी-मुड़ी पड़ा सो रहा है।”

(६). घर पहुँचना-कुंवर नारायण

“हम सब एक सीधी ट्रेन पकड़ कर
अपने अपने घर पहुँचना चाहते
हम सब ट्रेनें बदलने की
झंझटों से बचना चाहते
हम सब चाहते एक चरम यात्रा
और एक परम धाम
हम सोच लेते कि यात्राएँ दुखद हैं
और घर उनसे मुक्ति
सचाई यूँ भी हो सकती है
कि यात्रा एक अवसर हो
और घर एक संभावना
ट्रेनें बदलना
विचार बदलने की तरह हो
और हम सब जब जहाँ जिनके बीच हों
वही हो
घर पहुँचना।”

(७). वापसी -अशोक वाजपेयी

“जब हम वापस आयेंगे
तो पहचाने न जायेंगे-
हो सकता है हम लौटें
पक्षी की तरह
और तुम्हारी बगिया के किसी नीम पर बसेरा करें
फिर जब तुम्हारे बरामदे के पंखे के ऊपर
घोंसला बनायें
तो तुम्हीं हमें बार-बार बरजो-
या फिर थोड़ी सी बारिश के बाद
तुम्हारे घर के सामने छा गयी हरियाली
की तरह वापस आयें हम
जिससे राहत और सुख मिलेगा तुम्हें
पर तुम जान नहीं पाओगे कि
उस हरियाली में हम छिटके हुए हैं।
हो सकता है हम आयें
पलाश के पेड़ पर नयी छाल की तरह
जिसे फूलों की रक्तिम चकाचौंध में
तुम लक्ष्य भी नहीं कर पाओगे।
हम रूप बदलकर आयेंगे
तुम बिना रूप बदले भी
बदल जाओगे-
हालाँकि घर, बगिया, पक्षी-चिड़िया,
हरियाली-फूल-पेड़, वहीं रहेंगे
हमारी पहचान हमेशा के लिए गड्डमड्ड कर जायेगा
वह अन्त
जिसके बाद हम वापस आयेंगे
और पहचाने न जायेंगे।”

(८). शहर में वापसी-अलेक्सान्दर कुशनेर-अनुवाद-वरयाम सिंह

“सितम्बर में हम लौंटेंगे शहर
कैलेण्डर में बचे रहेंगे एक तिहाई पन्‍ने,
सीलन-भरी हवा तोड़ देगी उसे
जो चमकता है टहनियों पर
पीले धब्‍बों और छायाओं में ।
हम लौटेंगे शहर, उसी दिन
जिनकी इच्‍छा होगी हमें फ़ोन करेंगे
आप आ गए हैं ? हम भी यही हैं
और जो हमें फ़ोन नहीं करेंगे
क्रोध, आलस या किसी दूसरे कारण से
उन्‍हें हम फ़ोन करेंगे ।
हम लौटेंगे शहर-वक़्त आ गया है
किसी की रचनाओं का अनुवाद करने का,
लौटेंगे शहर और पूरे दिन
तंग करती रहेगी बारिश
और जेब में बचे नहीं होंगे पैसे ।
भाग-दौड़ को कोसने की आदत पड़ गई है
पर मुझे अच्‍छा लगता हे सोचना —
जल्‍द, साँझ को बातें हो सकेगी मित्रों से,
मौक़ा मिलेगा बेमक़सद इश्तिहार पढ़ने का ।
घर के पिछवाड़े के आँगन ख़ूबसूरत हैं
जैसे बैंगनी रंग के गलीचे ।
ख़ूबसूरत होती है नदी
जब लितेयनी पुल से कुछ क्षण के लिए
चमक उठता है जमा हुआ चेहरा
मुखौटे की तरह नेत्रहीन ।
हम लौटेंगे शहर — इन्तज़ार कर रही हैं चिट्ठियाँ ।
लौटना होगा — जूते छोटे पड़ रहे हैं,
ख़रीदना होगा बेटे के लिए ओवरकोट,
और पत्नी के लिए जुराबें,
सब काम तो पूरे हो नहीं पाएँगे
पर चलो आधे ही सही ।
अख़बारों पर भी नज़र फेरनी होगी —
क्‍या हो रहा है पूरब में
और क्‍या — पश्चिम में,
सोचना होगा, ख़बरों पर ।
लौटेंगे शहर — इन्तज़ार कर रही होगी
कहानी किसी के साहस की
कचोटती रहेगी जो हमारे अंत:करण को ।
पर, कहाँ है वह गरमियों का जंगल ?
कहाँ है वह घाटी
और कहाँ वे महकते झाड़ ?
ग़ायब हो गए हैं क्‍या ?
सान्त्वना नहीं मिल सकती इन शब्‍दों से —
अब वो ज़माना नहीं ।
सामान्‍य-सा यह दिन विदाई के दिन की तरह
धड़क रहा है भारी तनाव से ।
ठीक तभी
विपदाओं की तरह दरवाज़ा धकेलती
घुस आएँगी भीतर कविताएँ…
उन्‍हें डर नहीं लगता
शान्ति ? बिल्‍कुल नहीं,
उन्‍हें चाहिए शहर ।”

(९). घर पहुँचने की बेकरार- पीटर पाउलसेन -अनुवाद-अनिल जनविजय

“घर पहुँचने के लिए उड़ान भरने को तैयार पेड़ों को
तूफ़ान
सब्र करने के लिए मजबूर करता है।
देखो, कितना तड़प रहे हैं वे
अपनी डालें-डगालें हिला रहे हैं
अपने घर
अपने ब्रह्माण्ड में
पहुँचने के लिए बेचैन हैं वे !”

(१०). घर वापसी-एल्विन पैंग- अनुवाद -सौरभ राय

“उस दिन लहरों की दिशा बदल जाएगी
अपने सर को धीरे से रखेगी वह
किनारों के नरम गालों पर।
जम्बू के घने दरख़्तों से
झरने लगेंगे गीले हरे पत्ते, ज़मीन को वापस कर दिए जाएँगे
उसके हिस्से के आँसू।
हर बादल अपनी जगह तलाश लेगा
सूरज को एहसास होगा
उनकी हिम्मत का।
कितनी देर से मैं सुनता रहा हूँ
अपने एकान्त में खड़े पहाड़ों की पुकार को,
नदियों को, समन्दर की तलाश में भटकते हुए
मैंने देखा है, तुझ में क़ैद सदियों को
जैसे चिड़ियों की जमात, एक साथ फड़फड़ाती है अपने पँख
तुम्हारे दिल के अन्दर कहीं।
बस उसी क्षण, मैं तुम्हारी देह की उदासी को
अपनी देह से आज़ाद करना चाहता हूँ,
और पिंजरे के ताले से आवाज़ आएगी
खुलने की।”

(११). घर-बाहर -विष्णु नागर

“मेरा घर
मेरे घर के बाहर भी है
मेरा बाहर
मेरे घर के अंदर भी
घर को घर में
बाहर को बाहर ढूँढते हुए
मैंने पाया
मैं दोनों जगह नहीं हूँ।”

(१२). घर से दूर -मिथिलेश श्रीवास्तव

“पीछे वह छोड़ आया था एक लम्बी सड़क
आगे थी एक और लम्बी सड़क
कोई घर नहीं था जिधर से वह आ रहा था
जिधर वह जा रहा था उधर भी कोई घर नहीं था
सड़क पक्की थी लेकिन उस पर धूल की कई परतें थीं
कई सड़कों से गुज़रने के निशान जैसे
जिनको पहचानना मुमकिन नहीं था !
धूल जो पैरों पर थी वह पहचान नहीं थी लेकिन उसे
घर पहुँचकर ही धोया जा सकता था
कुछ और लोग थे सड़क पर । सिर खुजलाते ।
बार-बार लौटते । पलटते । और उसी सड़क से गुजरते
और सड़क से मुक्ति के उपाय पूछते
कोई पूछता था कुछ देर बाद बदल जाने वाली तारीख़
कोई पूछता था किसी घर, किसी पेड़, किसी छाया के बारे में
कोई पूछता ता इतनी दूर कैसे आ गए किसके सहारे ।
कुछ लोग कुछ नहीं पूछ रहे थे । चलते चले जा रहे थे ।
कभी हाथ भाँजते, कभी पैर पटकते, कभी सिर खुजलाते ।
जैसे उन्हें मालूम था कि रास्ते में जो मिल रहा था
वहाँ खम्भा था बिजली या टेलीफ़ोन या स्ट्रीट लाइट का ।”

(१३).मैं लौट आऊँगा -राकेशरेणु

“मैं लौट आऊँगा
अपने जर्जर हो चुके पुराने घर में
लौट आऊँगा एक दिन
जैसे लौटते हैं साइबेरियाई पक्षी
हजारों मील दूर से
मौसम अनुकूल होने के साथ
जैसे सुबह-सुबह स्कूल गया बच्चा
लौटता है माँ की गोद में मैं लौटूँगा उसी तरह ।
लौटूँगा
गाय के थन में दूध की तरह पेड़ पर बौर की तरह
तुम्हारे सबसे पसंदीदा मौसम की तरह लौटूँगा ।
मैं लौट आऊँगा
जैसे लौटती है सुबह
रात के बाद
लौट आता है लोकतंत्र
लंबी तानाशाही के बाद
जैसे लौट आता है जीवन लोकतंत्र की लड़ाई में मारे जाने के बाद
दादी की आँखों में रोशनी की तरह लौटूँगा
दादाजी के विश्वास की तरह
अपने जर्जर होते पुराने घर में लौट आऊँगा एक दिन।
दादाजी की गोद है यह
दादी की थपकियाँ और नसीहतें
नानी-मामी के किस्से और लोरियाँ
रक्त-मज्जा में बसा यह घर
मेरी रगों में बहता है
यहाँ लौट कर हर बार
पुनर्नवा होता हूँ मैं ।”

(१४). घर-वापसी -योगेंद्र कृष्णा

“महानगर की ऊंची इमारतों के बीच
भीड़ में खोया आदमी
चौड़ी चिकनी सड़कों पर
रफ्तार में सिमटते फासले…
दूरभाष और ई-मेल पर
संवेदित संप्रेषित
व्यापार नीतियां
और नई सदी के
प्रेम संलाप…
कमरे की मेज पर
ठिठक गई
पूरी की पूरी एक दुनिया…
विज्ञापनों और बाजार
की लकदक में
रात और दिन के बीच
पटती दूरियां
और
मुखर होठों के
निरंतर सुर्ख होते सारांश
और भी बहुत कुछ के बीच
क्यों तुम्हें
याद आते हैं
अपने गांव के घर
कमरों की दीवारों से
झरती सुरखियां
गलियों की वीरानी
खेतों की मेड़
मां की सफेद साड़ी
दीवारों की फ्रेम में जड़ी
पिता की बेचारगी
दलान में बैठी
मां की प्रतीक्षारत झुर्रियां
बहन की राखी
अद्भुत मंजरों से अटे
इस महानगर में
कई-कई दुनियाओं का रोमांच भी
क्यों तुम्हें
लौटने से नहीं रोक पाता
अंतत:
अपने ही घरों को
आज भी
शब्दों से गढ़ी तमाम भाषाओं
और संचार-तंत्र के
फैलते जालों के बीच
मौन से ही
क्यों संप्रेषित होते हैं
तुम्हारे जीवन के
जरूरी और
नितांत मौलिक संवाद
खुश्बुओं और रंगीनियों में
लगातार फुदकने-चहकने के बाद भी
क्यों अंतत:
इस पृथ्वी पर
बनी रहती है
देह की तुम्हारी आदिम गंध
महानागर आकांक्षाओं
और बाजार के
गोपनीय संघात से लरजती
चकाचौंध दुनिया में भी
क्यों अंतत:
कहीं बचा रहता है
एक अदद साबुत सुरक्षित कोना
आदमी और आदमी के बीच
पूरी एक दुनिया
घटित होने के लिए।”

(१५). घर में कई कमरे – हरजेन्द्र चौधरी

“घर में कई कमरे
कई कमरों में कई-कई अलमारियाँ
कई-कई अलमारियों में कई-कई ख़ाने
कई-कई ख़ानों में कई-कई चीज़ें (बेतरतीब)
कई-कई चीज़ों बीच कई-कई डायरियाँ (नई-पुरानी)
कई-कई डायरियों बीच कई-कई लिफ़ाफ़े (रंग-बिरंगे)
कई-कई लिफ़ाफ़ों में कई-कई छोटी डायरियाँ
कई छोटी-छोटी डायरियों में कई-कई पन्ने
किसी पन्ने के आख़िर-सी में
कोड-भाषा में लिखी एकाध डरी हुई पंक्ति
कितने गहरे गाड़कर रखते हैं लोग छुपाकर
अपनी असली ज़िन्दगी, असली बात
असली कहानी, असली कविता
ख़ुद खोजना चाहें तो भी न मिले…”

(१६). नया शहर- राकेश मिश्र

“नये शहर में दोस्त तुम्हारा कौन बनेगा इतनी जल्दी,
घर ना छोड़ो गाँव ना छोड़ो दिल मत तोड़ो इतनी जल्दी।
गाँव के रस्ते धूल भरे हैं पर तेरे पैरों पड़ते हैं,
राह ना छोड़ो यूँ मत दौड़ो मुँह मोड़ो इतनी जल्दी।
गाँव में पीपल महुआ बरगद अमवा नीम कहानी कहते,
नये शहर में तेरी कहानी कौन कहेगा इतनी जल्दी। गाँव में भौजी चाची ताई सब तेरी बलिहारी लेते,
नये शहर में तेरा पड़ोसी कौन बनेगा इतनी जल्दी।”

(१७). घर – स्नेहमयी चौधरी

“घर किस चिड़िया का
नाम है?
चार तिनके
एक जोड़ का
या बाहर की सर्दी
से बचे गर्म
मोड़ का
चांद का दाग़
या चमक
तनाव या
तनाव में पड़ी
ढील का
बाहर वालों के लिए
खुली खिड़की
या
घुप्प अंधेरे की सांस
या झिर्रियों से झरती
हवा का
बासी सांस
दबी उबासी
उधार जीने का!”

(१८). घर-बाहर – गीताश्री
घर
“हम घर लेकर चलते रहे अपने कन्धों पर
पेड़ की तरह हम इसे कहीं रोप नहीं सके,
झण्डों की तरह कहीं गाड़ ना सके,
बहंगी में लचकते रहे आँगन के सपने, नीम के पेड़ और मुण्डेर पर चहचहाती फुदगुदिया,
जिसे जाल में फँसा, रंगीन करके उड़ाया करते थे
रोज़ उन्हें मुण्डेर पर गिना करते थे,
कूद-कूद कर ताली पीटा करते थे,
सबको खारिज करता है समय,
घर के सपनो को बार-बार परखता रहा
हम ढोते रहे ख़्वाहिशे भी आधी-अधूरी,
घर ना कन्धों से उतरा
ना सपने हल्के हुए, हम बोझ से दोहरे हुए
हमने तंज कसे ज़माने पर
धुनते रहे अपने सिर कि ना बनना था ना बना हमारा घर
इस शहर में
हम आए थे, जब अपने साथ घर के सपने नहीं लाए थे
वहीं रख आए थे उन्हें, वापसी का वादा करके,
पता नही कब कैसे कन्धे पर चढ़ आया घर,
भाभी ने जो रास्ते की खुराक बाँधी थी पोटली में
जिसे हम खा ना सके आज तक
कि जिसे खाया जा सकता था पीढ़े पर बैठकर अपने आँगन में…
क्या पता कि घर ना बनना था कभी घर में।”

(१९). वापसी पर एक गाँव- यतीश कुमार

“उसका चेहरा दमका
तो दरकी हुई ज़मीन दिखी
फौलादी सपने भी टूटे
और तब लोहा भी पिघला
भूख और आग के बीच
बोसे की नमी नदारद थी
दावानल के केंद्र में
भाषा दिशाहीन
इस उदास वसंत में
समाज का चेहरा
पाला लगे मटर-सा है
चबाई और निगली जा चुकी चीज़ों में
शब्द भी शामिल हैं…
नामोनिशान दाँत से निकल कर
आँत में जा छुपा है
दाँत बड़े और आँतें छोटी
इस रिवायत के बहुसंख्यक
ज़मीन को निगल जाने की बात
ज़्यादा कर रहे हैं
सड़क तक पसरे बाज़ार पर
छाया सन्नाटा
निरापद बढ़ रहा है
वात्सल्य का कवच खंडित
और अर्थ के तीर हैं कुंद
लहलहाना था जहाँ अनाज को
वहाँ शब्द लहलहा रहे हैं
उन शब्दों के बीच
चित्त गिरा आदमी
आकाश ताकता है
और इतना चाहता है
कोई कैसे भी
बस बाहों में छान ले।”

(२०). घर वापसी -रश्मि भारद्वाज

“घर वापसी के रास्ते में
आता है एक मरघट
हिण्डन के मटमैले कीचड़ के साए में
भागती-चीख़ती सड़क के किनारे
किसी औघड़ साधु-सा पड़ा
राख और कुत्तों से सना
अकेला
निर्लिप्त, निर्विकार होकर
उन शरीरों को जलाता
जो शायद चन्द लम्हे पहले ही धडक रहे थे
अपनी ज़िन्दा हसरतों के साथ
आयताकार खाँचे नियत हर शरीर के लिए
बस उतने ही बड़े जितने में समा जाए वह सहूलियत से
लकड़ियों के ढेर के बीच से कभी झाँक जाती हैं
हथेली भर लाल चूड़ियाँ
कभी कहीं से छिटक आती है
एक रामनामी चादर
या फिर झूलते हुए माँस वाला एक हाथ
कि जैसे पकड़ लेना चाहता हो
छोड़ कर जाती हुई हथेलियाँ
कि जैसे बटोर लेना चाहता हो
अशेष इच्छाएँ, अधूरी कामनाएँ जीवन की
जो लिपटी होती हैं शरीर से आख़िरी साँस तक
नहीं जाती दफ़्न करने या जलाने पर भी
तैरती रहती हैं हमारे आसपास कहीं
बन कर यादें, प्रार्थनाएँ, मनौतियाँ
अब जबकि मृत्यु उपलब्ध है हर कहीं
ख़रीदी जा सकती है
दवा की दुकानों से चन्द पैसों में सहजता से
या कि बस काटनी होती है सुकोमल पतली एक नीली नस
जीवन को सहेजती
या फिर तेज़ रफ़्तार से भागती सड़क पर
छोड़ देना होता है ख़ुद को
भूलकर सब कुछ
और यह सब कुछ बस चन्द क्षणों में ही
सच बहुत आसान है चुन लेना
यह दूसरा रास्ता जीवन पर भारी
और ऐसे तमाम क्षणों में
हर बार कौंध जाता है आँखों के आगे वह मरघट
जले हुए शरीरों की राख
और उन पर लोटते कुत्ते
मण्डराते चील और कौए
मृत्यु ! तुम बहुत असुन्दर हो
और हो बहुत अकेली
अनायास तेज़ हो उठते हैं
घर को लौटते मेरे क़दम
ज़िन्दगी जीत जाती है
फिर एक बार
जीत ही जाए हर बार शायद
हमारे लिए तय की गई
उस अन्तिम वापसी से पहले।”

(२१). घटना नहीं है घर लौटना -रोहित ठाकुर

“दुर्भाग्य ही हम जैसों को दूर ले जाता है घर से
बन्दूक से छूटी हुई गोली नहीं होता आदमी
जो वापस नहीं लौट सकता अपने घर
मीलों दूर चल सकता है आदमी
बशर्ते कि उसका घर हो
विश्व विजेता भी कभी लौटा था अपने घर ही
हम असंख्य हताश लोग घर लौट रहे हैं
हमारे चलने की आवाज
समय के विफल हो जाने की आवाज है।”

संकलन- नीरज कुमार मिश्र

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