मेरी ज़रूरियात वाकई कम हैं ….. विजयशंकर चतुर्वेदी की कविता

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2. मेरा सामान

मेरी ज़रूरियात वाकई कम हैं

मेरे पास दो जोड़ा पैंट-शर्ट हैं,

गैस लाइटर टूटने के बाद बनी एक चिलमची,

जिसमें मैं सिगरेट फँसा कर पी लेता हूँ

सामान की फ़ेहरिस्त बनायी जाए तो थोड़ा ठहरिये

एक चटाई और चादर है जिसे मैने कई महीनों से धोया नहीं है

धो दूँ तो जिंदगी फट जाने की आशंका है जनाब!

सीलन भरा कमरा मुझे एक महान चित्रकार की याद दिलाता है

जो कहता था कि हवा में भी चित्र और जीवन के रंग देख लेना देखना होता है

ऐसे ही आकृतियों को देखना होता है कोरे-काले ब्लैक बोर्ड को भी.

इस कमरे की दीवारों पर मेरी ज़िंदगी के निशाँ हैं

देखो, देखो मेरी पीठ बनी हुई है उस जगह

ठीक उसी तरह जैसे कि एक शायर का सर बना पाया गया था

कमाठीपुरा के एक कोठे के बाहर पत्थर के बड़े टुकड़े पर

वह ग्राहकों से निपटने वाली अपनी प्रेमिका का इंतज़ार किया करता था.

इतने और ऐसे चित्र बादल भी नहीं बना सकते

रंगत ऐसी कि देह की कूची के सामने दा विंची और माइकल एंजेलो पानी भरें.

मैं सोता हूँ कुछ तिलचट्टों के साथ

जिनके बारे में मैंने पढ़ा गूगल में कि ये मनुष्य के सबसे प्राचीन साथी हैं

इनकी कौन सी नस्ल मेरे साथ रहती है, कौन सी पीढ़ी?

और छिपकलियों के क्या कहने?

उन्हें अगर न भगाओ तो वे हर घर में रहना पसंद करती हैं

मैं तो चमगादड़ों को भी नहीं रोकता आने-जाने से!

वैसे अध्यापकों की कौन-सी पीढ़ी पढ़ाती है छात्रों की किस पीढ़ी को?

मेरे कमरे में कई अध्यापक हैं

मैं न उनसे सवाल पूछता हूँ न ही वे मुझे कुछ बताते हैं

हम रहते हैं सनातन भाईचारे की एक दुनिया में.

वह देखो, देखो चला जा रहा है कनख़जूरा बड़ी शान से!

मुझे नज़र दौड़ाने दीजिये

कहाँ रखा है मेरा लोटा,

अरे! इस जर्जर पलंग के नीचे जो माँ को मिला था पिता से

और चार दिन की ज़िंदगी वाले इसके काले-कलूटे पाये!

इनसे लिपट-लिपट कर रोया हूँ मैं कितनी रातें

पलंग की बुझे सूर्य जैसी उजड़ी यह पुश्त

इस पर सर टिकाकर मैं हो जाता हूँ और उदास.

ख़ैर, यह रहा मेरा टूटा हुआ प्याला

जिससे टपकती ही चली जा रही है ज़िंदगी की आला शराब!

यों तो गिनाने के लिए अनगिनत जंग खाए गिलास,

चम्मचें, बटलोइयाँ, करछुलें, हंडे और गागरें वगैरह…

बिखरी पड़ीं हैं याददाश्त की अंधेरी कोठरी में

लेकिन ज़िंदगी के कबाड़खाने के लिए

मुझे अब भी बहुत कुछ जुटाना है.

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