क्या होगी उत्तर कोरोना विश्व की राजनीति?

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Shamshad Elahee Shams
इन पंक्तियों के लिखे जाने के वक्त पूर्व से उठे कोरोना भंवर (कोविड -१९) ने अब पश्चिम को अपनी भयानक गिरफ्त में लेकर पूंजीवादी साम्राज्यवाद के सबसे पुराने अभेघ दुर्ग को झिंझोड़ दिया है. उसकी कर्राहटें पूरब -उत्तर -दक्षिण को झकजोर रही हैं. वह यूरोप में इटली, स्पेन , फ़्रांस को झटके देकर इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था को भी जोरदार घस्सा दे रहा है. दुनिया की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं ‘जबरन बंदी’ का सामना कर रही है. दस लाख से अधिक लोग इस वायरस का शिकार हुए है और मरने वाले शीघ्र ही एक लाख के करीब पहुँचने वाले है. दुनियाभर के अर्थशास्त्री इस जबरन बंदी के आर्थिक दुष्परिणामों को आंकने और झांकने में व्यस्त हैं, लेकिन तमाम मुख्यधारा के प्रचारतंत्र बहुत शातिराना ढंग से अगर कोई बात छुपा रहे हैं तो वह यह है कि इस कोरोना बवंडर ने पूंजीवाद के खात्मे का बिगुल बजा दिया है.
१९९१ में सोवियत संघ का विघटन कराने वालों ने पूरे विश्व में, खासकर विकासशील देशों में पब्लिक सेक्टर को ध्वस्त करके निजी पूंजी को तर्ज़ी दी थी जिसका आधार मुनाफा था लोकहित नहीं, आज उसी अमेरिका में कोरोना ग्रस्त मरीजों के लिए निजी अस्पतालों में जगह नहीं है और न ही वेंटिलेटर्स। कोरोना महामारी के चलते बंद हुए कारोबार से इन देशों में बेरोज़गारों की सयुंक्त आबादी करोडो में पहुँच चुकी है. खरबो डालरों की सहायता राशि की घोषणाएं करने वाले इन देशों को अपनी अर्थव्यवस्थाएं ज़िंदा रखने के लिए कामगार तबके की जेबों में पैसा डालना जरुरत बन गया है, यह अलग बात है कि इस समाजवादी सिद्धांत का सबसे बड़ा हिस्सा बड़े उद्योग घराने ही डकार जायँगे ठीक वैसे ही जैसे २००८ की मंदी के दौरान सरकार ने खरबों डालर देकर निजी बैंकों को बचाया था. कोरोना त्रासदी , २००८ की मंदी से बड़ा संकट है इसकी आर्थिकी और राजनीतिक करवटें आने वाले समय में विश्व राजनीती की नई इबारतें लिखने में सक्षम इसलिए हैं क्योकि इस बार यूरोप इस आग में कायदे से झुलस गया है, दुनिया का यही वह हिस्सा हैं जहाँ आवाम सडकों पर उतर कर दुनियाभर की सियासत को सबक भी सिखाती हैं और नज़ीर भी देती हैं.
प्रबुद्ध लोगों को ये आंकड़े जरूर सबक सिखाएंगे की चीन, जहाँ कोरोना का संग्राम शुरू हुआ वहाँ करीब साढ़े तीन हजार लोगों की जाने गयी जबकि दुनियाभर में अपनी ताकत का ढिंढोरा पीटने वाले अमेरिका में यह आकंड़ा आठ हजार के पार पहुँच चुका है, इटली में पंद्रह हजार, स्पेन में बारह हजार, इग्लैंड में साढ़े चार हजार तो फ्रांस में अब तक साढ़े सात हजार लोग अपनी जाने गँवा चुके है.
आज पूरी दुनिया इस बात को गौर से देख रही है कि अमेरिका में कोरोना टेस्ट सरकार की तरफ से फ्री है लेकिन इलाज का खर्च मरीज़ की जेब से ही जायेगा जो तकरीबन पैंतीस हजार डालर के लपेटे में है. स्वास्थ्य राज्य की जिम्मेदारी है और रोज़गार भी. इन दोनों मुद्दों से अब पश्चिमी सियासत को आवाम की लपटें भुगतनी होंगी। मुनाफा नहीं लोकहित जैसा वाक्य जो बैठे बिठाये यहाँ की आवाम को अब समझ में आ जायेगा, अब सिर्फ इस सामाजिक सोच को राजनीतिक स्वर देना और सार्वजनिक मंचो पर इसे मुखरित करने का काम करना है, ये बात अपने आप यहाँ के सियासी दलों के एजेंडे पर आ जाएगी।
कोरोना त्रासदी के बाद दुनिया में होने जा रही आर्थिक बर्बादी के बाद एक प्रमुख मांग सामने आने वाली है, वर्ल्ड बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा तीसरी दुनिया के देशों को दिए गए कर्ज़े माफ़ किये जाएँ। धनवान देश नोट छाप कर अपने संकट का समाधान कर लेंगे लेकिन तीसरी दुनिया के देशो में मची तबाही का हश्र अभी देखना बाकी है।
भारत जैसे देश में जहाँ आवाम को गाय के गोबर और पेशाब तो कभी थाली बजाओ या मोमबत्ती जलाओ अभियान में लगाकर धार्मिक टोटकों से कोरोना को भगाने का उद्यम उसके अक्षम और निर्वीय नेतृत्व द्वारा चल रहा है और जिस प्रकार नरसिम्हा राव -मनमोहन सिंह से लेकर मोदी हकूमत ने निजी क्षेत्र के सामने सार्वजनिक क्षेत्र का बलिदान अपने पश्चिमी आकाओं को रिझाने के लिए किया है इसके ख़िलाफ़ व्यापक जन असंतोष होना स्वभाविक है. थोड़ा मामला संभल जाए, साँस में साँस आ जाए – जनता का वह तबका जिसने कोरोना के कारण काम खोया है, भुखमरी झेली और जाने गवाँई वो सही वक्त पर धर्म की सियासत करने वालों को गौ मूत्र जरूर चखाएगी।

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