कार्पोरेट चंदे को लेने का अर्थ होता है उत्पीड़न और सामाजिक-आर्थिक गैर-बराबरी को वैधता प्रदान करना

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अर्चना टाभा
फेसबुक और ट्वीटर पर दो तरह के ट्रेंड हैं। एक उन लोगों के फेवर में जिन्होंने कुछ दान दक्षिणा दी है और दूसरा उन लोगों के ख़िलाफ़ जिन्होंने देने की जहमत नहीं उठाई, और जिन्होंने कोई दान नहीं दिया उनसे मांगा जा रहा है। हालत तो ये है कि देश का प्रधानमंत्री भी दान की गुजारिश कर रहा है। ख़ैर अब आते हैं दान दक्षिणा पर। दान दक्षिणा सीधे तौर पर मौजूदा व्यवस्था में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक विषमता व असंतोष को दबाने और छुपाने के मकसद से की किया जाता है।
दरअसल ये दान दक्षिणा की गुजारिश एक तरह से भारतीय समाज का प्रतिबिंब भी है और भारतीय समाज मे व्याप्त भयंकर सामाजिक और आर्थिक असमानता के लिए जिम्मेदार भी है। आज ही फेसबुक पर किसी पोस्ट में पढ़ा कि जो लोग इतने वीभत्स हालात में बग़ावत की जगह चुपचाप पलायन कर रहे हैं वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि भारतीय समाज में ये भीख मांग कर खाने की भी व्यवस्था है। और ये बिल्कुल सच है, भारतीय समाज में कई जातियों और जनजातियों के पास कोई स्थायी ठिकाना नहीं होता है और लगातार पलायन करते रहते हैं तथा जब ये किसी गांव या कस्बे से गुजरते हैं तो घर घर अनाज मांगते हैं और लोग भी एक दो दिन की जिम्मेदारी समझकर दे देते हैं। जातियां और जनजातियां कभी अपनी स्थिति के लिए सवाल नहीं करती हैं। इसके ऊपर तो जातीय चौहद्दी तो होती ही है लोगों को व्यवस्था के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने से रोकने के लिए।
सामान्य सी गौर करने वाली बात ये है कि जो धन्नासेठ ज्यादा से ज्यादा धन इकट्ठा कर लेना कहते हैं, टैक्स नहीं देना चाहते, टैक्स माफ़ करवाते रहते हैं, आदिवासियों को उनके जमीन से बेदख़ल करने के लिए सरकारी पुलिस और सेना का इस्तेमाल करते हैं, पानी और स्वच्छ हवा जैसे संसाधनों को भी बेंच देना चाहते हैं ये धन्नासेठ अपनी दान दक्षिणा आख़िर किस मक़सद से करते होंगे? और इन धन्नासेठों और इनके दरबारियों यानी फ़िल्मी व खेल जगत की हस्तियों के दान दक्षिणा से कितने लोगों के जीवन में असर हो सकता है? जो सरकार और व्यवस्था अपने खरबों के बजट से भी गरीबी और भुखमरी दूर नहीं कर पाई है उसकी जगह इन लुटेरों के दान की क्या औकात !
इसके अलावा इस दान दक्षिणा से समाज में दो नकारात्मक प्रभाव अलग से पड़ता है – जिसमें से एक तो ये है कि इन लुटेरों और इनके दरबारियों की दान दक्षिणा को स्वीकृति दे कर न सिर्फ़ इनके द्वारा किये जा रहे उत्पीड़न और समाजिकार्थीक गैर बराबरी को वैधता दी जाती है। और दूसरा ये कि ये लुटेरे जिस राजनैतिक विचारधारा और संस्कृति ( यानी फ़ासीवादी) को बढ़ावा देते हैं उसको भी मौन स्वीकृति हो जाती है।
ऐसे में प्रश्न उठ सकता है कि अगर लोग दान दक्षिणा नहीं देंगे तो एक दूसरे के मुश्किल वक़्त में कैसे काम आ पाएंगे? आखिरकार दान दक्षिणा की जरूरत तो क्रांतियों को भी चाहिए होती है। तो इसका जवाब है कि आम लोगों का आपस का परस्पर आर्थिक सहयोग और धन्नासेठों की दान दक्षिणा में कोई तुलना ही नहीं हो सकती है। लोगों का आपस में दान दक्षिणा या परस्पर सहयोग जरूरी है और होना भी चाहिए। आज कोरोना महामारी में मजदूरों के पलायन पर सवाल और जिम्मेदारी सरकार व व्यवस्था से होनी चाहिए। सरकारी गोदामों में पड़े अकूत अनाज अगर कुछ महीने तक मेहनतकशों को बैठाकर नहीं खिला सकते तो ये किस दिन के लिए हैं?
तो पूंजीपतियों और इनके दरबारियों से दान दक्षिणा की भीख मांगने की बजाय अगर ये सवाल किया जाए कि हालात की वजहें क्या हैं, अम्बानियों, अडानियों, टाटाओं, बिरलाओं आदि और इनके दलाल नेताओं के पास कितनी संपत्ति शुरू में थी और आज कितनी है? क्या ये मेहनत का कमाल है? अगर मेहनत से इतनी संपत्ति अर्जित की जा सकती है तो एक मजदूर अंततः मजदूर ही क्यों
मरता है?

इलस्ट्रेशनः RSA animation

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