“”कल से आज का सफ़र,सहाफ़त का गिरता हुआ मेयार”

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एक ज़माना था जब सहाफ़त को खिदमते ख़ल्क का ज़रिया समझा जाता था और सहाफी को इज्ज़त की निगाह से देखा जाता था।अवाम को अपने समाज, अपने शहर,अपने मुल्क और दुनिया की जानकारी सहाफी़ अखबारों और रेसालों के ज़रिए देते थे।
दिन्दोस्तान मे अग्रेज़ों के आने के बाद कलकत्ता से हिन्दी में उदन्त भातर्न्ड और फारसी उर्दू में जानेजहाँ नुमा अख़बार निकलता था।
1857 ई. में अग्रज़ों ने आखरी मुगल बादशाह बहादूर शाह ज़फ़र को रंगून में नज़र बन्द कर दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लिया लेकिन उस वक़्त उन्होने कलकत्ता को ही राजधानी बनाये रखा।
अंग्रज़ों के खिलाफ़ बहादुर शाह ज़फ़र की क़यादत में आज़ादी की जंग शुरू की गयी उस वक़्त दिल्ली से शाया होने वाले सिराजूल अख़बार,उर्दू के कई अख़बार वगैयरा ने लोगों में देश प्रेम का जज़्बा पैदा किया।
उर्दू अख़बार के (मूदिर) सम्पादक मौलाना मुहम्मद बाक़र को फांसी की सज़ा दी गयी, मौलाना अबूल कलाम आज़ाद ने कलकत्ता से अल हिलाल, अल बिलाग़ रिसाला व अख़बार निकाला।
मौलाना मुहम्मद अली जौहर ने अंग्रेज़ी में कामरेड और उर्दू में हमदर्द अख़बार निकाला।
बनारस से सन 1920 ई. में बाबू शिव परसाद गुप्त ने हिन्दी में अख़बार “आज” की शुरुआत की,महात्मा गांधी ने यंग इंडिया और हरिजन पत्रिका की शुरुआत की,पंडीत जवाहरलाल नेहरू ने क़ौमी आवाज़ उर्दू और नेशनल हेरन्ड अग्रज़ी में निकला।
अनेक ज़बानों मेअख़बार,पत्रिकायें शाया की जाने लगी।
उस दौर में सहाफ़त समाज और देश की सेवा थी,सबका एक ही मक़सद था अग्रज़ों से देश आज़ाद कराना।
अंग्रेज़ सरकार उस वक़्त कितने अख़बारों को (ज़ब्त) बंद किया,प्रेस पर जुरमाना लगाया,ऐसी हालत में बनारस से “रनभेरी” निकाला गया, की इशाअत हुई अंग्रेज़ सरकार इसका पता लगाने में नाकाम रही की “रनभेरी” कहाँ से (शाया) होता,छपता है।
अकबर इलाहाबादी ने क्या खू़ब कहा था……
खीचों न तलवारों को न कमान निकालो
जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो।

अख़बार उस दौर में मेयारी हुआ करते थे और अख़बार से जुड़े ऐडीटर और सहाफ़ी देश प्रेम (हुब्बुलवतनी) के जज़्बे से सरशार थे।
पैसा कमाना उस वक़्त अख़बार और पत्रकार,सहाफी का मिशन नहीं था।
मौलाना ज़फ़र अली खाँ, मुंशी प्रेमचन्द,मुंशी दया नारायण निगम, डाॅ.सम्पूर्णान्द,पंडीत कमलापती त्रिपाठी वगैरा ऐसे ही ऐडीटर थे।
आज़ादी के बाद अख़बार और सहाफी़,पत्रकार दोनों ही धीरे धीरे व्यवसायीक (तिजारती) हो गए।
सियासी जमाअतों ने अपने फायदा के लिए अख़बारों और सहाफी़ को अपने साथ जोड़।
सभी की बात नहीं है पर ज़्यादा तर अख़बार और साफ़ी, पत्रकार अपने मक़सद को पाने की चाहत में ग़लत ढंग अपनाने लगे।
प्रिन्ट मीडिया से ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का मेयार गिर रहा है,इसका नज़ारा अभी हाल में पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनाव में देखने को मिला।
सभ्यता,संस्कृती से गीरी अपशब्द भाषाओं (बोली) का प्रयोग किया गया।
पैसों पर बिकने वाले चैनल और समाचार पत्र जनता में बेनक़ाब हो गया।
देश की छवि,पहचान दुनियां में करने वाले इन चैनलों और सहाफ़ी पत्रकारों को शर्मिन्दगी महसूस न हुई।
चैयनलों और समाचार पत्रों को मेयारी बनाने का काम कार्य देश की जागरुक जनता ही कर सकती है चैनलों और समाचार पत्रों को देश की एकता,अख़ंनण्डता,साम्प्रदायिता की समाप्ति देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम करना चाहिए।
ऐसी सहाफ़त हो जो सच और झूठ को अलग कर सके, सच्चाई,हकीकत का सामना कर सके बिना किसी लोभ, लालच के,बेहतर समाज का अक्कास बने,अपनी गंगा जमीनी तहज़ीब को क़ायम व बरक़रार रखें।

डाॅ.नूर फ़ात्मा
मुगलसराय-चन्दौली
23/05/2031

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