कोरोना में मुसलमानः रंजीत वर्मा की कुछ कविताएं

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-रंजीत वर्मा

ऐसा नेरटिव तैयार किया गया था
कि मुसलमान खुद को
गुनहगार समझने लगे थे
दबाव में उनका
हमलावर चेहरा भी सामने आया

एक तो अफवाह उनका जीना
मुश्किल की हुई थी
और ऊपर से पुलिस और हिंदुत्ववादी
गिरोहों का दस्ता
उनके साथ खूनी खेल खेलने में लगा हुआ था

वे सुनते थे अपने बारे में
कि उनकी तलाश की जा रही है
जबकि वे कहीं छिपे नहीं होते थे

राज्य इस महामारी के वक्त
अपनी छवि किसी मददगार मित्र
या किसी रहनुमा डॉक्टर की नहीं
एक निपट पुलिस की बनाए हुए था
जो सामने दिख जाने वाले जरूरतमंद पर
लाठी की तरह टूट पड़ता था

प्रधान जी ने देश के नाम संदेश में कहा
एक भी नये मरीज का मिलना
हजार लोगों की आजादी को छीन सकता है
बात साफ थी
जो हजारों लोगों को समझ में आई
कि अपनी आजादी किसी एक के लिए
खोने की जरूरत नहीं
दुश्मन चिन्हित करो
वहीं निपटाओ और अपनी आजादी बचा लो

संदेह नफरत और हिंसा फ़ैलाने के लिए
इस घोषणा की जवाबदेही
इतिहास तय करेगा
और अपना कठोरतम फैसला सुनाएगा

झूठ ऐसा गढ़ा गया था
कि मुसलमानों को बीमार नहीं
बल्कि बीमारी फैलाने वाला
माना जाने लगा था
वे पीड़ित थे
लेकिन उन्हें अपराधी बताया जा रहा था
सरकार षड़यंत्र के सिद्धांत पर काम कर रही थी
और पूरा देश षड़यंत्र का शिकार हो रहा था
क्या हिन्दू और क्या मुसलमान

सत्ता का यह आजमाया हुआ तरीका था
पिछले तमाम दंगों के समय में
देश ने देखा था कि
कैसे उनकी हत्या की जाती रही
और कैसे उन्हें ही दोषी बताया जाता रहा
कुछ उन हत्याओं के लिए
जो वे बचाव में किया करते थे

खबरों में
मरीज मुसलमानों की संख्या
अलग से बताई जाती थी
उनका इलाज अलग वार्ड में रखकर होगा
ऐसी भी खबरें आ रही थीं
कई गांवों ने मुसलमानों के प्रवेश पर
रोक लगा दी थी
कई जगहों पर मुसलमानों से कुछ भी
न खरीदने का फरमान जारी किया जा रहा था
मुसलमानों को कुछ जगहों पर हमला करते
टीवी पर बार-बार दिखाया जाता रहा
यह सब क्यों हो रहा था
जवाब कहीं नहीं था

बहुत सारे मुस्लिम मोहल्ले को
हॉटस्पॉट घोषित कर
चारों ओर से सील कर दिया गया था
लॉकडाउन के भीतर एक और लॉकडाउन
बाहर का लॉकडाउन खत्म कर
भीतर के लॉकडाउन को बरकरार रखने के
किसी प्रयोग की क्या यह तैयारी है
इस सवाल पर देश की सरकार चुप थी

कोरोना खत्म होने के बाद भी क्या
यह हॉटस्पॉट बना रहेगा
और उसके चारों तरफ
उमड़ती चली आ रही हिंदू भीड़ होगी
उसे नोच खाने को तैयार की गई भीड़
भूखी बदहाल और हिंसक
देश की सरकार चुप थी

आज उन पर बीमारी फैलाने का
आरोप लगाकर मारा जा रहा है
क्या कल उन्हें यह कहकर मारा जाएगा
कि वे बहुत खाते हैं
और देश में अन्न की कमी का कारण बने हुए हैं
देश की सरकार चुप थी

लोगों ने सोचा शायद हमेशा की तरह
इस बार भी सरकार
हिंदू मुसलमान का खेल खेल रही है
जबकि घृणा के खौलते कड़ाही में
मानवता को डुबोने की
पूरी तैयारी कर ली गई थी
मानव सभ्यता के इतिहास में
यह पहली बीमारी थी
जो प्रेम, दया और मानवता नहीं रच रही थी
बल्कि इसके ठीक उलट
संदेह, घृणा और अलगाव का संसार रच रही थी।

—–
[6:52 PM, 4/16/2020] +91 95993 46329: बस यह संविधान उनके रास्ते से हट जाए

गली के गुंडों से
शरीफ लोग दूर रहते हैं
वे उनके मुंह नहीं लगते
चाहे वह पड़ोस की किसी लड़की को
छेड़ ही क्यों न दें
ज्यादा से ज्यादा वे कानाफूसी करके रह जाते हैं

लेकिन वही लोग
स्नूपगेट कांड को लेकर चुप नहीं रहते
तल्ख टिप्पणियां करते हैं
अखबारों में कार्टून बनाते हैं
चुटकुले गढ़ते हैं
सख्त कविताएं लिखते हैं
उस शख्स के प्रधान जी बन जाने पर भी नहीं डरते
उलटे अपनी जुबान और तल्ख कर लेते हैं
अपनी कलम और पैनी कर लेते हैं
गली के मामूली गुंडों से
बच कर चलने वाले ये लोग
प्रधान जी के रास्ते में तनकर खड़े रहते हैं

वे जानते हैं
उनके और प्रधान जी के बीच संविधान है
जिसे प्रधान जी लांघ नहीं सकते
यह विश्वास शरीफों को भय से मुक्त करता है
जबकि गुंडा संविधान से बाहर होता है
वह तंत्र की पकड़ से बाहर का आदमी होता है
उसकी कोई मजबूरी नहीं होती
वह कभी भी आपके घर में घुसकर
दाभोलकर पानसरे कलबुर्गी या गौरी लंकेश की तरह
आपकी हत्या कर सकता है
वह सच के अंतिम परत तक जाने को अडिग
न्यायाधीश की हत्या कर उनका लोया कर सकता है
वह खुश हो जाए तो
सम्मानित कर उनका गोगोई भी कर सकता है

वह वरवरा राव अरुण फरेरा सुधीर ढाबले
या इसी तरह के लोगों का
जेल से बाहर आने का रास्ता
अनंत समय के लिए बंद कर सकता है
और जो बाहर हैं जैसे कि
गौतम नवलखा या आनंद तेलतुंबडे
या इन्हीं जैसे कई दूसरे लोग
उनकी अग्रिम जमानत की अर्जी फाड़कर
वह कूड़ेदान में फेंक सकता है

गुंडा किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होता
उसकी कोई मजबूरी नहीं होती
वह लोकतंत्र का हिस्सा नहीं होता
वह सत्ता पक्ष के विधायक खरीद कर
रातों-रात लोकतंत्र का अपहरण कर सकता है

वह लाशों के ढेर के बीच
दीयों का जश्न मना सकता है
चारों ओर पसरे मातम और मनहूसियत के बीच
पटाखे छोड़ सकता है
लाखों घरों से उठते विलाप के बीच
जोरदार भाषण दे सकता है
भय और भूख से बदहाल भटकती जिंदगी के बीच
वह आगे बढ़ने के गीत
सफलतापूर्वक गा सकता है

यह सब काम प्रधान जी भी कर सकते हैं
वे भी मजबूरी से मुक्त हो सकते हैं
जवाबदेही से मुकर सकते हैं
वे भी चाहें तो खुद को
लोकतंत्र का हिस्सा नहीं मान सकते हैं
कुछ भी असंभव नहीं उनके लिए
बल्कि वे और भी मजे में यह सब कर सकते हैं
वे तो ऐसा नृशंस दृश्य खड़ा कर सकते हैं
कि जल्लाद के भी रोंगटे खड़े हो जाएं
बस यह मुआ संविधान उनके रास्ते से हट जाए।

-रंजीत वर्मा
[6:53 PM, 4/16/2020] +91 95993 46329: उनका अपमान था यह जश्न

उनका अपमान था यह जश्न
अंधेरे से लड़ते हुए
जो अपनी जान गंवा रहे थे

वे जो पैदल चल पड़े थे
हजारों मील दूर घर की ओर वापस
लेकिन जो रास्ते में ही रह गये थे कहीं
या जो किसी तरह घर पहुंच तो गये थे
लेकिन दमड़ी तक बची नहीं थी जिनके पास
और अन्न का एक भी दाना
न उनके पेट में था न खोंचर में
उनका अपमान था यह जश्न

वे जो एक दुर्भिक्ष से होकर गुजर रहे थे
सिकुड़ चुके पेट जिसकी गवाही दे रहे थे
जिनकी पथराई आंखों पर
पिघलकर टपकते मोम
बहते आंसू का धोखा पैदा कर रहे थे
लगता था उनके अंदर का लोहा
गलकर बह रहा हो
उनका अपमान था यह जश्न

पिछले महीने दिल्ली में हुए
दंगे में जो मारे गए थे
उनके परिवार के लिए
यह समझना मुश्किल नहीं था
कि इस जश्न में उनकी हिंसा भी शामिल थी

फर्जी आरोपों में जिन लड़कों को घरों से
अंधेरा घिरते ही
पुलिस उठाकर ले जाती रही
उन घरों के लिए
असहनीय पीड़ा की तरह था
यह जश्न

कोरोना के कदम
जिन घरों पर पड़ चुके थे
उनके लिए यह जश्न
असभ्य समाज के उल्लास की तरह था

जश्न में शामिल लोगों की परछाइयां
अंधकार में जल रहे
दीयों और मोमबत्तियों की रौशनी में
दिख रही थी
लंबी और भयावह
जो खौफ और शोक में डूबे
करोड़ों लोगों की बस्ती पर
प्रेत की तरह डोलती रही थी रातभर।

-रंजीत वर्मा
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उनका अपमान था यह जश्न

उनका अपमान था यह जश्न
अंधेरे से लड़ते हुए
जो अपनी जान गंवा रहे थे

वे जो पैदल चल पड़े थे
हजारों मील दूर घर की ओर वापस
लेकिन जो रास्ते में ही रह गये थे कहीं
या जो किसी तरह घर पहुंच तो गये थे
लेकिन दमड़ी तक बची नहीं थी जिनके पास
और अन्न का एक भी दाना
न उनके पेट में था न खोंचर में
उनका अपमान था यह जश्न

वे जो एक दुर्भिक्ष से होकर गुजर रहे थे
सिकुड़ चुके पेट जिसकी गवाही दे रहे थे
जिनकी पथराई आंखों पर
पिघलकर टपकते मोम
बहते आंसू का धोखा पैदा कर रहे थे
लगता था उनके अंदर का लोहा
गलकर बह रहा हो
उनका अपमान था यह जश्न

पिछले महीने दिल्ली में हुए
दंगे में जो मारे गए थे
उनके परिवार के लिए
यह समझना मुश्किल नहीं था
कि इस जश्न में उनकी हिंसा भी शामिल थी

फर्जी आरोपों में जिन लड़कों को घरों से
अंधेरा घिरते ही
पुलिस उठाकर ले जाती रही
उन घरों के लिए
असहनीय पीड़ा की तरह था
यह जश्न

कोरोना के कदम
जिन घरों पर पड़ चुके थे
उनके लिए यह जश्न
असभ्य समाज के उल्लास की तरह था

जश्न में शामिल लोगों की परछाइयां
अंधकार में जल रहे
दीयों और मोमबत्तियों की रौशनी में
दिख रही थी
लंबी और भयावह
जो खौफ और शोक में डूबे
करोड़ों लोगों की बस्ती पर
प्रेत की तरह डोलती रही थी रातभर।

-रंजीत वर्मा

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बस यह संविधान उनके रास्ते से हट जाए

गली के गुंडों से
शरीफ लोग दूर रहते हैं
वे उनके मुंह नहीं लगते
चाहे वह पड़ोस की किसी लड़की को
छेड़ ही क्यों न दें
ज्यादा से ज्यादा वे कानाफूसी करके रह जाते हैं

लेकिन वही लोग
स्नूपगेट कांड को लेकर चुप नहीं रहते
तल्ख टिप्पणियां करते हैं
अखबारों में कार्टून बनाते हैं
चुटकुले गढ़ते हैं
सख्त कविताएं लिखते हैं
उस शख्स के प्रधान जी बन जाने पर भी नहीं डरते
उलटे अपनी जुबान और तल्ख कर लेते हैं
अपनी कलम और पैनी कर लेते हैं
गली के मामूली गुंडों से
बच कर चलने वाले ये लोग
प्रधान जी के रास्ते में तनकर खड़े रहते हैं

वे जानते हैं
उनके और प्रधान जी के बीच संविधान है
जिसे प्रधान जी लांघ नहीं सकते
यह विश्वास शरीफों को भय से मुक्त करता है
जबकि गुंडा संविधान से बाहर होता है
वह तंत्र की पकड़ से बाहर का आदमी होता है
उसकी कोई मजबूरी नहीं होती
वह कभी भी आपके घर में घुसकर
दाभोलकर पानसरे कलबुर्गी या गौरी लंकेश की तरह
आपकी हत्या कर सकता है
वह सच के अंतिम परत तक जाने को अडिग
न्यायाधीश की हत्या कर उनका लोया कर सकता है
वह खुश हो जाए तो
सम्मानित कर उनका गोगोई भी कर सकता है

वह वरवरा राव अरुण फरेरा सुधीर ढाबले
या इसी तरह के लोगों का
जेल से बाहर आने का रास्ता
अनंत समय के लिए बंद कर सकता है
और जो बाहर हैं जैसे कि
गौतम नवलखा या आनंद तेलतुंबडे
या इन्हीं जैसे कई दूसरे लोग
उनकी अग्रिम जमानत की अर्जी फाड़कर
वह कूड़ेदान में फेंक सकता है

गुंडा किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होता
उसकी कोई मजबूरी नहीं होती
वह लोकतंत्र का हिस्सा नहीं होता
वह सत्ता पक्ष के विधायक खरीद कर
रातों-रात लोकतंत्र का अपहरण कर सकता है

वह लाशों के ढेर के बीच
दीयों का जश्न मना सकता है
चारों ओर पसरे मातम और मनहूसियत के बीच
पटाखे छोड़ सकता है
लाखों घरों से उठते विलाप के बीच
जोरदार भाषण दे सकता है
भय और भूख से बदहाल भटकती जिंदगी के बीच
वह आगे बढ़ने के गीत
सफलतापूर्वक गा सकता है

यह सब काम प्रधान जी भी कर सकते हैं
वे भी मजबूरी से मुक्त हो सकते हैं
जवाबदेही से मुकर सकते हैं
वे भी चाहें तो खुद को
लोकतंत्र का हिस्सा नहीं मान सकते हैं
कुछ भी असंभव नहीं उनके लिए
बल्कि वे और भी मजे में यह सब कर सकते हैं
वे तो ऐसा नृशंस दृश्य खड़ा कर सकते हैं
कि जल्लाद के भी रोंगटे खड़े हो जाएं
बस यह मुआ संविधान उनके रास्ते से हट जाए।

-रंजीत वर्मा

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