कवयित्री और लेखिका सुषमा गजापुरे से राजीव कुमार झा की बातचीत

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कवयित्री और लेखिका सुषमा गजापुरे से राजीव कुमार झा की बातचीत
प्रश्न आपके, उत्तर मेरे –डॉ सुषमा गजापुरे ‘सुदिव’

प्रश्न-1 आप कवयित्री कथाकार होने के अलावा प्रतिष्ठित स्वतंत्र अग्रणी महिला पत्रकार भी हैं . साहित्य लेखन और पत्रकारीय लेखन में आपने सामंजस्य कायम किया है इसके बारे में बताया ?

बोलना, पढ़ना और लिखना संवाद के मूल गुण/स्त्रोत हैं। इन तीनों विधाओं में यदि हम एक अच्छी समझ और परिपक्वता को सम्मिलित कर दें तो व्यक्ति एक बेहतरीन संचारक अथवा कम्यूनिकेटर बनता है। यह तीनों आपस में एक-दूसरे से जुड़े हैं। गुणात्मक लेखन का आधार जीवन और संबंधित विषयों की अच्छी समझ और सब के प्रति सम्मान और जीवन के प्रति सकारात्मकता होती है। जब इंसान को ये समझ आ जाती है तो वह हर प्रकार के लेखन में सरलता से सामंजस्य पैदा कर लेता है। इसलिए पत्रकारिता हो या कोई कविता अथवा कोई भी लेखन हो, जब हम जीवन के साथ एक संतुलन बना लेते हैं तो लेखन बहुत सहज हो जाता है, उतना ही सहज जितना की साँस लेना। मैं जीवन को अबड़ी सहजता और सरलता से जीती हूँ शायद इसीलिए मुझे लिखने में बहुत आनंद आता है और मैं जो भी लिखती हूँ वह ह्रदय से लिखती हूँ। मुझे आडंबर से बहुत परहेज है। मैं इतना जानती हूँ जो हृदय से, आत्मा से लिखा जाएगा वह निश्चय ही सबके मन को भाएगा क्यों की वह सच के करीब होती है और मानवीय संवेदनाओं को उचित तरीके से प्रकट करती है।

प्रश्न-2 सुषमा जी लेखन के प्रति आपके मन में कैसे रुझान कायम हुआ ?

मूलतः मराठी भाषी होने पर भी हिंदी के प्रति प्रेम प्रारम्भ से ही था। हालांकि अध्ययन अंग्रेजी माध्यम से हुआ किन्तु मैं तो हिन्दी भाषा में ही खोयी रहती थी। इसके पीछे का कारण भी यही था कि घर पर पढ़ने का माहौल था और जब मैंने प्रेमचंद और महादेवी, रेणु, निराला, पंत को पढ़ा तो हिन्दी मेरी आत्मा में धीरे-धीरे कब प्रवेश कर गयी, पता ही नहीं चला। धीरे-धीरे यही हिंदी प्रेम मेरे जीवन के रचनात्मक कार्यों के लिए एक धुरी बन गया। छोटी-छोटी रचनाएँ पंक्तिबद्ध करना बचपन से जारी था। वर्ष गुज़रते गए और कभी सोचा ही नहीं कि हिंदी के सहारे जीवन में इतनी लम्बी दूरी तय कर ली। हिंदी भाषा के प्रति यही प्रेम कब तपस्या बन गया और कब मैं हिंदी से संबंधित विभिन्न आयामों के अनुभव से गुज़र गयी पता ही नहीं चला। मेरे लिए हिंदी एक यात्रा बन गयी और हर मैं हर मील पर कुछ नया सीखती गयी और सीखते ही जा रही हूँ।

प्रश्न-3 आपने साहित्यिक पत्रिका का संपादन भी किया . हिंदी की वर्तमान साहित्यिक पत्रिका की प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालिए ?

हिंदी की सेवा करते-करते भोपाल से प्रकाशित हिंदी साहित्य को समर्पित पत्रिका ‘अक्षर शिल्पी’ की सम्पादिका बनने का गौरव प्राप्त हुआ। जैसे-जैसे ‘अक्षर शिल्पी’ शिखर पर चढ़ती गयी, वैसे-वैसे ही मेरा भी हिंदी लेखन और सृजन में मन रमता गया। ‘अक्षर शिल्पी’ के प्रकाशन के दौरान ही कई प्रसिद्ध साहित्यकारों से परिचय हुआ। क्योंकि अंतर्मुखी स्वभाव होने के कारण मैं लोगों में ज्यादा घुलती-मिलती नहीं हूँ। सच कहूँ तो मैं बिलकुल भी सामाजिक प्राणी नहीं हूँ। मैं नहीं जानती, यह अच्छा है या बुरा, लेकिन मैं ऐसी ही हूँ और मैं इसे सहज स्वीकार करती हूँ। दरअसल कोलाहल में मेरी रचनात्मकता का दम घुटता है। संपादन-कालके दौरान बहुत लोगों से स्नेह और आशीष प्राप्त हुआ और हिंदी के लेखकों और प्रसिद्ध साहित्यकारों से सीखने का अवसर भी मिला। आजकल लोगों में पढ़ने की प्रवृति कम हुई है क्योंकि सोशल मीडिया का प्रभाव बहुत बढ़ गया है। पत्रिकाएँ इन दिनों बहुत अधिक महंगी हो गयी है और लोग खरीद कर पढ़ने में अधिक रुचि नहीं रखते। चूँकि लोग अधिक पढ़ते नहीं हैं इसीलिए उनके लेखन स्तर में भी अब कमी नज़र आनी शुरू हो गयी है। इस समय पाठक को साहित्य से अधिक मनोरंजन चाहिए होता है इसलिए साहित्यिक पत्रिकाओं इन दिनों संक्रमण-काल से गुजर रहीं है।

प्रश्न-4 ई-साहित्यिक पत्रिका भी आप संपादित करती हैं इसके बारे में बताइए

जी हाँ, वर्तमान में मैं हिंदी की दो ई-पत्रिकाओं का संपादन कर रही हूँ। इनमें से एक द्वैमासिक पत्रिका ‘साहित्य सुषमा’ है जो कि सम्पूर्ण रूप से हिंदी साहित्य को समर्पित है और दूसरी ई-पत्रिका ‘बचपन’ है जो कि बच्चों की पत्रिका है, चूँकि मैं 20 वर्षों स्कूल में प्रिन्सिपल रही हूँ तो विद्यार्थियों की मनोस्थिति को अच्छे ढंग से समझती हूँ इसलिए इस पत्रिका के प्रकाशन में मुझे बहुत आनंद आ रहा है।

प्रश्न-5 आप पेंटिंग्स भी करती रही हैं अपनी पेंटिंग और इसकी प्रदर्शनियों के बारे मे बताएं ?

पेंटिंग में रूचि प्रारम्भ से ही रही है। स्केचेस बनाने में भी ख़ास रूचि रही है। मेरी बहुत से स्केचेस और पेंटिंग्स विभिन्न प्रदर्शनियों में विशेषतः भोपाल के कला अकादमी में प्रदर्शित हुई हैं और उनको दर्शकों का भरपूर स्नेह और आशीर्वाद भी मिला है। मैं अधिकतर ‘ब्लेक अँड व्हाइट’ में काम करना पसंद करती हू, और मुझे रेखाओं के माध्यम से अभिव्यक्ति करना बहुत अच्छा लगता है। हालांकि कुछ रंगीन कलाकृतियाँ भी बनाई है। मेरे रेखाचित्र कई पत्र-पत्रिकाओं के मुखपृष्ठ एवं अंदरूनी साज-सज्जा को भी शोभायमान करते हैं तो अच्छा लगता है।

प्रश्न-6 आप लंबे समय तक भोपाल में रहीं अब पुणे में रहती हैं इन दोनों ही शहरों में आप लेखिका पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं अपने जीवनानुभवों को इस संदर्भ में रेखांकित कीजिए

ई-पत्रिका के साथ साथ मैं पत्रकारिता में भी सक्रिय हूँ और इस समय मैं 3 समाचारपत्रों में प्रति सप्ताह रविवारीय कॉलम लिख रही हूँ। इनमें एक मध्य प्रदेश से प्रकशित नवभारत है, दूसरा मुंबई से प्रकाशित हिंदी सामना है तथा तीसरा भोपाल से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक सेंट्रल क्रॉनिकल है। इनमें मैं आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, वैज्ञानिक और समसामयिक विषयों पर प्रत्येक सप्ताह लिखती हूँ,इसके अतिरिक्त दिन विशेष पर मेरे लेख-आलेख आते ही रहते हैं।

प्रश्न-7 आपने जिन स्थानों की यात्राएं की हैं उनमें प्रिय स्थलों के बारे में बताएं

स्मरण-शक्ति इतना साथ तो देती नहीं किन्तु हाँ मुझे पंचमढ़ी, ओरछा, मांडू के साथ ही जयपुर और डलहौजी बहुत अच्छे लगे। महाबलेश्वर भी बहुत अच्छी जगह है। सब स्थानों के नाम गिनना अभी शायद संभव न हो पर मुझे ऐतिहासिक स्थल, पहाड़ी रमणीय स्थल और प्राकृतिक स्थल अच्छे लगते हैं।

प्रश्न-8: सिनेमा में आपकी कितनी रुचि रही है . अपनी पसंदीदा फिल्मों और प्रिय अभिनेता अभिनेत्रियों गायक गायिकाओ के बारे में बताए

सिनेमा में रूचि एक आम भारतीय नारी की तरह ही है। मुझे बहुत अधिक फिल्में देखना पसंद नहीं है। किन्तु मुझे आर्ट फिल्में अच्छी लगती है साथ ही हास्य फिल्में भी। हिंदी गीत-संगीत से बहुत प्रेम है और कभी गाती गुनगुनाती भी हूँ। मेरा एक भजन हाल ही में रेकॉर्ड हुआ है ‘तेरा मंगल,मेरा मंगल’ मुझे पुरानी हिंदी अभिनेत्रियां मीना कुमारी, वहीदा, आशा पारीख, नंदा, साधना और मधुबाला सभी बहुत पसंद हैं। उनकी सादगी और अभिनय का कोई जोड़ ही नहीं है। गायकों में तो मोहम्मद रफ़ी, किशोर दा, मुकेश, मन्ना डे और तलत बहुत अच्छे लगते हैं। इधर नए गायकों में अरजीत, सोनू निगम, शंकर महादेवन बहुत अच्छे हैं। गायिकाओं में लता, आशा भोसले, उषा मंगेशकर मुझे बहुत अच्छी लगती है। बेगम अख्तर और परवीन सुल्ताना की गज़लें और सुनिधि और श्रेया भी पसंद हैं।

प्रश्न-9 अपने प्रिय लेखकों लेखिकाओं कवियों कवयित्रियों के बारे में बताएं

यह सूची कुछ अधिक ही बड़ी हो जाएगी लेकिन फिर भी महादेवी वर्मा, धर्मवीर भारती, मैथिलीशरण गुप्त, रेणु, पंत, मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, निराला, सुभद्राकुमारी, भारतेन्दु, नागार्जुन, हरिवंशराय, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी और प्रेमचंद बहुत पसंद हैं। दुष्यंत की कवितायें भी बहुत पसंद हैं। इसके अलावा पंजाबी में अमृता प्रीतम और शिव कुमार बटालवी भी काफी पसंद हैं। अमृता प्रीतम मेरी सबसे पसंदीदा लेखिका है।

प्रश्न-10 अपने बचपन शिक्षा माता पिता के बारे में बताएं

पिताजी मेडिकल क्षेत्र में थे और माताजी एक गृहिणी थी। पिता जी बहुत ही अनुशासित स्वभाव के थे। उन दोनों से जीवन में संतुलन और सामंजस्य बनाना सीखा।

प्रश्न-11 समाज मे जीवन के बदलते आयामों में किस चीज की कमी महसूस करती हैं ?

वर्तमान समय में लोगों में जीवन मूल्यों का अभाव मन को कचोटता है। आजकल के संदर्भ में नैतिकता की भी बहुत कमी महसूस होती है। आपसी प्रेम, सौहार्द और सद्भावना का दिन ब दिन कम होना समाज और राष्ट्र के लिए कोई अच्छे संकेत नहीं है।

प्रश्न-12 फोटो भी पासपोर्ट और सम्मान समारोहों का भेजिए

प्रश्न-13 हिंदी पत्रकारिता का अहिंदीभाषी क्षेत्रों मे भी काफी विकास हो रहा इसके बारे में बताएं

विकास तो है पर धीमी गति से है। भारत में हिंदी का जो भी विकास है तो हिंदी फिल्मों की बदौलत और बोलचाल की भाषा में ही है। साहित्य के क्षेत्र में प्रयास तो हो रहे हैं पर शायद उनमें वो ठहराव नहीं है। आज हिन्दी साहित्य आम जनता से जुडने के प्रयत्न में अपना स्तर खो देता है। बोलचाल की भाषा में कुछ भी लिखना आज चलन में हैं। हिन्दी भाषा को जिस तरह से लिखा जा रहा है वह दुर्भाग्यपूर्ण है। किसी भी साहित्य का सौंदर्य उसकी भाषा से होता है और किसी भी भाषा का सौन्दर्य उसके साहित्य से पहचाना जा सकता है।

प्रश्न-14 क्या आप मराठी भाषा भी बोलती समझती हैं यदि हाँ तो क्या मराठी नाटकों को आपने देखा हैं मराठी और हिंदी रंगमंच में अंतर को रेखांकित कीजिए

मराठी मेरी मातृ भाषा है और मैं उसको बहुत अच्छे ढंग से समझती हूँ। घर में मराठी और हिन्दी दोनों ही बोली जाती है। मराठी के नाटक और हिंदी के नाटक टेलीविज़न पर ज़्यादातर देखती हूँ। पिता श्री को मराठी नाटक देखने का बड़ा शौक था और वे हमें भी साथ लेकर जाते थे इसलिए थियेटर की ओर मैं बचपन से ही आकर्षित रही हूँ। भारतीय परिदृश्य में मराठी रंगमंच बहुत अधिक सशक्त है और हिंदी में अभी ये स्थिति नहीं बन पायी है। इसके कई सामाजिक कारण भी हैं। हिन्दी में दर्शकों का अधिक आकर्षण फिल्मों की ओर है किन्तु हिन्दी रंगमंच की भी अपनी गरिमा है जबकि हिन्दी सिनेमा में अधिकतर अभिनेता हिन्दी रंगमंच से ही आते है।

प्रश्न-15 संगीत में भी आपकी रुचि है सिनेमाई संगीत का जादू किन प्रयोगों से गुजरता प्रतीत होता है .

संगीत आज भी हिंदी और हिंदीतर सिनेमा की जान है। वैसे भी संगीत जीवन में रस घोल देता है।

संगीत में रूचि बचपन से है। पुराने गीत तो बहुत ही अच्छे लगते हैं क्योंकि उनमें ठहराव, गहराई और मधुरता होती थी। आजकल के संगीत में शोर अधिक है, संगीत कम है। देखा जाए तो हिंदी गीत-संगीत दरअसल हिंदी को आगे बढ़ाने में काफी हद तक मददगार सिद्ध हो रहा हैं। आज सम्पूर्ण विश्व में हिन्दी फिल्में और हिन्दी फिल्मी संगीत का वर्चस्व है। वहाँ हर कोई हिन्दी फिल्मी-गीतों का दीवाना है।

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