अफवाहें हैं अफवाहों का क्या?

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इसे संयोग ही कहिये कि दुनिया के सबसे बड़े (अ)लोकतंत्र की सबसे बड़ी (अ) राजनीतिक पार्टी के पोर्टल पर विश्व भर में फैल चुकी और देश में पैर पसार रही एक महामारी के बारे में जानकारी वाले हिस्से में FAQs पर मेरी नज़र पड़ गई। मुझे लगा कि यह जानकारी साझा करनी चाहिये सो साईट पर पूछे गये कुछ सवाल और दिये गये उनके जवाब, जो टू द प्वाइंट थे, यहां दे रहा हूं:
-क्या यह सच है कि यह महामारी विश्व में चार महीने पहले फैलनी शुरू हुई?
-जी। सच है।
-क्या यह भी सच है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हमें भी ढाई महीने पहले जानकारी दे दी थी जब यह महामारी फैल रही थी?
-जी। बिल्कुल सच है।
-और क्या यह भी सच है कि देश में महामारी विदेशों से आने वाले अमीर लोगों के कारण फैली?
-जी। यह भी झूठ नहीं है।
-क्या यह सच है कि गौैमूत्र से महामारी का उपचार हो सकता है?
-देखिये, अब तक अगर यह सिद्ध नहीं हुआ कि गौमूत्र से उपचार हो सकता है तो यह भी सिद्ध नहीं हुआ कि नहीं हो सकता। हम वैज्ञानिक पद्धति से सोचने, काम करने वाले लोग हैं सो अनुसंधान जारी है।
-हमने यह महामारी फैलने से रोकने के लिये क्या किया?
-हमने बहुत कुछ किया। जैसे हमने विदेशों से आने वाले लोगों से सेल्फ क्वारांटीन का अनुरोध किया, अब उनमें से कइयों ने नहीं माना तो हम क्या करें? फिर जब मामले बढ़ने लगे तो हमने ‘न भूतो, न भविष्यति’ 14 घंटे के जनता कर्फ्यू का आयोजन किया। अपने स्वास्थ्यकर्मियों का मनोबल बढ़ाने के लिये लोगों से थाली और ताली भी पिटवाई। और उससे भी बात नहीं बनी तो उसके बाद 21 दिनों की घरबंदी भी कर दी।
-यह जो जनता कर्फ्यू से पहले 12 घंटे में महामारी फैलाने वाले वायरस के मर जाने की बात हो रही थी, वह क्या था?
-जी, ये तो अफवाहें थीं, अफवाहों का क्या?
-घरबंदी के क्या फायदे हुए?
-बहुत फायदे हुए जी। आपने इंस्टाग्राम पर सेलीब्रिटीज की तस्वीरें नहीं देखीं? घर में रहकर लोगों ने क्या -क्या प्रयोग नहीं किये? क्या -क्या नया नहीं सीखा। महामारी का भी जहां तक सवाल है, काफी कंट्रोल में आई है।
-ये ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के पुन:प्रसारण का महामारी से क्या कनेक्शन है?
-गहरा कनेक्शन है जी। ‘रामायण’ जब पहली बार टेलीकास्ट हुआ था तो सड़कों पर कर्फ्यू लग जाता था, अब कर्फ्यू में टेलीकास्ट हो रहा है। ‘महाभारत’ का तो पता ही होगा, 18 दिन चला था सो हमने महामारी के खिलाफ जंग जीतने का लक्षय 21 दिन का रखा।
-घरबंदी का आइडिया कैसे सूझा?
-देखिये, हम 24×7 काम करने वाले लोग हैं, सोचते बाद में हैं पहले करते हैं। सो आइडिया तो हमें अपने आप सूझते हैं। सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ती। और हमारी खुशकिस्मती है कि हमारे आइडिया क्लिक भी कर जाते हैं।
-यह जो लाखों लोग सड़कों पर भटकते नज़र आ रहे हैं, इनका क्या? क्या यह रोज़ी रोटी छिनने के कारण सड़कों पर हैं?
-लापरवाह लोग हैं जी। अपनी भी जान खतरे में डाल रहे हैं और लोगों को भी महामारी दे देंगे।
-कुछ लोगों के मरने की भी खबरें हैं, दुर्घटनाओं में, भूखे-प्यासे मीलों पैदल चलने के कारण।
-अफवाहें हैं जी, अफवाहों का क्या? नोटबंदी के समय भी बैंकों की कतारों में लोगों के मरने की अफवाहें थीं, भला यह भी कोई मानने वाली बात है? फिर, इन्हें हमारे पीएम की खींची लक्षमण रेखा पार करने को किसने कहा था? छुट्टियां मिली थीं एंजॉय करते घरों में बैठकर। टीवी पर ‘रामायण’, ‘महाभारत’, ‘वागले की दुनिया’ देखते। नेटफ्लिक्स पर ‘हंगर गेम्स’ का मज़ा लेते। नई-नई रेसिपी ट्राई करते। कुछ क्रिएटिव कर लेते पेंटिंग-शेंटिंग, कविता-फविता। म्युजिक सुनते। खुद भी गाने गाते और स्मार्ट फोन के जरिये अपनों को भेजते। कितना कुछ है करने को? पर नहीं गांव जाना है। अब कुछ गैरजिम्मेवार लोगों के लिये हम 130 करोड़ भाई-बहनों की जान खतरे में तो नहीं डाल सकते थे न? सो घरबंदी जारी रखने का फैसला किया हमने। सख्त घरबंदी और अपने गरीब भाइयों, बहनों से भी अनुरोध करेंगे कि प्राण जाएं, लक्ष्मण रेखा न लांघी जाए।

#कोई नहीं जी!
-महेश राजपूत

https://baithethaley.blogspot.com/ से साभार

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