कोरोना की दूसरी लहर: भारत और ताइवान

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पिछले कई हफ़्तों से भारत में कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप चल रहा है। विगत वर्ष 2020 के बीत जाने की दुआएं मांगने वाले अब कह रहे हैं कि 2020 में आया वायरस इस वर्ष वाले वायरस की अपेक्षा कम खतरनाक था। तथाकथित ‘भारतीय रोग प्रतिरोधक क्षमता’ उस पर भारी पड़ रही थी। कितने ही लोग पिछले साल सिर्फ़ एसिंप्टोमेटिक थे यानी पॉजिटिव होते हुए भी रोग का कोई लक्षण उनमें दिखाई न देता था। इस वर्ष वाला वायरस का वेरिएंट इतना भयानक है कि वृद्धों और अधेड़ों को तो छोड़िए, जवान लोगों तक को अपनी चपेट में ले रहा है। तीस की उम्र के लोग भी अपनी जान गंवा रहे हैं।

भारत की स्थिति बुरी है। अपार जनसंख्या और क्षत-विक्षत ‘सिस्टम’। ऑक्सीजन सिलेंडर, रेमीडिसीवर या जो भी दवाइयां जान बचा सकती हैं, सब बाज़ार से गायब हो जाती हैं। उनकी कालाबाज़ारी हो रही है। कालाबाज़ारी करने वाले क्या यह भी नहीं सोचते कि बीमारी उनके भी प्राण ले सकती है? और यदि पैसे से जान बच पाती तो बहुत धनाढ्य लोग भी अपनी जान यूं गंवा न रहे होते ‌।

मृत्यु के बाद देह की भी बेक़द्री हो रही है। कोई अपने परिजन का शव घर या मरघट तक ले जाने के लिए भटक रहा है।  कोरोना से मरे लोगों के दाह संस्कार के लिए लकड़ी उपलब्ध नहीं है। कहीं लकड़ी है, तो जलाने के लिए श्मशान में जगह उपलब्ध नहीं है। कुछ लाशें दफ़नायी जा रही हैं जबकि मरने वाला एक दूसरी परंपरा का पालक था। असल विडंबना यह है कि कुछ लाशें नदियों में नदियों में बहाई जा रही हैं। नदी भी सोचती होगी कि उसमें बहाने को राख ही क्या कम थी? नदी के ऊपर लाशों को नोचकर खाने के लिए कौवे मंडरा रहे हैं। कुछ बड़े शहरों में दाह संस्कार के लिए भी लाखों रुपए लिए जा रहे हैं। ऐसा अवसरवाद? मनुष्य का यह बेहद क्रूर रूप है।

इसी मानवता का एक दूसरा चेहरा भी है। आशान्वित करता उज्ज्वल चेहरा। ये लोग गरीबों में राशन बांट रहे हैं। नितांत अपरिचित मरीजों के लिए बेड, आईसीयू और ऑक्सीजन का इंतजाम करने में लगे हैं। प्लाज्मा थेरेपी पर अब भारत में रोक लगा दी गई है, किंतु जब तक वह वैध थी, ये मददगार लोग स्वयं भी कोरोना पीड़ित होने के लिए तैयार थे, ताकि इनके भीतर प्लाज्मा बन सके और वे उसे दान कर सकें। इसमें मेरे कई साहित्यकार मित्र शामिल हैं। रह-रहकर उन पर प्यार आता है। बार-बार यह ख़्याल आता है कि भारत देश को सरकारों ने नहीं, बल्कि ऐसे ही मददगारों ने बचाया हुआ है।

अप्रैल के मध्य तक भारत में मेरे परिवार के सभी सदस्य कोरोना की चपेट में आ गए थे। सबसे पहले बहन को लक्षण हुए और उसने खुद को सबसे अलग कर किया। फिर भाई और उसकी पत्नी, फिर और मम्मी में भी लक्षण नजर आने लगे। पौने दो साल का भतीजा भी कोरोना की चपेट में आ गया। छोटे से बच्चे की बुखार से चढ़ी हुई आंखें। सोचकर ही दिल कांप जाता है। यह ईश्वर की कृपा रही कि सबको जयपुर में इलाज मिल गया और सब उबर रहे हैं। बहन को थोड़ी खांसी अब भी है। भाई को कमज़ोरी बनी हुई है।

साहित्य समाज से बहुत सी शिकायतें होते हुए भी इसमें कई अच्छाइयां भी हैं। इनमें से एक है कि किसी साहित्यकार की मृत्यु पर उसे समुचित सम्मान सहित विदाई दी जाती है। कुछ पत्रिकाएं उनके सकल रचनाकर्म पर केंद्रित अंक निकालती हैं। अन्य साहित्यकार उनका मूल्यांकन करते हैं, उन पर आलेख लिखते हैं। वैसे बेहतर यह होता कि हम अपने साहित्यकारों को जीते जी वह सम्मान दे पाते जो हम मरने के बाद देते हैं। कोरोनावायरस ने हमसे साहित्यकारों को इतनी अधिक संख्या में अचानक छीन लिया है कि साहित्य का आकाश बहुत सूना सा लगने लगा है। और उन्हें यथोचित विदाई देने वाली पत्रिकाएं बंद है। जान बचेगी, तब ही कोई पत्रिका निकालेगा।  ज़रा इन नामों पर गौर कीजिए- शंख घोष, विजेंद्र, नरेंद्र कोहली, मंगलेश डबराल, प्रभु जोशी, मंजूर एहतेशाम, रेवती रमन,‌‌‌‌ नवल किशोर, रमेश उपाध्याय, कुंवर बेचैन,  राजेश घरपुरे, सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव, शुक्ला चौधरी, राजकुमार केसवानी, लाल बहादुर वर्मा, कुमार नयन, अरविंद कुमार,  कांति कुमार जैन,  सुकांत सोम इत्यादि। इनके बीच उपस्थित अल्पविराम महज एक भाषाई तरतीब के अनुरूप दिये गये अंतराल नहीं हैं, निर्वात हैं। ‌ इस सूची के ‘इत्यादि’ शब्द में अनेक चर्चित, परिचित और उभरते साहित्यकार समाहित हैं। इस बारे में मैं अग्रज कवि कुमार मुकुल से चर्चा कर रहा था। कुछ नाम उन्होंने बताए। जब मैंने उन्हें यह नामों की सूची भेजी तो वे अवाक रह गए और बोले- “देखते-देखते कितने लोग चले गए!” तब ‘इत्यादि’ के नाम जोड़ने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। इस सूची में और नाम ना जुड़ें, यही अरदास दिन-रात है।

अप्रैल- 2021 के उत्तरार्ध में भारत में कोरोना की स्थिति भयंकर हो गई, तब ताइवान की प्रमुख विपक्षी पार्टी केएमटी ने यहां की सरकार से भारत को मदद पहुंचाने की अपील की। संभव है कि यहां की सरकार की मंशा भी पहले से ही मदद की रही हो। उन्होंने अगले ही दिन घोषणा कर दी कि ताइवान की सरकार भारत की मदद करने के लिए तैयार है और भारत के उच्चाधिकारियों से इस बारे में बात कर रही है। मैंने ताइवान के विदेश मंत्रालय (मिनिस्ट्री ऑफ फॉरेन अफेयर्स) के फेसबुक पेज को संदेश भेजकर आभार व्यक्त किया। आमतौर पर आप किसी देश के मंत्रालय से फेसबुक पर जवाब की अपेक्षा नहीं रखते। भारत में तो कभी-कभी पटवारी तक आम जनता की सुनवाई नहीं करता, मंत्रालय की तो बात ही दूर की है।  ताइवान की इस बात ने फ़िर मेरा दिल जीत लिया कि अगले ही दिन मुझे मंत्रालय से संदेश मिला कि हम भारत के साथ खड़े हैं। कुछ ही दिनों में भारत को ऑक्सीजन एवं अन्य सहायता यहां से भेजी गई।

भारत की तुलना में कई अन्य देश कोरोना प्रबंधन में अधिक सजग रहे। ऐसे देशों में बसे भारतीय खुद को खुशनसीब मान सकते हैं। उन्हें पता है कि यदि वे कोविड पॉजिटिव हो भी जाते हैं, तो उन्हें दवाइयों, चिकित्सा, ऑक्सीजन और बेड के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। किंतु ऐसा नहीं है कि वे अपने परिवार और अपने लोगों को भूल गए हैं। कोई भी इंसान अपनी जड़ों को कहां छोड़ पाता है। दान की राशि का ज़िक्र करना उचित नहीं होता। बस यही कहूंगा कि मैंने भी अपनी तरफ़ से अक्षय पात्र एवं इस तरह की अन्य संस्थाओं को अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ राशि भेजी है। ताइवान में बसे भारतीयों ने अपने सगे-संबंधियों के लिए यहां से ऑक्सीजन सिलेंडर भेजे हैं। कुछ ने मेरी तरह सामुदायिक सहायता हेतु राशि दान की है।
……

ताइवान ने अब तक कोरोना की स्थिति पर काबू रखा हुआ था। एक समय ऐसा भी रहा कि लगातार 250 दिन से भी अधिक अवधि तक ताइवान में एक भी स्थानीय कोरोना संक्रमण का मामला नहीं आया। पर अप्रैल के अंत में एक एयरलाइंस के पायलटों के माध्यम से कोरोना के कुछ मामले सामने आए। फिर राजधानी ताइपे और न्यू ताइपे में कुछ जगह कोरोना पॉजिटिव केस आने लगे। पिछले कुछ दिन से लगातार प्रतिदिन दो सौ से ऊपर मामले आ रहे हैं। अब तक अधिकतम दैनिक रिकॉर्ड (333) 17 मई 2021 का है। यह रिकॉर्ड टूट न जाए, बस।

ताइवान ने जनवरी 2020 से ही पूरी दुनिया के सामने कोविड प्रबंधन की नज़ीर प्रस्तुत की थी। वह पुनः मुस्तैदी से जुट गया है। स्थिति की गंभीरता के आधार पर यहां चार स्तरों पर महामारी अलर्ट परिभाषित किए गए हैं।  शुरुआत में सिर्फ़ क्लस्टर इंफेक्शन वाले इलाक़ों में स्तर-3 का अलर्ट लगाया गया था जिसे 19 मई से पूरे ताइवान में लागू कर दिया गया है। यह 28 मई तक जारी रहेगा। स्कूल और कॉलेज बंद कर दिए गए हैं। कक्षाएं ऑनलाइन आयोजित हो रही हैं। विदेशों से आने वाली उड़ानों से सिर्फ़ ताइवान के नागरिक और यहां का रेजिडेंट वीज़ा रखने वाले ही देश में प्रवेश कर सकते हैं। उन्हें भी आने के बाद क्वारंटाइन में रहना होगा।  बिना मास्क के निकलने पर जुर्माना भी लगाया जा रहा है। यह नियम लागू होने के एक दिन बाद ही सैकड़ों लोगों पर जुर्माना लगाया गया ‌‌।

स्तर-3 अलर्ट के दौरान मैं रात को मास्क लगाकर टहलने निकला तो ‌रास्ते में पुलिस की गाड़ी गश्त लगाती मिली। वह हर उस रास्ते पर जा रही थी जहां वह प्रवेश कर सकती थी।  मुझे घूमता देख गाड़ी धीमी हुई और मास्क देखकर आगे चल दी। मैं आगे जाकर मुड़ गया और एक मंदिर के सामने खाली पड़े मैदान की बेंच पर बैठ गया। उस बेंच के नीचे एक बिल्ली कुछ तलाश रही थी जो मेरे जाने से हट गई। कुछ देर बाद वह लौट आई। उसने देखा कि मैं उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचा रहा हूं तो वह निर्भय हुई। बेंच की त्रिविमीय दुनिया में हम दो जीव अपने-अपने कामों में संलग्न रहे। वह चूहे और कीड़े ढूंढने जैसा महत्वपूर्ण काम करती रही। और मैं?‌ मैं गीत और कविताएं गाता रहा।

मई के उत्तरार्ध में ताइवान के चियाई शहर में एक कॉन्फ्रेंस थी, जहां मुझे अपना शोधकार्य प्रस्तुत करने जाना था, उसे स्थगित कर दिया गया है। जब कोविड यहां लगभग शांत था तब मेरी योजना कांफ्रेंस के बाद आगे आलीशान पर्वत घूमने जाने की भी थी। ताइवान में ऐसी दो जगह हैं जहां मैं घूमने जाना चाहता हूं और इतने वर्षों में जा नहीं पाया हूं। आलीशान पर्वत उनमें से एक है। फ़िर कभी सही। चियाई तक जाने की ट्रेन की टिकट मैंने बुक करा ली थी और गाओची रोड वाले फैमिली मार्ट जाकर उसका प्रिंट आउट भी ले लिया था।  होटल भी बुक कर लिए थे। कॉन्फ्रेंस रद्द होने की सूचना मिलते ही होटल आसानी से कैंसिल हो गए, पर ट्रेन की टिकट कैंसिल करने के लिए टिकट का प्रिंट आउट होना ज़रूरी है। वही मुझसे खो गया है। यह भी संभव नहीं है कि दूसरी बार किसी कन्वीनियंस स्टोर से प्रिंटआउट लेकर फिर उसे कैंसिल कराया जा सके। काश, मुझे ये नियम पहले पता होते। अब यात्रा की तारीख़ निकल चुकी है और यदि अब टिकट मिल भी जाए तो उसे कैंसिल नहीं किया जा सकता। इस टिकट के खो जाने से लगभग 2000 भारतीय रुपए का नुकसान हुआ है। मैं लगभग डेढ़ साल से भारत नहीं जा सका हूं। कभी-कभी लगता है कि जाने कब मेरा अपना स्वास्थ्य और भारत की स्थिति दोनों इतनी अच्छी होंगी कि मैं घर जा सकूंगा।  वैसे मेरा दुख कोई ख़ास नहीं। मेरे देश में लोगों ने अपनी सारी जमा पूंजी अपनों को बचाने में ख़र्च कर दी है और फिर भी नहीं बचा पाए हैं। जाने कितने लोगों की कितनी योजनाएं कोरोना की वजह से ताक पर रखी हैं।

आजकल, यूनिवर्सिटी की तरफ से रोज़ कई बार ईमेल आते हैं। उनमें कोविड से बचाव के लिए रखने वाली सावधानियां और नए नियमों की जानकारी होती है। हिम्मत देते दो बोल भी होते हैं कि घबराने की ज़रूरत नहीं है। यह शायद इसलिए भी क्योंकि पाबंदी बढ़ने की आशंकाओं के बीच यहां के सुपरमार्केट्स में भीड़ मच जाती है। भारत में शायद यह हास्यास्पद लगे पर सबसे पहले टॉयलेट पेपर के गट्ठर खरीद लिए जाते हैं। हम भारतीय इस मामले में बेफ़िक्र हैं, क्योंकि हमारा काम एक मग से चल जाता है।

हमारे एस्ट्रोनॉमी डिपार्टमेंट की तरफ से एक यूट्यूब वीडियो का लिंक आया जिसमें मास्क के किनारे बांधकर उसे लगाने की तकनीक बताई गई थी। यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट (इस पद को शायद भारत में वाइस चांसलर कहेंगे) का ईमेल आया था‌‌। उन्होंने लिखा कि तीस साल के कार्यकाल में विभिन्न पदों पर रहते हुए यह सबसे कठिन दौर है। यदि कोई विद्यार्थी इस समय पार्ट-टाइम जॉब नहीं कर पाने के कारण अपना ख़र्चा नहीं उठा पा रहा है, तो वह यूनिवर्सिटी से आर्थिक मदद पाने के लिए आवेदन कर सकता है। यूनिवर्सिटी ने पिछले साल से ‘लव इन कोविड-19’ नाम से एक फंड इकट्ठा करने का प्रोजेक्ट शुरू कर दिया था। इसके माध्यम से ज़रूरतमंद विद्यार्थियों की मदद की जा रही है।

भारत हो या ताइवान, मदद के लिए बढ़े हुए हाथ हमें मनुष्य होने पर गौरवान्वित महसूस कराते हैं। इन दयावान मनुष्यों में

ईश्वर बसता है। ईश्वर अपना अस्तित्व और व्यापक करे। सभी मनुष्यों के ह्रदय में दयाभाव हो।

देवेश पथ सारिया

25 मई 2021

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