कोविड-19 का राजनीतिक अर्थशास्त्र- मनीष आज़ाद

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मनीष आज़ाद राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। इसीलिए सत्ता के दमन का शिकार भी हो चुके हैं। 29 फरवरी को 8 महीने बाद वे जेल से रिहा हो कर लौटे हैं। इसके पहले भी वे दस्तक के लिए लिखते रहे हैं। प्रस्तुत है कोरोना वायरस की महामारी से जुड़े तमाम पहलुओं को बताता उनका यह लेख।
यह लेख इस मायने में बेहद महत्वपूर्ण है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद जहां इसका ठीकरा चीन पर, भारत इसका ठीकरा मुसलमानों पर फोड़ रहा है, यह लेख इस महामारी के कारणों पर वैज्ञानिक रूप से प्रकाश डालता है, ताकि आने वाले समय के लिए हम अपने विकास का रास्ता साफ साफ देख सकें।

नाजी जर्मनी में जब ‘सोफी’ नाम की एक महिला को उसके दो बच्चों के साथ नाजी सैनिक गैस चैम्बर में लाये तो उन्होंने सोफी के रोने गिड़गिड़ाने के बाद उसके दो बच्चों में से एक को जिन्दा छोड़ने का वादा किया, लेकिन कौन जिन्दा रहेगा और कौन गैस चैम्बर में जायेगा, यह चुनाव उन्होंने सोफी पर ही छोड़ दिया। 1979 में इसी कहानी पर आधारित ‘सोफीज च्वाइस’ नाम के उपन्यास की सफलता के बाद अंग्रेजी में ‘सोफीज च्वाइस’ [Sophie’s choice] एक मुहावरा ही चल पड़ा। आज जब मैं कोरोना वाइरस से भयाक्रान्त लाॅक डाउन झेल रही दुनिया पर नज़र डालता हूं, तो मुझे अंग्रेजी का यही मुहावरा याद आ रहा है। लाॅक डाउन बढ़ाते हैं तो दुनिया की अर्थव्यवस्था गर्त में चली जायेगी, करोड़ों लोेगों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो जायेगा और यदि लाॅक डाउन खोलते हैं तो कोरोना महामारी लाखो-करोड़ों लोगों को लील सकती है। लगभग हर देश में यही दुविधा मुंह बाएं खड़ी है। लेकिन असल सवाल तो यह है कि हम यहां तक पहुंचे कैसे? क्या यह होना ही था। कोरोना को आना ही था। या फिर इसके पीछे चीन की साजिश है जो विश्व विजेता बनने के लिए पहले अपने यहां कोरोना से लोगों को मारा और फिर पूरी दुनिया को मार रहा है। या फिर चीन की बात सही है जो कह रहा है कि अमरीका ने ओलंम्पिक खेलों के दौरान यह वायरस चीन में छोड़ा था, ताकि चीन को कमजोर किया जा सके। या फिर कोई और बात है। आइये थोड़ी पड़ताल करते है।
सबसे पहली बात तो यह है कि Scripps Research Institute सहित कई प्रतिशिष्ट प्रयोगशालाओं ने कोविड-19 की जीन संरचना का अध्ययन करके यह साबित किया है कि इसे प्रयोगशाला में तैयार नहीं किया जा सकता। इसलिए यह खुद ब खुद विकसित (म्यूटेशन) हुआ है। यानी इसके पीछे किसी देश का हाथ नहीं है। यह कोरोना परिवार का ही नया वाइरस है। इसी परिवार के सार्स ने 2003-4 में भी दुनिया के कई देशों में तबाही मचायी थी। यह कोविड 19 सार्स-2 है।
कहा जाता है कि चीन के वूहान शहर से इसकी शुरूआत हुई (हालांकि प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘लैन्सेट’ के अनुसार शुरूआती 43 कोराना के मरीजों में से 13 मरीज वूहान के बाहर के थे और उनका वूहान के कोरोना मरीजों से या वहां के ‘वेट मार्केट’ से कोई सम्पर्क नहीं था)। दूसरी कहानी मीडिया में यह है कि यह वायरस वहां के वेट बाजार ( मछली व तरह तरह के मांस बेचने वाले छोटे मार्केट जैसे अपने यहां का मछली बाजार) से यह पूरी दुनिया में फैला। Scripps Research Institute ने अपने अध्ययन में इससे इंकार किया है। उसके अनुसार कोविड 19 जिस तरह विकसित (म्यूटेशन) हुआ है और जिस तरह की उसकी जीन संरचना है, उसके लिए पशुओं की उच्च जनसंख्या घनत्व [high population density] जरूरी है। और यह पशुओं के औद्योगिक उत्पादन वाली जगहों पर ही संभव है। जहां उन्हें ठूंस ठूंस कर रखा जाता है। चिकन और सूअर का उत्पादन विशेष तौर पर ऐसे ही परिस्थितियों में होता है। रिसर्च में यह कहा गया है कि चुंकि सूअर की प्रतिरोधक क्षमता प्रणाली (इम्यून सिस्टम) इंसान से अपेक्षाकृत ज्यादा मिलता है, इसलिए यह कोविड 19 सूअर के माध्यम से ही मनुष्य में आया है। इस क्षेत्र में काम करने वाली मशहूर वेबसाइट grain.org का यह दावा भी सही लगता है कि कोरोना के बहाने वूहान के ‘वेट मार्केट’ को बन्द कराने की साजिश के तहत यह प्रचार किया जा रहा है, क्योकि इस मार्केट के माध्यम से लाखों छोटे लोगों की जीविका चलती है और गरीब लोगों को सस्ता मीट उपलब्ध होता है (ये छोटे व गरीब लोग आमतौर पर वही है जिनसे समाजवाद के बाद के दौर में वहां के ‘कोआपरेटिव’ व ‘कम्यूनों’ को तोड़ कर उनकी जमीेने छीन ली गयी और उसी पर अनेको प्रकार के बड़े बड़े उद्योग, जिनमें मीट उद्योग भी शामिल है, और बड़े बड़े कृषि औद्योगिक फार्मो की स्थापना हुई)। जाहिर है बड़े मीट उद्योगों का हित इसी में है कि यह वेट मार्केट बन्द हो जाय और उनका अपना मार्केट और ज्यादा विस्तृत हो जाय।
इससे पहले कोरोना परिवार के सार्स कोरोना ने भी 2003-2004 में काफी लोगो की जान ली थी। यह वायरस पशुओं से ही मनुष्यों में आता है। इससे पहले स्वाइन फ्लू (H1N1) ने भी पूरी दुनिया में लाखों की जान ली थी (अकेले अमरीका में ही इससे 1200 से ज्यादा लोग मारे गये थे।)। यह मैक्सिको से शुरू हुआ था और शुरू में इसे भी उसी तरह ‘मैक्सिकन फ्लू’ का नाम दिया गया जैसे आज कोरोना को ‘चाइनीज कोरोना’ कहा जा रहा है। लेकिन ‘स्वाइन फ्लू’ के बारे में अब काफी कुछ पता चल गया है। यह औद्योगिक उत्पादन वाले सूअरों से मनुष्यों के बीच आया। मैक्सिको के एक सूअर मीट उद्योग से इसकी शुरूआत हुई। इस सूअर मीट उद्योग का नाम था-‘स्मिथफील्ड फूड कम्पनी’। यह अमरीकी कम्पनी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सूअर मीट उत्पादन व उसका प्रसंस्करण करने वाली कम्पनी है। इसके विभिन्न प्लान्टों में हर साल 28 मिलीयन सूअरों को काटा जाता है और पूरी दुनिया में अनेक रूपोें में (हाम, सासेस बेकन आदि) उसकी सप्लाई होती है। इसकी प्रमुख खरीददार कम्पनी है- मैकडानण्ड, केएफसी आदि। ये भी अमेरिकी कम्पनियां है। जैसे सभी अमरीकी कम्पनियां मसलन एप्पल, पेप्सी, नाइक, जनरल मोटर्स आदि ने चीन के सस्ते श्रम को निचोड़ने के लिए अपना प्लान्ट चीन में स्थापित किया है, वैसे ही इस कम्पनी का एक बड़ा प्लान्ट चीन में भी है। दुनिया की पांचवी सूअर मीट उत्पादन करने वाली डेनमार्क की कम्पनी ‘डानिस क्राउन’, सूअर मीट उत्पादन में दुनिया की सातवी बड़ी कम्पनी जर्मनी की ‘टोनी’ इन सभी के चीन में मीट उत्पादन व प्रसंस्करण के बड़े बड़े प्लान्ट हैं। यहां से यह मीट चीन के बाजारों सहित पूरी दुनिया के बाजारों में सप्लाई होता है। ‘मैकडोनाण्ड’ और ‘केएफसी’ जैसी कम्पनियां इसके प्रमुख खरीददार हैं। जाहिर है चीन की कम्पनियां भी इस दौड़ में शामिल हैं। 2008 की मंदी के बाद दुनिया की सबसे बड़ी निवेशक कम्पनी ‘गोल्डमान साश ’ ने अपने इन्वेस्टमेंट को विविध करने के प्रयास में 300 मीलियन डालर का निवेश करते हुए चीन के 10 बड़े पाल्ट्री फार्म पर कब्जा जमा लिया। इसके अलावा चीन के सूअर उद्योग में भी इसका लगभग 200 मीलियन डालर का निवेश है। इसके अलावा दूसरी बड़ी अमरीकी कम्पनी ‘ओएसआई’ से जुड़ा एक मामला पिछले दिनों काफी चर्चा में रहा। यह कम्पनी चिकन मीट को प्रोसेस करती है और इसके भी चीन में 10 बड़े प्लान्ट है। यह भी मैकडानण्ड व केएफसी जैसी अमरीकी कम्पनियों के माध्यम से ही चीन सहित दुनिया के बाजारों में मीट के विविध रूपों की सप्लाई करती है। इसने सड़े मास को प्रोसेस करके चीन के मार्केट में इसकी सप्लाई कर दी थी। जिसके कारण चीन ने इस पर बड़ा जुर्मान ठोका और 10 कर्मचारियों को जेल भेज दिया।
यह डिटेलिंग इसलिए जरूरी है ताकि हम देख सके कि दुनिया के लगभग 945 बिलियन डाॅलर के मीट व्यापार में अमरीकी और अन्य योरोपीय देशों की हिस्सेदारी क्या है और चीन के साथ इसका रिश्ता क्या है।
आइये अब नज़र डालते हैं कि यहां उत्पादन कैसे होता है। 1906 में अप्टन सिंकेलयर का प्रसिद्ध उपन्यास ‘जंगल’ आया था। इसमें अमरीकी मीट उद्योग का बहुत ही ग्राफिक वर्णन मिलता है। उसकी एक पंक्ति आज भी मुझे याद है। लेखक कहता है कि यहां सूअरों की चीख के अलावा सब कुछ बेच दिया जाता है। लेकिन आज मामला ‘जंगल’ से भी आगे निकल चुका है। आज उद्योगों में जिस तरह जूते कपड़े बनाये जाते है, ठीक उसी तरह से यहां जीवित पशुओं जैसे सूअर, चिकन आदि का उत्पादन किया जाता है। विभिन्न तरंह की एण्टी बायोटिक दवाओं, हार्मोन्स व जेनेटिक इंजिनियरिंग के सहारे इनका उत्पादन किया जाता है (इसलिए अब तो इन्हें चीखने की भी इजाजत नही हैं या यो कहें कि चीखना इनके जीन में है ही नही)। जल्दी बड़ा करने के लिए तमाम तरह की दवाएं उन्हें दी जाती है। क्योकि वे जितनी देर में बड़े होंगे उतना ही लागत बढ़ जायेगी। लागत घटाने के लिए ही इन्हें झुण्ड के झुण्ड साथ रखा जाता है जहां उनका हिलना डुलना भी मुश्किल होता है। पूंजीवादी तर्क के अनुसार उत्पादन लागत को कम करने के लिए ये लगातार उनकी जीन संरचना में बदलाव करते रहते है। उदाहरण के लिए- मुर्गे के पंख को हटाना एक अतिरिक्त काम होता है। जिसमें श्रम व समय दोनो जाया होता है। इसलिए उनके जीन में इस तरह का परिवर्तन किया जाता है कि पंख कम से कम हो। इसी तरह पूरी दुनिया में चिकन सूअर व अन्य जानवरों के अलग अलग अंग भी पैक करके बेचे जाते है, जैसे मुर्गे का ‘लेग पीस’। इसलिए इन जानवरों में इस तरह का परिवर्तन किया जाता है कि सभी पशुओं की साइज (व उनके खास अंगों की साइज) लगभग एक बराबर हो यानी उनमें एकरूपता रहे, नही तो उन्हें तौलने का एक अन्य काम जुड़ जायेगा।

उद्योगों के स्तर पर पैदा होने वाले ये पशु नेचुरल वातावरण में जीवित नहीं रह सकते। इनके लिए एक कृतिम वातावरण बनाना पड़ता है। जैसे बिना पंख वाले मुर्गे एक खास तापमान पर ही जीवित रह सकते हैं। यानी यहां न सिर्फ कृतिम तरीके से पशुओं का निर्माण किया जाता हैं बल्कि इनके रहने के लिए कृतिम वातावरण का भी निर्माण करना पड़ता हैं।
लेकिन इस प्रक्रिया में होता यह है कि इन पशुओं की प्रतिरोधक क्षमता लगभग खत्म हो जाती है। डार्विन का ‘नेचुरल सेलेक्शन’ का नियम यहां काम नहीं करता। इसका स्थान ‘पूंजीवादी सेेलेक्शन’ ले लेता है। इस परिस्थिति में कोरोना जैसे वाइरस जब इन पशुओं के सम्पर्क में आते हैं तो उनके फलने फूलने का (यानी म्यूटेट करने का) और हजारों लाखों पशुओं के एक साथ झुण्ड में होने की वजह से तेज गति से फैलने में आसानी हो जाती है। जब यही पशु अपने प्राकृतिक वातावरण में प्राकृतिक तरीके से अपेक्षाकृत दूर दूर पलते हैं तो उनकी प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और अलग अलग होती है। ऐसे में जब कोई वाइरस इनके सम्पर्क में आता है तो उसके आगे बढ़ने व फैलने का रास्ता काफी कठिन होता है। एक तरह से वाइरस के सामने कई फायरवाल खड़े होते हैं। और नेचुरल सेलेक्शन के माध्यम से वाइरस से बेहतर लड़ सकने वाले पशुओं का सेलेक्शन होता रहता है। लेकिन जब इनका उत्पादन बाजार के दबाव में उद्योगों की तर्ज पर किया जाता है तो एक तरह से वाइरस को राजपथ मिल जाता है तेजी से फैलने व विकसित (म्यूटेट) हाने का। इस उद्योग के साथ काम करने वाले लोगों के माध्यम से यह फिर पूरे समाज और वैश्वीकरण के इस दौर में पूरे विश्व में फैल जाता है। औद्योगिक स्तर पर उत्पादन के कारण यहां लाखों लोग विशेषकर इन उद्योगों में काम करने वाले मजदूर 12-14 घण्टे निरन्तर इन पशुओं व प्रकारान्तर से इन वायरसों के सम्पर्क में रहते है। इतने ज्यादा समय तक, इतने सारे लोगों के साथ रहने के कारण इनके अन्दर भी वायरस के म्यूटेट करने की पूरी संभावना रहती है। कोविड-19 वाइरस और इससे पहले आने वाले अनेक वाइरस जैसे सार्स, इबोला, स्वाइन फ्लू़, जीका, एमइआरएस……का इस तरह के औद्योगिक मीट प्रोडक्शन से रिश्ता अब स्पष्ट हो चुका है। ‘बिग फार्मस मेक्स बिग फ्लू’ [Big Farms Make Big Flu] जैसी चर्चित किताब लिखने वाले जीव विज्ञानी ‘राब वालस’ [Rob Wallace] कहते हैं- ‘जो भी यह समझना चाहता है कि वाइरस लगातार इतने घातक क्यो होते जा रहे हैं, उन्हें खेती के औद्योगिक माडल और विशेषकर पशु उत्पादन के औद्योगिक माडल की पड़ताल करनी होगी। एक शब्द में कहें तो पूंजीवाद को समझना होगा।’
राब वालस ही एक अन्य जगह कहते हैं कि ये कम्पनियां अपने यहां ना सिर्फ मीट उत्पादन करती है बल्कि इसके साथ साथ ही गंभीर बीमारी पैदा करने वाले वाइरस की भी खेती करती हैं। लगभग यही स्थिति खेती में भी है। बल्कि यहां पौधों की जीन संरचना सरल होने के कारण जीन तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है। इसके अलावा जिस तरह से बड़े पैमाने पर ‘पेस्टीसाइड’ और ‘हर्बीसाइट्स’ (कीट नाशक और खरपतवार नाशक) का इस्तेमाल खेती में हो रहा है, उसने ग्बोबल वार्मिग में तो अपना योगदान दिया ही है, पृथ्वी के सम्पूर्ण वातावरण में निर्णायक बदलाव ला दिया है। सूअर को खिलाने के लिए सोयाबीन का आटा दिया जाता है, इस सोयाबीन की खेती के लिए ब्राजील में अमेजन के जंगलों को साफ किया गया। फलतः ना सिर्फ पर्यावरण का सन्तुलन प्रभावित हुआ वरन् मनुष्य ऐसे वायरसों के सम्पर्क में भी आ गया जो पहले अछूते जंगलों में स्थानीय स्तर पर बने हुऐ थे। प्रकृति की जटिल संरचना कई खतरनाक वायरसों को उनके स्थानीय ‘घरो’ में कैद रखती है। एक वैज्ञानिक शोध के अनुसार, जिस तरह से अमेजन के जंगल साफ हो रहे हैं, उससे अगले 15 सालों में, अमेजन कार्बन सोखने वाला क्षेत्र ना रहकर कार्बन उत्सर्जन वाला क्षेत्र बन जायेगा। जब पूंजीवादी लालच में हम इस प्राकृतिक जटिल संरचना में हस्तक्षेप करके उन्हें एकरूप कर देते हैं तो एक तरह से इन वायरसों के लिए एक राजपथ का निर्माण कर देते हैं। इसी प्रक्रिया में पूंजीवादी औद्योगिक खेती ने दुनिया भर से करोड़ों लोगों को उनके खेतों से बेदखल किया है, उन्हें कर्ज के जाल में फंसाया (फलतः किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हुआ है) और पूरे वातावरण को जहरीला बना दिया। यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि आज जो कंपनिया बीज व कीटनाशक क्षेत्रों में है उनमें से अधिकांश प्रथम व दूसरे विश्व युद्ध तथा वियतताम युद्ध में इस्तेमाल जहरीली गैसों के उत्पादन में लगी रही हैं। DuPont, Monsanto, Dow Chemical आदि कम्पनियां जहां अमरीका व सहयोगी देशों को जहरीली गैसों की सप्लाई करती थी, वही आज की Bayer जैसी कीटनाशक क्षेत्र की प्रमुख कम्पनी हिटलर को जहरीली गैस की आपूर्ति करती रही है। डो केमिकल और मोन्सान्टो ने वियतनाम युद्ध के दौरान कुख्यात ‘ऐजेन्ट ओरेन्ज’ गैस और ‘नापाम बम’ की सप्लाई अमरीकी सेना को की थी। शान्तिकाल में अब यही कम्पनियां उन्ही जहरीले केमिकल का इस्तेमाल इस पर्यावरण के खिलाफ कीटनाशक के रूप में कर रही हैं। मशहूर कृषि वैज्ञानिक ‘देवेन्द्र शर्मा’ ने एक प्रतिष्ठित जर्नल में छपे रिसर्च पेपर के हवाले से कहा है कि पेस्टीसाइट्स का 99.9 प्रतिशत सीधे वातावरण में चला जाता है महज 0.1 प्रतिशत ही अपने लक्ष्य पर वार करता है। इस 99.9 प्रतिशत के कारण कितने ही दोस्त बैक्टीरिया व अन्य लाभदायक जन्तु जैसे केचुआ खत्म हो गये है। अपने देश के पंजाब प्रान्त में कैंसर के मरीजों की बढ़ती संख्या और वहां के खेतों में इस्तेमाल हो रहे कीटनाशकों के बीच रिश्ता अब किसी से छिपा नहीें है। पंजाब से जयपुर के टीबी अस्पताल तक चलने वाली ट्रेन का नाम ही ‘कैंसर एक्सप्रेस’ पड़ गया है। इसी के साथ यदि ‘जिओ इंजीनियनिंग’ व ‘वार इण्डस्ट्री’ को भी शामिल कर लिया जाय तो स्थिति बहुत भयावह बन जाती है।
यह साल एंगेल्स के जन्म का 200वां साल है। मार्क्स एंगेल्स ने पूंजीवाद की इस प्रवृत्ति को अपने समय में ही समझ लिया था और पूंजीवाद के अपने अध्ध्ययन में इसे शामिल किया था। एंगेल्स ने चेतावनी देते हुए कहा है-‘हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि हम किसी विदेशी आक्रान्ता की तरह प्रकृति पर शासन नहीं करते बल्कि हम अपने हाड़-मांस व दिमाग के साथ प्रकृति का हिस्सा हैं और प्रकृृति के बीच ही हमारा अस्तित्व हैं। प्रकृति पर हमारा नियंत्रण इस तथ्य में निहित है कि हम दूसरे जीवों के मुकाबले प्राकृतिक नियमों को बेहतर तरीके से जानते हैं और उसे सही तरीके से लागू करते है।’
पूंजीवाद के पहले जो भी वर्गीय व्यवस्था थी वो महज श्रम का शोषण करती थी। पूंजीवाद वह पहली वर्गीय व्यवस्था है जो श्रम के साथ साथ प्रकृति को भी निचोड़ती है। और पूरी मानव जाति को उसका परिणाम भुगतना पड़ता है।
2011 से 2018 के बीच डब्ल्यू एच ओ ने 172 देशों में कुल 1483 महामारियां चिन्हित की है। इन वायरसों (मुख्यतः इनफ्लुएंजा, सार्स, एमईआरएस, इबोला, जीका, प्लेग, पीला बुखार आदि) के अध्ययन के आधार पर जीपीएमबी (Global Preparedness Monitoring Board) ने आज के कोराना जैसी महामारी फैलने की सटीक चेतावनी सितम्बर 2019 में ही दे दी थी। रिपोर्ट का नाम ही था-‘A world at risk’ लेकिन इस रिपोर्ट की सुध लेने वाला कोई नहीं था। इससे पहले भी 2003-4 में सार्स महामारी आने के बाद भी वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी जारी की थी कि कोरोना परिवार का वाइरस आने वाले वक्त में और खतरनाक रूप ले सकता है। यहां तक कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी तीन साल पहले सभी देशों के जन स्वास्थ्य संगठनों को यह चेतावनी दी थी कि किसी खास वायरस के कारण एक भयानक महामारी आ सकती है और इसके लिए सभी सरकारों को अभी से तैयारी करनी होगी। इन चेतावनियों को सुनने का मतलब था कि इस पर शोध करना और भविष्य की तैयारी के लिए जन स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना।

लेकिन जब यह साम्राज्यवादी-पूंजीवादी व्यवस्था विशेषकर 2007-8 की मंदी के बाद खुद ‘आईसीयू’ में हो तो भविष्य की तैयारी कौन करे। 90 ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था वाला विश्व पूंजीवाद 270 ट्रिलियन डालर के कर्ज तले कराह रहा है। दुनिया के अधिकांश देशों में निजीकरण की आंधी में जो कुछ भी ‘पब्लिक’ था वह सब तबाह हो चुका है। सब कुछ निजी हाथों में जा चुका है। ज्यादातर देशों ने अपने यहां की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को तबाह कर दिया है। अमरीका और ब्रिटेन ने अपने यहां सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को कैसे तबाह किया है, यह जानने के लिए ‘माइकल मूर’ व ‘जान पिल्जर’ की डाकूमेन्टरी देखी जा सकती है। दूसरी ओर निजी कम्पनियां इस पर रिसर्च क्यों करे जिसमें कोई तात्कालिक मुनाफा नहीं है। इसे एक उदाहरण से साफ समझा जा सकता है। ‘जीन थेरेपी’ पर रिसर्च कर रही एक कम्पनी से उसके फंडर ‘गोल्डमान साश’ ने एक लीक हो गये ई मेल में कहा कि जीन में चेन्ज करके हमेशा के लिए रोग को खत्म कर देना ‘टिकाऊ बिजनेस माडल’ नही है। क्योकि इससे लगातार मुनाफा आने की संभावना खत्म हो जाती है। सच तो यह है कि 2020 की शुरूआत में जिस दुनिया पर कोराना ने कहर बरपाया है उसे पिछले 30 सालों की नवउदारवादी व्यवस्था रूपी दीमक ने चाट चाट कर पहले ही खोखला बना दिया है। आज यह दुनिया कैसी है, इसे आप महज दो तथ्यों से बखूबी समझ सकते हैं- हमारे पास पृथ्वी को 9 बार नष्ट करने का सामान मौजूद है, लेकिन जीवन देने वाले मामूली वेन्टिलेटर की भारी कमी है। वेन्टिलेटर की यह भारी कमी कोरोना से मरने का एक बड़ा कारण बनता जा रहा है। दूसरा, दुनिया के 2153 खरबपतियों की कुल संपत्ति दुनिया के 4 अरब 60 करोड़ लोगों की कुल संपत्ति के बराबर है। यही कारण है कि नवउदारवादी व्यवस्था का अलम्बरदार अमरीका इस समय सबसे बुरी स्थिति में है और इसके विपरीत सामाजिक आर्थिक व्यवस्था वाला क्यूबा सबसे अच्छी स्थिति में है। उसने ना सिर्फ अपने यहां कोरोना को नियंत्रण में कर लिया है, बल्कि दुनिया के 62 देशों में अपने डाक्टरों और दवाओं के साथ कोराना के खिलाफ लड़ाई में अग्रिम पंक्ति में हैं। जब अमरीका दूसरे देशों में सेना और टैंक भेज रहा है तो क्यूबा अपने डाक्टर और दवाएं भेज रहा है। यह दो विपरीत सामाजिक व्यवस्था का ही फर्क है कि एक मौत का निर्यात कर रहा है तो दूसरा जीवन का।
दरअसल जैसा कि मशहूर लेखिका ‘नोमी क्लेम’ ने कहा है कि शासक वर्ग जब भूकम्प, तूफान या महामारी जैसी आपदा का सामना करता है तो वह अपनी विचारधारा कहीं छोड़ के नहीं आता वरन् उसे साथ लेकर आता है। इसलिए इस तरह की आपदा में भी वह अपना वर्ग हित और भविष्य का मुनाफा देखता है। उसकी दमित इच्छाएं भी इसी समय उभरती है और वह उन्हें पूरा करने का भरसक प्रयास करता है। 2019 शानदार प्रदर्शनों व आन्दोलनों का साल था। कई राजनीतिक विश्लेषक 2019 की तुलना 1848 और 1968 से करने लगे थे। इस साल पृथ्वी का कोई भी कोना विशाल जन आन्दोलनों से अछूता नहीं था। सीएए के खिलाफ भारत में जनता का शानदार प्रदर्शन इसी दौरान हो रहा था। कोरोना के बहाने शासक वर्ग ने इस सभी आन्दोलनों को तात्कालिक तौर पर खत्म करवाने में सफलता पा ली है। कोरोना के बहाने पूरी दुनिया में इतने बड़े पैमाने पर राजनीतिक प्रदर्शनों की मौत, उन मौतों से कम नहीं है, जिसके समाचार से आज दुनिया भर के अखबार भरे पड़े है। अपने देश में ही शाहीनबाग के प्रदर्शन को कैसे खत्म कराया गया है, यह आपको पता ही है।
पूरी दुनियां में मंदी के कारण अपना प्राफिट मार्जिन बचाये रखने के लिए कम्पनियां अपने मजदूरों-कर्मचारियों की छंटनी पर आमादा थी। लेकिन उनके विरोध का उन्हें सामना करना पड़ रहा था। कोरोना ने उन्हें यह शानदार मौका दे दिया। इस कोराना समय में कितने लोगों की छंटनी हुई है, इसके असली आंकड़े तो बाद में आयेंगे। लेकिन एक तथ्य से ही हम इसका अंदाजा लगा सकते हैं। अकेले अमरीका में ही पिछले 2 माह में 1 करोड़ 80 लाख लोगों ने बेरोजगारी भत्ते के लिए आवेदन किया है। 1929-30 की महामंदी के बाद यह सबसे ज्यादा है।
इस कोराना समय में जिस तरह से दुनिया की सरकारों ने तानाशाही तरीके अपनाएं है, वो उनकी दमित इच्छा का ही प्रकटीकरण है। हंगरी समेत कई देशों ने तो सीधे सीधे आपातकाल की घोषणा कर दी है। अपने देश भारत में भी मोदी ने साफ साफ ‘सामाजिक आपातकाल’ बोल दिया है। भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों में स्थिति और बुरी है। कोलंबिया की बगोटा जेल में कोरोना से निपटने के लिए बेहतर स्थितियों की मांग कर रहे कैदियों पर 21 मार्च को राज्य पुलिस ने हमला बोल दिया और 23 कैदियों को मार डाला। केन्या की सड़कों पर जितने लोग पुलिस की गोली से मारे गये, वो कोरोना से मरने वालों से कही अधिक है। सामान्य समय में यह एक बड़ी खबर बनती। लेकिन कोरोना समय में किसी ने इस पर ध्यान नही दिया।
दुनिया की सरकारों ने इंटरनेट कम्पनियों के साथ मिलकर कोरोना से निपटने के बहाने वस्तुतः अपने अपने देशों को ‘एक्वेरियम’ में तब्दील कर दिया है। नागरिकों के एक एक हरकत पर नज़र रखी जा रही है। सामान्य समय में इसके खिलाफ काफी प्रतिरोध होता लेकिन अब यह ‘न्यू नार्मल’ होता जा रहा है। ‘सर्विलांस कैपीटलिज्म’ अपने सबसे नंगे रूप में आज हमारे सामने है। ‘1984’ फिल्म अब फिल्म नहीं हकीकत है। मजेदार बात यह है कि यह फिल्म समाजवाद को बदनाम करने के लिए बनायी गई थी, लेकिन आज पूंजीवाद इस पर कहीं ज्यादा खरा उतर रहा है। ‘थाट पुलिस’ (thought police) और ‘थाट क्राइम’ (thought crime) का कान्सेप्ट कोराना समय में कम से कम भारत जैसे देशों में हकीकत बन चुका है। यह लाइन लिखते समय ही पता चला कि फेसबुक पर कोराना पर सरकार की विफलता के बारे में एक पोस्ट करने पर ‘इंकलाबी मजदूर केन्द्र’ के कैलाश भट्ट को गिरफ्तार कर लिया गया।
मेनस्ट्रीम मीडिया इस बात पर भी लगातार जोर दे रहा है कि कोरोना अमीर गरीब में फर्क नहीं करता। लेकिन हमेशा की तरह इस बार भी यह गलत है। कोराना सभी आर्थिक सामाजिक विभाजनों का पूरा ख्याल रख रहा है। सिर्फ अमरीका के ही आंकड़ों को देखे तो यहां हो रही मौतों में 70 प्रतिशत काले और अफ्रीकन-अमेरिकन हैं। अब कई संस्थाओं ने फोन लोकेशन के आधार पर कोरोना समय में सोशल मोबिलिटि पर भी आंकड़ा देना शुरू कर दिया है। अमरीका और यूरोप में उच्च 10 प्रतिशत लोगों में लगभग जीरो मोबिलिटी दर्ज की गयी। यानी वे सफलतापूर्वक अपने घरों में हैं। वहीं नीचे के 30 प्रतिशत लोगों में अनेक स्तर पर मोबिलिटी देखी गई। यही मोबाइल जनसंख्या कोराना का सबसे बड़ा शिकार हो रही है। जिन्हें अपनी आजीविका के लिए कुछ ना कुछ मोबिलिटी करनी पड़ रही है। यानी घर से निकलना पड़ रहा है। इसी सन्दर्भ में आप ‘राना अयूब’ का लेख ‘सोशल डिस्टैन्सिंग इज ए प्रीविलेज’ भी देख सकते हैं। भारत व दुनिया की तमाम झुग्गी झोपड़ियों में ‘सोशल डिस्टैन्सिंग’ एक मजाक है।
दरअसल बाढ़ का पानी गुजर जाने के बाद ही इलाके की असली बदसूरती नज़र आती है। कोराना के जाने के बाद ही इस व्यवस्था की असली बदसूरती नज़र आयेगी। लेकिन कई चीजें आप बाढ़ के पानी में भी देख सकते हैं। स्पेन के स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक सीक्रेट गाइडलाइन्स जारी की कि 60 साल से उपर वालों को आइसीयू में भर्ती ना किया जाय। इसकी जगह नौजवान मरीजों को प्रमुखता दी जाय। अमरीका के टेक्सास राज्य के गवर्नर ‘डान पैट्रिक’ ने और भी बेहयाई दिखाते हुए कहा कि बूढ़े लोगों को अमरीकी अर्थव्यवस्था और नौजवान पीढ़ी के लिए अपनी जान दे देनी चाहिए। अमरीकी खरबपति ‘टाम गलिसानो’ ने बिजनेस पत्रिका ‘ब्लूमबर्ग’ को दिये एक इन्टरव्यू में इस बेहयाई को और आगे बढ़ाया। उन्होंने फरमाया कि अर्थव्यवस्था को बन्द करने से बेहतर है कि कुछ लोग मर जाये। इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री तो यहां तक आगे बढ़ गये कि जब लोग मरेंगे तभी तो कोरोना के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित होगी। शायद उनकी बात कोरोना को पसन्द आयी और आज वे लंदन के एक हास्पिटल मेें आईसीयू में हैं। इन बयानों से चर्चिल के उस बयान की याद ताजा हो जाती है जो उन्होंने भारत में 1942 के अकाल पर दिया था। चर्चिल का कहना था कि भारतीय चूहों की तरह अपनी जनसंख्या बढ़ा रहे थे। इस अकाल से वह नियंत्रित हो जायेगी।
चलिए अब एक नज़र भारत पर डालते है। जिन लोगों ने 5 अप्रैल की दिवाली को भक्तिभाव से नहीं देखा होगा उन्हें शायद यह अहसास हुआ होगा कि इस दिन भारत की औपचारिक डेमोक्रैसी, रियल इडियोकैसी (Idiocracy) में बदल गयी। भारतीय शासक वर्गो पर गालिब का एक शेर काफी सटीक बैठता है-‘मर्ज बढ़ता गया ज्यो ज्यो दवा की’। याद कीजिए नोटबन्दी। नोटबन्दी औपचारिक तौर पर इसलिए की गयी कि काला धन पकड़ में आ जाय। नोटबन्दी के बाद सारा काला धन सफेद हो गया। जितने नोट बन्द हुए थे, उससे ज्यादा बैंको में वापस पहुंच गये। लेकिन तानाशाह की इस सनक ने करोड़ो लोगों की रोजी रोटी छीन ली और भारत की अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार दिया। उसी तरह 24 तारीख के लाक डाउन के बाद जो स्थितियां बनी उसने कोरोना फैलाने में बेहतर मदद की। लाखों प्रवासी मजदूर ‘रिवर्स लांग मार्च’ करने को मजबूर हुए। धूप और बरसात में भूखे प्यासे ये लोग कोरोना का आसान शिकार बने होगे। चंद शेल्टर होम में लोग वैसे ही ठूसे पड़े हुए है जैसे वे अपनी मजदूर बस्तियों में रहते थे। सड़क व गांव के किनारे कई ‘क्वारन्टाइन सेन्टर’ सांप व बिच्छू का केन्द्र बने हुए है। अधिकांश क्वारन्टाइन सेन्टर वस्तुतः जेल है। जहां बिना किसी अपराध के लाखों लोगों को रखा गया है। ये सभी कोराना के आसान शिकार हैं। हां उच्च व मध्य वर्ग जरूर अपने अपने घरों में सुरक्षित है। भारत में सोशल डिस्टैन्सिंग दरअसल ‘क्लास डिस्टैन्सिग’ है। इसके पीछे का असली मकसद उच्च वर्ग-मघ्यवर्ग और गरीबों के बीच डिस्टैन्स को बढ़ाना है। और कोरोना को गरीबों की ओर जाने का रास्ता देना है।

अपने तमाम साक्षात्कारों में सड़क पर आ गये इन मजदूरों ने कहा है कि हमें कोरोना से उतना डर नहीं जितना भुखमरी और पुलिस की लाठी से है। ये लाचार मजदूर खुशी खुशी अपने गांव नहीं लौट रहे है। ये उन गांवों की ओर लौट रहे हैं जहां 31 किसान प्रतिदिन आत्महत्या कर रहे है। इतने संकट के समय में भी जिस तरह पुलिस सड़कों पर मजदूरों से उठ्ठक बैठक लगवा रही है और उन पर लाठियां बरसा रही है, वह बेहद अशोभनीय है और शासक वर्ग के वर्गीय/जातीय पूर्वाग्रह और उसके परपीड़क (sadist) चरित्र को ही उजागर करता है।

उत्तर प्रदेश सरकार के दिवालियापन का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है कि कोरोना के कारण सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए उसने 11000 कैदियों को छोड़ने का निर्णय लिया, लेकिन लाॅकडाउन के तथाकथित उल्लंघन के आरोप में इससे कहीं ज्यादा लोगों को जेलों मे ठूस दिया। इससे आप सरकार के काम करने का दिवालिया तरीका समझ सकते हैं। दरअसल भारत सरकार के पास ना कोई रणनीति है ना कोई तैयारी। यहां तक कि उसके पास कोई भरोसेमंद आंकड़ा भी नहीं है। हां हर मौके को जश्न में तब्दील करना मोदी सरकार को बखूबी आता है। फिर चाहे वह मातम ही क्यो ना हो। और यह काम वह बखूबी कर रही है। यूरोपीय देशों की नकल करते हुए भारत सरकार ने बिना किसी तैयारी के एकाएक लाॅकडाउन कर दिया। लेकिन नकल के साथ कुछ अकल भी तो होनी चाहिए। रात आठ बजे लाॅकडाउन की घोषणा हाते ही जनता सोशल डिस्टैन्सिंग की धज्जियां उड़ाते हुए बड़ी संख्या में दुकानों पर उतर गयी। हास्टलों में रहने वाले छात्र-नौजवान व अस्थाई श्रमिक झुण्ड के झुण्ड सड़कों, बस स्टेशनों, रेलवे स्टेशनों पर आ गये। यह देख कर तो यही कहा जा सकता है कि यह कवादत महज इसलिए की गयी कि उच्च व मध्य वर्ग को कोराना से बचाया जाय और बदले में तमाम गरीब मजदूर जनता को कोरोना नामक शेर के आगे परोस दिया जाय।
भारत में 4 लाख लोग हर साल टीबी से मरते है। जिसका एक बड़ा कारण गरीबी है। यह लाॅकडाउन इस गरीबी को और बढ़ायेगा [‘आइएलओ’ की ताजा रिपोर्ट कहती है कि लाॅकडाउन के बाद भारत की 40 करोड़ जनसंख्या गरीबी के गर्त में और गहरे धंस जायेगी] और टीबी से मरने वालो की संख्या इस साल बढ़ सकती है। यह रणनीति कितनी कारगर है कि हम 1 व्यक्ति को कोरोना से बचायें और बदले में 4 व्यक्ति को टीबी से मारे। इस कोरोना समय में लगभग सभी अस्पतालों की ओपीडी बन्द है। दिल्ली के ऐम्स जैसे अस्पताल ने अपना ओपीडी बन्द कर दिया है। कैन्सर के गम्भीर मरीजों का भी इलाज नहीं किया जा रहा है। तमाम कैन्सर के मरीज दिल्ली में ऐम्स व अन्य अस्पतालों के आसपास अपने मरने का ही इन्तजार कर रहे है। प्राइवेट क्लीनिक चलाने वाले ज्यादातर डाक्टरों ने अपनी खुद की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए अपनी क्लीनिक बंद कर रखी है। शायद यह आंकड़ा कभी नहीं आयेगा कि हमने कितने कोरोना मरीजों को बचाया और इसके एवज में कितने अन्य बीमार लोगों को मारा। आखिर भारत कर भी क्या सकता है। पिछले दशकों में हमने हिन्दू-मुस्लिम करने में ही अपना वक्त गंवाया है। बाकी का हमारा काम तो विश्व बैंक, आईएमएफ जैसी साम्राज्यवादी संस्थाएं या अमरीका ही करता रहा है। और इनके ‘सुन्दर’ कामों का नतीजा ही है कि आज हमारे यहां 10000 लोगों पर एक सरकारी एमबीबीएस डाक्टर है। 1000 लोगो पर आधा बेड है (कई अस्पतालों में अक्सर गम्भीर बीमारी वाले दो लोगो को एक ही बेड पर लिटा देते है)। बिहार के 18 जिलों में एक भी वेन्टिलेटर नहीं है। इन्हीं परिस्थितियों के कारण भारत में हर साल 5 करोड़ 5 लाख लोग सिर्फ स्वास्थ्य खर्च के कारण गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं।
भारत किसी भी लिहाज से कोराना जैसी महामारी के लिए तैयार नहीं था। लेकिन यहां का मीडिया हर चीज के लिए तैयार रहता है। कोरोना के लिए भी यह पहले से तैयार था। पहले अमरीका के साथ हुआं हुआ करते हुए इसने कोराना के लिए चीन को निशाना बनाया, लेकिन जब ‘वेन्टिलेटर’ और ‘टेस्टिंग किट’ के लिए भारत को चीन के सामने हाथ पसारना पड़ा तो मीडिया ने अपना अभियान बीच में रोक कर अपने पसंदीदा दुश्मन मुसलमान पर आ गया और कोराना का सारा ठीकरा मुसलमानों पर फोड़ दिया। संघ के आई टी सेल वाले भी लाॅक डाउन का पूरा इस्तेमाल करते हुए खुद कोरोना की भूमिका में आ गये हैं। और लोगों को नये सिरे से संक्रमित करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। सरकार को सीएए में मुसलमानों की भूमिका का बदला लेने का मौका मिल गया। ‘राना अयूब’ के ट्विटर हैण्डल पर जारी उस विडियों को कौन भूला सकता है जहां एक मस्जिद से निकलते हुए मुसलमानों पर पुलिस लाठियां बरसा रही है। कितने मुसलमानों और मुसलमान बस्तियों को कोरोना के कारण क्वारंटाइन किया गया और कितनों को उनके मुसलमान होने के कारण किया गया, यह अब किसी से छिपा नहीं है। जब पूरी दुनिया कोराना वाइरस के जीनोम का अध्ययन कर रही है तो हम कोरोना के धर्म के अध्ययन में लगे हुए हैं।
दरअसल भारत जैसे गरीब देश में जहां 94 प्रतिशत श्रम शक्ति असंगठित क्षेत्र में काम कर रही हो, आधी से ज्यादा जनसंख्या भयानक गरीबी का जीवन जी रही हो, सम्पूर्ण लाॅकडाउन सही विकल्प कतई नही हो सकता। यहां ज्यादा से ज्यादा परीक्षण होना चाहिए था और इन परीक्षणों के आधार पर लोकल लाॅकडाउन/क्वारंटीन का सहारा लेना चाहिए था। लेकिन सच्चाई यह है कि भारत प्रति 10 लाख व्यक्ति पर महज 137 परीक्षण ही कर पा रहा है। यहां यह याद रखना होगा कि एक ही व्यक्ति के अनेक टेस्ट भी इसमें शामिल है जैसे कनिका कपूर का ही अब तक 7 टेस्ट हो चुका है। हमसे अच्छा आंकड़ा तो पाकिस्तान और श्रीलंका का है, जो क्रमशः 262 और 152 है। जबकि इटली और जर्मनी का 15000 के आसपास है।
आज भले ही कोरोना समय में उन ताकतों की बात दब जा रही हो जो लगातार पर्यावरण, स्वास्थ्य, गरीबी, जल-जंगल-जमीन का मुद्दा पुरजोर तरीके से उठा रहे थे, इस अमानवीय व्यवस्था के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर रहे थे और अपने अपने तरीके से लड़ भी रहे थे। लेकिन कोरोना बाद के समय में उनकी आवाज और तेज सुनाई देगी। 14वीं शताब्दी मे जब यूरोप को प्लेग नामक महामारी ने अपनी चपेट में ले लिया था और इसके कारण यूरोप की एक तिहाई आबादी खत्म हो गयी थी, तो इसका एक महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ था कि आम लोगो में चर्च के प्रति आस्था खत्म हो गयी और इसने यूरोप में पुर्नजागरण शुरू करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसकी तार्किक परिणति अनेक बुर्जुवा क्रान्तियों में हुई। क्या इस बार भी ऐसा होगा? ‘एडुवार्डो गैलुआनो’ का कहना था कि इतिहास वास्तव में कभी अलविदा नहीं कहता। वह कहता है-फिर मिलेंगे [History never really says goodbye. History says, ‘See you later.’]।
रात कितनी भी काली हो, उसमें आने वाली सुबह की आहट होती है। ‘चार्ल्स डिकेन्स’ का मशहूर उपन्यास ‘ए टेल ऑफ टू सिटीज’ की इस बहुउद्द्यृत पंक्ति को एक बार फिर दोहराने का मन हो रहा है-‘यह सबसे अच्छा समय है, यह सबसे खराब समय है। यह बुद्धिमत्ता का युग है, यह मूर्खता का युग है। यह विश्वास का युग है, यह अविश्वास का युग है, यह प्रकाश का मौसम है, यह अंधकार का मौसम है। यह आशा का बसन्त है, यह निराशा की सर्दी है।’
https://dastaknayesamayki.blogspot.com/ से साभार

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