कब थमेगा झारखंड में निर्दोषों की हत्या का सिलसिला?

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विशद कुमार

पिछले 20 मार्च को झारखंड के खूंटी जिले के मुरहू थाना अंतर्गत कुम्बारडी गांव निवासी 36 वर्षीय युवक रोशन होरो को सीआरपीएफ 94 बटालियन का जवान जितेंद्र कुमार प्रधान ने उस वक्त गोली मार दी, जब वे भैस का चमड़ा लेकर लेकर नगाड़ा बनवाने जा रहे थे। पुलिस द्वारा रोशन होरो की गई हत्या को लेकर इलाके के लोग काफी आक्रोशित हुए और विरोध स्वरूप मृतक के परिजनों ने पुलिस द्वारा पोस्टमार्टम कराये जाने के बाद होरो के शव को लेने से साफ मना कर दिया। परिजनों व ग्रामीणों के इस आक्रोश को ठंडा करने के लिए स्थानीय प्रशासन के बीडीओ प्रदीप भगत, सीओ शंभू राम, थाना प्रभारी जयदीप टोप्पो, एवं मझगांव के झामुमो विधायक नीरल पुर्ती द्वारा 23 मार्च को एक समझौता के तहत रोशन होरो के आश्रित को 10 लाख रूपए, पत्नी जोसफिना होरो को नौकरी तथा उनकी दो बेटियां एलिना (12 वर्ष), आकांक्षा (8 वर्ष) तथा बेटा अर्पित (3 वर्ष) की पढ़ाई की जिम्मेवारी का आश्वासन दिया गया, तथा अंतिम संस्कार के लिए 50 हजार रूपए तुरंत दिए गए। उसके बाद रोशन होरो का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

इस कथित हत्या के बाद मृतक रोशन होरो के परिजनोंं को स्थानीय प्रशासन द्वारा मुआवजा के नाम पर दिए गए आश्वासन पर स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह कहते हैं कि ”रोशन होरो की सीआरपीएफ द्वारा हत्या आदिवासियों के प्रति इस व्यवस्था की मानसिकता को ही दर्शाता है कि किसी भी भागते हुए आदिवासी को नक्सली समझकर उसे पकड़ने के बजाय सर और सीने में गोली मारी जा सकती है, जिससे वह मर जाए और प्रशासन को जब यह पता चले कि इसे नक्सली साबित कर पाना नामुमकिन है, तो ‘मानवीय भूल’ कहकर माफी मांग लिया जाय। यह और भी दुखद है कि झारखंड का मुख्यमंत्री एक आदिवासी हैं, फिर भी एक निर्दोष आदिवासी की सीआरपीएफ द्वारा हत्या कर दिये जाने पर मुख्यमंत्री, मंत्री या फिर पुलिस विभाग का वरिष्ठ अधिकारी रोशन होरो के परिवार से मिलने तक नहीं गया। जहां तक मुआवजे की बात है, तो वह सिर्फ व सिर्फ जनता के आक्रोश को ठंडा करने के लिए एक ‘लाॅलीपाॅप’ मात्र है। मृतक की पत्नी ने अपने 10 सूत्रीय मांग में हत्या की सीबीआई जांच व 5वीं अनुसूची क्षेत्र में बिना ग्राम प्रधान की अनुमति के पुलिस के प्रवेश की मनाही’ जैसी गंभीर मांगें भी की थीं। साथ में 3 करोड़ मुआवजा राशि की मांग व परिवार के 3 सदस्यों को सरकारी नौकरी देने की मांग की थीं, लेकिन मात्र 10 लाख का मुआवजा, पत्नी की नौकरी व बच्चों की शिक्षा की जिम्मेवारी का ही आश्वासन प्रशासन ने दिया है। यह मुआवजा भी अभी सिर्फ आश्वासन ही है, यह भी पूरी तरह से मृतक के परिवार को ही मिल जाएगा, इसमें भी मुझे संदेह ही है। दरअसल बात यह है कि सरकार में चेहरे तो बदल जाते हैं, लेकिन उनकी दलित-आदिवासी विरोधी नीतियां नहीं बदलती। दलित-आदिवासियों के प्रति प्रशासन की मानसिकता नहीं बदलती।”

रूपेश आगे कहते हैं कि ”इसका एकमात्र इलाज यह है कि शोषण व लूट पर टिकी इस व्यवस्था को बदलकर एक शोषणविहीन समाज का निर्माण किया जाए।”

वहीं स्वंत्रत लेखन के साथ महिला मजदूर यूनियन की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आलोका कुजूर कहती हैं कि ”झारखंड के खूंटी जिला में रोशन होरो की हत्या की घटना के पहले तीन बड़ी घटना प्रशासन द्वारा की जा चुकी हैं। जान की कीमत मुआवजा मात्र से नहीं चलेगा। नक्सल के नाम पर किसान आदिवासियों के उपर फर्जी तरीके से नक्सली कहकर गोली चलाना बंद हो। प्रशासन इस तरह की घटनाओं को अंजाम देकर उसे क्षमा या मुआवजा में बदल नहीं सकता। रोशन होरो के मामले में पूरे इलाके के लोगों द्वारा जो मांगें रखी गयी थी, उसमें एक अहम मांग यह थी कि प्रशासन द्वारा रोशन होरो की हत्या के बाद गांव में आकर इसकी जानकारी दिए बिना लाश का पोस्टमार्टम कराया गया, ऐसी स्थिति में प्रशासन लाश को गांव लाकर परिजन को सुपूर्द करे और अपनी गलती की क्षमा मांगें। परंतु इस मांग को प्रशासन और स्थानीय झामुमो विधायक ने नजर अंदाज कर पूरे दिन ग्रामीणों को बैठाकर रखा और आए नहीं।” वे कहती हैं कि ”देखे कि प्रशासन लगातार घटना को अंजाम देती रही है और 10-20 हजार दे कर फिर उसी गलती को दोहराती रही है। ग्रामीणों द्वारा प्रशासन पर दवाब बनाने के लिए तीन करोड़ की मांग की गई थी। जो बिना सरकारी हस्तक्षेप के संभव नहीं था। जिसका परिणाम यह होता कि सरकारी दबाव के कारण ऐसी हत्याओं पर रोक लगती। अब ऐसी स्थिति में मुआवजा से ज्यादा जरूरी हैं कि प्रशासन द्वारा किये गये इस तरह के अपराध पर दोषी को सजा मिले।”

राज्य के नव नियुक्त डीजीपी एमवी राव ने टेलिफोनिक बातचीत पर कहा कि ”दोषी जवान के खिलाफ अपराधिक मामला दर्ज की गई है। उसके खिलाफ कोर्ट में मामला चलेगा और उसे सजा भी होगी।” उन्होंने कहा कि ”हां, गलती तो हुई है, केस भी दर्ज होगा और कार्रवाई भी होगी।”

बताते चलें कि पुलिस द्वारा रोशन होरो की गई इस हत्या से आक्रोशित गांव के लोग एवं पत्नी जोसाफिना होरो ने लाश लेने से मना कर दिया था और ग्राम प्रधान से अनुशंसा करा कर 10 सूत्री एक मांगपत्र खूंटी एसपी को भेजा था। जिसमें उनकी निम्नलिखित मांगें थी……

1. स्व. रोशन होरो के परिवार को तीन करोड़ रूपये मुआवजा दिया जाए।

2. मृतक के तीन आश्रितों को सरकारी नौकरी (सिविल सेवा) उनके इच्छानुसार दिया जाए।

3. पूरी घटनाक्रम का सीबीआई जांच किया जाए।

4. दोषी पुलिसकर्मी को बर्खास्त किया जाए।

5. ग्लेमर मोटरसाइकिल जिसका नं. JH01DP8226 पर पुलिस ने गोली चलाकर क्षतिग्रस्त किया, उसका ऋण अभी बाकी है, को पुलिस-प्रशासन पूरा करे एवं इसके बदले में नया ग्लेमर मोटरसाइकिल दिया जाय।

6. मृतक के दोनों बच्चों की पढ़ाई, रोजगर मिलने तक निजी शिक्षण संस्थानों में किया जाय।

7. मृतक परिवार एवं सभी गवाहों को पर्याप्त सुरक्षा प्रहरी दिया जाय।

8. पूरे 5वीं अनुसूची क्षेत्र में ग्रामसभा के बिना अनुमति के प्रशासन आज से आगे प्रवेश न करे।

9. सभी मांगें पूरी होने पर ही लाश के अंतिम संस्कार के लिए 50 हजार रूपये के साथ स्वीकार किया जाएगा।

10. मुआवजा राशि 3 करोड़ रूपये मृतक के परिजनों का खाता नंबर 459710110003749 बैंक ऑफ इंडिया के मुरहू शाखा में आज ही चेक द्वारा भुगतान किया जाय।

लेकिन 10 सूत्री इस मांगपत्र पर कोई विचार नहीं हुआ और मृतक के परिजनों और ग्रामीणोंं पर दबाव बनाकर 10 लाख रूपए की मुआवजा राशि, पत्नी जोसफिना होरो को नौकरी तथा उनकी दो बेटियां 12वर्ष, 8वर्ष तथा बेटा 3वर्ष की पढ़ाई की जिम्मेवारी का आश्वासन मात्र देकर कोरम पूरा कर लिया गया।

उक्त घटना में ग्रामीणों पर प्रशासनिक दबाव को हम ‘अम्बेदकराईट पार्टी आफ इंडिया‘(एआईपी) के अध्यक्ष कल्याण नाग के बयान से समझ सकते हैं। एक लिखित बयान में कल्याण नाग बताते हैं कि ”21 मार्च को सुबह जब हमें जानकारी मिली कि रोशन होरो को पुलिस ने गोली मार कर हत्या कर दी है, तब क्षेत्र के 3000 से अधिक लोग मृतक रोशन होरो के घर पर जमा हो गए। हमने ग्राम प्रधान से अनुशंसा करा कर 10 सूत्री एक मांगपत्र खूंटी के एसपी आशुतोष शेखर को भेजा। परिजनों व ग्रामीणों ने होरो का शव लेने से मना कर दिया। रात के 9 बजे थाना प्रभारी एवं इंस्पेक्टर जयदीप टोप्पो ने मुझे फोन करके थाना बुलाया। रात का मामला था, मैं डर गया। मैंने अपने एक मित्र सामुएल पुर्ती को बताया जिसे थाना प्रभारी भी जानते हैं। उसने थाना प्रभारी को फोन पर बताया कि मैं थाना जाने में असमर्थ हूं, अगर बहुत जरूरी है तो घर आकर मिल लें। फिर थानेदार महोदय मेरे घर के पास महिल रोड होटल के पास आए और हमसे मिले, फिर पूछा आज क्या क्या हुआ? मेरे बताए जाने पर उसने धमकी भरे लहजे में कहा — तुम तीन करोड़ की मांग करवाते हो और एफआईआर लिखते हो, ज्यादा दिन नहीं रहोगे। थानेदार ने कहा कि घर छोड़ कर कहीं मत जाना, जब बुलाया जाय थाना आ जाना। फिर 22 मार्च को थानेदार का फोन आया — कहां हो? मैंने बताया घर पर ही हैं। उसने पुन: कहा घर पर ही रहना, कहीं मत जाना। इसकी जानकारी मैंने गांव वालों को दी, शायद मुझे मिली इसी धमकी से गांव के लोग डर गए। मैं भी काफी डरा हूं कि पता नहीं कब क्या हो जाय?”

बताते चलें कि पुलिस द्वारा निर्दोषों की यह पहली हत्या नहीं है। नक्सल अभियान के बहाने झारखंड में पुलिस द्वारा इसके पहले कई हत्याएं हो चुकी हैं। 2010 में महुआ चुनने जा रहे दो नाबालिग को सीआरपीएफ के जवानों ने गोली मार दी। 31 जनवरी 2012 में लातेहार के जंगल में एक मुक बधिर चारवाहा लुकस मिंज को भी सीआरपीएफ के जवानों ने गोली मार दी थी। 8 जून 2015 को पलामू के सतबरवा के बकोरिया में एक फर्जी मुठभेड़ दिखाकर 12 लोगों को मार दिया गया था, जिसमें 5 नाबालिग थे। इस घटना की अब सीबीआई जांच चल रही है। इस घटना के वक्त डीके पांडेय डीजीपी थे और वर्तमान डीजीपी एमवी राव उस वक्त एडीजी थे। वहीं 9 जून 2017 को गिरिडीह जिला अंतर्गत जैनधर्मावलंबियों का मुख्य तीर्थ स्थल मधुबन के पारसनाथ पर्वत पर डोली मजदूर मोतीलाल बास्कें की हत्या सीआरपीफ द्वारा कर दी गई, जिसके खिलाफ राज्य के मजदूरों ने लंबे समय तक लगातार आंदोलन किया था। इस घटना को लेकर तत्कालीन विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन ने भी न्यायिक जांच की मांग की थी। जनवरी 2019 में खूंटी और पश्चिमी सिंहभूमि के बीच 11 वर्षीय संत थामस जो चौथी कक्षा का छात्र था, सहित एक 16 वर्षीय संजय ओड़ेया को मार कर मुठभेड़ दिखा दिया गया।

इस घटना में सबसे अहम बात यह है कि खूंटी से महज 50 किलोमीटर दूर रांची में बैठी हेमंत सोरेन की सरकार के मंत्री, कोई आला अधिकारी, यहां तक कि खुद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी घटना स्थल पर जाने की जहमत नहीं उठाई। जबकि मृतक रोशन होरो पूर्व में सीएनआई चर्च का धर्म प्रचारक भी रह चुका है। क्षेत्र के लोग उसका काफी सम्मान करते थे।

वैसे सीआरपीएफ के जितेंद्र कुमार प्रधान पर एफआईआर हो चुका है, मगर एफआईआर में दर्ज शब्द व उसकी भाषा से नहीं लगता है कि उसे सजा होगी। यह एफआईआर क्षेत्र की जनता में उपजी जन—आक्रोश को दबाने का हथियार भर है।

बता दें कि सीआरपीएफ 21/-94 बीडब्ल्यू. सीआरपीएफ के मनोज कुमार यादव द्वारा फोर्स नं.— 175063711 सिपाही जितेंद्र कुमार प्रधान पर मुरहू थाना में कांड संख्या – 24/20 भादवी की धारा 304 के तहत 20/03/2020 को प्राथमिकी दर्ज करायी गयी। प्राथमिकी में दर्ज रिपोर्ट के अनुसार 20 मार्च को सुबह सीआरपीएफ 21/-94 बटालियन सर्च अभियान को निकला था। एदेलबेड़ा के पास एक मोटरसाईकिल पर सवार एक आदमी तेजी से आगे बढ़ा तो जितेंद्र कुमार प्रधान ने उसे रूकने को कहा, मोटरसाईकिल रूकी, जब जितेंद्र कुमार प्रधान मोटरसाईकिल सवार के पास पहुंचा और उसे पकड़ने की कोशिश की, तो वह उसे धक्का देकर भागने लगा। उसकी मोटरसाईकिल पर बोरे में कुछ था जिसे देखकर जितेंद्र कुमार प्रधान को लगा कि बोरे में कोई विस्फोटक सामग्री है। तभी कहीं पास से गोली चलने की आवाज आई। उसे लगा कि नक्सली हमला कर रहे हैं। तब जितेंद्र कुमार प्रधान ने भागते हुए उसपर गोली चला दी। जितेंद्र कुमार प्रधान ने बताया कि उसने आत्मरक्षार्थ गोली चलाई।

इस घटना में मजे की बात तो यह है कि जिन स्थानीय प्रशासन व जनप्रतिनिधि का इस्तेमाल किया गया वे सभी समाज के निचली कतार के हैं, जैसे बीडीओ प्रदीप भगत (आदिवासी), सीओ शंभू राम (दलित), थाना प्रभारी जयदीप टोप्पो (आदिवासी) एवं मझगांव के झामुमो विधायक नीरल पुर्ती (आदिवासी)। जिससे यह बात तो साफ हो गई कि सत्ता व प्रशासन के चरित्रों में सामाजिक तानाबाना का कोई स्थान नहीं है। इसपर निर्भर यह करता है कि इनका इस्तेमाल कौन कर रहा है।

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