कल सिर्फ वही जियेंगे – सुभाष राय

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“नदी के बहने का अंदाज
कुछ बदला हुआ है
एक युग बाद उसकी
पूरी देह में उतरी है धूप
उसके भीतर चमक रहीं
आंखें मछलियों की
नदी कपड़े बदल रही है

आसमान पहले से कहीं
ज्यादा नीला हो गया है
बादल और सफेद हो गये हैं
बच्चों की कल्पनाओं के रूप धर
उन्मुक्त उड़ान भरते हुए

हिमालय काफी दूर से दिखने लगा है
क्षितिज पर बर्फ से बनायी पेंटिंग की तरह
मानो वह सैकड़ों मील दक्षिण खिसक आया हो

परिंदों की आवाजें तेज हो गयी हैं
घरों में कैद बूढ़े खुश हो रहे
हर सुबह उम्र में पीछे लौटकर
दूर घोंसलों में इंतजार करते
बच्चों तक पहुँच रही खाना तलाशने
निकली मां की चिचियाहट

जिन्हें जंगल के भीतर खदेड़ दिया गया था
वे अपनी सरहदें लांघ निकल आये हैं
गांवों, कस्बों और शहरों की सीमाओं तक
जंगल पास आना चाहता है‌ आगे बढ़कर

अचानक बहुत चौड़ी हो गयी हैं सड़कें
सारा बोझ सिर से उतार कर
अनकहे सुनसान में भागती हुईं
संकरी और लगभग बंद होती हुई

लोग जिंदा लोगों से बचकर निकल रहे
लोग लाशों से और भी बचकर निकल रहे
कई खूबसूरत जगहें लाशों से अंटी पड़ी हैं
मुर्दाघरों और कब्रिस्तानों के बाहर
अपनी बारी के इंतजार में हैं लाशें
जिंदा लोगों को गले लगाना चाहती हैं लाशें

मृत्यु पर बहसें हो रहीं चारों ओर
कितना फासला रखा जाय मृत्यु से?
मनुष्य से बचकर क्या मृत्यु से बचना संभव है?
अकेले रहकर क्या मृत्यु को टाला जा सकता है?
किन चीजों में छिपकर आ सकती है मृत्यु?
क्या वह हवा में उड़कर भी आ सकती है?

इस बहस से बिलकुल अलग
कुछ साहसी लोग खुद ही आ गये हैं
मृत्यु से दो-दो हाथ करने
जान हथेली पर लिये पीछा कर रहे मृत्यु का
जिनकी मुक्ति के लिए लड़ रहे
उन्हीं के हाथों पत्थर खा रहे
हाथ भी कटवा रहे

बड़े- बड़े तानाशाह हांफ रहे
परमाणु बम दुनिया को तबाह कर सकते हैं
पर एक मामूली वायरस का कुछ नहीं बिगाड़ सकते
असहाय हैं पादरी, पुजारी और धर्माधिकारी
ईश्वर बेमियादी क्वारेंटीन में चला गया है
स्तम्भन, उच्चाटन और मारण मंत्र काम नहीं आ रहे
सारी क्रूरताएं और बर्बरताएं निरुपाय
याचना की मुद्रा में खड़ी हैं
जान बख्श देने की प्रार्थना करती हुईं

जो जीतना चाहते हैं इसे युद्ध की तरह
उनसे पूछो, पांडव भी कहां
जीत सके थे महाभारत
जीतते तो हिमालय से अपनी ही
मृत्यु का वरदान क्यों मांगते
१८ दिन का हो, २१ का या इससे भी लम्बा
युद्ध जब भी होगा, लोग मारे जायेंगे
और मौतों पर कोई जीत का उत्सव
आखिर कैसे मना पायेगा

जीतेंगे वे जो लड़ेगे
युद्ध टालने के लिए
भूख, बीमारी और मौतों से
लोगों को बचाने के लिए
कल सिर्फ वही जियेंगे
जो आज मरेंगे दूसरों के लिए।”

कवि सुभाष राय का परिचय-

उत्तर प्रदेश के जनपद मऊ के गाँव बड़ागाँव में जन्में सुभाष राय चर्चित कवि और जनसंदेश टाइम्स के चीफ़ एडिटर हैं।चार दशकों से पत्रकारिता।समसामयिक विषयों पर एक हज़ार से ज्यादा लेख के साथ कई पुस्तकें प्रकाशित।हिंदी क्षेत्र की लगभग सभी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।कई सम्मानों से सम्मानित।

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