इस पर्वती गाँव में छोटी-से-छोटी चीज़ की भी दरकार है …

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(भूख पर केंद्रित कविताओं का संकलन)

कोरोना का असर सबसे ज्यादा आम जनता पर हुआ है।ये लोग दोहरी मार झेल रहे हैं।एक तरफ कोरोना और दूसरी तरफ भूख।हो भी क्यों न ? जमाखोरी और कालाबाजारी अपने चरम में है।270 रुपये का आटा अब 400 में बिक रहा है।प्रधानमंत्री जी की 21 दिन घर में रहने की घोषणा के बाद रातों रात कीमतें आसमान छू गईं।अब ऐसे में आम जनता अपने परिवार की भूख कैसे मिटाये? भूख आदमी को कुछ भी करवा सकती हैं।इसी भूख को ध्यान में रखते हुए कुछ कविताओं का संकलन किया है।

(१).चौथी भूख -सुमित्रानंदन पंत

“भूखे भजन न होई गुपाला,
यह कबीर के पद की टेक,
देह की है भूख एक!—
कामिनी की चाह, मन्मथ दाह,
तन को हैं तपाते
औ’ लुभाते विषय भोग अनेक
चाहते ऐश्वर्य सुख जन
चाहते स्त्री पुत्र औ’ धन,
चाहते चिर प्रणय का अभिषेक!
देह की है भूख एक!
दूसरी रे भूख मन की!
चाहता मन आत्म गौरव
चाहता मन कीर्ति सौरभ
ज्ञान मंथन नीति दर्शन,
मान पद अधिकार पूजन!
मन कला विज्ञान द्वारा
खोलता नित ग्रंथियाँ जीवन मरण की!
दूसरी यह भूख मन की!
तीसरी रे भूख आत्मा की गहन!
इंद्रियों की देह से ज्यों है परे मन
मनो जग से परे त्यों आत्मा चिरंतन
जहाँ मुक्ति विराजती
औ’ डूब जाता हृदय क्रंदन!
वहाँ सत् का वास रहता,
चहाँ चित का लास रहता,
वहाँ चिर उल्लास रहता
यह बताता योग दर्शन!
किंतु ऊपर हो कि भीतर
मनो गोचर या अगोचर
क्या नहीं कोई कहीं ऐसा अमृत धन
जो धरा पर बरस भरदे भव्य जीवन?
जाति वर्गों से निखर जन
अमर प्रीति प्रतीति में बँध
पुण्य जीवन करें यापन,
औ’ धरा हो ज्योति पावन!”

(२).नन्दा देवी-2 – अज्ञेय

“वहाँ दूर शहर में
बड़ी भारी सरकार है
कल की समृद्धि की योजना का
फैला कारोबार है,
और यहाँ
इस पर्वती गाँव में
छोटी-से-छोटी चीज़ की भी दरकार है,
आज की भूख-बेबसी की
बेमुरव्वत मार है।
कल के लिए हमें
नाज का वायदा है-
आज ठेकेदार को
हमारे पेड़ काट ले जाने दो;
कल हाकिम
भेड़ों के आयात की
योजना सुनाने आवेंगे-
आज बच्चों को
भूखा ही सो जाने दो।
जहाँ तक तक दीठ जाती है
फैली हैं नंगी तलैटियाँ-
एक-एक कर सूख गये हैं
नाले, नीले और सोते।
कुछ भूख, कुछ अज्ञान, कुछ लोभ में
अपनी सम्पदा हम रहे हैं खोते।
ज़िन्दगी में जो रहा नहीं
याद उस की
बिसूरते लोक-गीतों में
कहाँ तक रहेंगे सँजोते!”

(३).हाथ से बेहाथ होकर-केदारनाथ अग्रवाल

हाथ से बेहाथ होकर
गिरा,
टूटा,
फर्श पर दम तोड़ बैठा,
काँच का मेरा गिलास!
भूख का भाषण हुआ अब
दूध का
व्याकुल विलाप।
पेट खाली रहा खाली,
और, मैं भी
चुप रहा,
इस त्रासदी को सह गया,
बेहाल
होकर रह गया।”

(४).सच न बोलना -नागार्जुन

“मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को,
डंडपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को!
जंगल में जाकर देखा, नहीं एक भी बांस दिखा!
सभी कट गए सुना, देश को पुलिस रही सबक सिखा!
जन-गण-मन अधिनायक जय हो, प्रजा विचित्र तुम्हारी है
भूख-भूख चिल्लाने वाली अशुभ अमंगलकारी है!
बंद सेल, बेगूसराय में नौजवान दो भले मरे
जगह नहीं है जेलों में, यमराज तुम्हारी मदद करे।
ख्याल करो मत जनसाधारण की रोज़ी का, रोटी का,
फाड़-फाड़ कर गला, न कब से मना कर रहा अमरीका!
बापू की प्रतिमा के आगे शंख और घड़ियाल बजे!
भुखमरों के कंकालों पर रंग-बिरंगी साज़ सजे!
ज़मींदार है, साहुकार है, बनिया है, व्योपारी है,
अंदर-अंदर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी है!
सब घुस आए भरा पड़ा है, भारतमाता का मंदिर
एक बार जो फिसले अगुआ, फिसल रहे हैं फिर-फिर-फिर!
छुट्टा घूमें डाकू गुंडे, छुट्टा घूमें हत्यारे,
देखो, हंटर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे!
जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा,
काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा!
माताओं पर, बहिनों पर, घोड़े दौड़ाए जाते हैं!
बच्चे, बूढ़े-बाप तक न छूटते, सताए जाते हैं!
मार-पीट है, लूट-पाट है, तहस-नहस बरबादी है,
ज़ोर-जुलम है, जेल-सेल है। वाह खूब आज़ादी है!
रोज़ी-रोटी, हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा,
कोई भी हो, निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा!
नेहरू चाहे जिन्ना, उसको माफ़ करेंगे कभी नहीं,
जेलों में ही जगह मिलेगी, जाएगा वह जहां कहीं!
सपने में भी सच न बोलना, वर्ना पकड़े जाओगे,
भैया, लखनऊ-दिल्ली पहुंचो, मेवा-मिसरी पाओगे!
माल मिलेगा रेत सको यदि गला मजूर-किसानों का,
हम मर-भुक्खों से क्या होगा, चरण गहो श्रीमानों का!”

(५).भूखों की रोटी हड़प ली गई है-बर्तोल ब्रेख्त-अनुवाद मोहन थपलियाल

“भूखों की रोटी
हड़प ली गई है
भूल चुका है आदमी
माँस की शिनाख़्त
व्यर्थ ही भुला दिया गया है
जनता का पसीना।
जय पत्रों के कुंज
हो चुके हैं साफ़।
गोला बारूद के कारख़ानों की चिमनियों से
उठता है धुआँ।”

(६).जब भी -सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

“जब भी
भूख से लड़ने
कोई खड़ा हो जाता है
सुन्दर दीखने लगता है।
झपटता बाज,
फन उठाए सांप,
दो पैरों पर खड़ी
कांटों से नन्ही पत्तियां खाती बकरी,
दबे पांव झाड़ियों में चलता चीता,
डाल पर उलटा लटक
फल कुतरता तोता,
या इन सबकी जगह
आदमी होता।”

(७).भूख -धूमिल

“गेहूँ की पौध में टपकती हुई लार
लटे हुए हाथ की
आज की बालियों के सेहत पूछती है।
कोई नारा नहीं, न कोई सीख
सांत्वना के बाहर एक दौड़ती ज़रूरत
चाकू की तलाश में मुट्ठियाँ खोलती है फैली हुई
हथेली पर रख देती है…
एक छापामार संकेत
सफ़र रात में तै करना है।
आततायी की नींद
एतवार का माहौल बना रही है
लोहे की जीभ : उचारती है
कविता के मुहावरे
ओ आग! ओ प्रतिकार की यातना!!
एक फूल की कीमत
हज़ारों सिसकियों ने चुकाई है।
भूख की दर्शक-दीर्घा से कूदकर
मरी हुई आँतों का शोर
अकाल की पर्चियाँ फेंकता है।
आ मेरे साथ, आ मेरे साथ आ!
हड़ताल का रास्ता हथियार के रास्ते से
जुड़ गया है।
पिता की पसलियों से माँ की आँखों से गुज़र
भाई के जबड़े से होती हुई मेरे बेटे की तनी हुई
मुट्ठी में आ! उतर! आ!
ओ आटे की शीशा!
चावल की सिटकी!
गाड़ी की अदृश्य तक बिछी हुई रेल
कोशिश की हर मुहिम पर
मैं तुम्हें खोलूँगा फिश-प्लेट की तरह
बम की तरह दे मारूँगा तेरे ही राज पर
बीन कर फेंक दूँगा
मेहनतकश की पसलियों पर
तेरा उभार बदलाव को साबित करता है
जैसे झोंपड़ी के बाहर
नारंगी के सूखे छिलके बताते हैं :
अंदर एक मरीज़ अब
स्वस्थ हो रहा है
ओ क्रांति की मुँहबोली बहन!
जिसकी आंतों में जन्मी है
उसके लिए रास्ता बन।”

(८).भूख है तो सब्र कर – दुष्यंत कुमार

“भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुदद्आ ।
मौत ने तो धर दबोचा एक चीते कि तरह
ज़िंदगी ने जब छुआ तो फ़ासला रखकर छुआ ।
गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नही
पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ ।
क्या वज़ह है प्यास ज्यादा तेज़ लगती है यहाँ
लोग कहते हैं कि पहले इस जगह पर था कुँआ ।
आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं आग को
आप के भी ख़ून का रंग हो गया है साँवला ।
इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो
जब तलक खिलते नहीं ये कोयले देंगे धुँआ ।
दोस्त, अपने मुल्क कि किस्मत पे रंजीदा न हो
उनके हाथों में है पिंजरा, उनके पिंजरे में सुआ ।
इस शहर मे वो कोई बारात हो या वारदात
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ।”

(९).भूखा आदमी- इब्बार रब्बी

“भूखे आदमी को लगता है कि जैसे
वह नंगा हो गया है,
कुछ पेट उसे नोच रहे हैं ।
उसकी आत्मा से तृप्ति का केंचुल
उतर गया है
वह अपने में सिकुड़ रहा है,
कि उसकी भूख और अधिक और अधिक
नंगी न हो जाए
वह भूख से बाहर नहीं निकलता
अपना कुछ भी
भूख में डूब जाने के लिए
इधर-उधर कातरता से कतराता है
भूखा आदमी सितम्बर की धूप में
यहां आता है, वहां जाता है
वह लपटों की सीढ़ियां चढ़ता है
उतरता है ।
उसे लगता है कि वह भूलभुलैया में भटक रहा ऐ
जो पिघले लोहे से भरी है
उसे लगता है कि समुद्र सूख रहे हैं
उसकी खाल और स्वभाव तड़क रहा है ।”

(१०).भूखा बच्चा -आलोक धन्वा

“मैं उसका मस्तिष्क नहीं हूँ
मैं महज उस भूखे बच्चेस की आँत हूँ।
उस बच्चे की आत्मा गिर रही है ओस की तरह
जिस तरह बाँस के अँखुवे बंजर में तड़कते हुए ऊपर उठ रहे हैं
उस बच्चे का सिर हर सप्ताह हवा में ऊपर उठ रहा है
उस बच्चे के हाथ हर मिनट हवा में लम्बे हो रहे हैं
उस बच्चे की त्वचा कड़ी हो रही है
हर मिनट जैसे पत्तियाँ कड़ी हो रही हैं
और
उस बच्चे की पीठ चौड़ी हो रही है जैसे कि घास
और
घास हर मिनट पूरे वायुमंडल में प्रवेश कर रही है
लेकिन उस बच्चे के रक्त़संचार में
मैं सितुहा-भर धुँधला नमक भी नहीं हूँ
उस बच्चे के रक्तसंचार में
मैं केवल एक जलआकार हूँ
केवल एक जल उत्तेजना हूँ।”

(११).भूख -नरेश सक्सेना

भूख सबसे पहले दिमाग़ खाती है
उसके बाद आँखें
फिर जिस्म में बाक़ी बची चीज़ों को
छोड़ती कुछ भी नहीं है भूख
वह रिश्तों को खाती है
माँ का हो बहन या बच्चों का
बच्चे तो उसे बेहद पसन्द हैं
जिन्हें वह सबसे पहले
और बड़ी तेज़ी से खाती है
बच्चों के बाद फिर बचता ही क्या है।”

(१२).एक भूखा बच्चा- मिथिलेश श्रीवास्तव

“कई प्रसन्न बच्चों के बीच एक भूखा बच्चा
उछलता-कूदता भूला रहता है अपनी भूख
भूखा वह किसी से नही डरता
दिल्ली की गोविन्दपुरी और बम्बई की उपनगरीय बस्तियों
की सड़ान्ध के बाहर एक बेहतर ज़िन्दगी का सपना
दिखाते अपने बाप के साथ वह ख़ूब उछलता
प्रतियोगियों के समारोह में।
चित्र बनाते बच्चों के बीच एक कलाकृति वह भी बनाता
नृत्य करते बच्चों के बीच एक कलाकृति वह भी बनाता
नृत्य करते बच्चों के पैरों की थाप पर
थिरकते हुए वह मुस्कराना नहीं भूलता
सफल या असफल घोषित किए जा रहे बच्चों के बीच वह डटा रहता अकेले।
फ़ास्टफ़ूड के सजे-धजे स्टालों की ओर
से आती हुई ख़ुशबू फैलती
अपनी खाली जेब वह यों टटोलने लगता
जैसे खेल में एक बच्चा ख़रीद लेता है
झूठ-मूठ के रुपये में दुनिया भर की चीज़ें
वह बार-बार देखता माँ के आने का रास्ता।”

(१३).भूख का कोरस-मदन कश्यप

“जानवर होता
तो भूख को महसूस करते ही निकल पड़ता
पेट भरने की जुगत में
और किसी एक पल पहुँच जाता वहाँ
प्रकृति ने जहाँ रख छोड़ा होता मेरे लिए खाना
लेकिन आदमी हूँ भूखा
और पता नहीं कहाँ है मेरे हिस्से का खाना
आदमी हूँ बीमार
कहाँ है मेरे हिस्से की सेहत
आदमी हूँ लाचार
कहाँ है मेरे हिस्से का जीवन
कुछ भी तो तय नहीं है
बिना किसी नियम के चल रहा है जीवन का युद्ध
चालाकी करूँ
तो दूसरों के हिस्से का खाना भी खा सकता हूँ
पर बिना होशियारी के तो
अपना खाना पाना और बचाना भी सम्भव नहीं
पेट भरने के संघर्ष से जो शुरू हुई थी सभ्यता की यात्रा
कुछ लोगों के लिए वह बदल चुकी है घर भरने की क्रूर हवस में
बढ़ रहा है बदहजमी की दवाओं का बाज़ार
और वंचितों की थालियों में कम होती जा रही हैं रोटियाँ
ऐसे में कहाँ जाए भूखा ‘रामदास’
जो माँगना नहीं जानता और हार चुका है जीवन के सारे दाँव
ठण्डे और कठोर दरवाज़ों वाले बर्बर इमारतों के इस शहर में
भूख बढ़ती जा रही है सैलाब की तरह
और उसमें डूबते चले जा रहे हैं
भोजन पाने के लिए ज्ञात-अज्ञात रास्ते!”

(१४).भूख के बच्चे – सुभाष राय

“कचरे से प्लास्टिक बीनती
पारो झुक गई थी जवानी में ही
सूरज सातवाँ बच्चा था उसका
जन्मते ही लुढ़क गया था धूल में
नहीं जानती बाक़ी छह कहाँ हैं, हैं भी या नहीं
सूरज को भी रोक पाएगी, पता नहीं
भूख की आग में जलकर
भस्म हो गई है उसकी ममता
निचुड़ गया है उसका मातृत्व
यह सूरज आख़िरी नहीं होगा उसकी कोख से
अब मौत के साथ ही ख़त्म होगा यह सिलसिला।”

(१५).भूख में आँखें- विनय विश्वास

रात गहरी होती जा रही है
नींद उतरती जा रही है मेरे जैसे सुखियों की आँखों में
पर खुदकुशी कर चुके किसान की आँखों का तारा ये
बच्चा
कई दिन से भूखा है
इसकी आँखें लगातार खुली हैं
और पुतलियाँ तेज़ी से इधर-उधर भटक रही हैं
थोड़ी सी शक्ति मिलती तो ये पुतलियाँ भी
ठहरती कहीं
तेज़ी से इधर-उधर भटकती पुतलियाँ
ढूंढ़ रही हैं
क्या पता किस ठौर
एक टुकड़ा रौशनी मिल जाए
जैसे जीवन की सम्पूर्ण शक्ति एक तलाश हो
सिर्फ़ एक तलाश
और वो इन नन्ही-नन्ही पुतलियों में आकर बैठ गई हो!।”

(१६).भूख-राकेश मिश्र

“सूई श्रृंखला सी
प्रवेश करती है
रोम-रोम से
हर कोशा में उपस्थित होती है भूख।”

(१७).वह-लीना मल्होत्रा राव

“वह अपने अधनंगे फूले पेट वाले बच्चे को उठाए
मेरी कविता की पंक्तियों में चली आई
और भूख के बिंब की तरह बैठ गई
मैं जब भी कविता खोलती
उसके आजू बाजू में बैठे शब्द मक्खियों की तरह उस पर भिनभिनाने लगते
जिन्हें हाथ हिलाकर वह यदा कदा उड़ा देती।
उस निर्जन कविता में
उसकी दृष्टि
हमारी नाकामी का शोर रचती
जिससे मैं दूर भाग जाना चाहती
किंतु अफसोस कविता गाड़ी नहीं थी जिसके शीशे चढ़ाकर उसे मेरी दुनिया से बेदखल किया जा सकता।
वह आ गई थी
और अपना हक माँग रही थी।”

(१८).भूखा तोतला बच्चा और कविता- प्रांजल धर

“काव्य-पँक्तियों पर चीखता है
दो दिन से भूखा एक तोतला बच्चा
और बिलख उठतीं कितनी ही माँएँ
पँक्तियों के शब्दों पर ।
जबकि शब्द भी इसी परिवेश के हैं,
यूरोप-अमरीका से नहीं आए हैं
किसी महासागरीय धारा की
पीठ पर सवार होकर ।
शब्दों से परिचित हैं
तमाम तोतले बच्चों के आधे-अधूरे पिता
जो हालात और ईमानदारी की
दोहरी मार झेल रहे हैं,
सुबह-शाम करम का लेखा मिटाते हुए
भाग्य से खेल रहे हैं ।
झाँकते कविता की लकीरों में से
छन्दों की पीरों में से
अनेक तोतले बच्चों के
अनेक बिखरे परिवार ।
खोल देते
ममता की खिड़कियाँ,
दर्द का रोशनदान,
और समर्पण का बहुत बड़ा दरवाज़ा ।
जा बैठती कविता
जिसकी घिसी-पिटी चौखट पर ।
सुनती रहती चीख़
भूखे तोतले बच्चे की ।”

(१९).उनका सफ़र -विपिन चौधरी

“रोटी का स्याह पक्ष ही
देखा है उन्होंने ।
जला हुआ,
महकविहीन ।
जंगल से आग तक
प्रेम से प्यास तक का
विचलित कर देने का सफ़र है उनका ।
सब जानते है
उनके समानांतर एक भूखी-पीढ़ी चल रही है ।
कड़ी धूप में नंगे-पाँव ।
लम्बे सफ़र के बाद
बची-खुची हिम्मत के साथ
वे हादसों की तह में उतरते हैं ।
उस जीवन के विरूद्ध नहीं
फिर भी वे
जिसने उन्हें हर क़दम पर छकाया है ।
वे कब इतिहास में अपना क़दम रखते हैं
कब वर्तमान में अपनी सिकुड़ी हुई जगह बनाते हैं।
अनिश्चित भविष्य में भी अपने होने का प्रबल दावा रखते हैं ।
इंसानियत की पहल पर ऊँचा मचान तैयार करते हुए
लगातार धरती पर नज़र टिकाए हुए ।
दुनियावी शऊर से कोसों दूर।”

(२०).भूख से युद्ध-घनश्याम कुमार देवांश

“मैं अपनी भूख से लड़ना नहीं जानता
माँ से दूर जब भी अकेला होता हूँ
तो यह एक मायावी तृप्ति रचती है मेरे चारों तरफ
मैं बेबाक निर्द्वंद्व बेखटके गुंथा रहता हूँ
किसी न किसी काम में
कि तभी भूख यकायक घात लगाए बाघ की तरह
जोरदार हमला करती है
दुनिया भर के छोटे बड़े काम पूरे कमरे में
भय और विस्मय से तितर बितर हो जाते हैं
मैं घबराकर बर्तन टटोलता हूँ
सब्जी की टोकरी पलटता हूँ
छूरी उठाकर फटाफट तरकारी काटता हूँ
पतीली में आटा राँधता हूँ
और दुनिया का सबसे तेज़ कुक बन जाता हूँ
मैं पंद्रह मिनट में
दाल चावल, आलू चोखा और रोटी
या फिर खिचड़ी जैसा कुछ भी बनाकर तैयार कर देता हूँ
मैं प्लेट लिए कमरे में लौटता हूँ
जैसे घायल शिकारी अपनी बंदूक के साथ
जंगल में लौटता है
लेकिन हर बार बाघ जा चुका होता है।”

(२१).शहर में भूख -गौरव पाण्डेय

“साधारण सी बात को
पिता बड़े गूढ़ तरीके से कहते
“बेटा!! इस देश में लोग भूखे मरते हैं
और कवि भी”
हम हँसते-वे नाराज़ होते।
गाँव में खेत थे हमारे
बाग थी, बाग़ में पुश्तैनी आम-जामुन
कुआँ-तलाब लबालब
परिवार-पड़ोसी सब
भला कैसे समझ में आती पिता की बात तब!
अब शहर में
कुछ अधिक ही लगती है भूख
गला कुछ ज्यादा ही सूखता है
हमें याद आते हैं खेत
परिवार-पड़ोसी याद आते हैं
मन हिरनों-सा भागता है गाँव की ओर…
पर अब कहाँ
हमारा वो पहले वाला गाँव
परिवार-पडोसी-बाग़-बगइचा-छाँव.!
फिर भी पाठकों.!
गाँव में पिता हैं, माँ है हमारी
जहाँ पिता हैं वहाँ भटकना नहीं है
जहाँ माँ है वहाँ भूख नहीं है!”

(२२).बंधक है उनका बसंत-अनुपम सिंह

“उनके बच्चे छोड़ रहे हैं
मछलियों-सा सेहरा
अम्हौरिओं का
चुनचुनाहट को पीठ में दबाये
निखरहरे सोये हैं बच्चे
भूख से चिपक गयी हैं उनकी आतें
सांसे फंसी हैं अतड़ियों में
कोरों में जमा है रात का कीचर
कीचर में बझी हैं कोमल पलके उनकी
पत्तों से ऐंठकर
झुलस जाते हैं बच्चे
जिन्दा रहने की ज़िद में
अधखुली रह जातीं हैं उनकी आँखें
सरकारी आंकड़ों में दर्ज़ है
मौत का सार्वभौम कारण
‘मौत अटल सत्य है’
‘यह संसार मिथ्या है’
फिर भी वे सिखाते हैं अपने बच्चों को
जीवित रहना
मौत से लड़ना
और अड़े रहना
सिखातें हैं भरोसा बनाए रखना
जिद्दी बच्चे
कभी-कभी नहीं मानते बात।”

(२३).भूख -यतीश कुमार

“रोटियों की गंध
अंतहीन गंध के चक्कर में
घूमती रहती है धरती
या इसी चक्र में घूमते हैं
इस पर रहने वाले लोग
मृग तृष्णा है ये गंध
या इंसानों में भी है कोई कस्तूरी
विचित्र अग्नि है
रूह झुलसती नहीं
बस सुलगती रहती है
भूख करवट यूँ बदलती है
मानो जलती लकड़ी
आँच ठीक करने के लिए
सरकाई जा रही हो
उसी आँच पर रोटी पकेगी
सोच कर नींद नहीं आती
आँच आती है, बढ़ती है
बस कमबख़्त रोटी नहीं आती
आँखें बुझ जाती है
नींद डबडबाती है
देह सो जाती है
पर भूख अपलक जागती है
हाँ,कभी-कभी ढिबरी में
ज़्यादा तेल फैल जाने जैसा
फकफ़काती भी है
एक लम्बी रुदाली है
जिसकी सिसकियाँ नहीं थमती
एकसुरा ताल है जिस पर
ताउम्र नाचता है जीवन
एक ठूँठ पेड़ है
जिसकी पत्तियाँ नहीं होती
तने का बस हरापन ज़िंदा है
और वो जो लहू हरे में बह रहा है
वो अजर-अमर भूख है
भूख को अमरत्व प्रदान है
पर सपनों को नहीं
देह से बाहर
देश की भूख अलग होती है
और देश के अंदर
राज्यों की अलग भूख
अनंत सीमाओं की भूख लिए
दूर अंतरिक्ष से दिखते हैं देश
ऊन के उलझे धागों जैसे
कोई एक भी सीधी रेखा नहीं दिखती
बीते दिनों देश की भूख
रोटी से ज़्यादा
पानी की हो गयी है
पूरी नदी चाहिए इनको
पर इन दिनों प्यास
और विकराल हो चला है
इसे अब नदी से संतुष्टि नहीं
पूरा समंदर चाहिए
भूख की स्थूलता
अब इस पर निर्भर है
कि ये किसकी भूख है
भारत की,पाकिस्तान की
चाइना की या अमेरिका की
पर भूटान की भूख
थोड़ी मीठी सी है
भूख की ज़िद इनदिनों
आक्टोपसी हो गयी है
इसलिए कहता हूँ यतीश
रोटी से ऊपर के सारे भूख
दरिंदे होते है
नुक़सान होना तय है
बोसों की भूख को
रोटी से नीचे की भूख मानता हूँ मैं
कई घर जिनमें रोटी नहीं है
वो बोसों के आलिंगन पर ही तो टिके हैं
और ज़्यादातर देश ??
ज़्यादातर देश टिके हैं
आलिंगन की सांत्वना पर
रोटी की गंध अपनी नाभि की कस्तूरी में लेकर ।”

संकलन-नीरज कुमार मिश्र

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