ग़ज़ल

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रंगीन उसके हुस्न से बज़्मे जहाँ है अब
ये मेहरो माहो, नज्मो फ़लक, कहकशाँ है अब

पहले की तरह जज़्बए उल्फ़त कहाँ से अब
चारों तरफ़ निफ़ाक़ का फैला धुवाँ है अब

मैंने तो हर क़दम पे सबूते वफ़ा दिया
शक की नज़र से देखता क्यों बाग़बाँ है अब

जिसके लिए लुटा दी मताए हयात भी
लेता क़दम क़दम पे वही इम्तहाँ है अब

अपना रफ़ीक़ आपने जब से बना लिया
मेरे लिए तमाम ज़मीं आस्माँ है अब

रंजो ग़मो अलम का असर दिल पे कुछ नहीं
रौशन तुम्हारी याद से दिल का मकाँ है अब

इसमें किसी की याद का होता नहीं असर
ये हमनशीं तुम्हारा फ़क़त तर्जुमाँ है अब

फूलों में रंगो बू है न कलियों में ताज़गी
तुम बिन तमाम बाग़ पे नज़रे ख़िज़ाँ है अब

करते नहीं ज़ुबाँ से वो इज़हार इश्क़ का
चेहरे से “नूर” रंगे मुहब्बत अयाँ है अब

डाॅ नूर फ़ातमा “नूर”

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