कैसे खतरे में पड़ जाती है संस्कृति?

5
253

सब जगह संस्कृति का शोर है आखिर यह खतरे में कैसे आ जाती है? सब इसके खतरे में आने से डर क्यों जाते हैं , मनुष्य भेड़ की तरह सर झुकाए उन आदर्शों उन निर्देशों का पालन करता रहता है जो उसे मिलते हैं, जो मुस्लिम पैदा हुआ वो आजीवन अपनी संस्कृति के लिए लड़ता है, हिंदु अपनी संस्कृति के लिए लड़ रहा है, सिक्ख अपनी संस्कृति के लिए लड़ रहा है? जिनको संस्कृति का अर्थ नही मालूम वो भी इसकी लड़ाई में शामिल हैं। लोगों को जैसे हिंसा और रक्तपात के अवसर चाहिए। अगर संस्कृति क्या है यह पूछा जाए तो अधिकतर लोग कपड़े पहनना, खाना खाना, जीवन यापन करना ऐसी बहुत सी बाहरी बातों को संस्कृति कहने लगते हैं। बहुत से लोग जो दर्शनशास्त्रियों का फिलासफर कहकर मजाक उड़ाते हैं वे नहीं जानते कि जीवन जीने की विधा को ही वास्तव में दर्शन कहते हैं और हर व्यक्ति का अपना एक जीवन दर्शन होता ही है। हम एक ऐसे देश में रहते हैं जिसके मात्र दस बारह प्रतिशत युवा स्नातक तक शिक्षा प्राप्त करते हैं, बाकी भीड़ संस्कृति का ठेका लेकर धार्मिक अनुष्ठान को संस्कृति समझती है । वे पुरातनपंथी के साथ साथ हद दर्जे के कूड़मगज हैं, गाय, बच्चा चोर, डायन,लव जेहाद इत्यादि के नाम पर भीड़ के रूप में हिंसक और घातक है । अपना भला बुरा नहीं सोचते, नशेड़ी होने के कारण अपनी अयोग्यता का ठीकरा कभी आरक्षण कभी मुस्लिम , कभी ईसाई , कभी पाकिस्तान पर फोड़ते हैं। अपनी गलतियां ना देखना पड़े इसलिए वे हिंसा के माध्यम से आक्रोशित युवा छवि बनाकर समाज में प्रतिष्ठा पाना चाहते हैं। इस नफरती भीड़ में कुछ लोग तो विरोधियों की स्त्री और बच्चियों के रेप द्वारा भी अपने समाज में पहचान बनाना चाहते हैं, अगर सीधे सीधे उनसे संस्कृति पर चार शब्द बोलने को कह दिया जाए तो बगले झांकने लगेंगे, विरोध से पहले वे क्यों विरोध कर रहे हैं यह भी जानना नहीं चाहते , क्योंकि जब विरोध से जननायक बना जा सकता है तो विचारधारा के अध्धयन पर समय कौन खराब करे। राजनीति को ऐसे युवाओं की हमेशा आवश्यकता रहती है जिसके पास बलशाली शरीर हो, भावना और विचार करने की शक्ति ना हो। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने लिखा है कि संस्कृति बदलती रहती है। पर युवा द्विवेदी जी का नाम पढ़ें सुने भी क्यों पढ़ने लिखने से कोई लाभ नहीं ले अक्सर चौपाल ,खेल के मैदान और हर जगह शोर मचाते हुए मिल जायेंगे। मानों शिक्षा का उद्देश्य मात्र नौकरी हासिल करना है । अशिक्षित व्यक्ति अपनी लड़ाई बंदूक से लड़ता है या चापलूसी और आडम्बर से। समाज में कम पढ़े लिखों का बोलबाला है क्योंकि बहुसंख्यक की जय है । वे सोशल इंजीनियरिंग में माहिर हैं और संस्कृति के रक्षक बनकर राजनीति में आसानी से फिट हो जाते हैं।

‌बिना यह जाने कि कभी शिक्षा पर मात्र एक वर्ग का अधिकार था , अधिकार भी ऐसा कि दूसरे के श्रवण करने पर कान में शीशा ढलका दिया जाता था । शिक्षा का अधिकार पूरे युवा वर्ग को संविधान प्रदत्त है फिर भी वे संविधान की प्रतियां जलाते हैं । सभी को वोट का अधिकार संविधान प्रदत्त है फिर भी न्याय से अधिक उन्हें शोषण पर भरोसा है । स्त्री का विवाह नौ साल की उम्र तक कर देना संस्कृति थी , क्या यह उचित था ? क्या संस्कृति के नाम पर यह बाल शोषण होता रहना चाहिए था ? वे शिक्षा से वंचित थी, क्या यह तर्कसंगत था? देश में युवाओं की बलि प्रथा भूंडा जैसी प्रचलित थी क्या यह जायज थी ? लाखों मनुष्य युद्ध में जाने से वंचित थे क्योंकि रक्षा केवल एक वर्ग का कार्य था ,और देश को गुलाम रहना पड़ा , आधुनिक शिक्षा का विरोध अंडे, टमाटर , गोबर फैंक कर किया गया जब पहला कन्या विद्यालय ज्योतिबा और सावित्री बाई फुले द्वारा खोला गया। समन्दर लांघने से धर्म भ्रष्ट हो जाता था! समुन्द्र का नमक खाने से धर्म संस्कृति चली जाती थी , कुर्सी मेज पर बैठकर चीनी बर्तन में खाने से मनुष्य भ्रष्ट मान लिया जाता था, स्त्री को माहवारी के दिनों में अछूत मानकर पशुओं के साथ पशुशाला में रहना पड़ता था , बिजली के प्रवेश को, बस में बैठने को, रात को कंघी करने को ,शादी पूर्व दूल्हे या दुल्हन को देख लेना पुल लांघना ,स्त्री द्वारा मांस खाना, अलग रसोई अलग बर्तन में मांस पकाना ,पुरुष का शराब पीना इनका विरोध ऐसी बहुत सी छोटी बड़ी बातें संस्कृति का हिस्सा रही हैं। जो आज कमोबेश मायने नहीं रखती। विज्ञान अनुसार मनुष्य जीवन सफलता का गुण उसका स्वयं को प्रकृति अनुसार ढाल लेने की क्षमता पर निर्भर है । हमारी त्वचा के रंग तक प्रकृति अनुसार स्वयं को ढाल लेने की कोशिश भर है, गर्म प्रदेशों के लोगों का रंग सांवला होता है ताकि वे गर्मी में मेलानिन के द्वारा त्वचा की रक्षा कर सकें जबकि ठंडे प्रदेशों के लोगों को अधिक होमोगलोबिन कि आवश्यकता सांस लेने के लिए है इसलिए उनके शरीर में लाल रक्ताणुओं की संख्या अधिक होती है , लेकिन उसे सुंदरता का पैमाना बना देना और करोड़ों लोगों को नाहक अपराध बोध में डाल देना भी हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है , यहां तक कि रंग के कारण व्यक्ति ताउम्र हीन भावना से ग्रसित रहता है, क्या संस्कृति के ऐसे हिस्सों को तार्किक और सही माना जा सकता है जो मनुष्य को मनुष्य से घृणा सिखाते हैं ।

‌कया यह तर्कपूर्ण है कि पश्चिमी परिधान यदि पुरुष पहने तो संस्कृति को कोई अंतर नहीं पड़ता जबकि स्त्रीयों के द्वारा पहनने पर संस्कृति खतरे में पड़ जाती है। कपड़े सिलकर पहनने का प्रचलन यहां नहीं था जो अरब से यहां आया लेकिन आज वही सांस्कृतिक परिधान हैं। कितना घुल मिल गई है मुस्लिम संस्कृति ,खान पान ,भवन यहां पर फिर भी धर्म के नाम पर कितना हो हल्ला है। जो लोग यह नहीं जानते कि तुलसीदास और रहीम हिंदू मुस्लिम होते हुए भी परम मित्र थे वे शान से धर्म विरोध को संस्कृति समझते हैं।

‌अज्ञानता कोई संस्कृति नहीं है, बुद्ध ने इस राष्ट्र को किताब की संस्कृति दी है जिसके बल पर भारत विश्व गुरु कहलाया , उन्हीं बुद्ध की शिक्षा है अप्पो दीपो भव । अर्थात अपने दीपक स्वयं बनो। अर्थात सुनी सुनाई बातों से, ग्रहण किए हुए अर्थों से बाहर निकल कर सच को देखना और पहचानना । किन्तु मूड मगज लोगों की भीड़ तेजी से बढ़ रही है, जो हिंसा और प्रतिहिंसा में भी संस्कृति देखते हैं, जबकि मनुष्य को सभ्यता के विकास के साथ साथ समझदार होते जाना चाहिए था, सामंजस्य बिठाना चाहिए था, देशहित देश के संसाधनों को आपसी लड़ाई में बर्बाद करने की बजाय राष्ट्र निर्माण में लगाना चाहिए था, लेकिन अपनी संस्कृति से प्रेम और सद्भावना की जगह यह जो हिंसा हमने ग्रहण की है यह आने वाले समय को भीषण बनाने वाली है, आर्थिक रूप से समृद्ध देशों का ही विश्व में सम्मान है आदर है , घुटे हुए, स्वकेन्द्रित देशों को विश्व में युगांडा, फिलस्तीन, पाकिस्तान दक्षिण कोरिया जैसा ही सम्मान मिल सकता है। संस्कृति आज ए सी रूम, महंगे सोफे, विदेशी गाडियां, महंगी शराब, महंगे होटल, विदेशी सौन्दर्य प्रसाधन,खाना पीना, विदेशी मोबाइल, विदेशी मशीनें हर हद लांघ चुकी है ,वो सिर्फ अंतर्जातीय विवाह से नष्ट हो जाएगी, ऐसा सिर्फ मूर्ख सोच सकते हैं, मंदिर मस्जिद के लिए लड़ने वाले हम सांस्कृतिक लोग विदेशी धरती तक अपनी मूर्खता का झंडा लहरा रहे हैं , विश्व हमें किस नज़र से देखता है यह सोचने की जरूरत है, अपनी नज़र में महान बनना, अपने लोगों से महान कहलवाना यह आत्मकेंद्रित और आत्ममुग्धता की चरम सीमा है । विनम्रता भी भारत की संस्कृति है जहां अभिमान का निषेध अध्यात्म का प्राण है । बच्चों को धर्म के नाम पर आनर किलिंग करना ,उस समाज के लिए जो सुख दुख में कभी काम नहीं आता , रूढ़िवादी स्वार्थ नहीं तो क्या है ? कन्या भ्रूण हत्या उस समाज के लिए जो भीख तक ना दे, आत्महत्या करने को छोड़ दे, आखिर सोचना न चाहिए समाज के रूप में कितने असफल हैं हम और किस किस बदलाव की आवश्यकता है जीवन को बेहतर बनाने के लिए यह हमें ही तो सोचना है

शेली किरण

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here