कोरोना का कहर और प्रशासनिक संवेदनहीनता : आपदा के नाम पर लूटतंत्र हावी

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विशद कुमार
यहां दो ऐसे आदिम जनजाति परिवार मिले जिनके नाम से दो-दो राशन कार्ड बने हैं, जबकि इन्हें एक कार्ड से खाद्यान्न दिया जा रहा है। मनोहर बैगा, पिता गिरवर बैगा के नाम से 2 राशन कार्ड बनाया गया है जिसकी संख्या 202005051112 व 202005574268 है। जबकि लाभुक को एक कार्ड से खाद्यान्न दी जा रही है। ऑनलाइन रिकॉर्ड के अनुसार दूसरे कार्ड से प्रत्येक माह राशन का उठाव किया जा रहा है। इसी प्रकार कार्ड सं0 — 202005574126 है, जो अन्छू परहिया के नाम से है, जबकि वह बहुत पहले ही हो मर चुका है। इस मामले का सबसे भ्रष्टतम और शर्मनाक पहलू यह है कि उसके नाम से भी हर माह 35 किलो का राशन उठाव किया जा रहा है। दूसरी तरफ बसन्ती कुअंर जिसकी कार्ड सं0 — 20200557426863 है, को कार्ड रहने के बावजूद उसे अप्रैल 2018 के बाद से खाद्यान्न वितरित नहीं किया गया है, जबकि इसके कार्ड में भी ऑनलाइन रिकॉर्ड बताता है कि उसे नियमित राशन वितरित किया गया है।

पूरी दुनिया कोरोना से जंग लड़ रही है, भारत भी इससे अछुता नहीं है। पूरे देश में 3 मई तक लॉकडाउन है। देश के करोड़ों गरीब—मजदूर रोजगार और भूख को लेकर भयभीत हैं। एक तरफ सरकार किसी को भूख से नहीं मरने देगी, की घोषणा पर घोषणा कर रही है। वहीं दूसरी ओर देश की नौकरशाही ऐसी संवेदनशील व इस आपदा की घड़ी में भी अपनी संवेदनहीनता से बाज नहीं आ रही है। खासकर आपूर्ति विभाग अपनी तिजोरी भरने की मशक्कत में भूखों के निवाले पर कुण्डली जमाये बैठा है। देश के कई राज्यों से गरीब—मजदूरों की भूख से बिलबिलाने की खबरें सूर्खियों हैं। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि इस कोरोना के खौफनाक संकट में आम गरीब, भूख की समस्या से परेशान लोग अपनी फरियाद लेकर किसके पास जाये?

झारखंड जो आदिवासी बहुल राज्य है, जहां 24 जिलों में कुल 260 प्रखंड हैं, जिनमें से 168 प्रखण्डों में खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले, झारखण्ड सरकार के दिशा-निर्देश के अनुसार प्रखण्ड स्तर पर अधिकारियों की नियुक्ति की गई है, जिन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गठित स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से डाकिया योजना के तहत 35 किलो का खाद्यान्न पैकेट बनाकर इन प्रखंडों के गांवों में आदिम जनजातियों के घर तक वितरण सुनिश्चित करने की जिम्मेवारी दी गई है, जिसकी जवाबदेही सरकारी डीलर के तौर पर प्रखण्ड आपूर्ति पदाधिकारी को दी गई है।

मगर आलम यह है कि निजी डीलरों (जन—वितरण प्रणाली दुकानदार) की तरह ही ये सरकारी डीलर प्रखण्ड आपूर्ति पदाधिकारी को न तो सरकार के आदेश की चिंता है और न ही अपने उच्चाधिकारियों का खौफ, इन्हें चिंता है तो बस इस आपदा का लाभ कैसे उठाया जाय, इसकी चिंता है।

विदित हो कि पलामू जिले के डालटनगंज सदर प्रखंड अंतर्गत सुआ पंचायत के बिन्हुआ टोला में करीब 35 आदिम जनजाति परहिया परिवार रहता है। जो पहले से ही अत्यन्त गरीबी की हालत में जिन्दगी गुजार रहा है। अब इस कोरोना की महामारी के संकट और इसके मद्देनजर लॉकडाउन से इनकी हालत और खराब हो गई है।

इस टोला के परहिया परिवारों को एम0 ओ0 द्वारा अप्रैल एवं मई 2020 का खाद्यान्न मुहैया कराना था, लेकिन लाभुकों को सिर्फ एक माह का राशन दिया गया है, जबकि उनके कार्ड में जून 2020 तक राशन की मात्रा दर्ज कर दी गई है। इसकी जानकारी वहां के लोगों कों तब हुई, जब झारखंड नरेगा वाच के राज्य संयोजक जेम्स हेरेंज अपनी टीम के साथ वहां जाकर यह जानने की कोशिश की कि उन्हें सरकारी सुविधा का लाभ मिल रहा है या नहीं? वैसे भी यहां के इस परहिया समुदाय के लोगों में साक्षरता की संख्या नगण्य है। उन्हें जब उनके कार्ड में दर्ज मात्रा की जानकारी मिली तो वे लोग आक्रोशित तो हुए, परंतु इस संकट की घड़ी में ये लोग इस डर से शिकायत दर्ज कराने से पीछे हट गए, क्योंकि उन्हें इस बात का डर सताने लगा कि कहीं उनको जो भी कुछ खाने को मिल रहा है, वह भी न बंद हो जाये।

टीम द्वारा जब एक-एक कार्ड की जांच की गई, तो राशन चोरी के कई अन्य मामले भी सामने आए। यहां दो ऐसे आदिम जनजाति परिवार मिले जिनके नाम से दो-दो राशन कार्ड बने हैं, जबकि इन्हें एक कार्ड से खाद्यान्न दिया जा रहा है। मनोहर बैगा, पिता गिरवर बैगा के नाम से 2 राशन कार्ड बनाया गया है जिसकी संख्या 202005051112 व 202005574268 है। जबकि लाभुक को एक कार्ड से खाद्यान्न दी जा रही है। ऑनलाइन रिकॉर्ड के अनुसार दूसरे कार्ड से प्रत्येक माह राशन का उठाव किया जा रहा है। इसी प्रकार कार्ड सं0 — 202005574126 है, जो अन्छू परहिया के नाम से है, जबकि वह बहुत पहले ही हो मर चुका है। इस मामले का सबसे भ्रष्टतम और शर्मनाक पहलू यह है कि उसके नाम से भी हर माह 35 किलो का राशन उठाव किया जा रहा है।

दूसरी तरफ बसन्ती कुअंर जिसकी कार्ड सं0 — 20200557426863 है, को कार्ड रहने के बावजूद उसे अप्रैल 2018 के बाद से खाद्यान्न वितरित नहीं किया गया है, जबकि इसके कार्ड में भी ऑनलाइन रिकॉर्ड बताता है कि उसे नियमित राशन वितरित किया गया है।

जब डालटनगंज सदर प्रखंड के प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी से इन आदिम जनजातियों के अनाज वितरण में गड़बडी के मामले पर जब पूछा गया तो उन्होंने बताया कि आदिम जनजाति को डाकिया योजना के तहत मिलने वाले अनाज के लिए कोई दुकानदार नियुक्त नहीं है। इसे प्रखण्ड आपूर्ति पदाधिकारी ही देखते हैं। मतलब कि वे खुद इसे देखते हैं।

जब एक परिवार के दो—दो राशन कार्ड के बारे में पूछा गया, तो उसने कहा कि मेरे संज्ञान में नहीं है, मैं मामले को देखता हूं और जांच करता हूं।

राशन लाभुकों के घर तक पहुंचाने के सवाल पर उनका निम्न बयान काफी गैरजिम्मेदाराना था। उन्होंने कहा कि राशन लाभुकों के घर तक पहुंचाने का काम स्वयंसेवक उपेन्द्र करते हैं। अगर कोई गड़गड़ी हो रही है तो वही कर रहे होंगे।

अब आते हैं गुमला जिला के ग्राम नरेकेला। ग्राम नरेकेला से 35 – 40 किलोमीटर दूर टोलोंग्सेरा गांव। नरेकेला के ललित साहू का राशन कार्ड संख्या 202006623478 थी टोलोंग्सेरा गांव के राशन डीलर रामावतार साहू के पास। मतलब कि ललित साहू को अपना पीडीएस का राशन लेने के लिए जाना पड़ता था 35 – 40 किलोमीटर दूर टोलोंग्सेरा गांव। जिसके कारण उसका पूरा दिन के राशन लाने में लग जाता था। 35 – 40 किलोमीटर के सफर में किराया खर्च के अलावा ललित का दैनिक मजदूरी भी मारी जाती थी। आज उसका वह राशन कार्ड भी रद्द हो गया है।

दरअसल जिला आपूर्ति पदाधिकारी कार्यालय में बैठे कम्प्यूटर ऑपरेटर ने नरेकेला में रहने वाले ललित साहु की कार्ड संख्या 202006623478 को उसके घर से 35 – 40 किलोमीटर दूर टोलोंग्सेरा गांव के राशन डीलर रामावतार साहू के साथ टैग कर दिया था। लाभुक उक्त डीलर से बात करके हरेक दो महीने पर एक बार राशन लेने जाता था। दो महीने का 30 किलो राशन लेने के लिए उसे दिनभर की मजदूरी भी गंवानी पड़ती थी। साथ ही इसके लिए वह बसिया सिमडेगा रोड में पुटरी टोली तक बस से जाता और फिर वहां से तोलोंग्सेरा गांव 15 किलोमीटर अपनी साईकिल से जाकर राशन लेकर वापस आता। पुन: बस से बसिया तक आकर अपने घर आता था। पिछले वर्ष मई जून का राशन लेने वह नहीं जा सका था। क्योंकि वह गंभीर रूप से बीमार हो गया था। जब वह जुलाई में राशन लेने गया तो मशीन में अंगूठा मिलान नहीं होने के कारण डीलर ने उसे राशन नहीं दिया। डीलर रामावतार ने शंका जाहिर करते हुए बताया था कि शायद उसका कार्ड स्थानीय डीलर उसके ही गांव को हस्तांतरित हो गया हो। डीलर द्वारा राय दिए जाने पर उसने बसिया एम०ओ० को आवेदन दिया। आज जब लॉकडाउन में उसके परिवार में खाद्य संकट गहरा गया है, उसका परिवार भूखों मरने कगार पर है, तब कार्ड की स्थिति जांच करने से पता चल रहा है कि उसका कार्ड रद्द हो गया है। आज उसके पास न कोई रोजगार है और न ही कोई सरकारी राहत सामग्री उस तक पहुंची है। उसके परिवार में कुल 6 सदस्य हैं, जिसमें पत्नी और चार छोटे बच्चे शामिल हैं। आज उसे सरकारी मदद का इंतजार है, मगर अभी तक उसे सरकारी मदद नहीं मिल पाई है।

बताते चलें कि गढ़वा जिला मुख्यालय से करीब 55 कि0 मी0 दूर और भण्डरिया प्रखण्ड मुख्यालय से करीब 30 कि0 मी0 उत्तर पूर्व घने जंगलों के बीच बसा है 700 की अबादी वाला एक आदिवासी बहुल कुरून नामक एक गांव। इसी गांव की 70 वर्षीय सोमारिया देवी की भूख से मौत पिछले 02 अप्रैल 2020 की शाम हो गई थी। सोमरिया देवी अपने 75 वर्षीय पति लच्छू लोहरा के साथ रहती थी। उसकी कोई संतान नहीं थी। मृत्यु के पूर्व यह दम्पति करीब 4 दिनों से अनाज के अभाव में कुछ खाया नहीं था। इसके पहले भी ये दोनों बुजुर्ग किसी प्रकार आधा पेट खाकर गुजारा करते थे।

इसी गांव की 80 वर्षीय मुल्का देवी और उनके पति दोनों काफी बुजुर्ग हैं और विकलांग भी हैं, जिनका कार्ड सं0 202002703136 है। इन्हें कई महीनों से राशन नहीं मिलने की खबर है। ये बताते हैं कि लगातार 8-10 दिनों तक डीलर के पास जाते हैं, लेकिन डीलर उन्हें राशन नहीं देता है।

लोहरदगा जिला अंतर्गत सेन्हा बांधटोली की रहने वाली महिला चिन्तामुनी कुमारी अकेली रहती है। वह अत्यन्त गरीब है। उसने पी0 एच0 कार्ड जिसका संख्या 202002191351 है, उसने उसे संभाल कर रखा है। लेकिन राशन लेने जाने पर उससे कहा जाता रहा है कि उसका कार्ड डिलीट हो गया है। चेक करने पर पता चला कि उस नंबर पर प्रमिला नामक किसी दूसरे परिवार को कार्ड निर्गत कर दिया गया है।

7 दिसम्बर 2019 को बोकारो जिला का भूखल घासी (42 वर्ष) की मौत भूख से हो गई थी। खबर थी कि भूखल घासी के घर में चार दिनों से चूल्हा नहीं जला था। मतलब साफ था कि भूखल को चार दिनों से अनाज का दाना भी नसीब नहीं हुआ था।

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