कौन भारी : मीडिया या महामारी?

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धुनिक समय में पूरा विश्व एक गाँव जैसा बन गया है. विश्व को एक गाँव बनाने में तो कई क्षेत्रों का योगदान है लेकिन प्रमुख योगदानों में से एक अग्रणी योगदान किसी का है तो वह मीडिया का है. विश्व में तरह-तरह के मीडिया का विकास हुआ है, जिसमें प्रिंट मीडिया, मल्टीमीडिया एवं सोशल मीडिया आदि प्रमुख मीडिया समूह हैं, लेकिन सबसे ज्यादा ताकतवर यदि कोई है तो वह सोशल मीडिया है. क्या कभी वर्ष 1978 में ‘ईमेल’ की खोज करने वाला भारतीय अमेरिकी ‘वीए शिवा अय्यदुरई’ या 04 फरवरी 2004 को ‘फेसबुक’ की शुरुआत करने वाला ‘मार्क जुकरबर्ग’ व उसकी टीम या 14 फरवरी 2005 को ‘यूट्यूब’ की खोज करने वाला ‘सैन मातेओ’ या 21 मार्च 2006 को ‘ट्वीटर’ की खोज करने वाला ‘जैक डॉर्सी’ व उसकी टीम या 3 मई 2009 को ‘वाट्सऐप’ की शुरुआत करने वाले जेन कूम या 6 अक्टूबर 2010 को ‘इंस्टाग्राम’ की खोज करने वाले ‘केविन सिस्ट्राम’ और ‘माइक क्रेगर’ आदि को अनुमान रहा होगा कि एक दिन यह आभासी जाल इतना व्यापक बुन जायेगा कि पुरे जगत को ही अपने में जकड़ लेगा? बिल्कुल नहीं! आखिर कोई इतना दूर तक कैसे सोच सकता था कि इसका उपयोग इतना नकारात्मक भी होने लगेगा कि मानवता का ही गला इसकी फ़ांस में फंस जायेगा. खैर, कई बार तो इन्सान को उसके भोजन से भी नकारात्मक असर पड़ जाता है, असंतुलित होने पर.

विश्व के मीडिया जगत में क्या चल रहा है, यह तो मुझे नहीं पता है, परन्तु अपने देश में क्या चल रहा है उससे तो कुछ हद तक जरुर ही अवगत हूँ. यह तो सार्वभौमिक सत्य है कि मानव को गति देने में मीडिया का अहम योगदान है, उसमें भी सोशल मीडिया विशेष रूप से. मीडिया का शुरुआत भले ही सूचना संचार के रूप में हुआ हो लेकिन आज पूरा जीवन ही इससे संचारित होने लगा है. यदि किसी दिन, किसी जगह से मीडिया को काट दिया जाये, तो समझो वहां के मानव जीवन की गति में ही ठहराव आ जाता है. अपने देश में इसका सर्वाधिक प्रमाणिक अनुभव तो कश्मीर में रहने वाले लोग के पास ही होगा.

बहरहाल, मैं अपने देश के मीडिया में चल रही ख़बरों को देखता हूँ, तो कभी-कभी थोड़ा विचलित सा होने लगता हूँ. यह लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है लेकिन वर्तमान में तो लोकतंत्र के चारों स्तम्भ ही हिलने लगे हैं तो फिर मीडिया…..? पिछले कुछ वर्षों को गौर से देखेंगे तो पता चलेगा कि मीडिया मदारी की भूमिका निभा रहा है. बचपन में हम देखते थे कोई मदारी बन्दर-बंदरिया लेकर आता था और लोगों की भीड़ जुटाकर खेल दिखाता था. लोग खूब ताली पीटते थे और थाली-गिलास में चावल-गेहूं लाकर उसकी झोली भर देते थे. वह झोली उठाता और किसी दूसरे गाँव की ओर चल देता. गाँव के बच्चे कुछ दूर तक उसके पीछे-पीछे हू-हू करते चलते. खैर, इससे तो आप सब परिचित हैं ही. उम्मीद है इस प्रसंग का संदर्भ भी समझ गये होंगे.

कई विद्वानों का मानना है कि जाति यहाँ की हवा में बिल्कुल घुलमिल गई है. चाहे कोई धर्म कहीं से आये. यहाँ जाति में बंटे बिना नहीं रह सकता, लेकिन अब तो ऐसा लगता है कि मीडिया द्वारा यहाँ के हवा और पानी दोनों में साम्प्रदायिकता का जहर घोल दिया गया है. लोग हर घटना में जहरीली जुबान चलाने लगते हैं जबकि इस जहर का कहर देश पर भारी पड़ता रहा है. यह अलग बात है कुछ पार्टियों के लिए यह वरदान साबित हुआ है, क्योंकि उनकी राजनीतिक रोटियाँ सांप्रदायिक आग में ही सेंकी जाती हैं. तमाम मॉब लिंचिंग, दंगा, झड़प एवं नरसंहार ने कईयों को काल के गाल में ठूंस दिया. मीडिया द्वारा प्रसारित जहर में बच्चे-बूढ़े, औरत-मर्द, अनपढ़-शिक्षित, चपरासी-अधिकारी, एवं नेता-जनता सब प्रकार के लोग जहरीले होते जा रहें हैं. जहर का असर धर्मान्धता की ओर ढकेल रहा है. यह तो सर्वविदित है कि धर्मान्धता मानवता की जानी दुश्मन है, शायद इसीलिए कार्ल मार्क्स ने धर्म की तुलना अफीम से की थी.

बहरहाल मैं बात वैश्विक महामारी कोरोना के काल की कर रहा हूँ. जिसने क्षणिक काल में ही पूरे विश्व को काल कोठारी में कैद कर लिया. अभी तक उत्पत्ति का कोई ठोस स्रोत नहीं मिल पाया है. कोई इसे प्राकृतिक तो कोई कृत्रिम बता रहा है. शुरुआत में तो इसे चीन का जैविक हथियार कहा जाने लगा था. ट्रम्प तो इसे चाइना वायरस भी कहने लगे थे लेकिन आज ट्रंप ही क्या, कई देश चीन के सामने घुटने टेक दिए हैं. लेकिन चीन के ऊपर से संभवतः संदेह हटा नहीं होगा. शायद महामारी से निपटने के बाद लोग इसका प्रमाणिक पुष्टि करेंगे. फिर शायद चीन से निपटने की कवायद तेज करेंगे। इसके उत्पत्ति का स्थान तो बुहान, चीन तय ही है, बस उत्पत्ति का तरीका तय नहीं है, खैर.
मैं तो कोरोना महामारी में भारतीय मीडिया की बात कर रहा था. प्रारम्भिक तौर पर जब भारत में कोरोना की सुगबुगाहट मिली, तब न यहाँ की सरकारें सतर्क हुईं, न मीडिया और ना ही लोग. जबकि देश में पहला कोरोना केस 30 जनवरी 2020 को ही सामने आया लेकिन उसके बाद भी विदेश से लोग भारत आते रहे, आखिर आते भी कैसे नहीं, 24 फरवरी को नमस्ते ट्रम्प कार्यक्रम जो था. अपने यहाँ कोरोना से पहली मौत सम्भवतः 12 मार्च 2020 को हुई, जिसमें कलबुर्गी, कर्नाटक के 76 वर्षीय बुजुर्ग ने दम तोडा. उस वक्त मीडिया में कोरोना से कम बल्कि राजनितिक हलचल ज्यादा थी, क्योंकि उसी वक्त मध्यप्रदेश के कुछ कांग्रेसी विधायक को भाजपा शासित राज्य कर्नाटक की राजधानी बंगलुरु स्थित एक आलिशान होटल में नजरबंद रखा गया था. 20 मार्च को कमलनाथ जी मुख्यमंत्री पद से स्तीफा देते हैं, कांग्रेस की सरकार गिरती है. 22 मार्च को ‘जनता कर्फ्यू’ लगता है क्योंकि 19 मार्च को रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी इसका आह्वान किये थे यह अलग बात है कि 9 बजे रात की बजाय शाम 5 बजे ही कुछ अति उत्साहित व मूर्ख लोग ताली-थाली पीटते व घंटी-घंटा बजाते जुलूस निकाल जनता कर्फ्यू का हवा निकाल दिए वरना पूरा देश एक साथ खुद को कमरे में कैद कर लिया था. 23 मार्च, 2020 को मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान जी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनती है और 24 मार्च की रात 8 बजे प्रधानमन्त्री महोदय 21 दिन के लिए पूरे देश में लॉक डाउन घोषित करते हैं. तब तक ज्यादातर राज्यों और शहरों में 31 मार्च तक के लिए लॉकडाउन घोषित किया जा चुका था. 25 मार्च को मीडिया राजनितिक उठापटक व हो-हल्ला से खाली होकर लॉक डाउन पर केन्द्रित होने लगा था. कुछ लोग गरमा-गरम खबर के आभाव में कार्टून देखने लगे तो, कुछ अंत्याक्षरी खेलने लगे. उधर 21 दिन लॉक डाउन की खबर पाकर दिहाड़ी मजदूर दहल गए और अपना धैर्य खोकर बोरिया-बिस्तर समेत पैदल ही गाँव-घर को कूच करने लगे. नोएडा-दिल्ली में प्रवासी मजदूरों की भीड़ देख सबकी परेशानी बढ़ गयी. फिजिकल डिस्टेंस की बजाय गेदरिंग हो गई. दिल्ली सरकार भरपूर कोशिश की, कि लोग रुक जाएँ परन्तु कुछ मजदूरों पर उनके आश्वासन का कोई असर नहीं पड़ा. फिर दिल्ली सरकार ने बस मुहैया कराकर उन्हें उत्तर प्रदेश की सीमा पर छोड़ी. उत्तर प्रदेश अपने सरकारी बसों से उन्हें लखनऊ लायी, जिसमें कुछ मजदूरों ने आरोप लगाया कि बस के भीतर का भाड़ा अधिकतम 1200रु तथा बस के छत पर अधिकतम 800रु वसूला गया, सच्चाई जो भी हो. इस वक्त सबसे बुरी बयार मीडिया में बही कि ‘केजरीवाल भगाया और योगी ने गोद लगाया’. इस बयार को बहाने में टीवी चैनल और आईटी सेल के जरिये सोशल मीडिया का भरपूर योगदान रहा.

30 मार्च 2020 को तेलंगाना में 6 लोग की कोरोना के कारण मौत हो गयी. ये सभी 13-15 मार्च को निजामुद्दीन (दिल्ली) में आयोजित तबलीकी जमात के मरकज कार्यक्रम से लौटे थे. तबलीग-ए-जमात शब्द ही मीडिया के लिए खाफी था. खैर, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस ने स्वास्थ्य कर्मियों के सहयोग से तीन दिन के ऑपरेशन में लगभग डेढ़ हजार लोग को बाहर निकाला और उन्हें आवश्यकता अनुसार उचित जगह पर रखा गया. जमातियों की लापरवाही व गैरजिम्मेदाराना व्यवहार के कारण कोरोना संक्रमित व्यक्तियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई. देश के कोने-कोने से आये जमाती और जमाती से सम्पर्क में आये लोगों को ढूंढा जाने लगा. मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के आग्रह व आदेश पर तुरंत एफआईआर दर्ज किया गया, विदेश से आये पर्यटक बीजा पर जमातियों का धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होने के कारण बीजा को ब्लैक लिस्टेड किया गया. देश में लोग इनकी निंदा करने लगे तथा कठोर कार्रवाई की मांग करने लगे. जो कि उचित भी था. निजामुद्दीन मरकज ने भी विधिवत प्रमाणिक पत्र जारी करके प्रशासन की लापरवाही और अपनी बेबसी की ओर ध्यान दिलाया. इसी आरोप-प्रत्यारोप व जाँच के बीच मीडिया ने जो किचाइन किया वह बेहद निंदनीय व शर्मनाक था. जाहिर सी बात है कि अचानक लॉक डाउन के बाद देश के तमाम कोने में लोग फंस गए. यहाँ तो सालों भर लोग धार्मिक यात्रायें करते रहते हैं, फिर एक धर्म के लोग के लिए ‘छिपना’ और दूसरे धर्म के लिए ‘फंसना’ शब्द का प्रयोग मीडिया के दोहरे चरित्र को उजागर किया. एक पार्टी के आईटी सेल प्रबन्धक तो भारत में फर्जी खबर के पितामह ही बन बैठे हैं. यदि रवीश कुमार जी के शब्दों में कहूँ तो गोदी मीडिया के पत्रकार और वाट्सऐप यूनिवर्सिटी के प्रोडक्ट अंधभक्त तेजी से खबर फ़ैलाने लगे कि जमाती के लोग जमीन पर थूक रहे, पुलिस-डॉक्टर पर थूक रहे हैं, थूक लगा कर सब्जी बेच रहे हैं, अश्लील हरकत कर रहे रहें हैं आदि-आदि. तमाम प्रकार की ऐसी खबरों की पुष्टि के लिए वीडियो वायरल होने लगे और इसका असर यह हुआ कि गाँव-गाँव में लोग एक समुदाय विशेष के प्रति दुर्भावना भरे शब्द उगलने लगे. जबकि ऑल्ट न्यूज़ और पुलिस प्रशासन आदि की ओर से फर्जी या पुराने वीडियो घोषित किये जाने लगे, कुछ जगह तो पत्रकारों पर केस भी दर्ज हुए. इन सांप्रदायिक खबरों का असर कोरोना से भी तेज देश के कोना-कोना में फ़ैल गया. लोग कभी धर्म देखकर ठेले वाले से फल-सब्जी नहीं खरीदते थे परन्तु मदारी मीडिया फल-सब्जी को भी धर्मों में बाँट दिया.

14 अप्रैल 2020 लॉक डाउन के प्रथम सोपान का आखिरी दिन था. बहुत सारे लोग आशा लगाये थे कि शायद कुछ दिन के लिए लॉक डाउन हटे तो घर भागा जाये. यह आशा-उम्मीद भी मीडिया ने ही उपजाया था क्योंकि मीडिया में खबर आने लगी थी कि ट्रेन चलने की सम्भावना है. प्लेटफ़ॉर्म पर चार घंटे पहले पहुंचना पड़ेगा. स्क्रीनिंग के बाद चढ़ने दिया जायेगा. वेटिंग वालों को नहीं नहीं चढने दिया जायेगा. एक तरफ ऐसी-ऐसी अफवाहें व खबरें उड़ने लगीं तो दूसरी तरफ ऑनलाइन टिकट भी बुक हो रहा था. सारी आशा-उम्मीदों पर पानी तब फिर गया जब 14 अप्रैल को अपने संबोधन में प्रधानमंत्री जी ने कोरोना की भयावहता को देखते हुए लॉक डाउन को 3 मई तक के लिए बढ़ा दिया. इसी बीच किसी ने अफवाह फैला दी. फिर क्या, मजदूर बांद्रा(मुंबई) रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ने लगे. अफ़सोस! मिडिया में खबर चलने लगी कि लोग मस्जिद के पास क्यों जुट रहे हैं? अंधभक्त आव देखे न ताव, तुरंत सर्कुलेट करने लगे. जब यह खबर न चल सकी तो फिर मीडिया में दिल्ली के मजदूरों की भीड़ से तुलना की जाने लगी कि इस भीड़ में महिलाएं नहीं हैं. मजदूरों के हाँथ में झोला नहीं है आदि-आदि. अब इन खाए-पिए-अघाए को कौन समझाए कि मजदूर अपने परिवार(बीबी-बच्चे) के साथ अभी लॉक डाउन खत्म हो भी जाये तो निकलने की साहस नहीं जुटा पाएंगे, क्योंकि भारी भीड़ से अवगत हैं. और रही बात झोला की तो इन्हें मालूम होना चाहिए कि मजदूर घर जाने से एक-दो दिन पहले खरीदारी करते हैं न कि हमेशा मॉल जाकर खरीदते रहते हैं. मजदूर अपने घर जाने के लिए बेचैन हैं क्योंकि उनका दावा है कि उन्हें खाने के लिए नहीं मिल रहा है और बाहर निकलने पर पुलिस भी पिट रही है? जबकि सरकार का दावा है कि यह भोजन के लिए नहीं बल्कि घर जाने के लिए बेचैन हैं. गुजरात से आये एक वीडियो में मजदूर गुहार लगाते दिखे कि मुझे खाना दो या घर जाने दो. बहरहाल बांद्रा स्टेशन से पुलिस ने भीड़ को हटाई भले ही लाठीचार्ज करना पड़ा. एक हजार अज्ञात लोगों पर एफआईआर भी दर्ज हुआ और विनय दुबे नाम के शख्स को गिरफ्तार भी किया गया. जरा सोचिये यदि विनय दुबे की जगह कोई दूसरे कौम से नाम होता तब मीडिया वाले और आईटी सेल वाले एक तूफान खड़ा किए होते या नहीं? अच्छा हुआ एक मीडिया तूफ़ान से देश बचा। अब यहाँ कुछ सवाल मन में उठते हैं कि क्या सच में सरकार गरीब-मजदूर को पर्याप्त मात्रा में सही समय पर खाना दे पा रही है? क्या मजदूर लॉक डाउन का पालन करते हुए धैर्य धारण करके घर में नहीं रह सकते हैं? यदि तीर्थयात्रियों को वापस घर भेजा जा सकता है तो फिर मजदूरों को क्यों नहीं? तीसरा सवाल इसलिए क्योंकि 28 मार्च को खबर आयी थी कि हरिद्वार में 1800 फंसे तीर्थयात्री को बस से गुजरात लाया गया. 14 अप्रैल को खबर आयी कि वाराणसी से लगभग 800 यात्री 25 बस से भेजे गए. यह सच है कि तीर्थयात्री और मजदूरों की संख्या में बड़ा फासला है लेकिन क्या उन्हें पहुंचाया नहीं जा सकता है? हम उन्हीं गरीब-मजदूर परिवार का भाई-भतीजा हैं, आखिर सवाल हम नहीं करेंगे, तो कौन करेगा?

15 अप्रैल को बिहार के औरंगाबाद और उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से खबर आयी कि पुलिस तथा डॉक्टरों के टीम पर ग्रामीणों ने हमला कर दिया. खून से सने पुलिस व डॉक्टर की तस्वीर देखकर हम देश के लोग गुस्से से लाल-पीले होने लगे और घोर निंदा करते हुए कठोर कार्यवाई की मांग करने लगे लेकिन कुछ लोग उसमें भी ग्रामीणों की धर्म खोजने में लग गए. कुछ तो बिना खोज बिन किये ही एक समुदाय को उसका जिम्मेदार मानकर गाली देने लगे? इसी बीच गुजरात के अहमदाबाद से एक खबर आयी कि वार्ड में धार्मिक भेदभाव किया जा रहा है, कुछ देर बाद गुजरात सरकार ने इस आरोप को ख़ारिज भी कर दी. हम सब जानते हैं कि सरकार या सरकारी लोग किसी जाति-धर्म विशेष की सेवा के लिए नहीं बल्कि सबके लिए होते हैं, इसलिए उन्हें सबकी सेवा करनी चाहिए और सबके लिए एक समान व्यवहार भी करना चाहिए. ज्यादातर लोग करते भी हैं। उसी प्रकार जनता को भी उनके साथ जाति-धर्म देखकर व्यवहार नहीं करना चाहिए. यदि कोई कानून तोड़ता है तो उसे जाति-धर्म से जोड़कर नहीं बल्कि निष्पक्षता से कार्यवाई भी होनी चाहिए, परन्तु ऐसा हो रहा है क्या? एक सवाल और उठ रहा है कि डॉक्टर-पुलिस के साथ धर्म विशेष का बुरा बर्ताव किसी पार्टी विशेष द्वारा शासित राज्य में ही क्यों देखने को मिल रहा है? जरा सोचिए मीडिया समाज को कितना जहरीला बना दिया है. सरकारी लोग हों या आम लोग, उनके बर्ताव में बदलाव आ गया है, जिससे कलह उत्पन्न हो रहा है. दो-चार महीना में महामारी के कहर से तो हम उबर जायेंगे परन्तु मीडिया के इस जहरीले कहर से उबरने में कितना समय लगेगा? महामारी में लोग मरते मात्र हैं परन्तु मीडिया के साम्प्रदायिक आग में जो पीड़ा घर-परिवार या समाज को उठाना पड़ता है वह तो असहनीय होता है. अभी हाल ही में दिल्ली में दिखा भी है. किसी घटना में जाति-धर्म सिर्फ मीडिया के लोग खोजते हैं ऐसा भी नहीं है. इसमें सबसे बड़ा गिद्ध हैं नेता और नेता की मौज के लिए ही मीडिया में भी मशाला तैयार किया जाता है. याद है न दुमका, झारखण्ड में 16 दिसम्बर 2019 को दिया हुआ बयान? जिसमें आगजनी करने वालों को कपड़े से पहचानने की बात कही गई थी. शुक्र है मीडिया के कुछ लोग आज भी ईमानदारी से अपना फर्ज निभा रहे हैं. कुछ लोग सोशल मीडिया से इनका मुकाबला भी कर रहे हैं. वरना लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को भी चौपट होते देर नहीं लगेगी. फिर भी मैं तो यही कहूँगा कि मानव के विनाश में महामारी पर साम्प्रदायिक मीडिया भारी पड़ेगा. इसलिए देश को ऐसे मीडिया से मुठभेड़ करने के लिए मुस्तैद रहना चाहिए.

डॉ. दिनेश पाल©
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी)

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