आवासीय परिसर निर्माण हेतू हेमन्त सरकार लैंड पूल नीति वापस लो

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  • विशद कुमार
क्या कभी रांची के आदिवासी समाज रांची में आवासीय परिसर बनाने की मांग रखी थी ? या रखी है? नहीं न।
ऐसा सवाल उठाया है आदिवासी अधिकार मंच, झारखण्ड के महासचिव प्रफुल्ल लिण्डा ने। वे आगे कहते हैं कि फिर रांची शहर के विभिन्न क्षेत्रों में आवासीय परिसर कैसे बनाये गये?
 वे बताते हैं कि राजधानी के हरमू, कड़रु, गोंदा, हतमा बरियातू, कुसाई कोकर, नामकुम, डोरण्डा, लालपुर, बैंक, हिनू इत्यादि अनेक क्षेत्रों में आवासीय परिसर आदिवासियों की जमीन पर हैं। क्या इन आवासीय परिसर में आदिवासी रहते हैं? नहीं न। आदिवासी को उजाड़ कर, हटाकर, गैर आदिवासियों को क्यों बसाया गया? पांचवीं अनूसुचित क्षेत्रों में संविधान की धारा ,19 (ड़) के तहत गैर आदिवासियों के निवास और बसने में रोक और पाबन्दी है। फिर ये गैर आदिवासियों के लिये आवासीय परिसर क्यों?
क्या किसी आदिवासी संगठन ने मांग रखी कि आवासीय परिसर बनाओ? नहीं न। तो फ़िर झारखंड सरकार को यह खुजली कैसे हुई ? जिन्होंने विधानसभा में 23 मार्च को क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण संशोधन विधेयक 2021 लाकर लैंड पुल नीति पारित किया गया है, ताकि आवासीय परिसर बनाया जा सके। ये आवासीय परिसर किन लोगों के लिए? किन्हें आवासीय परिसर की जरूरत है?
लैंड पुल नीति की समझ से रांची में आदिवासी समाज को उनकेे जल, जमीन, जंगल, पहचान, अस्मिता और सांस्कृति को मिटाना है।
प्रफुल्ल लिण्डा मांग करते हुए कहते हैं कि हेमन्त सोरेन सरकार लैंड पुल नीति वापस ले।
आदिवासी समाज के जमीन पर आवासीय परिसर नहीं बने।
गैर आदिवासियों के आवासीय परिसर ‌बनने से आदिवासियों का विकास कैसे होगा? झारखंड सरकार कानूनी तरीके से जमीन लूटना बंद करो।

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